Wednesday 27 November 2013

पीया तो से नैना लागे रे

प्रेमी नायक : 1960 का दशक
भाग - ५
यह दशक प्रेमियों का दशक था। इस प्रेम का जन्म समाजवाद की कोख से हुआ था, तो उसकी मस्ती भी देखने लायक थी, ताजा खिले फूल की तरह। राज कपूर ने ही एक तरह से प्रेम का ट्रेंड सेट किया, १९६२ में उनकी फिल्म आई 'जिस देश में गंगा बहती है', उसमें एक गाना है, 'प्यार कर ले, नहीं तो फांसी चढ़ जाएगा।' यह एक तरह से नारा था कि प्यार की ओर बढ़ा जाए, क्योंकि प्यार नहीं, तो कुछ भी नहीं। इसी दशक में 'मुगले आजम' का गीत - जब प्यार किया तो डरना क्या... खूब गूंज रहा था। प्यार की मांग बढ़ गई थी। दरअसल, १९६२ में भारत को युद्ध में पराजय मिली, लोग निराश थे, नेहरू और उनके युग की विदाई हुई। १९६५ में भारत को फिर युद्ध लडऩा पड़ा, ऐसे में, गीत-संगीत और प्रेम ने टूटे व घायल दिलों पर मरहम लगाने का काम किया। फिल्में राहत की तरह थीं।
इस दशक के बिल्कुल मध्य में १९६५ में शानदार गीतों से सजी 'गाइड' रिलीज हुई। प्रेम ही फिल्म का केन्द्र था। एक गाना मानो पूरी कहानी कह रहा है - कहीं बीते ना ये रातें कहीं बीते ना ये दिन, गाता रहे मेरा दिल, तू ही मेरी मंजिल...। १९६४-६५ में ही राज कपूर की फिल्म 'संगम' की धूम थी। मेरे मन की गंगा और तेरे मन की यमुना का, बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं...
नायक की इस मनोकामना ने इस दशक में अपना चरम देखा। प्रेम का दौर था, फिल्में सौभाग्य से रंगीन हो गई थीं। सपनों को चार चांद लग गए थे। 'संगम' में राज कपूर अपना कैमरा लेकर दुनिया घूमने निकल गए। यह रंगीन होने का ही नतीजा था कि फिल्मी नायक विदेश घूमने निकल गया। देश की राजनीति में भी तरह-तरह के बदलाव और प्रयोग चल रहे थे, सत्ता बदल रही थी, सत्ता का स्वभाव बदल रहा था, तनाव बढ़ रहा था, ऐसे में, फिल्मकारों ने महसूस किया कि उनका काम है लोगों को अच्छा अनुभव कराना, क्योंकि लोग पैसे खर्च करके सिनेमा देखने आते हैं। वे अच्छा देखें, अच्छा सुनें, फिल्मकारों का यही लक्ष्य बनने लगा। यह वही दशक है, जब मेकअप का काम बढ़ गया, बनावट पर जोर दिया जाने लगा। वास्तविकता पाश्र्व में जाने लगी। राजू गाइड (गाइड) से हीरामन गाड़ीवान (तीसरी कसम) तक, सारे नायक प्रेम के पीछे भाग रहे थे। दिल का मामला नाजुक हो रहा था। यह गाना भी खूब चला कि आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर सबको मालूम है और सबको खबर हो गई. . .। लोग भी बहुत खुश थे, इस दौर में प्रेम शायद इसलिए भी ज्यादा चल गया, क्योंकि गीतों के शब्द शानदार थे और संगीत भी। 
इस दशक की एक और खास बात है कि नायक और नायिका, दोनों के ही 'सेक्स अपील' में इजाफा हुआ। यह अपील कोई बुरी बात नहीं थी, क्योंकि इस अपील में उस दौर में बहुत साफगोई थी। प्यार था, सुन्दरता थी, लेकिन अनुशासन भी था। किसी के लिए मर मिटने का इरादा था, सुन्दर दिखने की चाहत थी, साफ-सुथरा रहने का प्रयास था। इसका निश्चित रूप से समाज पर गहरा असर पड़ा। एक अच्छा और साफ-सुथरा मध्य वर्ग और मध्यवर्गीय मानसिकता को तैयार करने में इस दौर के नायक ने काफी मदद की। शहरों में सुधार आया, कॉलेजों के माहौल में सुधार आया, कुछ खुलापन आया, परस्पर सामाजिकता बढ़ी, प्रेम की स्वीकारोक्ति बढ़ी, प्रेम विवाहों की संख्या बढ़ी। इस दौर की पारिवारिक फिल्मों ने भी समाज और देश को काफी कुछ सिखाया।
इस दशक के प्रतिनिधि नायक-अभिनेता अगर हम चुनें, तो शम्मी कपूर, देव आनंद और राजेश खन्ना सबसे आगे नजर आएंगे। विशेष रूप से, आज भी न देव आनंद जैसा कोई नायक मिला है और न राजेश खन्ना जैसा। दोनों ही नायकों का अलग-अलग स्नेहिल प्रभाव था, दोनों ही नायक ऐसे थे, जिनके लिए जान देने को लोग तैयार थे। कहा जाता है कि लोग इन नायकों को खून से खत लिखते थे। दोनों ही रोमांटिक और सुदर्शन अभिनेता थे। यह भी एक खास बात है कि इस दौर में अच्छा दिखने वाले अभिनेताओं की भारी मांग थी। इसी दशक में फिल्मी नायक या अभिनेता बनना कठिन हो गया। फिल्म बनाने का खर्च बहुत बढ़ गया था। स्टार छवि की मांग बढ़ गई थी। फिल्म निर्माण की चुनौती बढ़ गई थी। इस दशक के आखिर तक श्वेत-श्याम फिल्मों ने पूरी तरह से विदाई ले ली। रंगीन रुपहले पर्दे पर मजबूती से टिकना आसान नहीं रहा। वैसे प्रेम की डगर पर टिकना भी आसान नहीं होता। हम नहीं भुला सकते कि फिल्मी नायकों ने इस दशक में फिल्मों में जितना आदर्श प्यार किया, उतना अन्य किसी दशक में देखने में नहीं आया।
(क्रमश:)

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