Wednesday 27 November 2013

इश्क दी गल्ली बिच...

विलासी नायक : २००० का दशक
(भाग - ९)
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के साथ भारत ने नई सदी में प्रवेश किया था। तकनीक, इंटरनेट से उपजी सूचना क्रांति ने देश के मिजाज को बदल दिया था। मल्टीप्लेक्स, मॉल, विदेशी उत्पादों, इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों की भरमार, विदेशी गाडिय़ों का चलन बढ़ गया था। युवा भारत की विकास गति सुधर गई थी। ऐसा लगने लगा था कि भारत अब तरक्की करता चला जाएगा, पीछे मुडक़र देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। खूब पैसा आया, ऋण लेकर घी पीना आसान हो गया। मध्य वर्ग के जो सपने पिछले दशकों में साकार नहीं हुए थे, वो इस दशक में साकार होने लगे। ऋण लेकर घर बनाना, पढ़ाई करना, विदेश जाना आसान हो गया। मस्ती की पाठशालाएं सज गईं। भारतीय समाज के एक हिस्से में कुछ संपन्नता आई। प्रभु वर्ग की तनख्वाहें बढ़ गईं। सरकारी योजनाओं में गांव के स्तर तक वितरण और लूट की संभावना बढ़ी। समाज में पैसा बढ़ा। तो सिनेमाई नायक विलासी हो गया। महंगी गाड़ी, महंगे ब्रांडेड कपड़े, महंगे विदेश दौरे, महंगे होटल, महंगी गर्लफ्रेंड, महंगे गिफ्ट का दौर आ गया। मुख्यधारा में जो फिल्में बन रही थीं, उनमें पैसा कोई मुद्दा नहीं रहा। नायक के पास ज्यादा काम नहीं था, समाज इत्यादि की ज्यादा चिंता नहीं थी, उसके पास पूरा समय था कि वह जिम जाकर 'सिक्स पैक' बना सके। सिक्स पैक बना लेने से दुश्मनों से लडऩे, शर्ट खोलने, नाचने-गाने, नायिका का दिल जीतने, खलनायकों को डराने और दर्शकों को लुभाने में सुविधा होने लगी। गरीबी से लडऩे वाले, समाज की समस्याओं से पीडि़त होने वाले सिंगल पैक बॉडी वाले नायक पीछे छूट गए, उनकी जगह सिक्स पैक वाली समृद्ध जमात आ गई। एक समय दारा सिंह और धर्मेन्द्र इत्यादि को अच्छी बॉडी का मालिक माना जाता था, ये भारतीय फिल्मों के ऐसे पहलवान थे, जिन्हें दुश्मनों से लडऩे के लिए मांसपेशियों की जरूरत नहीं पड़ी थी। अमिताभ बच्चन भी अपने चरम दौर में सिंगल पैक वाले नायक थे। २००० के दशक में पूरा मिजाज ही बदल गया। जिन फिल्मों को कभी खेतों में काम करने वाले मेहनती गठीले नायकों की जरूरत नहीं पड़ी थी, वे सिक्स पैक वाले नायक मांगने लगीं। इस दशक में यह पूरी तरह से स्थापित हो गया कि अंग प्रदर्शन एकतरफा नहीं रहेगा, नायक को भी ऐसा शरीर बनाना पड़ेगा कि वह भी अंग प्रदर्शन में नायिकाओं से मुकाबला कर सके। इस दशक में विलास का फायदा यह हुआ कि नायक अच्छे शरीर धारी होने लगे, लेकिन चरित्र का पतन भी प्रबल हुआ। 

२००० के दशक के मध्य वर्ष २००५ में एक फिल्म सुपर हिट हुई, 'नो एंट्री। यथार्थ के स्तर पर बेतुकी कॉमेडी फिल्म, लेकिन दर्शकों को खूब पसंद आई। फिल्म के केन्द्रीय नायक थे सलमान खान। अच्छे शरीरधारी नायकों में अग्रणी। वास्तविक जीवन में अविवाहित, लेकिन सिलसिलेवार प्रेम सम्बंधों वाले सबसे चर्चित और प्रशंसित फिल्मी नायक। 'नो एंट्री' में उनका किरदार पूरे इस दशक का प्रतिनिधि किरदार बनकर उभरता है। वे एक ऐसे नायक हैं, जो अपनी समर्पित पत्नी को छोडक़र दूसरी लड़कियों के पीछे भाग रहे हैं, उनके संपर्क आधुनिक गणिकाओं से भी हैं, बल्कि वे उनका अपनी कहानी आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल भी करते हैं। आधुनिक गणिका भी फिल्म की मुख्यधारा में अहम किरदार है, तो इसका श्रेय उस विलासी नायक को ही देना चाहिए, जिसके लिए मौज-मस्ती ही सबकुछ है, उसके सामने चरित्र चर्चा बेकार है। नायक दोगला भी है, वह अपनी पत्नी और प्रेमिका से तो पूरी ईमानदारी की मांग कर रहा है, लेकिन खुद अव्वल दर्जे का बेईमान है।  इस विलासी नायक के दौर में ही हम देखते हैं कि समाज में परिवार, सम्बंध, निष्ठा, बंधुत्व या मित्रता का पतन, भ्रष्टाचार, चारित्रिक पतन इत्यादि चिंता के विषय नहीं रह गए। फिल्मों ने ईमानदारी को क्षणिक तत्व या एक क्षणिक अवस्था मान लिया। इस दशक में विलास के प्रति आकर्षण ऐसे बढ़ा कि बेईमानी भी स्वीकार्य-सी हो गई। अच्छाई या अच्छी बातों का रोमांच खत्म-सा हो गया। पैसे का डंका बज उठा।
इसी दौर में 'थ्री इडियट्स' जैसी फिल्म भी आई, जिसमें नायक बहुत क्षमतावान था, कुशल था, लेकिन छात्र जीवन में ही वह शराब का सेवन करने लगा था। रेंचो नाम का यह नायक सफल रहा, फिल्म भी सफल रही, लेकिन सच्ची बात तो यह थी कि इस नायक ने एक झूठे नाम और परायी पूंजी के दम पर पढ़ाई की थी। उसकी पढ़ाई और उसके नायकत्व के आधार में झूठ था। नायक ने पराई पूंजी का सदुपयोग कर ढंग से पढ़ाई की, इसे तो लोगों ने देखा, लेकिन लोगों ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि नायक ने शराब पीकर और दोस्तों को पिलाकर इस पराई पूंजी का दुरुपयोग भी किया। अनजानी शादी में भोजन करने पहुंच गया, पिं्रसिपल के घर उत्पात में शामिल हुआ और प्रश्न पत्रों की चोरी भी की। इस फिल्म ने यह प्रमाणित कर दिया कि गरीबों के लिए भी नैतिकता ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं रही, केवल विलास महत्वपूर्ण हो गया। गरीबों को भी यही शिक्षा दी गई, पूंजी कहीं से भी ले लो, मस्त जीवन जीयो, अपना मतलब साधो और आगे निकल जाओ। इस दौर में नायकों के विलास की भी कोई सीमा नहीं रही, सारे बंधन टूट गए। ऐसी फिल्में भी आईं, जिनमें अधेड़ उम्र के नायकों को नई नवेली नायिकाओं से प्रेम हो गया। पिछली सदी के महानायक घोषित हो चुके अमिताभ बच्चन ने भी ऐसी भूमिकाओं को दो बार (चीनी कम और नि:शब्द) निभाया। विवाहेत्तर सम्बंधों वाले इस विलासी दौर में गरीब और देहाती नायक दुर्लभ हो गए। अमिताभ अपने चौथे फिल्मी दशक में विराजमान थे, लेकिन उन्होंने पूरी तरह से बदलते वक्त का साथ दिया, कभी बैंक में डाका डालने वाले बने, तो कभी डॉन, तो कभी केवल पैसे के पीछे भागने वाले चरित्र। चरित्र की बात करें, तो अमिताभ बच्चन ने 'कभी अलविदा ना कहना में 'सेक्सी सैम जैसे विलासी चरित्र को निभाकर अच्छे चरित्र की अहमियत को गौण कर दिया।
विलास के पीछे भागने और विलास में जीने वाले फिल्मी नायकों की भीड़ लग गई, लेकिन इस दशक के एक प्रतिनिधि अभिनेता-नायक को अगर चुनें, तो बेशक वह नाम सलमान खान का होगा। जो अपनी वास्तविक जिंदगी में भी युवाओं के मॉडल रहे, विश्व सुन्दरी से प्यार, नशा करके महंगी गाड़ी में सवारी, वन्य जीव का शिकार इत्यादि। समय बदल चुका था, कोई आश्चर्य नहीं, वे आदर्श बने और लोगों द्वार खूब पसंद किए गए।
(क्रमश:)

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