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Wednesday, 27 November 2013

देना पड़ेगा मोहब्बत का इम्तेहान

असंतुष्ट नायक : 1970 का दशक
भाग - 6
जब यह दशक शुरू हुआ, तो लोगों में असंतोष की भावना आ चुकी थी। यह असंतोष संगीतमय ढंग से भी उभरने लगा था। १९७१ में कमाल अमरोही की फिल्म 'पाकिजा' के एक गाने की देश में बड़ी गूंज थी - इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा...  हमरी न मानो सिपहिया से पूछो, जिसने... भरी बजरिया में छीना दुपट्टा मेरा...। इस दौर का नायक व्यवस्था से निराश होने लगा था। सरकारी नीतियों और सरकारी लोगों का शिकंजा कसने लगा था। देश में लोगों और नायकनुमा तमाम लोगों को यह अहसास हो गया था कि देश की समस्याओं का समाधान उतना आसान नहीं है, जितना कि १९५० के दशक में सोचा गया था। राजनीति कोरे वादों से अपना काम चला रही थी। तत्कालीन राजनीतिक नायक सरकार के समक्ष शिकायत दर्ज कराने लगे थे। साहित्य में भी सरकार के प्रति निराशा और रोष का भाव आने लगा था। नायक विचलित होने लगे थे। ऐसे में, जब यह गाना बजा कि इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा, तो मानो यह अहसास हुआ कि देश की धरती गुहार लगा रही है, शिकायत कर रही है कि उसके साथ बहुत बुरा हो रहा है। 

इस दशक में नायक का गुस्सा धीरे-धीरे बढ़ा, 'जंजीर' आई, तब भी ठीक था, क्योंकि नायक सरकार के दायरे में ही था, वह सरकार का अंग बनकर समाधान तलाश रहा था, लेकिन उसके बाद दशक के ठीक बीच में १९७५ में 'शोले' आई, जिसमें नायक सरकार से बाहर आ चुका था, क्योंकि सरकार में रहते हुए उसे न्याय नहीं मिला था, 'शोले' का ठाकुर पहले पुलिस अधिकारी था, लेकिन जब पुलिस की नौकरी करते हुए उसका परिवार मार दिया गया, उसके हाथ काट दिए गए, तब निराश होकर उसे व्यवस्था से बाहर आना पड़ा और तब उसके सहयोगी बने दो अपराधी। सरकार की व्यवस्था से इतर एक व्यवस्था बनी, जिसने डकैतों से लोगों को मुक्ति दिलाई। एक तरफ पीडि़त पक्ष था, दूसरी तरफ खलनायक था, जिसका व्यवस्था में कोई विश्वास नहीं था, तो तीसरी तरफ दो अपराधी थे, जो पैसे के लिए ही खलनायक को मारने के लिए तैयार हुए थे। देश की व्यवस्था ऐसे बिगड़ रही थी कि एक भ्रम खड़ा हो गया कि इसमें नायक कौन है। कुछ लोगों ने पीडि़त पक्ष - ठाकुर - को नायक माना, तो किसी ने अपराधी जय-वीरू को नायक माना, तो ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने खलनायक गब्बर सिंह को ही नायक मान लिया। यह कहा जाता है कि असंतोष से क्रोध होता है और क्रोध के माहौल में आदमी अंधा हो जाता है। हम यह देखते हैं कि यह भ्रम समाज में बाद के दशकों में बढ़ता चला गया, एक दौर ऐसा भी आया, जब गब्बर सिंह ही नायक मान लिया गया, 'शोले' के जय (अमिताभ बच्चन) ने गब्बर सिंह जैसा किरदार बहुत शौक से -दूसरों से छीनकर- निभाया। इसमें कोई शक नहीं कि १९७० का दशक असंतुष्ट नायकों का दौर है। तत्कालीन राजनीति पर अगर गौर करें, जहां एक ओर, प्रतिपक्ष (जयप्रकाश नारायण) में असंतोष का भाव था, वहीं दूसरी ओर, सत्ता पक्ष (इंदिरा गांधी) में देश में फैले असंतोष के प्रति रोष का भाव था। संघर्ष की स्थिति बनी, तो पीडि़त पक्ष को एक हद तक खुशी मिली, लेकिन वह वास्तविक जीत से वंचित रह गया। दोनों पक्ष के नायकों ने उसे निराश किया। सम्पूर्ण क्रांति का उत्थान और उसकी विफलता इसी दशक की घटनाएं हैं। यह असंतोष और विरोधाभास का दशक है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता पक्ष ने सेंसरशिप का प्रयोग किया था, आपातकाल लगा था। अखबारों ही नहीं, फिल्मों पर भी नजर रखी जाती थी। एक फिल्म 'किस्सा कुर्सी का' में सत्ता के प्रति विरोध का भाव था, तो इस फिल्म की मूल कॉपी को सत्ता पक्ष के महाबलियों ने नष्ट कर दिया था। कला से राजनीति तक चहुंओर असंतोष का भाव था।
हम यह कह सकते हैं कि इस दशक में भी निराशा, असंतोष या दुख का टोन राज कपूर ने सेट किया था। वर्ष १९७०-७१ में चर्चित रही 'मेरा नाम जोकर' फिल्म की ब्यंजना बहुत गहरी है। गरीबी और प्रेम में जब निरंतर निराशा हाथ लगती है, तब नायक जोकर बन जाता है। हम गरीब जनता ने सरकारों को चुना, बनाया, लेकिन सरकारें कहीं और समर्पित रहीं। इस फिल्म का जोकर भी तो यही करता है, अपने भोलेपन से अपने बड़े होने तक, एक के बाद एक नायिकाओं को चुनता है, चाहता है, आगे बढ़ाता है और नायिकाएं किसी और को समर्पित हो जाती हैं, तो यह अकेला, निराश आम आदमी जोकर ही तो है! वह समस्याओं से भरपूर सर्कस में खड़ा है और उसके हिस्से की तमाम खुशियां-नायिकाएं दूर चली गई हैं। वास्तव में सरकार की उपेक्षा ने आम आदमी को जोकर बनाकर रख दिया। 'मेरा नाम जोकर' को ऐसे भी देखना चाहिए। वैसी बड़े दिल वाली फिल्म बनाने का साहस फिर किसी ने नहीं किया, क्योंकि जनता जोकर दिखना नहीं चाहती। उसे तो उन सबसे बदला लेना है, जिन्होंने उसे ठगा है, लूटा है, तरह-तरह से उत्पीडि़त किया है। इस दशक में यह सिद्ध हो गया कि भारतीय नायक जोकर नहीं बनेगा, वह लड़ेगा, दुश्मनों को चुन-चुनकर मारेगा। पर्दे पर गुंडे जब पिटते थे, तब लोगों की आंखों में खुशी के आंसू आ जाते थे, आज भी आ जाते हैं। गुस्से को हिंसा से रिलीज करने का शौक भारतीय नायकों को १९७० के दशक में ही हुआ है और वे आज भी अपना यह शौक पूरा करते हैं और जनता तालियां बजाती है। १९६० के दशक का प्रेमी फॉर्मूला और १९७० के दशक की मारधाड़ - एक्शन का फॉर्मूला आज भी आजमाया जाता है और हिट होता है। सफल फिल्मी व्याकरण इस दशक में ज्यादा स्पष्ट हुआ। प्रेम, संगीत, ड्रामा, हास्य और मारधाड़, ये पांच विधाएं ऐसी थीं, जिन्होंने भारतीय फिल्मों में खुद को मजबूत कर लिया। इन विधाओं का अच्छा सम्मिश्रण आज भी हिट और सुपर हिट होता है। 
इसमें कोई संदेह नहीं कि इस दशक के प्रतिनिधि नायक अमिताभ बच्चन हैं। इस दशक का मध्य वर्ष १९७५ बहुत महत्वपूर्ण है, अमिताभ की 'दीवार', 'शोले' और 'फरार' इसी वर्ष की फिल्में हैं, जिनमें वे एंग्री यंगमैन की भूमिका में बेहतरीन तरीके से उभरे। वैसे इस दशक में रोष को जाहिर करने वाले अभिनेताओं में धर्मेन्द्र को नहीं भुलाया जा सकता। कुत्ते, मैं तेरा खून पी जाऊंगा. . . जैसा सिनेमाई संवाद धर्मेन्द्र के अलावा और किसी पर नहीं जमा। अमिताभ समय के साथ खुद को बदलते रहे, लेकिन १९७० के दशक में गुस्से वाले आदमी के रूप में धर्मेन्द्र की जो छवि बनी, उसने उनका पीछा नहीं छोड़ा और इसका प्रभाव उनके बेटे सनी देओल की छवि पर भी पड़ा। ठीक इसी तरह से १९७० के दशक में जो हिंसक मानसिकता पैदा हुई, वह आगे की पीढिय़ों को मिलती चली गई। देश में मुखर रोष के प्रतिनिधि इस दशक ने देश और फिल्मी नायक को भी हमेशा के लिए बदल दिया। 
(क्रमश:)

Tuesday, 11 October 2011

जेपी के जन्मदिन पर कुछ भावुक नोट्स

मेरा आकलन है कि आजादी के बाद भारत में मास लीडर गिने-चुने ही हुए हैं। पंडित नेहरू पुरानी पीढ़ी के ऐसे मास लीडर थे, जिन्होंने गुलामी और आजादी दोनों का दौर देखा। इंदिरा गांधी के मास लीडर होने पर किसी को संदेह नहीं हो सकता। बड़े नेता आंधी की तरह होते हैं, एक उनकी अपने व्यंजना होती है, वे बिना बोले ही अपना प्रभाव छोड़ते हैं, खींचते हैं। मुझे याद आता है, इंदिरा गांधी मेरे जन्म-नगर राउरकेला आई थीं, करीब १९८०-८१ का समय होगा। उन्हें देखने के लिए बहुत भीड़ लगी थी, उनका काफिला तेजी से निकला, पता नहीं वो किस गाड़ी में थीं, मैं सात का रहा होऊंगा, छोटा था, उन्हें देखने से रह गया। राजीव गांधी को मैंने करीब से तीन बार देखा है, वे बहुत लोकप्रिय व सुदर्शन नेता थे, लेकिन मास लीडर नहीं थे।
इंदिरा गांधी के अलावा जयप्रकाश नारायण मास लीडर हुए, इसमें कोई शक नहीं है। देश की दिशा को बदल दिया, कई लोग कहेंगे कि उनकी सम्पूर्ण क्रांति तो युवाओं का संघर्ष थी, लेकिन जयप्रकाश नारायण के प्रतीक हुए बिना या छत्रछाया के बिना वह आंदोलन उस तरह से संभव नहीं था, जिस तरह से वह संभव हुआ। जयप्रकाश नारायण ने राजनीति की पूरी दिशा बदल दी।
उसके बाद जिस नेता का मैं नाम लूंगा, उस पर विवाद हो सकता है, लेकिन यह नाम लालकृष्ण आडवाणी का है, जिन्होंने प्रगतिशील भारत में हिन्दू नवजागरण का बिगुल बजाया। भारत की न केवल दिशा बदल गई, बल्कि भारतीय समाज की दशा बदल गई। आडवाणी ने जो राजनीतिक आंदोलन चलाया, उसी पर अटल बिहारी वाजपेयी खड़े हुए। वाजपेयी जी बड़े लोकप्रिय व स्वीकार्य नेता थे, लेकिन आडवाणी अगर न होते, तो वाजपेयी प्रधानमंत्री तो कदापि नहीं बन पाते। हम इसे यों भी कह सकते हैं कि सत्ता तो आडवाणी ने हासिल की थी, और सत्ता के लिए समझौते अटल जी ने किये। या यों भी कह सकते हैं कि सत्ता तो
आडवाणी के नेतृत्व में हासिल की गयी और समझौते अटल जी के नेतृत्व में किये गए. हालांकि एक सच यह भी है कि आडवाणी की रथयात्रा के पीछे गोविंदाचार्य और प्रमोद महाजन का दिमाग काम कर रहा था। यह सच है, रथ यात्रा लेकर आडवाणी ही निकले थे, राम मंदिर आंदोलन को उन्होंने ही चरम पर पहुंचाया था और १९९६ में जब सरकार बनाने का मौका मिला, तो उन्होंने अटल जी का नाम प्रस्तावित कर दिया।
पंडित नेहरू ने नींव रखी। इंदिरा गांधी ने देश की दिशा को बदला, जयप्रकाश ने भी देश को बदला और आडवाणी ने भी देश में एक रास्ता तैयार किया, हां, उस रास्ते की निंदा हो सकती है, होती ही रही है। इस बीच अनेक नेता भारत में हुए, गांधी जी तो राम मनोहर लोहिया को भविष्य का नेता मानते थे, और यह मानते थे कि उनकी विरासत को लोहिया ही संभालेंगे, लेकिन लोहिया मास लीडर नहीं बने, जयप्रकाश बन गए।
वैसे अब आडवाणी भी बूढ़े हो गए हैं। बीस साल पहले जो बात उनमें थी, वह तो अब वे चाहकर भी नहीं पैदा कर सकते। तब के आडवाणी और आज के आडवाणी में काफी फर्क है। मुझे याद है, १९९० की रथ यात्रा और जय श्रीराम के नारे। राउरकेला में ही बिलकुल मेरे सामने से गुजरा था आडवाणी का रथ, खूब भीड़ थी, जय श्रीराम का बड़ा जोर था, आडवाणी ने नमस्कार किया, हाथ हिलाया, जब जय श्रीराम का नारा जोर से लगा, तो मुझे याद है, मेरे हाथ भी आसमान की ओर उठ गए थे, मुझे लगा था कि जय श्रीराम का नारा लगा लेने में कोई बुराई नहीं है। आज जब समीक्षा करता हूं वह आंदोलन किसलिए था, क्यों था, उससे क्या मिला, तो दुख होता है, अपने देश की राजनीति और लोगों की समझ पर भी थोड़ा तरस आता है।
मैंने रामबहादुर राय जी से कहा कि मुझे याद नहीं आता कि भाजपा ने सत्ता में रहते हुए जेपी को याद किया हो, या भाजपा के मंच पर जेपी की तस्वीरें लगी हों, तो फिर अचानक आडवाणी जी को जेपी के गांव सिताब दियारा से रथयात्रा की क्यों सूझी, यह तो जेपी का दुरुपयोग है? राय साहब की यादें ताजा हो गईं। उन्होंने बताया, हां, बिल्कुल सही है, भाजपा ने सत्ता में रहते हुए जेपी को भुला दिया था। आडवाणी उप प्रधानमंत्री थे, २००२ जेपी का जन्मशती वर्ष था, हम लोगों को उम्मीद थी कि जेपी की जन्मशती ठीक उसी तरह से मनाई जाएगी, जैसे काग्रेस ने महात्मा गांधी की मनाई थी, लेकिन राजग सरकार का मन साफ नहीं था। मेनका गांधी को जन्मशती मनाने की योजना बनाने वाली समिति का अध्यक्ष बना दिया गया। कहना न होगा, मेनका गांधी की आपातकाल के दौरान क्या भूमिका थी, वह किस के पक्ष में थी । जेपी तो आपातकल के खिलाफ थे, लेकिन जो आपातकाल के साथ थीं, उन्हें ही जेपी जन्मशती आयोजन के लिए बनी समिति का अध्यक्ष बना दिया गया? क्या आडवाणी इस बात को नहीं जानते थे?
जाहिर है, राजग को जेपी को याद करने की औपचारिकता का निर्वहन करना था, जो उसने बखूबी किया। आडवाणी पता नहीं किस मुंह से सिताब दियारा से रथयात्रा शुरू कर रहे हैं? जेपी का गांव जब पूछेगा कि बताओ, तुम २००२ में कहां थे, तब आडवाणी क्या जवाब देंगे? भला हो, चंद्रशेखर जेपी को याद कर लिया गया। वरना सरकारों के भरोसे अगर रहते, तो शायद जेपी का गांव गंगा-सरयू की धार में बह गया होता।
कभी-कभी बहुत दुख होता है? राजनीति इतनी गिरी हुई, निकम्मी और मौकापरस्त कैसे हो गई?
कुछ दोष राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे लोगों का भी है। लोहिया गांधी जो को बहुत प्रिय थे, जयप्रकाश तो गांधी जी आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक हर तरह की मदद लेने की स्थिति में थे। लोहिया और जेपी के पास जो ऊर्जा थी, वह आज कहां है, समाज में दिखती क्यों नहीं? किताबों, भाषणों और यादों में लगातार बेवजह टहल रही है उनकी ऊर्जा। लोहिया नहीं होंगे, जेपी नहीं होंगे, तो जाहिर है, आडवाणियों की रथयात्रा निकलेगी, राजाओं-कलमाडियों की रैली निकलेगी। अन्ना जैसी जनता आकर बताएगी कि सच्ची राजनीति क्या होती है. धूर्त, चापलूस, शिथिल मंत्रियों और जरूरत से ज्यादा समय गंवाने वाले प्रधानमंत्री क्यों हैं?
इसका एक बड़ा कारण है, न तो लोहिया राजनीति में पांव जमा सके और न जेपी ने आगे आकर मोर्चा संभाला। जेपी को तो पहली केंद्र सरकार में मंत्री बनने का प्रस्ताव खुद पंडित नेहरू ने दिया था, जेपी ने २५ शर्तें थोपकर नेहरू को निराश कर दिया। जेपी को मौके कई मिले, लेकिन पीछे हट गए, पीछे हटने का एक कारण उनका समाजवादी खेमा भी रहा, जिसमे अगर पांच नेता होते, तो पांच तरह की आवाजें भी आती थीं। विचार से भारी-भरकम और संभावनाशील नेताओं ने एक दूसरे को काटते-काटते इतना हल्का बना लिया कि सत्ता का मैदान हल्के लोगों की भीड़ से बोझिल होने लगा। फिर भी जेपी के नाम से एक आंदोलन है, लेकिन लोहिया के नाम से तो वह भी नहीं है?
सिताब दियारा से आडवाणी का रथ जब निकलेगा, तो क्या जेपी की आत्मा खुश होगी, यह सवाल पूछना ही चाहिए। हममें यह कमी है कि हम पूछकर चुप हो जाते हैं, जबकि पूछना सतत प्रक्रिया है, जो जारी रहनी चाहिए। रथ लेकर निकले हर रथी से पूछना चाहिए कि बताओ, ध्वंस करोगे या निर्माण?

Friday, 15 January 2010

जेपी का गांव














जब भी जयप्रकाश नारायण के बारे में पढ़ता था, मन में यह बात उठती थी कि एक बार उनके गांव जाकर देखना चाहिए। बचपन से ही यह सुनता आया था कि मेरे अपने गांव से जयप्रकाश नारायण का गांव बहुत दूर नहीं है। पिछले साल 28 अक्टूबर को जेपी के गांव जाने का सपना साकार हुआ। अपने गांव शीतलपुर बाजार से मांझी तक सड़क ऐसी थी कि नीतीश कुमार पर बहुत गुस्सा आ रहा था। नीतीश ने उत्तरी बिहार पर बहुत कम ध्यान दिया है। स्थानीय नेता तो बस चुनाव जीतने और हारने के लिए ही आते हैं। कई नेता तो यह मानकर लूट मचाते हैं कि अगली बार जनता मौका नहीं देगी। कहीं सड़क पर खड्ढे हैं, तो कहीं खड्ढे में सड़क। ऐसी सड़कों पर पैदल चलना भी चुनौतीपूर्ण है। सात किलोमीटर दूर मांझी पहुंचने में लगभग पैंतालीस मिनट लग गए। फिर सरयू पर बना नया पुल पार किया, यह पुल भी लगभग बीस साल में तैयार हुआ है। खराब सड़कों की वजह से पुल से वाहनों की आवाजाही अभी कम ही है। खैर, आगे भी सड़क कहने को राजमार्ग है, हालत खस्ता है।
जेपी के गांव सिताब दीयरा के लिए छपरा-बलिया सड़क मार्ग से बाईं ओर मुड़ना होता है। दीयर का इलाका भी मैंने पहली बार देखा। दूर-दूर तक सपाट खेत, ऊंची सड़क से कहीं कहीं धूल उड़ाती गुजरती कार। सिताब दीयरा बहुत बड़ा गांव है, शायद 27 टोलों का। सड़क की बाईं ओर समानांतर लगभग पांच सौ मीटर दूर गांव शुरू हो चुका है, अपेक्षाकृत अच्छी, लेकिन सूनी सड़क पर पूछते-पूछते हम आगे बढ़ रहे हैं। जेपी ने चंबल में डकैतों से समर्पण करवाया, लेकिन उनका खुद का इलाका हमेशा से चोरों-लुटेरों से परेशान रहा है। जिस सड़क से हम गुजर रहे हैं, वह सुरक्षित नहीं है। बाईं ओर कई टोलों को पार करते हुए दाईं ओर एक टोला नजर आता है, पूछने पर पता चलता है, हां, इधर ही जयप्रकाश नारायण का घर है। उनके टोले में प्रवेश करते हुए लगता है कि किसी पॉश कॉलोनी में आ गए हैं। कई शानदार भवन, बागीचे, द्वार, अच्छी सड़कें। कोई भीड़भाड़ नहीं है। टोले के ज्यादातर लोग शायद बाहर ही रहते हैं। बाहर से भी यहां देखने के लिए कम ही लोग आते हैं। इस टोले का नाम पहले बाबुरवानी था, यहां बबूल के ढेरों पेड़ थे। जेपी के जन्म से काफी पहले जब सिताब दीयरा में प्लेग फैला, तो बचने के लिए जेपी के पिता बाबुरवानी में घर बनाकर रहने आ गए।
दीयर इलाका वह होता है, जो नदियों द्वारा छोड़ी गई जमीन से बनता है। सिताब दियरा गांव गंगा और सरयू के बीच पड़ता है। नदियां मार्ग बदलती रहती हैं। कभी यह गांव बिहार में था, लेकिन अब उत्तर प्रदेश में है, हालांकि बताया जाता है, राजस्व की वसूली बिहार सरकार ही करती है। वैसे भी ऐसी जमीनें हमेशा से विवादित रही हैं। जेपी के दादा दारोगा थे और पिता नहर विभाग में अधिकारी, अतः जेपी के परिवार के पास खूब जमीन थी। आजादी के बाद भी काफी जमीन बच गई। चूंकि दीयर इलाके में हर साल बाढ़ आती है, इसलिए मजबूत घर बनाना मुश्किल काम है, अतः जेपी के घर की छत खपरैल वाली ही थी। आज भी उनका घर बहुत अच्छी स्थिति में रखा गया है। देख-रेख बहुत अच्छी तरह से होती है। जेपी के गांव जाने से दो दिन पहले मैं डॉ राजेन्द्र प्रसाद के गांव भी गया था। जेपी का गांव मेरे गांव से 34 किलोमीटर दूर, तो राजेन्द्र बाबू का गांव 52 किलोमीटर दूर है। राजेन्द्र जी के गांव में उनकी उपेक्षा हुई है, जबकि सिताब दीयरा में जेपी सम्मानजनक स्थिति में नजर आते हैं।
यहां यह उल्लेख जरूरी है कि राजेन्द्र प्रसाद और जेपी के बीच रिश्तेदारी भी थी। राजेन्द्र बाबू के बड़े बेटे मृत्युंजय प्रसाद और जेपी साढ़ू भाई थे।
जेपी का घर, दालान, उनका अपना कमरा, उनकी वह चारपाई जो शादी के समय उन्हंे मिली थी, उनकी चप्पलें, कुछ कपड़े, वह ड्रेसिंग टेबल जहां वे दाढ़ी बनाया करते थे, सबकुछ ठीक से रखा गया है, जिन्हें देखा और कुछ महसूस किया जा सकता है। उनके घर की बाईं ओर शानदार स्मारक है। जहां उनसे जुड़े पत्र, फोटोग्राफ इत्यादि संजोए गए हैं। पत्रों में डॉ राजेन्द्र प्रसाद द्वारा राष्ट्रपति रहते हुए भोजपुरी में लिखा गया पत्र भी शामिल है। इंदिरा गांधी, महात्मा गांधी, पंडित नेहरू इत्यादि अनेक नेताओं के पत्र व चित्र दर्शनीय हैं। दरअसल, बलिया में सांसद रहते चंद्रशेखर ने जेपी के प्रति अपनी भक्ति को अच्छी तरह से साकार किया है। चंद्रशेखर की वजह से ही बाबुरवानी का नाम जयप्रकाश नगर रखा गया है। उन्हीं की वजह से बाहर से आने वाले शोधार्थियों के पढ़ने लिखने के लिए पुस्तकालय है, तीन से ज्यादा विश्राम गृह, स्थानीय लोगों के रोजगार के लिए कुटीर उद्योग हैं। काश, राजेन्द्र प्रसाद को भी कोई चंद्रशेखर जैसा समर्पित प्रेमी नेता मिला होता। चंद्रशेखर वाकई धन्यवाद के पात्र हैं। उजाड़ दीयर इलाके में उन्होंने जयप्रकाश नगर बनाकर यह साबित कर दिया है कि अपने देश में नेता अगर चाहें, तो क्या नहीं हो सकते।
लेकिन न जेपी रहे और न चंद्रशेखर। तो क्या जयप्रकाश नारायण नगर का वैभव बरकरार रह पाएगा? मोटे तोर पर जयप्रकाश नगर का विकास चंद्रशेखर की ही कृपा से हुआ, सांसद निधि से भी कुछ पैसा मिला करता था। स्मारक इत्यादि के लिए सरकार ने कभी कोई बजट नहीं दिया। जो नेता या पदाधिकारी आते थे, अपने विवेक से कुछ दान की घोषणा कर जाते थे। चंद्रशेखर के पुत्र नीरज शेखर, जो अब बलिया से सांसद हैं, स्मारक का ध्यान रख रहे हैं, लेकिन जयप्रकाश नगर में कुछ न कुछ बदलेगा, लेकिन जो भी बदलाव हो, उससे वैभव में वृद्धि ही हो, ताकि यहां आने वालों को सुखद अहसास हो।
यह पावन भूमि जेपी जैसे महान नेता की जन्मभूमि है। एक ऐसे नेता की भूमि है, जो महात्मा गांधी को चुनौती देने की हिम्मत रखता था। जिसमें पंडित नेहरू भी प्रधानमंत्री होने की सारी योग्यताएं देखते थे। जिन्होंने सदैव दलविहीन लोकतंत्र की पैरोकारी की। वे चाहते थे कि प्रतिनिधि सीधे चुनाव जीत कर आएं, राजनीतिक दलों के चुनाव लड़ने को वे गलत मानते थे। वे किसी भी क्षण सत्ता के चरम पर पहुंच सकते थे, लेकिन उन्होंने सत्ता के बजाय जन-संघर्ष का रास्ता चुना। सरकारी लोग उनके नाम से कांपते थे। उनका प्रभाव सत्ता में बैठे नेताओं से भी ज्यादा था। उन्होंने संपूर्ण क्रांति से देश की भ्रष्ट सत्ता को चुनौती दी। उन्होंने देश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार को संभव बनाया। उन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया। जीवन में सदैव नैतिक ऊंचाइयों को छूते रहे। उनके योगदानों की बड़ी लंबी सूची है। उनको चाहने वाले दुनिया के हर कोने में थे। अमेरिकी उन्हें पसंद करते थे, क्योंकि जेपी को बनाने में तब के जुझारू व मेहनतकश अमरीका का भी योगदान था, जेपी ने 1922 से 1929 तक अमरीका में रहकर मजदूरी करते हुए अध्ययन किया था। जब उनका निधन हुआ, तब सात दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा हुई थी। पटना में उनके अंतिम दर्शन के लिए विशेष रेलगाड़ियाँ चलाई गई थीं। निस्संदेह, उनकी यादों व स्मारकों की अहमियत हमेशा बनी रहेगी।
वाकई याद रहेगा जेपी का गाँव, मौका मिला तो फिर आयेंगे।