Thursday 6 July 2017

ये कैसे गांव, जहां किसान की सुनवाई नहीं ?

क्या उन पंचों-सरपंचों पर दंड नहीं लगना चाहिए, जिनके क्षेत्र में किसान जान दे रहे हैं?

श्रीकृष्ण ने देवशिल्पी विश्वकर्मा को आदेश दिया कि जाओ मेरे मित्र सुदामा के लिए ठीक मेरे महल जैसा भवन बना दो। आदेश पाकर विश्वकर्मा जी सुदामा के गांव वृंदापुरी पहुंचे। सुदामा की धर्मपत्नी वसुंधरा को उन्होंने सूचना दी कि मैं आपके लिए भवन बनाने आया हूं, तब वसुंधरा ने प्रश्न खड़ा कर दिया कि ‘केवल मेरा घर महल जैसा कैसे बनेगा। गांव में जिन लोगों ने हमें भिक्षा देकर सहयोग करके अभी तक जीवित रखा है, उन्हें कैसे भूल जाएं, अगर बने, तो उनके लिए भी महल बने।’
वसुंधरा की इच्छा पूरी हुई। खुशहाल हुआ, तो पूरा गांव हुआ।...लेकिन अब वैसे गांव कहां हैं? कहां हैं वो गांव, जहां कोई भूखे नहीं मरता था, जहां लोग रसोई का बचा हुआ भोजन गांव के बाहर किसी निश्चित पेड़ पर टांग दिया करते थे, ताकि रात के समय कोई भूखा अतिथि आए, तो उसे भटकना न पड़े। कभी हम दूर गांव के लोगों के लिए भी सोचते थे, लेकिन अब अपने गांव के लोगों के लिए भी हमने सोचना छोड़-सा दिया है, तभी तो देश में हर आधे घंटे में एक किसान जान दे रहा है और हम अफसोस जताकर काम चला रहे हैं। प्रधानमंत्री ने संसद में केवल इतना कहकर आश्वस्त करना चाहा था कि समस्या बहुत पुरानी है, हम समाधान के हर संभव प्रयास कर रहे हैं। इधर, उत्तरप्रदेश से किसान कर्ज माफी की लहर शुरू हुई, जो पूरे देश में फैल गई है। किसान दुखी-उद्वेलित हैं, आत्महत्या का सिलसिला टूट नहीं रहा। एक महीने से भी कम समय में अकेले छत्तीसगढ़ में १२ से ज्यादा किसान अपनी आर्थिक परेशानियों की वजह से आत्महत्या कर चुके हैं। कोई आश्चर्य नहीं, सरकार किसी भी आत्महत्या के लिए स्वयं को जिम्मेदार नहीं मानती, हमारे यहां यह बेशर्म परंपरा है। मंत्री, अधिकारी, सब हाथ झाडक़र मुंह फेर लेते हैं, लेकिन कोई पूछे तो सही कि कहां है पंचायत राज? क्या उन पंचों-सरपंचों पर दंड नहीं लगना चाहिए, जिनके क्षेत्र में किसान जान दे रहे हैं? हम शहरों में संवादहीनता का रोना रोते थकते नहीं, लेकिन हमारे गांवों को क्या हो गया है? ये कैसे गांव हैं, जहां ५०० से २००० की आबादी में भी पंचों-सरपंचों को नहीं पता चलता कि कौन किसान कितनी परेशानी में है? क्या गांवों में पंच-पंचायतें केवल ग्रामीण योजनाओं की मलाई की बंदरबांट के लिए चुनी गई हैं? 
किसान आत्महत्या एक बड़ी समस्या है, लेकिन कहीं भी पंचायत चुनाव में यह मुद्दा नहीं बनता, आखिर क्यों? राजनेताओं को निशाना बनाने वाले, राजधानी घेरने वाले और राजपथ जाम करने वाले किसानों व किसान नेताओं के लिए भी यह चिंता का विषय होना चाहिए। गांवों की तमाम परेशानियों के लिए केवल राज्य और केन्द्र सरकार को नहीं कोसा जा सकता। गांव के लोग और परंपरागत ग्रामीण व्यवस्थाएं भी तो कुछ जिम्मेदारी उठाएं। 
किसी गरीब सुदामा का महल भले न बने, लेकिन उसकी रोजी-रोटी तो चलती रहे। उसे आत्महत्या जैसे कदम उठाने की जरूरत तो न पड़े। किसानों को गांव के स्तर पर ही परस्पर मजबूत होना पड़ेगा। अपनी समस्याओं के समाधान के लिए किसान गांव से बाहर आएगा, तो तमाशा ही बनेगा। जैसे पिछले दिनों तमिलनाडु के किसान सीधे नई दिल्ली पहुंचकर सरकार व मीडिया का ध्यान खींचने के लिए दुखद अमानवीय तमाशे कर रहे थे। प्रकारांतर से वे यही जाहिर कर रहे थे कि उनके गांव मर चुके हैं, जहां उनकी कोई सुनवाई नहीं है, इसलिए वे दिल्ली को सुनाने आए हैं? दिल्ली, रायपुर, भोपाल को सुनाने की अपेक्षा ज्यादा जरूरी है कि अपने गांवों को सुनाया जाए, गांवों को जिंदा किया जाए। किसान कर्ज माफी को दवा न बनाया जाए, अगर कर्ज माफी दवा होगी, तो इसकी जरूरत हर छह महीने पर पड़ेगी। गांवों को मजबूत किए बिना किसान आत्महत्या की समस्या को खत्म नहीं किया जा सकता। छत्तीसगढ़ के गांव अगर इस उम्मीद में बैठे हैं कि रायपुर से आकर कोई मंत्री-अफसर उन्हें मजबूत करेगा, तो ये भी एक तरह का आत्मघात ही है। गांवों को ऐसे परंपरागत आत्मघात से बचना चाहिए। हां, ऐसे गांव भी हैं, जहां लोग परस्पर एक दूसरे की चिंता करते हैं, जहां आत्महत्या जैसी नौबत नहीं आती, ऐसे गांवों से आज सीखने की जरूरत है। ऐसे आदर्श गांवों का सम्मान होना चाहिए।
महात्मा गांधी ने कहा था, ‘केवल सरकार के भरोसे रहोगे, तो विकास नहीं होगा।’ तो सोचिए कि हम किसके भरोसे बैठे हैं?

Wednesday 12 April 2017

चार चराग तेरे बरन हमेशा


(जितना मैं समझ पाया हूं, उतना पेश है...यह टिप्पणी तब लिखी गई थी जब शाहबाज कलंदर की दरगाह पर हमला हुआ था )
वे भटके हुए लोग सदियों से चीख रहे हैं कि खुद को सूफी संत कहकर पूजा-आराधना लेने वाले शैतान के नबी हैं, रहमान के नबी नहीं! यह गलत विवेचना एक तरह से भारतीय मानस की आलोचना है।  
सूफी नहीं होते, तो आज का भारत नहीं होता। आज का जो सेकुलर भारत है, उसमें रामानंदियों का जितना योगदान है, उससे थोड़ा ही कम सूफियों का है। सेवन शरीफ वाले हजरत लाल (सखी) शाहबाज कलंदर लगभग रामानंद और कबीर के ही समय के हैं। जैसे अजमेर शरीफ में मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है, ठीक उसी प्रकार से पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र के दादू जिले में स्थित सेवन शरीफ में शाहबाज कलंदर की दरगाह है। गरीब इन दरगाहों पर मत्था टेककर हज-सा सुख लेते हैं, लेकिन ये बात कइयों को चुभती है। 
वाकई, इसलाम का भारतीय संस्करण है सूफीवाद या सूफीयत। इस्लाम का यह संस्करण उसके अरबी संस्करण से अलग माना जाता रहा है। भारतीय जमीन में जो कलात्मक-विवेचनात्मक उर्वरा, उदारता रही है, उसमें सूफी भाव के जरिये ही इसलाम का बेहतर स्वरूप सामने आया है। भारत में सूफीयत ने ही इस्लाम का वह स्वरूप प्रकट किया है, जिसमें सबके लिए जगह है। जहां सब आसानी से नमाज पढ़ सकते हैं, उर्स मना सकते हैं। वरना अरबी संस्करण के अंदर ही उलेमा की एक कट्टर फौज भी है, जो दरगाहों पर पुष्प चढ़ाने, धूप-अगरबत्ती करने, कुछ प्रसाद-सा बांटने, चौखट चूमने, नमाज पढऩे, वहां नाचने-गाने या धमाल डालने की इजाजत नहीं देती।
यह छिपी हुई बात नहीं है कि अरबी संस्करण का वर्चस्व दुनिया में जिस तरह से बढ़ा है, उसमें सूफीयत के लिए जगह कम होती जा रही है। सूफियों का काम खत्म माना जा रहा है, क्योंकि शायद नाम का इस्लाम बनाने का काम सूफियों का था, जो उन्होंने पूरा कर लिया और अब काम का मुसलमान बनाने का काम अरबी संस्करण ने अपने हाथ में ले लिया है। 
बम-बंदूक की जरूरत पड़ रही है, ताकि दरगाहों में मत्था टेक रहे लोगों को सबक सिखाकर बाकियों को रास्ते पर लाया जा सके। यह रास्ता तबाही की ओर ले जाता है। यह माना जा रहा है कि भारतीय मुस्लिम अपेक्षाकृत उदार है या हो गया है। वह गैर-मुस्लिम और मुस्लिम में सद्भाव की जरूरत को समझने लगा है, इससे कट्टर अरबी संस्करण का प्रचार रुक रहा है, अत: जरूरी है कि अपेक्षाकृत उदार हुए लोगों को पक्का या कट्टर बनाकर फिर प्रचार तेज किया जा सके। 
इसमें कोई शक नहीं कि सूफियों में अभी बहुत ताकत है, उन्हें पराजित करने में कट्टरपंथियों को नाको चने चबाने पड़ेंगे। जिस दिन हजरत शाहबाज कलंदर की दरगाह में नरसंहार हुआ, उसके दूसरे ही दिन सुबह नियम से घंटा फिर बजा और नगाड़ा भी। शाम को धमाल भी डाली गई। सूफी सेवणी हों या अजमेरी...दोनों ने प्रेम और हिम्मत की तलवार हाथों में ले रखी है। तुर्की, भारत, इंडोनेश्यिा से अभी अरब दूर है!
बेशक, दक्षिण एशिया में इस्लाम का प्रचार कराने में सूफी संतों की भूमिका सर्वस्वीकार्य रही है। वे नहीं होते, तो दक्षिण एशिया में पैर जमाना अरबी संस्करण के लिए आसान नहीं होता। आधुनिक दुनिया में सूफीवाद एक बड़ी ताकत है, जहां से कट्टरता को करारा जवाब मिल सकता है। जो लोग हजरत चिश्ती, हजरत शाहबाज, हजरत निजामुद्दीन, बाबा हाजी अली, बाबा फरीद और ऐसे ही हजारों सूफी संतों को नहीं मानते, उनकी इंसानियत पर सवाल वाजिब हैं।  
आप अपने पूर्वजों को ललकार रहे हैं, पूर्वजों को गलत ठहरा रहे हैं। धागा बांधने, पुष्प चढ़ाने का संस्कार, नाचने-झूमने का संस्कार क्या कभी मिट सकता है? 
यह वही भारतीय भूखंड है, जहां आकर ह्वेनसांग ने लिखा था, ‘ये भारतीय कितना नाचते-गाते हैं, भारतीयों ने हर अवसर के लिए गीत-संगीत-नृत्य रच रखे हैं।’ यहां आकर इस्लाम को जो सूफी स्वरूप मिला, वह पूर्ण रूप से वाजिब था और वाजिब है। आप सूफियों को खत्म नहीं कर सकते। सेवण शरीफ के मुस्लिमों ने इस बात को साबित कर दिया। वे नरसंहार से घबराए नहीं, हजरत शाहबाज की दरगाह पर फिर इबादत के लिए जुट गए। दरअसल, पाकिस्तान की मिट्टी भी वही है, जो भारत की मिट्टी है। उस मिट्टी ने सदियों से भारत की मिटï्टी से भी ज्यादा हमले झेले हैं। पाकिस्तान के बुद्धिजीवी अफगानियों को दोषी ठहरा रहे हैं। उन्हें महसूस हो रहा है कि उन पर हमले तो पश्चिम से ही हुए हैं, पूरब से नहीं। पाकिस्तान में शांति तभी संभव है, जब वहां सैंकड़ों सूनी पड़ी दरगाहों पर रौनक हो, जब पाकिस्तान पूरे भाव के साथ पूरब की ओर बढ़े। नेकी की राह में कभी देर नहीं। 
पुकार रहा है, चिराग निरंतर जगा हुआ है। आवाज गूंज रही है...
चार चराग तेरे बरन हमेशा, पांजवा मैं बरन आई बला झूलेलालण...

Tuesday 17 January 2017

बिरादरी का बोलबाला


ज्ञानेश उपाध्याय

आपकी जाति क्या है? जाति बता दिया, तो बताइए कि बिरादरी या उपजाति क्या है? जोधपुर शहर में आपकी बिरादरी की जानकारी हालिया माहौल में बहुत जरूरी है। मान लीजिए, आप ‘ए’ बिरादरी के हैं और ‘बी’ और ‘सी’ के लोग पकडक़र आपको बुरी तरह पीट रहे हैं, तो आप कृपया अपनी ‘ए’ बिरादरी के लोगों को ही मदद के लिए पुकारिए।  न बुलाया, पिट गए, पुलिस में शिकायत हो गई। पुलिस सक्रिय हुई, तो ‘बी’ और ‘सी’ के लोग अपनी बिरादरी के आरोपियों के बचाव में लग जाएंगे। कुछ इंतजार कीजिए, हम पुलिस में भी खूब जाति देखेंगे। ‘बी’ गिरफ्तार होगा, तो ‘बी’ बिरादरी वाले चाहेंगे कि गिरफ्तारकर्ता पुलिस वाला भी ‘बी’ हो, मुकदमा लडऩे वाला वकील भी ‘बी’ हो और न्याय के मंदिर में भी कोई ‘बी’ मिल जाए, तो सोने पर सुहागा हो जाए?
शहर के आयोजनों, सभाओं, विवाहों, प्रदर्शनों, रैलियों पर गौर कीजिएगा, लग जाएगा कि हमें बिरादरी में जीने की आदत पड़ रही है। ऐसा लगेगा कि हम देश में नहीं, बिरादरी में सांस ले रहे हैं। हम बिरादरी देखकर प्रतिभाओं के साथ-साथ अपराधियों का भी सम्मान करने लगे हैं। शिक्षक भर्ती घोटाले में गिरफ्तार महानुभावों और भय से छिपे लाभार्थियों का जाति-बिरादरीगत विश्लेषण पेश कर दिया गया है और इस आधार पर यह भी बता दिया गया है कि जोधपुर में सरकार किस-किस जाति का शोषण कर रही है। लेकिन यह कोई नहीं देख रहा कि कथित शोषक किस जाति-बिरादरी के हैं। मुख्यमंत्री से लेकर हवालात में ताले लगाने वाले पुलिसकर्मी तक की जाति-बिरादरी की सूची अगर बनाई जाए, तो साफ हो जाएगा कि जाति-बिरादरी का हल्ला बेमतलब है। 
जिस देश में वसुधैव कुटुंबकम का उद्घोष हुआ था, उसी देश में अपनी संकीर्ण बिरादरी को समाज मानते हुए जयकारे लग रहे हैं। जब देश को लूटा और तोड़ा जा रहा था, तब महान संत रामानंद ने सबको जोडऩे के लिए नारा दिया था, जात-पात पूछे नहीं कोई...हरि को भजे से हरि का होई। लेकिन आज सबसे पहले आपसे जाति-बिरादरी पूछी जाती है और देस-देश बाद में आते हैं। चिंतन की संकीर्ण शैली का एक उदाहरण देखिए कि भगवान परशुराम अब केवल ब्राह्मणों के बैनर पर नजर आते हैं, क्या मजाल कि कोई दूसरी जाति-बिरादरी परशुराम के चित्र का इस्तेमाल कर ले।  हालात ऐसे हैं कि तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की टिप्पणी याद आ रही है। चर्चिल ने भारत को आजाद करते हुए यह भाव प्रकट किया था कि ये इंडियन आपस में लड़ेंगे और इनका देश टूट जाएगा। बेशक, हम भारतीय जन चर्चिल का सपना कभी पूरा नहीं होने देंगे, लेकिन हम यह तो जरूर सोचें कि हम अपनी संगठन शक्ति कहां लगा रहे हैं। किसको संगठित होना चाहिए और कौन संगठित हो रहा है? ये कुछ लोगों के निहित स्वार्थ साधक संगठन किसके काम आएंगे? किस बिरादरी में गरीब या गैरबराबरी नहीं है? बिरादरी की संगठन शक्ति अगर पूरी तरह से बिरादरी में समानता-संपन्नता लाने में लग जाए, अगर बिरादरी के अपराधियों को सुधारने में लग जाए, अगर बिरादरी के भ्रष्ट अफसरों-उद्यमियों को ईमानदार बनाने में लग जाए, तो कोई गलत बात नहीं, लेकिन कहां लग रही है? बिरादरी की कोरी अपणायत हमें कहां ले जाएगी, यह जरूर देखिए और सोचिए। 

published in rajasthan patrika- jodhpur edition

Saturday 7 January 2017

और वो चले गए

प्रो. रामानुज देवनाथन

१८ फरवरी २०१६ को नई दिल्ली में उनसे अंतिम भेंट हुई थी। राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी पर केन्द्रित विद्वतापूर्ण आयोजन था। रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य और केन्द्रीय मंत्री उमा भारती के साथ मंच पर विराजमान वे अपना व्याख्यान दे चुके थे। विद्वतापूर्ण माहौल में वे अति प्रसन्न थे। वे भारतीय विद्या भवन के सभागार से दोपहर बाद उठे। मैं साथ था। मैंने पूछा, ‘कहां जाना है, गाड़ी बुलवाकर छुड़वा देता हूं।’ उन्होंने मेरा हाथ थामकर कहा, ‘आप विराजो, मैं चला जाऊंगा।’ फिर भी मेरा मन न माना, मैं बाहर गेट तक आया। वे एक कैब सर्विस को फोन लगा चुके थे। कैब की गाड़ी उन्हें खोज रही थी। शायद विद्या भवन स्ट्रीट से बाहर कैब खड़ी थी। मैंने कहा, ‘आप अकेले कैसे जाएंगे, मैं चौराहे तक साथ चलता हूं।’
लेकिन उन्होंने फिर मेरी हथेलियों को दबाकर कहा, ‘यहीं चौराहे तक ही तो चलना है। आप यहीं रहो, मैं तो चला जाऊंगा।’ 

और वे चले गए। मैं कुछ देर तक उन्हें पैदल जाते देखता रह गया। पवित्र हृदय संस्कृत विद्वान प्रो. रामानुज देवनाथन अब सदा के लिए संसार से ओझल हो गए हैं। अब देखना संभव नहीं, उन्हें बस याद करते रहना है।


इतना सहज, सरल, तपस्वी विद्वान, जिसने यश की ऊंचाइयों को छुआ। बड़े पदों पर रहे, विद्वान छात्रों-शिक्षकों से घिरे रहने वाले, जिन्हें विद्वता से लालबत्ती भी नसीब हुई। आज के दौर में जब लोग कुरसियों पर नहीं बैठते, कुरसियां लोगों पर बैठ जाती हैं, तब देवनाथन जी जैसे ऋषि चरित्र भारतीय संस्कृति के लिए प्रतिमान हैं। सहजता और विद्वता के अनुपम प्रतिमान।

यह देश भोगियों ने नहीं खड़ा किया। यह देश योगियों ने ही खड़ा किया है। तप से खड़ी हुई हैं हमारी विद्याएं। कहते भी हैं कि भारत मोक्ष भूमि है, जबकि बाकी दुनिया भोग भूमि। भारत की मोक्ष भूमि पर रामानुज देवनाथन जैसे चरित्र की महत्ता चमकदार विरासत है। सज्जन-योगियों-तपस्वियों का सम्मान तो आपको करना ही होगा, वरना भोगी आपसे आपका सबकुछ छीन लेंगे। जीवन और चरित्र की उसी कंगाली तक आपको पहुंचा देंगे, जहां केवल भोग-रास-पतन है। 

संस्कृत कोई आम भाषा नहीं है। इस भाषा का अपना विद्युत है। ज्ञान-चरित्र के सुरक्षा कवच और पवित्रता के बिना संस्कृत को छूना विद्युत के खुले तार को छूने जैसा है। आपने गुस्ताखी की, तो या तो आप पगला जाएंगे या फिर आपके परिजन-लोग भी आपको पागल-ढोंगी समझेंगे, दुनिया क्या कहती है या कहेगी, यह चर्चा फिर कभी।

वे भाषाविद् थे, जैसी उनकी संस्कृत, वैसी ही अंग्रेजी और वैसी ही तमिल। हिन्दी में तो उनके लेखन का माध्यम शायद मैं नाचीज ही बना, शास्त्री कोसलेन्द्रदास की मदद से उनसे राजस्थान पत्रिका के लिए शायद पहली बार मैंने ही लिखवाया। और वे लिखते चले गए।

रामानुज देवनाथन जी से मिलकर ऐसा लगता था कि हां, ये सच्चे आधुनिक ऋषि हैं, जिनके मुख से वेद और उपनिषद के शब्द स्वत: साकार हो रहे हैं। एक ऐसा ऋषि जीवन जो केवल कूप जल पर निर्भर था, स्वयं जल निकालना, स्वयं अपना भोजन पकाना, उसे दूसरों की छाया से भी बचाना। कहीं दूर जाना, तो अपना जल-भोजन साथ लेकर चलना। 

सितंबर २०१३ का वह पुस्तिका लोकार्पण कार्यक्रम याद आ रहा है, जो हरिद्वार में हुआ था। वे तब जगदगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर के कुलपति थे। लालबत्ती गाड़ी से ही सपरिवार हरिद्वार पधारे थे। उनके लिए शास्त्री कोसलेन्द्रदास के सहयोग से हरिद्वार में रामानुज संप्रदाय से जुड़ा एक ऐसा आश्रम खोजा गया था, जहां कूप जल की व्यवस्था थी। लालबत्ती गाड़ी से जब एक धवल वस्त्रधारी, चंदनपूर्ण ललाट, ऋषि-रूप कुलपति उतरता था, तब देखकर हर्ष होता था कि संस्कृत के पास एक ऐसा विद्वान भी है, जो दुनिया को संबोधित कर सकता है कि देखो - भारतीय जीवन किसे कहते हैं, भारत कोई ऐसे ही विश्व गुरु नहीं बना था। भारतीय जीवन की ऐसी अनेक परंपराएं हैं, जो लुप्त हो रही हैं। संस्कारित होने की परंपरा, सीखने की परंपरा, विनयशीलता की परंपरा, उज्ज्वल चरित्र की परंपरा, वरिष्ठों को आदर देने की परंपरा, कनिष्ठों को आशीर्वाद देने की परंपरा।

उन्हें देखकर उन पुरानी पीढिय़ों-पूर्वजों की याद आती थी, जिन्होंने देश और देश के निर्माण के लिए अपना सबकुछ लगा दिया। 
कवि आलोचक अशोक वाजपेयी ने एक वाकया मुझे सुनाया था। २६ जनवरी आने वाली थी। तब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति होने जा रहे थे। दीक्षांत समारोह में भाग लेने मध्य प्रदेश के सागर विश्वविद्यालय आए थे। ठंड के दिन थे, सर्किट हाउस के बगीचे में धूप में चबूतरे पर बैठकर हाथ में सुई धागा लिए अपने कपड़े दुरुस्त कर रहे थे। यह सहजता डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को भारतीयता के ज्ञान के उपरांत ही प्राप्त हुई थी, वरना आज भी उनका जीरादेई में विशाल महलनुमा भवन है। उनकी संपन्नता का अंदाजा आप इसी से लगा लीजिए कि जब राजेन्द्र बाबू छपरा के स्कूल में पढ़ते थे, तब उनके साथ सेवक रहा करते थे।
उन्हीं राजेन्द्र बाबू ने कहा था, ‘हमारी स्वतंत्रता तभी तक सुरक्षित है, जब तक हमारी जरूरतें सीमित हैं।’

जरूरतों को सीमित करके ही तपस्वी चरित्र तैयार होते हैं और ज्ञान की असली गंगा प्रस्फुटित होती है और तब भारत विश्व गुरु बनता है। तब दूर अरब में भी पैगंबर बरबस बोल पड़ते हैं कि मैं पूरब से इल्म की हवा आती महसूस कर रहा हूं।    

वह ज्ञान की पवन आज अवश्य कुछ शांत होगी, उसने अपना एक संत-सैनिक गंवा दिया है। उन्हें हृदय से चाहने वाले दुर्लभ चिंतन वाले सहज विद्वान मंत्री राजपाल सिंह शेखावत ने उचित ही कहा है कि यह संस्कृत की ही क्षति नहीं है, यह संस्कृति और इस ब्रह्मांड के पुण्य की क्षति है।

लेकिन व्यवस्था में राजपाल जी जैसे कितने लोग हैं, जो संस्कृति के वास्तविक महत्व को समझ रहे हैं। स्वयं संस्कृत का समाज क्या यह मान रहा है? अगर आप नहीं समझेंगे और सच्ची भारतीय संस्कृति पर आपको हंसी आएगी, तो फिर आप दिल्ली-बंगलूर से गांवों तक अपनी बहू-बेटियों को असुरक्षित होते देखते रहिए। अच्छे-सच्चे लोग नहीं होंगे, तो अच्छा-सच्चा ज्ञान भी नहीं होगा और तब जो समाज बनेगा, तय है, आपको खून के आंसू रुलाएगा। संस्कृति के निर्माण के लिए भोगी और योगी के अंतर को समझना ही होगा, वरना भारत और भारतीय का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। आप स्वयं भोगी रहना चाहते हैं और दूसरों से योगी होने की आशा कर रहे हैं, तो मुझे कतई माफ न करें, मैं पुरजोर तरीके से कहना चाहता हूं कि आप जरूरत से ज्यादा भोले हैं!

कहना न होगा, यह हमारी व्यवस्था के लिए भी सोचने का समय है कि हमने वास्तविक योगियों के साथ क्या किया। रामानुज देवनाथन ने कभी कहा नहीं, लेकिन शायद वे तनाव में थे। ५७ की उम्र हो चुकी थी, किसी ऐसी जगह पर पोस्टिंग चाहते थे, जहां कूप की व्यवस्था हो, जहां वे अपनी पवित्रता का निर्वाह सही तरीके से कर सकें, लेकिन केन्द्र सरकार और राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के प्रबंधन ने उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें पोस्टिंग दी। उनके तपस्वी जीवन को और दुष्कर बनाया गया। 

दुर्भाग्य से यह हमारी प्रवृत्ति में शामिल होता जा रहा है कि हम अपनी संस्कृति की दुहाई तो देते हैं, लेकिन उसकी पालना नहीं करते और सबसे खौफनाक सच यह कि जो लोग संस्कृति की सच्ची पालना कर रहे हैं, उनकी हम सुनना भी नहीं चाहते। 

रामानुज देवनाथन जिस भारतीय मार्ग से गए हैं, उसी मार्ग से हमारे अनगिन पूर्वज व ऋषि गए हैं। ये उज्ज्वल मार्ग मिटने वाला नहीं है। निश्चिंत रहिए, आ रहे हैं उसी मार्ग पर कई लोग चलते हुए।