Sunday 14 February 2010

पढ़ना-लिखना जरूरी : कुम्भ में हम : भाग- पांच

साधु पढ़े-लिखे होते हैं या नहीं? ज्यादातर तो कम उम्र में साधु बन जाते हैं। औपचारिक शिक्षा नहीं मिल पाती है। पोथी कम पढ़ते हैं, सुनकर ज्यादा जानते हैं और जीवन से सीखते हैं। हरिद्वार में भगवानदास जी से पढ़ाई-लिखाई पर भी चर्चा हुई, उन्होंने स्वीकार किया कि अब पढ़ाई-लिखाई बहुत जरूरी हो गयी है, वरना संस्थाओं को चलाना कठिन है। प्रबंधन में कठिनाई आती है। पढ़े-लिखे होने से सुविधा होती है, संवाद भी आसानी से होता है। साधुओं का काम बढ़ता जा रहा है। उनकी संस्थाओं का निरन्तर विस्तार होता जा रहा है। समाज में श्रद्धा का भी विकास हुआ है। गांधी जी जब १९१५ में कुंभ में आए थे, तब उन्होंने जिक्र किया है कि 19 लाख लोग कुंभ आए थे। आज कुंभ में करोड़ों लोगों के आने की संभावना है। कुंभ जनवरी मध्य से शुरू हुआ है और अप्रेल मध्य तक चलेगा। बिना शिक्षा व लिखित, सुनिश्चित प्रबंधन के कुंभ को सम्भालना कठिन है। साधुओं की देश में हजारों संस्थाएं हैं, संस्थाओं का काम बढ़ रहा है। कांवड़ यात्राओं में पहले बहुत कम लोग आते थे, अब लाखों की संख्या में आते हैं। मन्दिरों में दान कम होता था, लेकिन अब बहुत होता है। साधुओं की संख्या भी घटने की बजाय बढ़ रही है। धार्मिक भारत का आकार बढ़ रहा है। पढ़ाई-लिखाई जरूरी होती जाएगी। मठों या आश्रमों का संचालन वही साधु कर पाएंगे, जो पढ़े-लिखे होंगे। अतः न केवल साधुओं के संगठनों को बल्कि सरकार को भी साधुओं की शिक्षा का ध्यान रखना चाहिए। साधुओं से दूरी बनाना ठीक नहीं है। यह दूरी साधुओं के लिए ज्यादा हानिकारक नहीं है, यह देश और सरकार के लिए हानिकारक है। साधु भारतीय चेतना के ही अंग हैं। उनका ध्यान देश को रखना चाहिए। साधुओं की ओर घृणा या भय से देखने की बजाय जिज्ञासा और प्रेम से देखना चाहिए।
आधुनिकता साधुओं को नकारने में नहीं, उन्हें समझने में है। साधुओं के चिन्तन पर दृष्टि रखने की आवश्यकता है। कम से कम पढ़ाई-लिखाई के धरातल पर हम साधुओं को समझ सकते हैं, लेकिन ऐसा तभी सम्भव है, जब साधु पढ़े-लिखे हों। वे पढ़े-लिखे होंगे, तो न केवल प्राचीन भारत उनकी छत्रछाया में सुरक्षित होगा, बल्कि वे आधुनिक भारत को भी निर्देशित कर सकेंगे।

1 comment:

अनुनाद सिंह said...

साधुओं को प।धाने के साथ-साथ यह भी जरूरी है कपढ़े-लिखे लोग धर्म की बागडोर सम्हालें। यही विचार 'गायत्री परिवार' के प्रतिष्ठाता एवं महान विचारक श्रीराम शर्मा जी का है।