Tuesday 5 August 2008

भीड़ की भक्ति से भड़के भगवान?

हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध धर्मस्थल नैना देवी मंदिर के बाहर रविवार ३ अगस्त को मची भीषण भगदड़ में लगभग डेढ़ सौ लोगों की मौत भक्ति की बढ़ती भेड़चाल को मुंह चिढ़ा रही है। दुर्घटना दुखद और शर्मनाक है। जरूरत से ज्यादा भीड़ बनाकर किसी मंदिर या धर्मस्थल पर भक्ति के लिए जुटना अब हमारी आदत में शुमार हो चुका है। प्रशासन और सरकारों को तो जितना कोसिए कम है। जैसे ही अत्यधिक भीड़ जुटती है, इंतजामों का रायता फैल जाता है। सबकुछ भगवान भरोसे होता है। भीड़ वाली जगहों के लिए विशेष नीति या इंतजाम की जरूरत है, लेकिन धर्म-धर्म चीखने वाली भाजपा की सरकारों ने भी कभी इस दिशा में प्रयास नहीं किया है।


माफ कीजिएगा यह भक्ति नहीं है? भक्ति एक शांत और एकल भावना है, यह भीड़ में संभव नहीं हो सकती। भीड़ का व्याकरण असभ्यता और अभद्रता का व्याकरण है। अभी आप किसी भी धर्मस्थल पर चले जाए, श्रावण का महीना चल रहा है, हरिद्वार से लेकर रामेश्वरम तक सभी धर्मस्थल ठसाठस मिलेंगे? कथित भक्ति की रेलमपेल मची है। भीड़ बनकर देह से देह रगड़ते हुए पूजा में न जाने कितना रस मिलता है? ऐसी पूजा से न जाने कितना फल मिलता है? भगदड़ की घटनाओं के बहाने कोई भी नास्तिक भीड़ वाली भक्ति पर सवालिया निशान लगा सकता है और लगाना भी चाहिए। छोटे-छोटे बच्चों को टांगे हुए लोग मंदिरों में आखिर क्यों धक्के खाने पहुंच जाते हैं? भगवान कोई वीआईपी अफसर या मंत्री नहीं हैं कि सप्ताह में एकाध दफा दर्शन दें, वे तो सदा और सर्वत्र उपलब्ध हैं, क्या उन्हें घर बैठे याद नहीं किया जा सकता? प्रसिद्ध धर्मस्थलों के दर्शन आराम से बिना भीड़ लगाए भी संभव है। दरअसल, भीड़ की भक्ति को बाजार ने बढ़ावा दिया है।


आप किसी भी धर्मस्थल पर चले जाइए, वहां विराजमान धंधेबाज आपको ठगने के लिए अजगर की तरह चीभ लपलपाते दिखेंगे? वाराणसी के घाट से लेकर ख्वाजा के दरबार अजमेर तक आप भक्ति करने जाते हैं और वहां के पंडे, खादिम आपका मूड खराब करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते। आपका ध्यान दर्शन पर होता है और पंडों का ध्यान आपकी जेब पर। आप धर्मस्थलों पर बार-बार ठगे जाते हैं। यही नहीं, धर्मस्थलों के आसपास मिलावटी सामान या प्रसाद खूब मिलता है और कीमत भी नाजायज वसूली जाती है। धर्मस्थलों के आसपास पाप और ठगी का ऐसा जाल बुन चुका है कि जिसमें सीधे-सादे श्रद्धालु फंसी मछली की तरह तड़पते हैं, लेकिन कुछ कर नहीं पाते। क्या ऐसी जगहों पर भगवान वाकई रहते होंगे? क्या भगवान को ठगों और अपवित्र दुष्ट लोगों के बीच रहना अच्छा लगता होगा? भीड़, दिखावा, भेड़चाल, झूठ, ठगी, अभद्रता और गंदे मिलावटी प्रसादों-भोगों से भड़क कर भगवान न जाने कितने कथित विख्यात धर्मस्थलों को छोड़ चुके होंगे।


कहा जाता है, सब भगवान की मर्जी है, क्या भगदड़ भी भगवान की मर्जी है? क्या जहाँ पाप होता है वहां विनाश होता है?

2 comments:

vipinkizindagi said...

achchi post hai.....

surjeet said...

भगवान कोई वीआईपी अफसर या मंत्री नहीं हैं कि सप्ताह में एकाध दफा दर्शन दें, वे तो सदा और सर्वत्र उपलब्ध हैं, क्या उन्हें घर बैठे याद नहीं किया जा सकता? गहरी और सार्थक अभिव्यक्ति। लेकिन आज धर्म के नाम पर मजमा लगाकर और अफवाह फैलाकर भगदड़ मचाना भी एक तरह से दहशतगर्दी ही है। चुस्त-दुरुस्त इंतजामों से ही इन पर रोक लगाई जा सकती है।