Sunday, 14 February 2010

पढ़ना-लिखना जरूरी : कुम्भ में हम : भाग- पांच

साधु पढ़े-लिखे होते हैं या नहीं? ज्यादातर तो कम उम्र में साधु बन जाते हैं। औपचारिक शिक्षा नहीं मिल पाती है। पोथी कम पढ़ते हैं, सुनकर ज्यादा जानते हैं और जीवन से सीखते हैं। हरिद्वार में भगवानदास जी से पढ़ाई-लिखाई पर भी चर्चा हुई, उन्होंने स्वीकार किया कि अब पढ़ाई-लिखाई बहुत जरूरी हो गयी है, वरना संस्थाओं को चलाना कठिन है। प्रबंधन में कठिनाई आती है। पढ़े-लिखे होने से सुविधा होती है, संवाद भी आसानी से होता है। साधुओं का काम बढ़ता जा रहा है। उनकी संस्थाओं का निरन्तर विस्तार होता जा रहा है। समाज में श्रद्धा का भी विकास हुआ है। गांधी जी जब १९१५ में कुंभ में आए थे, तब उन्होंने जिक्र किया है कि 19 लाख लोग कुंभ आए थे। आज कुंभ में करोड़ों लोगों के आने की संभावना है। कुंभ जनवरी मध्य से शुरू हुआ है और अप्रेल मध्य तक चलेगा। बिना शिक्षा व लिखित, सुनिश्चित प्रबंधन के कुंभ को सम्भालना कठिन है। साधुओं की देश में हजारों संस्थाएं हैं, संस्थाओं का काम बढ़ रहा है। कांवड़ यात्राओं में पहले बहुत कम लोग आते थे, अब लाखों की संख्या में आते हैं। मन्दिरों में दान कम होता था, लेकिन अब बहुत होता है। साधुओं की संख्या भी घटने की बजाय बढ़ रही है। धार्मिक भारत का आकार बढ़ रहा है। पढ़ाई-लिखाई जरूरी होती जाएगी। मठों या आश्रमों का संचालन वही साधु कर पाएंगे, जो पढ़े-लिखे होंगे। अतः न केवल साधुओं के संगठनों को बल्कि सरकार को भी साधुओं की शिक्षा का ध्यान रखना चाहिए। साधुओं से दूरी बनाना ठीक नहीं है। यह दूरी साधुओं के लिए ज्यादा हानिकारक नहीं है, यह देश और सरकार के लिए हानिकारक है। साधु भारतीय चेतना के ही अंग हैं। उनका ध्यान देश को रखना चाहिए। साधुओं की ओर घृणा या भय से देखने की बजाय जिज्ञासा और प्रेम से देखना चाहिए।
आधुनिकता साधुओं को नकारने में नहीं, उन्हें समझने में है। साधुओं के चिन्तन पर दृष्टि रखने की आवश्यकता है। कम से कम पढ़ाई-लिखाई के धरातल पर हम साधुओं को समझ सकते हैं, लेकिन ऐसा तभी सम्भव है, जब साधु पढ़े-लिखे हों। वे पढ़े-लिखे होंगे, तो न केवल प्राचीन भारत उनकी छत्रछाया में सुरक्षित होगा, बल्कि वे आधुनिक भारत को भी निर्देशित कर सकेंगे।

कहां से आते हैं साधु?

हमारे देश में साधुओं का मजाक उड़ाने की छूट है, तो बड़ी सहजता से उनका मजाक उड़ाया जाता है। ऐसा भी नहीं है, साधुओं का मजाक उड़ाने के खिलाफ कानून बना दिया जाए, स्वयं साधु ऐसे किसी कानून का विरोध करेंगे। कबीर कह गए थे, निन्दक नियरे राखिये। निन्दा भले ही किसी को अच्छी नहीं लगती, लेकिन निन्दा से कुछ न कुछ हर कोई सीखता अवश्य है। साधु होना कतई आसान नहीं है। गांधी जी १९१५ में हरिद्वार में लगे कुंभ में आए थे। उन्होंने साधुओं को मालपुए छकते देखा था और यह अनुमान भी लगाया था कि ये लोग शायद पकवान छकने के लिए ही साधु बने हैं। हां, वैसे भी साधु होते होंगे, लेकिन तब भी साधु होना आसान नहीं है। पहले वे घर-परिवार छोड़ते हैं, बाद में घर-परिवार ही उन्हें अपने से दूर भगाने लगता है। अकेलेपन से इनकार नहीं किया जा सकता। आज आधुनिक चमक-दमक को देखकर यह कहना मुश्किल नहीं है कि कई साधु अवसाद ग्रस्त रहते होंगे। उन्हें तपस्या निरर्थक मालूम पड़ती होगी। वैज्ञानिक आधुनिकता ने एक स्वर्ग-सा परिवेश पृथ्वी पर रच ही दिया है, वह अवश्य साधुओं को लुभाता होगा। ह्रदय को लुभाने वाली तमाम बुराइयों से बचकर साधु होना कदापि आसान नहीं है। बुराइयों वाले भी हैं, लेकिन उन्हें सच्चा सुख-सन्तोष नहीं मिल सकता। जो बुरा होगा, उसका मन जानता होगा कि वह साधु नहीं है। कोई दूसरों को धोखा दे सकता है, लेकिन अपने आप को नहीं।
जब मैंने जाने-माने पत्रकार रामशरण जोशी जी को कुंभ यात्रा की योजना के बारे में बताया था, तब उन्होंने कहा था कि वहां यह पता करने की कोशिश करना कि अब साधु अमीर परिवार से आ रहे हैं या गरीब परिवार से। यह सवाल मेरे मन को मथ रहा था। हरिद्वार में जब महामण्डलेश्वर भगवानदास जी से बात हुई, तब उन्होंने कहा, अमीर परिवारों से भी लोग आते हैं साधु बनने। हालांकि उन्होंने माना कि ऐसे साधुओं की तादाद कम है। लोग ईश्वर से मन्नत मांगते हैं, सन्तान दो, भले ही साधु बनाकर अपनी सेवा में लगा लेना। ऐसे बच्चे भी साधु बनते हैं। गरीब परिवार के लोग बड़ी संख्या में साधु बनते हैं। अभाव से आहत होकर वैराग्य का जागना स्वाभाविक है। साधु बनकर कम से कम दो जून की रोटी का तो जुगाड़ हो ही जाता है। दूसरी बात कि साधु बन जाओ, तो फिर कोई जाति नहीं पूछता। पूजा-पाठ से मानसिक सुख तो मिलता ही है। इहलोक ही नहीं, परलोक भी सुधरने की आश्वस्ती रहती है। साधु बनने के अपने कई फायदे हैं, लेकिन इसके बावजूद साधु होना दुष्कर है। साधुओं की पवित्रता और उनका आध्यात्मिक विकास होना अत्यन्त आवश्यक है। अच्छे साधु ही अच्छे लोगों को आकर्षित करते हैं। गौतम बुद्ध हों या भगवान महावीर राजसी पृष्ठभूमि से आए थे, लेकिन उनके समय भी अमीर पृष्ठभूमि से साधु कम ही आते थे, यह कोई नई बात नहीं है। गरीबों के देश में गरीबों के घर से साधु नहीं आएंगे, तो कहां से आएंगे?

Friday, 12 February 2010

नागा साधु हैं, तो हम हैं

कुम्भ में हम : भाग - तीन

अगर आपने नागा साधुओं को नहीं समझा, तो आप यह नहीं जान पाएंगे कि हमारे राष्ट्र में सनातन धर्म की रक्षा के लिए कुछ हजार लोगों को क्यों सर्वस्व लुटाना पड़ा था? सचमुच, सच्चा हिन्दुत्व किसी राजनीतिक पार्टी या संगठन के पास नहीं, कुंभ मेला परंपरा के पास है। चूंकि कुंभ की परंपरा समाप्त नहीं हो सकती, इसलिए हम आश्वस्त रह सकते हैं कि भारत समाप्त नहीं हो सकता। नंग-धड़ंग, जटा-जूट, भभूत, अस्त्र, शस्त्र नागाओं की पहचान हैं। पहली नज़र में वे किसी को भी भयावह नज़र आते हैं।
हरिद्वार में हमने एक युवा साधु को अपने ही चूल्हे की राख से निकाल भभूत लपेटते देखा, तो दूसरे साधु से पूछा, भभूत क्यों लपेटते हैं?
उत्तर मिला, खराब दिखने के लिए। खराब दिखेंगे, तो लोग निकट नहीं आएंगे। आकर्षण नहीं बनेगा। आकर्षण नहीं बनेगा, तो वैराग्य को बल मिलेगा।
यह उत्तर मेरे मन को मथता रहा। खुद को सशक्त बनाने के लिए कितना कष्ट सहा है साधुओं ने। युवा साधु भभूत बड़े मन से लपेट रहा था।
मैंने फिर पूछा, गंगा में नहाएंगे, तो भभूत बह जाएगा।
मुस्कराहट के साथ उत्तर मिला, ये तो गंगा से निकलकर फिर भभूत लपेट लेंगे। उत्तर सुनकर मुझे खुशी हुई। भभूत लपेटने के बाद मात्र हथेली को धो रहे साधु के मुख पर प्रसन्नता तैर रही थी। आकर्षणहीन हो जाने की यह प्रसन्नता भी नागाओं को बल प्रदान करती होगी।
भभूत प्रेमी डरावने नागाओं के पीछे भारत की विशाल संघर्ष कथा विराजमान है। निस्सन्देह, कभी यह देश केवल सीधे-सादे साधुओं का रहा होगा। आज भी है, लेकिन जिन जमातों ने भारत की अपनी परंपरा पर समय-समय पर निर्मम आक्रमण किए, भारत को भारत से अपदस्थ करने हेतु आक्रमण किए, उन आक्रमणों के प्रतिउत्तर स्वरूप हमारी संस्कृति में नागाओं का पदार्पण हुआ। जिन साधुओं ने सहजता से गर्दन कटाना स्वीकार नहीं किया, वे नागा बन गए। शस्त्र-अस्त्र उठा लिया। अपने आप को बाह्य और आन्तरिक रूप से अत्यन्त कठोर बना लिया, ताकि आक्रमणों का उचित प्रतिउत्तर दे सकें, ताकि सनातन संस्कृति को बचाया जा सके, ताकि दुनिया को यह बताया जा सके कि भारतीय साधुओं ने चुडीयाँ नहीं पहन रखी हैं।
इतिहास गवाह है, दूसरे कुछ पन्थों-धमो ने जो अखाड़े दिए, उनसे आतंकवाद पनपा, बच्चों और स्त्रियों की भी हत्या हुई। लेकिन सनातन संस्कृति या हिन्दुओं की पीड़ा से जो अखाड़े उपजे, उन्होंने कभी किसी निर्दोष को नहीं मारा।
कुंभ में नागाओं के जनसमुद्र को देखकर रोम-रोम पुलकित हो जाता है। सुरक्षा अनुभूत होने लगती है। वे हमारी सनातन संस्कृति के माता-पिता नज़र आने लगते हैं। वे हैं, तो हम आश्वस्त हैं कि हमें भारत भूमि से कोई अपदस्थ नहीं कर पाएगा।

इनके राम ऑफलाइन?

इनके राम भला ऑन लाइन क्यों न हों? अब ऑफ लाइन रहने से रामानन्दियों का संसार में गुजारा कैसे चलेगा? इसमें कोई संदेह नहीं कि वे सीधे-सादे और सहज हैं, लेकिन मुझे ऐसा लगा कि अध्ययन व ज्ञान-विज्ञान के बारे में समय के हिसाब से सिद्ध नहीं हैं। मेरा मानना रहा है कि भविष्य में वही साधु ध्यान धारा में अंगद की तरह पांव टिका पाएगा, जो पर्याप्त पढ़ा-लिखा होगा। भव सागर में राम नाम की अतुलनीय पतवार काम तो आएगी, लेकिन संघर्ष के समय नाव के पलटने या पलायन कर जाने की आशंका बनी रहेगी। ज्ञान का साम्राज्य भी रामानंदियों से भरा पूरा रहना चाहिए.
यह संप्रदाय बहुत पुराना है, लेकिन उसके जो प्रमुख केन्द्र हैं, उनके रखरखाव और वैभव में वृद्धि समय के हिसाब से नहीं है। जबकि कई दूसरे संप्रदाय या मठ कुछेक वर्ष पहले ही आए हैं, लेकिन मात्र बेहतर अध्ययन व तैयारी की वजह से चमकदार हो गए हैं, सबको नज़र आ रहे हैं, जबकि रामानन्द संप्रदाय अपनी सर्वकालिकता, गुणसंपन्नता, सज्जनता, पारंपरिकता व अटूट तपस्या व संघर्ष के बावजूद प्रचार से दूर है। कई नए-नए फिजूल के मठ ऑन लाइन हो गए, लेकिन यह राष्ट्र अनुकूल श्रेष्ठ मठ या संप्रदाय अभी भी ऑफ लाइन है। साधु होने का कदापि यह मतलब नहीं है कि जड़ हो जाया जाए। राम नाम जप रहे हैं और राज-पात ख़ाक हो रहा है। सच्ची साधुता इसमें है कि समाज की आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को परिवर्तित किया जाए। समाज के रक्षार्थ जीना और संघर्ष करना वही जानता है, जो सच्चा साधु है। यह बात साधुओं से बेहतर कौन जानता है। नागा साधु तो संघर्ष की सर्वश्रेष्ठ मिसाल रहे हैं।
ध्यान से सुना जाए, राम महाराज रामानन्दियों को ऑन लाइन धरा पर भी पुकार रहे हैं।

कुम्भ में हम


अगर आपने कुंभ नहीं देखा, तो आप यह नहीं जान पाएंगे कि मेला क्या होता है? मेला केवल टिक्की, चाट, समोसे, जलेबी, पिज्जा, बर्गर, झूला, बैलून, चरखी बिकने का स्थान नहीं है। मेला तो व्यापक है। मेला तो जितना बाह्य है, उससे कहीं ज्यादा आन्तरिक है। जो मेला पावन तपस्वियों की ह्रदय परिधि में पहले लगता है और बाह्य व्यवस्थाएं बाद में बनती हैं, वही सच्चा मेला है, वही अच्छा मेला है और बस वही काम का मेला है।
मेरी बड़ी इच्छा थी, कुंभ मेला देखूं। जन्म कुछ सार्थक करूं, तो इस बार 5 फरवरी को हरिद्वार गया। सोचा था, साधुओं के रामानन्द आश्रम में रहूंगा, लेकिन आश्रम में केवल साधु विराजमान थे। तरह-तरह के साधु। हर उम्र के साधु। भभूत लपटते, ध्यान करते, धूनी रमाते वैरागी अर्चनालीन, रामभक्त रामानन्दी सीधे-सादे साधु। परिवार मेरे साथ था। साधुओं को अटपटा लगता, तो आश्रम के सामने ही एक होटल में साधुओं ने ही ठहरवा दिया। आश्रम के प्रमुख महामण्डलेश्वर श्री भगवानदास जी का यह आदेश था। आश्रम में ठहरने की इच्छा अधूरी रही, मन थोड़ा भारी हुआ। खैर, सुबह ही हम कमरे से निकल जाते थे। भोजन का समय होता, तो साधु अपने चेलों को हमें बुलाने भेजते थे। ठीक साढ़े आठ बजे रात घंटी बजती थी, साधुओं को भोजन-प्रसाद का समय बताती। मेरी भी इच्छा थी, एक बार मैं भी भोजन प्रसाद ग्रहण करूं। तो सात फरवरी की रात पात में बैठे सैकड़ों साधुओं के समीप मैं भी जा बैठा सपरिवार। पत्तल आया, गिलास आया। फिर आई बहुत ही स्वादिष्ट खिचड़ी, पत्ता गोभी की सब्जी और चपाती, अचार। जितना मन करे, उतना छकिए, कोई रोक नहीं। आनन्द हो गया। शायद कोई सुकर्म फलीभूत हुआ हो, वर्ना साधुओं के हाथ का बना प्रसाद साधुओं के हाथों से प्राप्त करना कहां-कितनों को सम्भव होता है?
महात्मा रामानन्द जी कण-कण में राम देखते थे, आज भी परंपरा जीवित है। कोई भी बैठे पात में प्रसाद सबको मिलेगा, न जात पूछी जाएगी, न पन्थ। स्वभाव में इतनी निर्मलता कि रामानन्दी साधु एक दूसरे को महात्मा या सीताराम कहकर संबोधित करते हैं। अरे महात्मा ये क्या कर रहे हैं, नल तो बन्द कीजिए। लगता है सीताराम सो गए हैं। ऐसे मीठे वाक्य सुनकर आज भी यादें गदगद हैं।
निस्सन्देह, अब मैं सबको बता सकूंगा कि कुंभ से मैंने क्या पहला श्रेष्ठ अनुभव प्राप्त किया।

Sunday, 31 January 2010

संघ को बधाई


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बधाई। क्षेत्रवाद के खिलाफ उसका आदेश-निर्देश हाले ही बहुत देर से आया है, लेकिन उसे उत्तर भारतीयों की रक्षा के लिए अब अडिग रहना चाहिए। संघ को नया इतिहास लिखना है। अभी तक यही बात इतिहास में दर्ज है कि जब मुम्बई में गरीब उत्तर भारतीय लोग शिव सैनिकों व नवनिर्माण सेना के कथित राष्ट्र प्रेमी योद्धाओं के हाथों पिट रहे थे, तब स्वयंसेवकों का खून नहीं खौला था। क्या ऐसा इसलिए हुआ था, क्योंकि संघ का मुख्यालय नागपुर, महाराष्ट्र में है? शायद ऐसा पहली बार हुआ है कि संघ ने शिव सेना को ललकारा है। शिव सेना जब मुम्बई पर अपनी बपौती की कोशिश में लगी है, तब संघ का हस्तक्षेप वाकई हर्ष पैदा करता है। बाला साहेब ठाकरे के हमलों का कोई तो जवाब दे और यह ताकत संघ में है। राष्ट्रीय एकता के लिए उससे बेहतर संघर्ष और कोई नहीं कर सकता।
बाला साहेब को दोटूक जवाब मिलना चाहिए कि क्षेत्रवादी हिंसा करने वालों को राष्ट्र की चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है। क्षेत्रवादी हिंसा के समर्थकों को नस्लीय हिंसा पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है। पिछले दिनों शिव सेना प्रमुख ने धमकी दे डाली थी कि अगर ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हमले नहीं रुके, तो ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट खिलाडियों को महाराष्ट्र में क्रिकेट खेलने नहीं दिया जाएगा। गौर कीजिए, शिव सेना की नीति और घृणा फैला रहे ऑस्ट्रेलिया के लोगों में समानता है। ऑस्ट्रेलिया के लोगों की शिकायत है कि भारतीय लोग ऑस्ट्रेलियाई परंपराओं से नहीं जुड़ते हैं और अलग समुदाय बनाकर रहते हैं, ठीक इसी तरह की शिकायत शिव सेना को उत्तर भारतीयों से रही है। ऐसे में, शिव सेना का ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मुंह खोलना शर्मनाक है।
शाहरुख और आमीर खान को टु इडियट्स कहा गया? शाहरुख को देशद्रोही कहा जा रहा है। क्या मजाक है? क्षेत्रवादी शिव सेना देशप्रेम का प्रमाणपत्र बांट रही है। यह बात नई नहीं है, बाला साहेब अकसर भारतीय क्रिकेट खिलाडियों और अभिनेताओं को आत्म सम्मान और देशभक्ति की नसीहत देते हैं, जब मुम्बई में क्षेत्रवादी हिंसा हो रही थी, तब उनकी देशभक्ति कहां थी? तब कहां था भारतीय होने का आत्म सम्मान ? बाला साहेब की राजनीति मराठियों को भी समझ में आने लगी है, तभी तो उनके लिए सत्ता दूर की कौड़ी हो गई है।
ऐसे लोगों से देशवासियों को सावधान रहना चाहिए। बाला साहेब ठाकरे का क्या है, वे तो कुछ समय तक राष्ट्र चिन्तन के बाद क्षेत्र चिन्तन में लौट जाएंगे। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को तो सदैव राष्ट्र चिन्तन में सक्रिय रहना चाहिए। क्षेत्रवाद के खिलाफ किसी राजनीतिक पार्टी से भारत राष्ट्र की जनता को कोई आशा नहीं है। क्षेत्रवाद क्या देशद्रोह से कम है?

Monday, 18 January 2010

ज्योति बसु का न होना


अन्तिम लाल सलाम
रविवार, 17 जनवरी को भारतीय वामपन्थ ने अपना सबसे कामयाब क्वलाइट हाउसं गंवा दिया। ज्योति बसु के न होने से अब जो वाम सागर पीछे छूट गया है, उसमें भटकाव की आशंकाएं बहुत बढ़ गई हैं। आज से पहले जब वामपन्थी भटकते थे, तब ज्योति बाबू लाइट हाउस की भूमिका में आकर भटकाव से बचने की अपील तो करते ही थे। अब यह अलग सवाल है कि ज्योति बाबू की अपील पर कितने कॉमरेडों ने ध्यान दिया। कोई शक नहीं कि उनकी अपीलें अगर मानी गई होतीं, तो वामपन्थ सत्ता की राजनीति में ज्यादा प्रभावी रहता और देश की ज्यादा सेवा कर पाता। वामपन्थ और लोकतन्त्र, दो अलग दिशाओं में बहती विचारधाराएं हैं, लेकिन ज्योति बसु दोनों के बीच न केवल तालमेल बनाए हुए थे, बल्कि उन्होंने सत्ता का स्वाद भी भरपूर लिया। दुनिया के कोने-कोने में सत्ता में वर्चस्व के लिए संघर्षरत वामपन्थियों को उनसे इर्ष्या होती थी कि एक कॉमरेड मुख्यमंत्री कार्यालय में कैसे 23 साल तक विराजमान रहा। विरोधी विचारधाराओं के लोग चाहे जो कहें, कॉमरेडों के लिए वे आदर्श थे, उनके दर्शन से ही कॉमरेडों को सुख मिल जाता था। उनसे राजनीतिक गुर सीखकर यथोचित मार्ग मिल जाता था। सार्वजनिक लोकतान्त्रिक जीवन जीने में सहूलियत बढ़ जाती थी। वामधारा में चूंकि राजनीतिक संगठन बहुत कट्टर और विचारधारा के प्रति बहुत दृढ़ होते हैं, इसलिए सत्ता में रहते हुए उनसे समन्वय बिठाना एक अत्यन्त कठिन कार्य होता है, लेकिन इस कार्य को ज्योति बसु ने शायद सबसे कुशलता और लोकप्रियता के साथ अन्त समय तक निभाया।
आज जब वे नहीं हैं, तब अक्सर उनका मार्ग रोकने वाले माकपा संगठन के लोगों को अनुभव होना चाहिए कि उन्होंने कितना सच्चा -अज्छा समर्पित कॉमरेड गंवाया है। बहरहाल, हर लोकतान्त्रिक नेता की तरह ज्योति बसु के हिस्से में भी कई सफलताओं के साथ कुछ विफलताएं भी आई। वे मार्क्सवाद और वैज्ञानिक समाजवाद को अपना राजनीतिक दर्शन मानते थे, लेकिन दोनों ही मोर्चों पर उन्हें ज्यादा सफलताएं नहीं मिलीं। भूमि सुधार से पश्चिम बंगाल के समाज में व्यापक सकारात्मक बदलाव तो हुए, लेकिन जरूरत कई तरह के सुधारों की थी, जो शायद दलगत व भारतीय व्यवस्था की विधिगत मजबूरियों की वजह से सम्भव न हो सके। उनके प्रदेश की वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक स्थिति कमजोर होती गई, केवल राजनीतिक शक्ति को सत्ता का सहयोग मिला। आंकड़े बताते हैं, पश्चिम बंगाल विकास की दौड़ में अनेक राज्यों से पीछे दौड़ रहा है। हां, ज्योति बसु को इस बात श्रेय अवश्य जाता है कि नवंबर 2000 तक उनके मुख्यमंत्री रहने तक पश्चिम बंगाल में असन्तोष ज्यादा नहीं उभर सका था, क्योंकि वे तमाम तरह के असन्तोषों के सामने स्वयं समाधान बनकर खड़े हो जाते थे। वे थे, तो वाम संगठन के लोग चादर तानकर सोते थे, लेकिन अब उनके न रहने से वह चादर छिन जाने को है। पश्चिम बंगाल में चादर की सलामती के लिए वामपन्थियों को फिर भूमि सुधार जैसे किसी बड़े उपयोगी सुधार की जरूरत है। वे अगर सुधार करना चाहेंगे, तो उनके लिए ज्योति बसु का उदारवाद-समन्वयवाद कदम-कदम पर कारगर साबित होगा।

- राजस्थान पत्रिका के लिए मेरे द्वारालिखा गया सम्पादकीय -

Friday, 15 January 2010

जेपी का गांव














जब भी जयप्रकाश नारायण के बारे में पढ़ता था, मन में यह बात उठती थी कि एक बार उनके गांव जाकर देखना चाहिए। बचपन से ही यह सुनता आया था कि मेरे अपने गांव से जयप्रकाश नारायण का गांव बहुत दूर नहीं है। पिछले साल 28 अक्टूबर को जेपी के गांव जाने का सपना साकार हुआ। अपने गांव शीतलपुर बाजार से मांझी तक सड़क ऐसी थी कि नीतीश कुमार पर बहुत गुस्सा आ रहा था। नीतीश ने उत्तरी बिहार पर बहुत कम ध्यान दिया है। स्थानीय नेता तो बस चुनाव जीतने और हारने के लिए ही आते हैं। कई नेता तो यह मानकर लूट मचाते हैं कि अगली बार जनता मौका नहीं देगी। कहीं सड़क पर खड्ढे हैं, तो कहीं खड्ढे में सड़क। ऐसी सड़कों पर पैदल चलना भी चुनौतीपूर्ण है। सात किलोमीटर दूर मांझी पहुंचने में लगभग पैंतालीस मिनट लग गए। फिर सरयू पर बना नया पुल पार किया, यह पुल भी लगभग बीस साल में तैयार हुआ है। खराब सड़कों की वजह से पुल से वाहनों की आवाजाही अभी कम ही है। खैर, आगे भी सड़क कहने को राजमार्ग है, हालत खस्ता है।
जेपी के गांव सिताब दीयरा के लिए छपरा-बलिया सड़क मार्ग से बाईं ओर मुड़ना होता है। दीयर का इलाका भी मैंने पहली बार देखा। दूर-दूर तक सपाट खेत, ऊंची सड़क से कहीं कहीं धूल उड़ाती गुजरती कार। सिताब दीयरा बहुत बड़ा गांव है, शायद 27 टोलों का। सड़क की बाईं ओर समानांतर लगभग पांच सौ मीटर दूर गांव शुरू हो चुका है, अपेक्षाकृत अच्छी, लेकिन सूनी सड़क पर पूछते-पूछते हम आगे बढ़ रहे हैं। जेपी ने चंबल में डकैतों से समर्पण करवाया, लेकिन उनका खुद का इलाका हमेशा से चोरों-लुटेरों से परेशान रहा है। जिस सड़क से हम गुजर रहे हैं, वह सुरक्षित नहीं है। बाईं ओर कई टोलों को पार करते हुए दाईं ओर एक टोला नजर आता है, पूछने पर पता चलता है, हां, इधर ही जयप्रकाश नारायण का घर है। उनके टोले में प्रवेश करते हुए लगता है कि किसी पॉश कॉलोनी में आ गए हैं। कई शानदार भवन, बागीचे, द्वार, अच्छी सड़कें। कोई भीड़भाड़ नहीं है। टोले के ज्यादातर लोग शायद बाहर ही रहते हैं। बाहर से भी यहां देखने के लिए कम ही लोग आते हैं। इस टोले का नाम पहले बाबुरवानी था, यहां बबूल के ढेरों पेड़ थे। जेपी के जन्म से काफी पहले जब सिताब दीयरा में प्लेग फैला, तो बचने के लिए जेपी के पिता बाबुरवानी में घर बनाकर रहने आ गए।
दीयर इलाका वह होता है, जो नदियों द्वारा छोड़ी गई जमीन से बनता है। सिताब दियरा गांव गंगा और सरयू के बीच पड़ता है। नदियां मार्ग बदलती रहती हैं। कभी यह गांव बिहार में था, लेकिन अब उत्तर प्रदेश में है, हालांकि बताया जाता है, राजस्व की वसूली बिहार सरकार ही करती है। वैसे भी ऐसी जमीनें हमेशा से विवादित रही हैं। जेपी के दादा दारोगा थे और पिता नहर विभाग में अधिकारी, अतः जेपी के परिवार के पास खूब जमीन थी। आजादी के बाद भी काफी जमीन बच गई। चूंकि दीयर इलाके में हर साल बाढ़ आती है, इसलिए मजबूत घर बनाना मुश्किल काम है, अतः जेपी के घर की छत खपरैल वाली ही थी। आज भी उनका घर बहुत अच्छी स्थिति में रखा गया है। देख-रेख बहुत अच्छी तरह से होती है। जेपी के गांव जाने से दो दिन पहले मैं डॉ राजेन्द्र प्रसाद के गांव भी गया था। जेपी का गांव मेरे गांव से 34 किलोमीटर दूर, तो राजेन्द्र बाबू का गांव 52 किलोमीटर दूर है। राजेन्द्र जी के गांव में उनकी उपेक्षा हुई है, जबकि सिताब दीयरा में जेपी सम्मानजनक स्थिति में नजर आते हैं।
यहां यह उल्लेख जरूरी है कि राजेन्द्र प्रसाद और जेपी के बीच रिश्तेदारी भी थी। राजेन्द्र बाबू के बड़े बेटे मृत्युंजय प्रसाद और जेपी साढ़ू भाई थे।
जेपी का घर, दालान, उनका अपना कमरा, उनकी वह चारपाई जो शादी के समय उन्हंे मिली थी, उनकी चप्पलें, कुछ कपड़े, वह ड्रेसिंग टेबल जहां वे दाढ़ी बनाया करते थे, सबकुछ ठीक से रखा गया है, जिन्हें देखा और कुछ महसूस किया जा सकता है। उनके घर की बाईं ओर शानदार स्मारक है। जहां उनसे जुड़े पत्र, फोटोग्राफ इत्यादि संजोए गए हैं। पत्रों में डॉ राजेन्द्र प्रसाद द्वारा राष्ट्रपति रहते हुए भोजपुरी में लिखा गया पत्र भी शामिल है। इंदिरा गांधी, महात्मा गांधी, पंडित नेहरू इत्यादि अनेक नेताओं के पत्र व चित्र दर्शनीय हैं। दरअसल, बलिया में सांसद रहते चंद्रशेखर ने जेपी के प्रति अपनी भक्ति को अच्छी तरह से साकार किया है। चंद्रशेखर की वजह से ही बाबुरवानी का नाम जयप्रकाश नगर रखा गया है। उन्हीं की वजह से बाहर से आने वाले शोधार्थियों के पढ़ने लिखने के लिए पुस्तकालय है, तीन से ज्यादा विश्राम गृह, स्थानीय लोगों के रोजगार के लिए कुटीर उद्योग हैं। काश, राजेन्द्र प्रसाद को भी कोई चंद्रशेखर जैसा समर्पित प्रेमी नेता मिला होता। चंद्रशेखर वाकई धन्यवाद के पात्र हैं। उजाड़ दीयर इलाके में उन्होंने जयप्रकाश नगर बनाकर यह साबित कर दिया है कि अपने देश में नेता अगर चाहें, तो क्या नहीं हो सकते।
लेकिन न जेपी रहे और न चंद्रशेखर। तो क्या जयप्रकाश नारायण नगर का वैभव बरकरार रह पाएगा? मोटे तोर पर जयप्रकाश नगर का विकास चंद्रशेखर की ही कृपा से हुआ, सांसद निधि से भी कुछ पैसा मिला करता था। स्मारक इत्यादि के लिए सरकार ने कभी कोई बजट नहीं दिया। जो नेता या पदाधिकारी आते थे, अपने विवेक से कुछ दान की घोषणा कर जाते थे। चंद्रशेखर के पुत्र नीरज शेखर, जो अब बलिया से सांसद हैं, स्मारक का ध्यान रख रहे हैं, लेकिन जयप्रकाश नगर में कुछ न कुछ बदलेगा, लेकिन जो भी बदलाव हो, उससे वैभव में वृद्धि ही हो, ताकि यहां आने वालों को सुखद अहसास हो।
यह पावन भूमि जेपी जैसे महान नेता की जन्मभूमि है। एक ऐसे नेता की भूमि है, जो महात्मा गांधी को चुनौती देने की हिम्मत रखता था। जिसमें पंडित नेहरू भी प्रधानमंत्री होने की सारी योग्यताएं देखते थे। जिन्होंने सदैव दलविहीन लोकतंत्र की पैरोकारी की। वे चाहते थे कि प्रतिनिधि सीधे चुनाव जीत कर आएं, राजनीतिक दलों के चुनाव लड़ने को वे गलत मानते थे। वे किसी भी क्षण सत्ता के चरम पर पहुंच सकते थे, लेकिन उन्होंने सत्ता के बजाय जन-संघर्ष का रास्ता चुना। सरकारी लोग उनके नाम से कांपते थे। उनका प्रभाव सत्ता में बैठे नेताओं से भी ज्यादा था। उन्होंने संपूर्ण क्रांति से देश की भ्रष्ट सत्ता को चुनौती दी। उन्होंने देश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार को संभव बनाया। उन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया। जीवन में सदैव नैतिक ऊंचाइयों को छूते रहे। उनके योगदानों की बड़ी लंबी सूची है। उनको चाहने वाले दुनिया के हर कोने में थे। अमेरिकी उन्हें पसंद करते थे, क्योंकि जेपी को बनाने में तब के जुझारू व मेहनतकश अमरीका का भी योगदान था, जेपी ने 1922 से 1929 तक अमरीका में रहकर मजदूरी करते हुए अध्ययन किया था। जब उनका निधन हुआ, तब सात दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा हुई थी। पटना में उनके अंतिम दर्शन के लिए विशेष रेलगाड़ियाँ चलाई गई थीं। निस्संदेह, उनकी यादों व स्मारकों की अहमियत हमेशा बनी रहेगी।
वाकई याद रहेगा जेपी का गाँव, मौका मिला तो फिर आयेंगे।

Friday, 1 January 2010

जगदगुरु रामनरेशाचार्य जी : पूज्य से भेंट



नव वर्ष में आकर जब पिछले को देखता हूं, तो सोचता हूं कि आखिर पिछले का क्या अगले में याद रह जाएगा या पिछले का क्या विशेष अगले में साथ रखने योग्य है। अगर किसी एक इंसान की चर्चा करूं, जिससे मैं लगातार मिलना चाहूंगा, तो वो हैं जगदगुरु रामनरेशाचार्य जी। हत् भाग्य पत्रकारिता ने मानसिकता ऐसी बना रखी है कि मन में प्रश्न आवश्यकता से अधिक उपजते हैं। प्रश्नों ने जितना भला नहीं किया है, उससे ज्यादा कबाड़ा किया है। हालांकि खोज तो सदा रही है कि कोई मेरे कबाड़ व पूरी मानसिक अव्यवस्था को व्यवस्थित कर दे। शास्त्री कोसलेन्द्रदास जी का धन्यवाद देता हूं और अफसोस भी जताता हूं कि उनके कई आग्रहों पर मैं ध्यान नहीं दे पाया, वरना अदभुत हस्ती रामनरेशाचार्य जी से मेरी भेंट बहुत पहले ही हो गई होती। इसी को सौभाग्य कहते हैं, वह तभी संभव है, जब भाग्य प्रबल हो, वरना दुर्भाग्य तो मेरे जीवन का एक अहम हिस्सा रहा है। ग्रेगोरियन कलेंडर के वर्ष 2009 को मैं इसलिए याद रखना चाहूंगा, क्योंकि इस वर्ष मेरी भेंट पूज्य रामनरेशाचार्य जी से हुई। 30 दिसंबर की वह दोपहर सदा मेरी स्मृति में अंकित रहेगी। गेरुआ चादर लपेटे लंबी कद काठी के लगभग छह फुट के पूज्य श्री की छवि सदैव स्मरणीय है। पांव में गेरुआ मोजे, सिर और कान को ढकते हुए बंधा गेरुआ स्कार्फ यों बंधा था, मानो किसी ईश्वर ने अपने इन योग्य सुपुत्र को अपने हाथों से बाँधा हो। चेहरे पर सहजता-सरलता ऐसी मानो कुछ भी बनावटी न हो, कुछ भी आडंबरपूर्ण न हो, कुछ भी छिपाना न हो, कुछ भी पराया न हो, सबकुछ अपना हो, सब सगे हों। मेरे साथ समस्या है, मेरी दृष्टि उस चेहरे पर नहीं टिक पाती, जो चेहरा मुझसे बात करता है, लेकिन पहली बार बिना बगलें झांके मैंने अनायास पूज्य श्री को देखा। मेरे बारे में शास्त्री कोसलेन्द्रदास जी ने उन्हें पहले ही बता रखा था। वे एक तरह से मेरे जैसे तुच्छ ब्यक्ति से मिलना चाहते थे । आदर -सत्कार के बाद पहले उन्होंने संपादन की चर्चा की। यहां यह बताना उचित होगा कि पूज्य श्री के श्रीमठ (जो वाराणसी में पंचगंगा घाट पर स्थित है) से स्वामी रामानन्द जी पर एक पुस्तक प्रकाशित हो रही है, जिसके संपादन में शास्त्री कोसलेन्द्रदास जी ने मेरा सहयोग लिया है, जिसके लिए मैं स्वयं को धन्य मानता हूं। जिस पावन श्रीमठ की स्थापना महान श्री स्वामी रामानन्द जी ने की थी, जिससे कबीर, रैदास, धन्ना, पीपा, सैन, तुलसीदास जी जैसी अनगिन महान विभूतियां निकलीं। जिन्होंने न केवल राम के नाम को जन-जन तक पहुंचाया, बल्कि समाज में धर्म भेद और जाति भेद को भी गौण बनाया। ऐसी महान विभूतियों को समाहित करने का प्रयास करती पुस्तक के संपादन में कुछ समय देकर सहयोगी बनना निस्संदेह सौभाग्य की बात है।
यह शायद मेरे भाग्य में लिखा था कि पहले मैं पूज्य रामानन्द जी को जानूं, उनके योगदान व शिष्यों को जानूं, उनकी छटांक भर सेवा करूं, उसके बाद ही मुझे पूज्य रामनरेशाचार्य जी के दर्शन सुलभ होंगे। देश में स्वतंत्र मन वाले जो कुछ सम्मानित धर्मगुरु हैं, उनमें रामनरेशाचार्य जी का नाम पूरी ईमानदारी के साथ समाहित है। राष्ट्र की मुख्यधारा राजनीति भी उनका महत्व जानती है। वे एक ऐसे गुरु हैं, जो किसी दलित को पुजारी बनाते हिचकते नहीं हैं, जो किसी मुस्लिम से मंदिर की नींव डलवाने का भी सु-साहस रखते हैं। तो संपादन की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, कौन-सा लेख कहां जाना चाहिए, किसका लेख पहले जाना चाहिए, यह तय करना महत्वपूर्ण कार्य है। अच्छे संपादन से अखबार चमक जाते हैं। स्वामी रामानन्द जी पर मेरे स्वयं के लेख ,थोथा दिया उड़ाय, को सराहते हुए उन्होंने कहा कि पुस्तकों से उद्धरण देकर तो बहुत लोग लिख लेते हैं। ऐसा हमेशा से होता रहा है। साल दर साल यही सब चलता है। इतिहास पुरुषों पर मौलिक लेखन कम होता है।
बिहार चर्चा
पूज्य श्री के साथ हुई बिहार चर्चा विशेष रही। उन्हें जब ज्ञात हुआ कि मेरी पैतृक भूमि बिहार है, तब उन्होंने उत्तर बिहार अर्थात पुराने छपरा जिला की विभूतियों को गिनाना शुरू किया। नामी संस्कृत विद्वानों के साथ-साथ उन्होंने कुंवर सिंह, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, भिखारी ठाकुर इत्यादि को याद किया। मैंने उन्हें बताया कि मेरे गांव से राजेन्द्र जी का घर 52 किलोमीटर दूर और जयप्रकाश नारायण का घर 34 किलोमीटर दूर स्थित है। मैंने यह भी बताया कि ठग नटवरलाल भी वहीं के थे, राजेन्द्र प्रसाद के गांव के बगल के, तो उन्होंने कहा कि लालू प्रसाद यादव भी वहीं के हैं। लेकिन उनका जोर उस भूमि की प्रशंसा पर था। उन्होंने बताया, सिकंदर ने पंजाब जीत लिया, लेकिन उसकी हिम्मत मगध या बिहार की ओर बढ़ने की नहीं हुई, क्योंकि वहां नंद वंश का शासन था। ऐसी धारणा थी कि अगर सिकंदर की सेना बिहार पर आक्रमण करती, तो कोई जीवित नहीं लौटता। इस बीच उन्होंने रहस्योद्घाटन किया कि हम भी वहीं से आते हैं। यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि पूज्य श्री का गांव भोजपुर के जगदीशपुर के परसिया में पड़ता है। ईश्वर ने चाहा, तो कभी उनके गांव की यात्रा करूंगा।
मेरे पैर सो गए
उनके चरणों में बैठे-बैठे मेरे पैर सो गए, तो अनायास मन में भाव आया कि पैर ये संकेत दे रहे हैं कि अब यहां थमा जा सकता है, आगे चलने या आगे खोजने की कोई जरूरत नहीं है। यहां निश्चिंत हुआ जा सकता है, खुद को पूज्य श्री को समर्पित करते हुए। उनके साथ केवल धर्म नहीं है, उनके साथ एक राष्ट्रीय आंदोलन है, जो वास्तव में राष्ट्र को सशक्त करने की क्षमता रखता है। उनके साथ केवल कर्मकांडी नहीं, कर्मयोगी हुआ जा सकता है। ऐसा कर्मयोगी बना जा सकता है, जो राष्ट्र के सच्चे मर्म को समझता हो। उनकी कृपा की सदैव अपेक्षा रहेगी। अत्यंत संकोच के साथ बताना चाहूंगा कि महात्मा स्वामी रामानंद जी को पढ़ते-जानते हुए मेरी आंखों में आंसू आ गए थे और पूज्य श्री रामनरेशाचार्य से भेंट के उपरांत भी मेरे मन में आंसुओं का वैसा ही ज्वार उठा, जैसा ज्वार किसी खोए हुए अभिभावक को पाकर किसी अभागे पुत्र के मन में उठता होगा। लगा, मैं बहुत दिनों बाद फिर बच्चा हो गया हूं, उंगली पकड़कर चलना सीखने को तैयार बच्चा।
वही राम दशरथ का बेटा, वही राम घट-घट में व्यापा, वही राम ये जगत पसारा, वही राम है सबसे न्यारा।
निष्कर्ष
अब अपनी विवेचना करूं, तो पाता हूं कि मैं विचार भूमि पर प्रारंभ से ही रामानन्दी रहा था, अभी भी हूं और आगे भी रहूंगा।

Wednesday, 23 December 2009

फिर अधर में नतीजे

झारखण्ड मे जो चुनाव नतीजे आये है, उनसे चिंता बढ़ गयी है। किसी भी पार्टी को अकेले बहुमार नहीं मिलना एक बड़ी चिंता की बात है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा के साथ ही अगर झारखण्ड में चुनाव हुए होते तो बीजेपी को फायदा हो सकता था। लोकसभा चुनाव के समय बीजेपी बहुत मजबूत थी, लेकिन कांग्रेस ने झारखण्ड में तब वहां विधानसभा चुनाव नहीं करवाए। मधु कोड़ा का मुद्दा शांत हो गया , कांग्रेस के पाप को जब जनता भूल सी गयी तब वहां चुनाव करवाए। कांग्रेस को खास लाभ नहीं हुआ लेकिन बीजेपी हार जरूर गयी। कांग्रेस ने पूर्व भाजपाई बाबूलाल मरांडी से गठबंधन करके भी मधु कोड़ा से हुए नुक्सान की भरपाई कर ली।
न महंगाई मुद्दा रही न भ्रष्टाचार। तभी तो मधु कोड़ा की पत्नी चुनाव जीत गयी और सोरेन मुख्यमंत्री पद के लिए लालायित हैं। देश चिंता जनक दौर में है लोगों की मानसिकता समझ से परे जा रही है। ऐसा लगता हैं की भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं रहा। जिस समाज को भ्रष्टाचारियों को डंडे लेकर खदेड़ देना चाहिए वह सामाज विवादस्पद व भ्रष्ट नेताओं को बार-बार बचा ले रहा है। शायद झारखण्ड को फिर जोड़-तोड़ वाला एक भ्रष्ट मुख्मंत्री ही मिलेगा। बेशक यह दौर कांग्रेस का है, क्या वह उम्मीदों पर खरी उतरेगी ? क्या वह आम आदमी को वास्तविक रहत देने के प्रयास करेगी ? क्या अच्छी योजनाओं में भ्रष्टाचार कम होगा? क्या गरीबों का पैसा गरीबों तक पहुंचेगा ?

Friday, 18 December 2009

सिंपल की स्पेशल यादें


मेरे साथ बड़ी मुश्किल है, जितना मैं वर्तमान में जीता हूं, उतना ही अतीत में और भविष्य की चिंता का दौर शुरू करने के बारे में केवल सोचता रहता हूं। पिछले दिनों कुछ फालतू की व्यस्तताएं रहीं, कुछ थोपी गईं, तो कुछ ओढ़ी हुईं। मौका ही नहीं मिला, कई ऐसी घटनाएं निकल गईं, जिन पर लिख न सका। अखबार के लिए लिखा भी, तो ब्लॉग पर डालना न हुआ। अब जब ब्लॉग खोलता हूं, तो उदासी का अहसास होता है। तो आइए उदासी दूर करने की कोशिश करते हैं।
किशोरवय में देखी गई फिल्में, अभिनेता व अभिनेत्रियां जिंदगी भर याद आते हैं। पिछले दिनों मेरी एक प्रिय अभिनेत्री सिंपल कपाडिया का निधन हो गया। सिंपल वाकई सिंपल थीं, अपनी बहन डिंपल की ग्लैमरस इमेज से बिल्कुल अलग। डिंपल में एक उच्च्वार्गियता थी, आज भी है, लेकिन सिंपल ने हमेशा मध्यवर्गीयता का ही प्रतिनिधित्व किया। जैसे मध्य वर्ग को निर्णायक मौके कम मिलते हैं, ठीक उसी तरह सिंपल को भी कम मिले। जितना भी काम किया, अच्छा किया, सच्चा किया। खूब बतियाती शरारती आंखें, चेहरे पर दूसरों को सहज ही अपना बना लेने का भाव। सिंपल के जमाने में अभिनेत्रियों को जीरो फीगर का सपना नहीं आता था, अभिनेत्रियां खाते-पीते घरों की हुआ करती थीं। गौर कीजिए, तो पहले की अभिनेत्रियां स्वस्थ्य नजर आती हैं, यह बात नई अभिनेत्रियों के साथ नहीं है। शायद इसीलिए पहले की अभिनेत्रियां याद रह जाती हैं और अब की अभिनेत्रियों को बीतते समय नहीं लगता। सिंपल भी स्वस्थ्य थीं, सुंदर थीं।
तब मैं दस-ग्यारह का बच्चा था। शायद 1985-86 की बात है। पिता जी वेस्टन का रंगीन टीवी 1984 में ही खरीद चुके थे। बचपन में हम सिनेमा हॉल तो कम ही गए। बामुश्किल तीन फिल्में मैंने बचपन में सिनेमा हॉल में देखीं। पहली फिल्म मैंने दीपक टॉकीज, राउरकेला में नूरी देखी थी, दूसरी फिल्म मासूम और तीसरी दर्द का रिश्ता कोणार्क टॉकीज में देखी। हां, सामुदायिक भवनों के पास खुले में पर्दा टांगकर प्रोजेक्टर से दिखाई जाने वाली कुछ फिल्मों की यादें हैं, जैसे डॉन, मां, धर्मात्मा, रास्ते का पत्थर इत्यादि। बहरहाल, सिंपल का जो चेहरा सर्वाधिक ध्यान में आता है, वह अनुरोध फिल्म का है, जो मैंने घर में टीवी पर देखी थी। राजेश खन्ना गायक हैं। सफेद कोट पर नीली-लाल धारियां। खड़े होकर झूमते हुए रेडियो पर गा रहे हैं - आते जाते खूबसूरत आवरा सड़कों पर....। दूसरी ओर, सिंपल, नीली साड़ी, नीला ब्लाउज, खुले बाल, खिला-खिला, मुस्कराता, लजाता मादक चेहरा। पांच मिनट के इस गाने के फिल्मांकन में शक्ति सामंत के निर्देशन की शक्ति भी चरम पर है। रेडियो के शीशे पर सिंपल का ठिठका हुआ चेहरा उभरता है। और गीत जारी है - ...किस कदर ये हसीन खयाल मिला है, राह में एक रेशमी रुमाल मिला है, जो गिराया था किसी ने जानकर, जिसका हो ले जाए वो पहचानकर...। मुझे अच्छे से याद है, इस गीत के समय कोई हिल भी नहीं रहा था। सब मोहित थे। मैंने तब अहसास किया था कि मेरे जीवन में कुछ विशेष घट रहा है। वह गीत खत्म हो गया, लेकिन जो गीत मेरे अंदर शुरू हुआ, वह अभी भी जारी है। इसी गीत की एक पंक्ति मुझे बार-बार याद आती है - काश फिर कल रात जैसी बरसात हो, और मेरी उसकी कहीं मुलाकात हो, मुलाकात हो।
अफसोस, केवल यादें रह जाएंगी, न वैसी बरसात होगी, न मुलाकात होगी। जब भी दिल या दिल के बाहर यह गीत बजेगा, यही ध्यान आएगा कि सिंपल अब संसार में नहीं रहीं।

Thursday, 3 December 2009

प्रथम राष्ट्रपति का गांव



भारत राष्ट्र के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा था, "सच्ची स्वतंत्रता के लिए अपनी जरूरतों को कम करना चाहिए।" उन्होंने अपने जीवन में जरूरतों को इतना कम कर लिया कि उनके बारे में यह आम धारणा बन गई कि वे गरीब परिवार से आए थे। वास्तव में वे अमीरी में जन्मे थे। उनके बड़े दादा चौधुरलालजी करीब 25-30 वर्ष तक हथुआ राज में दीवान रहे थे। दीवान होने के अलावा उन्होंने उस जमाने में सात-आठ हजार रूपए की जमींदारी खरीदी थी, जिसकी कीमत समय के साथ बढ़ी। जीरादेई गांव में राजेंद्र बाबू का जैसा बड़ा मकान है, वैसा उस इलाके में दूसरा नहीं है। जब वे छपरा में पढ़ रहे थे, तब उनकी सेवा के लिए नौकर और रसोइए रहा करते थे। यह भी सच है कि उन जैसा सादगी पसंद राष्ट्रपति दूसरा कोई नहीं हुआ। कपड़े की सिलाई उधड़ी, तो सूई-धागा हाथ में लेने से परहेज नहीं किया। महात्मा गांधी ने राजेंद्र प्रसाद ही नहीं, उनके पूरे परिवार को सादगी पसंद बना दिया था। गांधीजी के प्रभाव में देश में असंख्य लोगों ने सादगीभरा जीवन अपनाया, इसलिए वे त्याग कर पाए, इसीलिए वे देश के लिए संघर्ष कर पाए और इसीलिए हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई।

उनका गांव

उत्तरी बिहार के सीवान शहर के रेलवे स्टेशन से पश्चिम की ओर जीरादेई रेलवे स्टेशन है, लेकिन वास्तव में यह स्टेशन ठेपहां गांव में है। स्टेशन से बाहर निकलते ही, जहां राजेंद्र बाबू की प्रतिमा होनी चाहिए, वह ऊंचा चबूतरा खाली है। जिस देश में मामूली नेताओं के स्मारकों के लिए भी अरबों रूपए बेशर्मी से बहाए जा रहे हों, वहां प्रथम राष्ट्रपति की प्रतिमा के लिए धन का टोटा है? स्टेशन इतना उपेक्षित कि वेटिंग हॉल नहीं। रात के समय अंधेरा पसर जाता है। स्टेशन से पच्चीस कदम दूर आकर सड़क खोजना पड़ती है। दाहिने हाथ की ओर पतली धूलभरी कच्ची सड़क पर दो सौ मीटर चलने के बाद पक्की सड़क नसीब होती है। उसी सड़क पर लगभग चार किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में जीरादेई व जमापुर दो गांव हैं। स्वयं राजेंद्र बाबू ने लिखा है कि यह जानना मुश्किल है कि जीरादेई कहां खत्म होता है और जमापुर कहां शुरू होता है। गांव में विकास वैसे ही बेतरतीब हुआ है, जैसे बाकी देश में। प्रथम राष्ट्रपति के गांव में कोई इंटर कॉलेज नहीं, अस्पताल नहीं, थाना है, तो उधार के कमरों में। बिजली का हाल ऎसा बुरा कि ना पूछिए। धन्य हैं इस इलाके के नेता, संविधान लेखक का नहीं, कम से कम संविधान का ही सम्मान करते, तो जीरादेई आदर्श गांव हो गया होता। इसका जीरादेई को पूरा हक था, लेकिन यह हक मारा गया, क्योंकि जिम्मेदार लोगों और यहां के बाहुबली नेताओं ने अपनी जरूरतों को इतना बढ़ाया कि दूसरों की जरूरत, गांव, प्रदेश, देश की जरूरत गौण हो गई।

उनका घर

राजेंद्र बाबू के विशाल हवेलीनुमा घर को तो सरकार ने ठीक करवाया है। एक सूचना पट्ट भी लगा है कि यह देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ। राजेंद्र प्रसाद का जन्मस्थल है, लेकिन अंदर जाकर निराशा हाथ लगती है। लगता है अच्छे लोग चले गए, केवल इमारत, उसकी दीवारें और ढेर सारा सन्नाटा बचा है। चार कमरों में राजेंद्र बाबू के परिवार द्वारा प्रयुक्त होने वाले सामान, अलमारियां, संदूक, कुर्सियां, पलंग, चौकियां, मेज, बेंच इत्यादि इस तरह से ठूंसे गए हैं, मानो कूड़े में जाने हों। प्रथम राष्ट्रपति के साथ उनके अपने घर में ऎसा सुलूक किया गया है कि किसी भी संवेदनशील भारतीय की आंखों में आंसू आ जाएं। घर देखने लायक है, लेकिन किसी भी कमरे के बारे में कोई सूचना नहीं लिखी है। आप खुद घूमकर दीवारों से बात कर लीजिए। एक जगह दलान में सहेजी गई चीजों में एक बड़ी चौकी और लकड़ी की दो सोफेनुमा बेंच हैं। वहीं ऊपर लिखा है : यहां महात्मा गांधी 1927 में 16 जनवरी से 18 जनवरी की सुबह तक ठहरे थे।" ऎसा स्मारक किस काम का? कम से कम राजेंद्र बाबू की कुछ किताबें, जीवनी व संविधान से संबंघित किताबें रख दी जातीं, कुछ फोटोग्राफ, कुछ पत्र इत्यादि लगाए जाते। क्या देश के प्रथम राष्ट्रपति के साथ अन्याय इसलिए हुआ, क्योंकि वे गांव में जन्मे? काश! वे भी इलाहाबाद या दिल्ली में पैदा होते।

राजस्थान से सम्बन्ध

वे राजस्थान से बड़ा स्नेह करते थे। सुखद संयोग है कि उन्होंने आत्मकथा लिखने की शुरूआत सीकर में की थी और समापन भी यहीं राजस्थान के पिलानी में किया। 1940 में उनका स्वास्थ्य खराब हुआ था और सेठ जमनालाल बजाज उन्हें अपने साथ सीकर ले आए थे। जमनालाल बजाज जीरादेई भी गए थे, जब राजेंद्र बाबू का परिवार उनके बड़े भाई महेंद्र प्रसाद के निधन की वजह से कर्ज में डूब गया था। जमनालालजी ने न केवल ऋण प्रबंधन, बल्कि राजेंद्र बाबू के परिवार की बची हुई जमींदारी का प्रबंधन स्वयं किया। जमींदारी बेचने के बावजूद कर्ज की राशि इतनी ज्यादा थी कि जमनालालजी को घनश्यामदास बिड़ला से भी सहयोग लेना पड़ा। राजेंद्र बाबू का मकान बिक जाता, लेकिन जमनालालजी ने सूझबूझ से उसे बचाया लिया। वे जमनालालजी को बड़ा भाई मानते थे, जिनकी कृपा से वे ज्यादा से ज्यादा समय राष्ट्र को दे पाए। न कोई दिखावा, न राजनीतिक जोड़तोड़। मेहनत करते रहे, फल मिलता गया। अत्यंत मेधावी छात्र रहे राजेंद्र बाबू ने अपनी आत्मकथा में यह भी बताया है कि वे सभी परीक्षाओं में टॉप कैसे करते थे। मेहनत, तैयारी और ईमानदारी ने उन्हें देश के सर्वोच्च पद पर भी पहुंचा दिया। वाकई युवा पीढ़ी भी उनसे काफी कुछ सीख सकती है।
( मेरा यह लेख राजस्थान पत्रिका मे ३ दिसंबर को प्रकाशित हो चुका है )

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अफसोस

३ दिसंबर को राजेन्द्र बाबू की १२५ वी जयंती थी लेकिन भारत सरकार ने उनके लिए एक सेन्टीमीटर विज्ञापन भी जारी नहीं किया। आप ख़ुद सोचिये, क्या यह ठीक है ?