Tuesday 19 August 2008

जो थे तगड़े दावेदार

मिल्खा का मलाल
पाकिस्तान के लायलपुर में 8 अक्टूबर 1935 को जन्मे फ्लाइंग सिख के नाम से मशहूर मिल्खा सिंह भारत के उन गिने चुने एथलीटों में रहे, जिन पर दुनिया की निगाह टिकी थी। मिल्खा रोम में 1960 में आयोजित ओलंपिक में बस एक सेकंड से कांस्य पदक जीतने से चूक गए थे। 400 मीटर की फाइनल दौड़ में वे सबसे आगे दौड़ रहे थे, साफ लग रहा था, वह जीत जाएंगे, लेकिन उन्होंने महसूस किया कि वह बहुत ज्यादा तेज दौड़ रहे हैं, उन्होंने एक-दो पल के लिए थोड़ा धीरे दौड़ने और बाद के लिए ऊर्जा बचाने की भूल की थी, बस उतने में ही पदक उनके हाथों से फिसल गया। बाद में उन्होंने पूरा जोर लगा दिया, लेकिन स्वर्ण पदक की बात तो दूर, वे कांस्य पदक से भी मात्र एक सेकंड से चूक गए। कांस्य जीतने वाले दक्षिण अफ्रीकी एथलीट मेल स्पेंस ने दौड़ 45।5 सेकंड में पूरी की थी और मिल्खा 45।6 सेकंड का समय निकाल पाए थे। मिल्खा को वह कमाल किए 48 साल हो गए, लेकिन आज तक उन जैसा कोई पुरुष एथलीट भारत में नहीं उभरा। मिल्खा उस जमाने के एथलीट थे, जब खिलाडि़यों को रोजगार सुरक्षा भी नसीब नहीं थी। मिल्खा के पदक न जीत पाने का मलाल आज भी बहुतों को है। मिल्खा आज भी अपने स्वतंत्र विचारों के लिए जाने जाते हैं। उनके पुत्र विश्व प्रसिद्ध गोल्फर हैं। ----

महाराजा निशानेबाज
इक्कीस अप्रैल 1924 को जन्मे बीकानेर के 23वें महाराजा कणीü सिंह अपने समय में बहुत अच्छे निशानेबाज थे। उड़ती हुई चीजों को निशाना बनाने में वे माहिर थे। वे इंटरनेशनल स्कीट शूटर चैंपियन भी रहे थे। उन्होंने पांच बार ओलंपिक में हिस्सा लिया था और उन्हें पदक का प्रबल दावेदार माना जाता था। रोम से लेकर मास्को तक वे ओलंपिक में भारत की ओर से भाग लेने गए थे। महाराजा कणीü सिंह 17 साल तक क्ले पिजन ट्रैप एंड स्कीट निशानेबाजी की राष्ट्रीय स्पर्धा में विजयी रहे थे। वे देश के पहले ऐसे शूटर थे, जिन्हें 1961-62 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वे 1952 से 1977 तक सांसद भी रहे थे। निशानेबाजी एक ऐसी स्पर्धा है, जिसमें केवल आपकी योग्यता ही आपको पदक नहीं दिलाती, इसके लिए आपका भाग्य भी प्रबल होना चाहिए। 4 सितंबर 1988 में उनका निधन हो गया, लेकिन आज भी उन्हें एक दिग्गज निशानेबाज की रूप में याद किया जाता है। वे राजस्थान के गौरव और आदर्श निशानेबाज माने जाते हैं।----

टोक्यो, मोंत्रिअल में मात
छह जून 1939 को अमृतसर जिले के नांग्ली गांव में जन्मे गुरबचन सिंह रंधावा 1964 टोक्यो ओलंपिक में 110 मीटर बाधा दौड़ में पदक के दावेदार माने जा रहे थे, लेकिन उन्हें पांचवें स्थान से ही संतोष करना पड़ा। वे अपने समय में देश के सबसे नामी एथलीट थे।बड़नगर राजस्थान में 14 नवंबर 1948 को जन्मे धावक श्रीराम सिंह ने 1976 मांटि्रयल ओलंपिक में पदक जीतने का विश्वास पैदा किया था। वह फाइनल में 400 मीटर दौड़ में आधी दौड़ तक सबसे आगे थे, लेकिन बाद में धीमे पड़ते हुए सातवें स्थान पर रहे थे। दौड़ जीतने वाले क्यूबा के धावक ने अपनी जीत का श्रेय श्रीराम सिंह को दिया था। सेना में काम करने वाले श्रीराम सिंह आगे चलकर बहुत अच्छे प्रशिक्षक साबित हुए। ठीक इसी तरह इसी ओलंपिक में मैराथन धावक शिवनाथ सिंह भी तगड़े दावेदार थे, लेकिन उन्हें ग्यारहवें स्थान से संतोष करना पड़ा। मांटि्रयल मांटि्रयल से भारतीय ओलंपिक दल खाली हाथ लौटा था। भारत में और लगभग छह ऐसे खिलाड़ी हुए, जिन्होंने ओलंपिक में पदक जीत का विश्वास पैदा किया, लेकिन वक्त उनके साथ नहीं था।---

आशा भरी उषा
उड़न परी और पय्योली एक्सप्रेस के नाम से मशहूर पिलावुल्लकंडी थेक्केपरंबिल उषा यानी पी। टी। उषा का जन्म 27 जून 1964 को केरल में हुआ। वह कोझकोड जिले के पय्योली गांव में जन्मीं और एक समय पूरे एशिया में उनके उड़ते कदमों की तूती बोलती थी। 1984 में लॉस एंजेलिस में आयोजित ओलंपिक में 400 मीटर बाधा दौड़ में उषा को पदक का प्रबल दावेदार माना जा रहा था, लेकिन वह भी मिल्खा सिंह की तरह बहुत मामूली अंतर से चूक गई। एक सेकंड के मात्र सौवें हिस्से से वह पिछड़ गई थीं, वरना उनके हाथ कांस्य पदक तो जरूर लगता। पदक न जीत पाने पर उषा के साथ-साथ पूरा देश निराश हुआ था। बताया जाता है, उषा दौड़ने में तो किसी से कम नहीं थीं, लेकिन दौड़ के समापन करते हुए वे कुछ पिछड़ जाती थीं। उषा ही नहीं, बल्कि देश को भी उस हार का आज भी मलाल है। वह पहली भारतीय महिला हैं, जिन्होंने ओलंपिक में किसी स्पर्धा के फाइनल में जगह बनाई थी। उन्होंने अपने जीवन में 100 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय पदक जीते। उनके बाद भारत आज तक ओलंपिक में दौड़ से जुड़ी किसी स्पर्धा में उम्मीद नहीं जगा पाया है।

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