Tuesday 7 October 2008

पापी पार्टियों की परिपाटी




धिक्कार है ऐसे मां-बाप पर, जो अपने बच्चों को शुरू में तो दूध पिलाते हैं और बाद में नशा पीने के लिए छोड़ देते हैं। मुंबई में रेव पार्टी मनाते हुए लगभग ढाई सौ युवाओं का पकड़ा जाना न केवल दुखद, बल्कि शर्मनाक है। देर रात हुई पार्टी में सारे लड़के नहीं थे, वहां 65 लड़कियां भी कंधे से कंधा मिलाकर नए जमाने के नए पतन की परिपाटी को आगे बढ़ा रही थीं। इस पार्टी के लिए जिम्मेदार लोगों को अगर माफ किया गया, बिना सजा दिए छोड़ा गया, तो रेव पाटिüयों का चलन हमारे समाज में तेजी से बढ़ेगा। इसके अलावा जो युवा पार्टी में शामिल हुए थे, उन्हें भी बेदाग नहीं जाने देना चाहिए, ताकि बाकी युवाओं को नसीहत मिले कि ऐसी पार्टियों का क्या हश्र होता है। रेव पार्टियाँ कोई आम पार्टियाँ नहीं होतीं, उनमें खुलकर नशेबाजी होती है। नशेबाजी में भी शराब नहीं, बल्कि सीधे ड्रग्स का इस्तेमाल होता है। तड़क भड़क वाली रोशनी जरूरी नहीं है क्योंकि समुद्र के किनारे या जंगल या और कहीं भी यह हो सकती है. हाँ इनमें खास तरह का तरंगित संगीत भी होता है, संगीत में शब्द कम होते हैं और एक ही तरह के शब्दों का दोहराओ होता है कान को झनझना देने वाले बीट्स होते हैं कुल मिलकर संगीत ऐसा होता है की नशा बढ़ जाए। लेकिन संगीत सहायक का काम करता है, मुख्य काम तो ड्रग्स करते हैं। आम तौर पर रेव पार्टी में ड्रग्स के शौकीन ही जाते हैं। ये पार्टियाँ खचाखच भरी होती हैं, जितनी ज्यादा भीड़ उतना ही लाउड इलैक्ट्रिक संगीत और उतना ही ज्यादा नशे का सामान। पश्चिमी देशों में आयोजित होने वाली ऐसी पाटियों में तो पांच-पांच हजार की भीड़ जुटती है, जो एक साथ नशे के अंधेरे गड्ढे में उतरती है। ऐसे अंधेरे गड्ढों से चंद युवा ही वापसी कर पाते हैं, ज्यादातर युवा तो अपनी जिंदगी का बहुमूल्य समय हमेशा के लिए ड्रग्स के नाम कर देते हैं।


रेव कहिए या एसिड हाउस पार्टी कहिए या वाइल्ड बोहमियन पार्टी, पश्चिम के खाए-पीए-अघाए समाज को 1950 के दशक में ऐसी पार्टियों का रोग लगा था। पूंजीवाद और `इजी मनी´ की गंदी कोख से रेव पार्टियों का जन्म हुआ था। पूंजी के प्रभाव में अमेरिका के हु ूस्टन शहर और ग्रेट ब्रिटेन के लंदन में अकूत अमीरी में पले उदास युवाओं ने रेव पार्टियों में जीवन की तलाश शुरू की थी, वह जीवन तो आज भी हाथ नहीं आया, लेकिन बेहूदी खोज आज भी जारी है। भारत में भी अमीरी की मलाई जम रही है, तो रेव और जंगल पार्टियाँ यहां भी न केवल बड़े शहरों, बल्कि छोटे शहरों में भी होने लगी हैं। अमीरी का यह घिनौना रूप न केवल अभद्र डिजाइनर डे्रसेज, बल्कि डिजाइनर ड्रग्स से तैयार होने लगा है। हमारी सरकारें आंखें मूंदकर बैठी हैं, शासन-प्रशासन चला रहे लोग भी कहीं न कहीं इन पार्टियों में भागीदारी करते पाए जा रहे हैं। यह देश रेव पार्टियों को कदापि बर्दास्त नहीं कर सकता। जहां 25 प्रतिशत लोगों को एक-दो रुपये की रोटी के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है, वहां चंद लोग रेव पार्टियों में हजारों रुपये उड़ा रहे हैं। ऐसी पार्टियाँ न केवल नशा देंगी, बल्कि इनसे तमाम तरह के अपराध भी बढ़ेंगे। अगर हम रेव पार्टियाँ होने देंगे, तो यकीन मानिए, कल ये पार्टियाँ हमारा सुख-चैन लूट लेंगी।

1 comment:

राजीव जैन Rajeev Jain said...

sahi hai sir

jara in rahisjado ki photo bhi dekhiye

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshowpics/msid-3569327.cms