Wednesday, 14 October 2009

बेमिसाल अमिताभ




( yah sambhavtah amitabh bachchan ke janmdin par likha gaya akela prakashit sampadkeey hai )
उम्र के 68वें साल में प्रवेश कर चुके अमिताभ ऐसी बेमिसाल हस्ती हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। भारत में शायद किसी भी जीवित हस्ती के जन्मदिन पर इतना धूमधड़ाका नहीं होता है। गैर-सरकारी स्तर पर ही सही, अमिताभ का जन्मदिन साल दर साल खास बनता जा रहा है। केवल फिल्म उद्योग ही नहीं, बल्कि पूरी मनोरंजन की दुनिया में अमिताभ का कोई सानी नहीं है। कालिया फिल्म में अमिताभ का एक संवाद, - हम जहां पे खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती हैं, - बेहद अर्थपूर्ण है। मनोरंजन की दुनिया में उनके द्वारा शुरू की गई लाइनें दिनों-दिन लंबी होती जा रही हैं। फिल्म सात हिदुस्तानीं से लेकर रियलिटी शो बिग बॉस-तृतीय तक अमिताभ द्वारा शुरू की गई लाइनों, प्रतिमानों और शैलियों का कोई अंत नहीं है। भारत में सबसे ज्यादा नकल अगर किसी हस्ती की हुई होगी, तो वो अमिताभ ही हैं। हर छोटा-बड़ा कलाकार कभी न कभी उनकी किसी शैली को आजमाने की कोशिश करता है। बेशक, उनके आलोचक भी हैं, लेकिन जिस देश में राष्ट्रपिता का दर्जा प्राप्त हस्ती की आलोचना हो सकती है, वहां अमिताभ आलोचना से कैसे बच सकते हैं। हालांकि कई मौके आते हैं, जब अमिताभ अपने विशाल कद से आलोचकों को बौना बना देते हैं।


आखिर क्या है अमिताभ बच्चन होना? हम उनसे क्या सीख सकते हैं? पहली बात, परिवार के प्रति अमिताभ का प्रेम अनुकरणीय है। उनके माता-पिता को लंबा जीवन मिला, क्योंकि अमिताभ ने अपने माता-पिता को वह स्थान और वह जरूरी आजादी दी, जो आजकल की सफल संतानें अपने अभिभावकों से छीन लेती हैं। पिता की चरणों में जगह खोजने वाले पुत्र के रूप में, अपने बेटे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते पिता के रूप में वे आदर्श हैं। हॉलीवुड के कई महान अभिनेता अपनी शादियों की वजह से भी जाने गए हैं, लेकिन अमिताभ यहां भी आदर्श हैं।
उनकी दूसरी बड़ी खूबी है, हमेशा कुछ नया करने की कोशिश। एंग्री यंगमैन की नई धारा, कमाई के पैसे के उचित निवेश का तरीका, चुनावी राजनीति में अभिनेताओं के लिए द्वार खोलने की जिम्मेदारी, राजनीति से पल्ला झाड़ने एवं फिर न लौटने का वचन, हर संभव चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं, बड़े परदे से छोटे परदे पर पदार्पण, सक्रिय ब्लॉग लेखन और अब बिग बॉस- तृतीय में मेजबान की भूमिका, अमिताभ ने हमेशा नया करने की कोशिश की है, खतरे उठाए हैं। एकाध विफलताओं को छोड़ दीजिए, तो वे आज सफलतम हस्ती हैं। त्रिशूल फिल्म में उनका एक संवाद है, सही बात सही वक्त पे की जाए, तो उसका मजा ही कुछ और है और मैं सही वक्त का इंतजार करता हूं। - यह हमारे जीवन प्रबंधन में भी बड़े काम का वाक्य है।
अमिताभ की तीसरी बड़ी खूबी है कठोर परिश्रम।
चौथी बड़ी खूबी है वक्त का सम्मान । उनके जीवन में एक-एक मिनट मायने रखता है और सेट पर समय पर पहुंचने के लिए भी जाने जाते हैं।
पांचवी खूबी, उन्होंने हमेशा भारतीयता का आदर किया है। हॉलीवुड की दादागिरी उनके सामने बेदम हो जाती है और भारतीय बॉलीवुड पूरी मजबूती से उभरता है। आज उन जैसे खांटी अरबपति भारतीय दुर्लभ हैं। भारतीय संस्कृति ही नहीं, राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति उनका सहज समर्पण दूर देश तक लोगों को हिन्दी सीखने के लिए प्रेरित करता आया है।
अमिताभ की छठी खूबी है वो मुंबई मे रहकर भी इलाहाबादी हैं। लोग बड़े शहरों मे जाकर अपने गाँव, बोली , लहजे को भुला देते हैं लेकिन इस मोर्चे पर भी अमिताभ एक मिसाल हैं.
अमिताभ अकसर दूसरों को शतायु होने का आशीर्वाद देते हैं, आइए हम दुआ करें कि वे स्वयं भी शतायु हों।

Sunday, 27 September 2009

नवमी पर मां के लिए

लड़कियां और नदियां

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उनके मन में डर की सीढ़ियां हैं
जो हर बार
कुछ ऊंची हो जाती हैं
उन्हीं पर चढ़ती-उतरती रहती हैं
लड़कियां

उनके रास्तों में बांधों की ऊंचाइयां हैं
जो हर बार
कुछ बढ़ जाती हैं,
उन्हीं ऊंचाइयों से
ढहती-सिमटती रहती हैं
नदियां

लड़कियां हंसना चाहती हैं
वे हंसने नहीं देते,
वे चाहती हैं बदलाव
वे होने नहीं देते,
मन से जी जीने नहीं देते
हर बार रचते हैं नया व्यूह।

नदियां बहना चाहती हैं निर्बाध
वे रोकते हैं, जोड़ते-बढ़ाते हैं पहाड़
वे नदी की राह में बार-बार
बिछाते हैं जल योजनाओं की बिसात

छोटी-छोटी खुशियों
कटी-छंटी आजादियों
से संजोकर जीवन
लड़की होना
जैसे
छोटी-पतली धाराओं
बहते-सूखते झरनों
से सहेजकर प्रवाह
नदी होना
मुश्किल है

मात्र स्नेह से लड़की होना
मात्र पानी से नदी होना
बहुत मुश्किल है
मुकम्मल होना।

उम्र के हर पड़ाव पर
रखी हैं भयदायी बेडियाँ
कुछ-कुछ दूर पर बंधे हैं बांध
कहते हैं लड़कियों का हंसना
और नदियों का बहना मना है,
कहते हैं इनकी किस्मत में है गुलामी
कहते हैं काबू में रहेंगी,
तभी काम आएंगी
कहते हैं छूट दो तो
हाथ से निकल जाएंगी,
कहते हैं उन्हीं से पाप होता है,
भुल जाते हैं
उन्हीं से पाप धुलता है।

बार-बार टोको
तो अंदर कहीं मुरझा जाता है
लड़की होना
बार-बार बांधो
तो अंदर कहीं ठिठक जाता है
नदी होना

बांधो तो बांझ हो जाती हैं
नदियां और लड़कियां
फिर वहीं गरियाते हैं उन्हें
जिनमें मर चुकी लड़की,
जिनमें सूख चुकी है नदी
वाकई जिनमें पानी नहीं
उनमें लड़की नहीं

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एक-सी हैं सहेलियां
लड़कियां और नदियां

इधर लड़कियों पर बंधते हैं बांध
होती है समाज की सिंचाई
कटती हैं फसलें
लूटते हैं धन बल धारी
होती हैं लड़ाइयां,
खुदती हैं पतन की खाइयां

उधर नदियों की शादी होती है जबरन
मरती हैं नदियों की इच्छाएं
एक कल्लू कई नदियों को
एक साथ बांध लेता है बेहया।

हर दिन हर बांध के पीछे
ढलता है सूरज
और मिटती है कोई लड़की
या कोई नदी
सरस्वती।

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Sunday, 20 September 2009

हमारे मिलने से

( मित्रों के लिए )

वे दूर-दूर तक नहीं थे,
पल भर पहले,
अचानक आते, घुमड़ते,चमकते,
गरजते और बरसते हैं बादल
दम धरती है धरती
चैन लेता है मौसम
हमारे मिलने से
गौर करो, बहुत कुछ होता है।

देह पर तन आती छाया
बहार की मोहक माया
झूमते पेड़, बलखाती डालियां,
आनंद से कांपती पत्तियां
अपनी महक से चहकते फूल
हाथ आते झुक जाते रसीले फल
हमारे मिलने से
याद करो , बहुत कुछ खिलता है।

दूसरों से मिले धोखे,
दम तोड़ते कुछ भरोसे,
कभी मन दिखाते
कभी मन मसोसते
सुख पर शक
और दुख पर चुप्पी,
हो जाते हैं कई बोझ हलके
हमारे मिलने से
दर्ज करो, बहुत कुछ घटता है।

आते हो, पर्दा हटाते,
गली साफ नजर आती है,
जीने के लिए जरूरी
बेशर्मी उभर आती है,
न मिलते, न चेतते,
तो मारे जाते हम,
हवा भी बेखौफ हो जाती है
हमारे मिलने से
वाकई , बहुत कुछ होता है।

Sunday, 23 August 2009

रियलिटी शो - इतिहास, नक़ल और बाज़ार



दुनिया में रियलिटी शो से जुडे़ कुछ महत्वपूर्ण वर्ष व दास्तान

1948 - दुनिया का पहला रियलिटी शो अमेरिका में एलन फन्ट द्वारा निर्मित हुआ, जिसका नाम कैंडिड कैमरा था। यह एक तरह से प्रेंक रियलिटी शो था, जो पूर्व में कैंडिड माइक्रोफोन के नाम से रेडियो पर प्रसारित किया जाता था।

1973 - एन अमेरिकन फैमिली आधुनिक सन्दर्भों में दुनिया का पहला रियलिटी टीवी शो था। इसमें एक ऐसे परिवार को केन्द्र में रखा गया था, जो तलाक के दौर से गुजर रहा था।

1974 - ब्रिटेन में एन अमेरिकन फैमिली की नकल से द फैमिली की शुरुआत हुई।

1977-78 - द डेटिंग गेम, द न्यूलीवेड गेम इत्यादि रियलिटी शो की शुरुआत हुई।

1996 - ब्रिटिश टीवी शो चेंजिंग रूम से आत्म विकास और बदलाव वाले रियलिटी शो की शुरुआत हुई।

1997 - स्वीडिश रियलिटी शो एक्सपीडिशन रोबिनसन से रियलिटी शो में कायदे से कंपीटिशन और एलिमिनेशन की शुरुआत हुई। सर्वाइवर व सिलेब्रिटी सर्वाइवर जैसे रियलिटी शो इसे से निकले।
1998 - ब्रिटेन में हू वांट्स टु बी मिलिनेयर शुरू हुआ, तो पूरी दुनिया में तहलका मच गया। यह अब तक का सबसे पॉपुलर रियलिटी शो है। 100 से ज्यादा देशों में लोगों ने इसे देखा है, इस कार्यक्रम की फ्रेंचाइजी दुनिया भर में बिकी है।

2002 - अमेरिकन आइडल की शुरुआत हुई, जिससे गीत-संगीत आधारित रियलिटी टीवी शो की दुनिया में एक क्रांति आई।

---भारत की कहानी---

1994 - जीटीवी ने सबसे पहले अंताक्षरी के तौर पर प्रतियोगिता शुरू की थी, जिसे देश का पहला टीवी रियलिटी शो कहा जा सकता है।

1995 - सारेगामापा जैसे टैलेंट हंट शो की शुरुआत हुई।

1996 - दूरदर्शन ने भी इसी तर्ज पर मेरी आवाज सुनो प्रतियोगिता करवाई। कार्यक्रम सफल रहा।
2000 - भारत में अमिताभ बच्चन के संचालन में कौन बनेगा करोड़पति शुरू हुआ। इस रियलिटी गेम शो ने टीवी की भूमिका को बदलकर रख दिया। उसके बाद रियलिटी शो की बाढ़ सी आ गई।

2004 - इंडियन आइडल की शुरुआत से रियलिटी शो को एक सकारात्मक दिशा मिली। यह शो बहुत कामयाब रहा।

2006 - बिग बॉस शुरू हुआ, जिसमें कुछ नामचीन लोगों को एक घर में कई दिनों तक रखा गया, जो आखिर तक रहा, जिसे ज्यादा वोट मिले, वह जीता। शो चर्चित हुआ।

2009 - यह साल भारत में रियलिटी शोज की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रहा। कई शो शुरू हुए, सर्वाधिक चर्चा राखी का स्वयंवर और सच का सामना की हुई। कुछ भारतीय सेलीब्रिटी क्वइस जंगल से मुझे बचाओं जैसे रियटिली शो के लिए विदेश अथाüत मलयेशिया के जंगल में पहुंच गए।

----कुछ ही मौलिक---

भारत में कुछ ही रियलिटी शो मौलिक हैं और हम लोकप्रियता के लिहाज से बात करें, तो सबसे पहले अंताक्षरी, बूगी-वूगी, सारेगामापा, तोल-मोल के बोल, सांप-सीढ़ी का नाम लिया जा सकता है। भारत में ज्यादातर रियलिटी टीवी शो नकल हैं या किसी विदेश शो से प्रेरित हैं। नकल करके बनाए गए लोकप्रिय रियलिटी कार्यक्रमों इस प्रकार हैं
- कौन बनेगा करोड़पति - हू वांट्स टू बी ए मिलिनेयर
- इंडियन आइडल - अमेरिकन आइडल
- बिग बॉस - बिग ब्रदर
- सच का सामना - मोमेंट ऑफ ट्रूथ

- क्या आप पांचवी पास से तेज हैं - आर यू स्मार्टर देन फिफ्थ ग्रेडर

- दस का दम - पावर ऑफ टेन

- सरकार की दुनिया - सरवाइवर

- झलक दिखला जा - डांसिंग विद स्टार्स

- राखी का स्वयंवर - द बेचलरेट

- इस जंगल से मुझे बचाओ - आई एम ए सेलीब्रिटी ज् गेट में आउट ऑफ हीयर

- छुपा रुस्तम - हाइडिंग कैमरा

- पति, पत्नी और वो - बेबी बोरोअर्स

--बढ़ता बाजार---

आज टीवी का 20 प्रतिशत समय रियलिटी शोज के हवाले है। पिछले दो वर्ष में काफी तेजी से लोकप्रियता बढ़ी है। रियलिटी शो का हिस्सा बढ़ने की शुरुआत वर्ष 2000 में अमिताभ द्वारा प्रदर्शित कौन बनेगा करोड़पति से हुई थी। आज रियलिटी शो अज्छी कमाई कर रहे हैं, इसलिए उनका हिस्सा बढ़ रहा है। टीवी चैनल की टीआरपी भी इन्हीं से तय होने लगी है। धारावाहिकों से ऊबे हुए लोग रियलिटी की ओर रुख कर रहे हैं, तो तरह-तरह के रियलिटी शो शुरू होने वाले हैं। फिलहाल देश में पचास से ज्यादा रियलिटी शो चल रहे हैं। किसी धारावाहिक की एक कड़ी के निर्माण पर 5 से 6 लाख रुपये खर्च होते हैं, जबकि रियलिटी शो की एक कड़ी पर अधिकतम 15 से 20 लाख रुपये खर्च हो जाते हैं। लेकिन तब भी रियलिटी शो बनाना फायदे का धंधा है। प्राइम टाइम की अगर हम बात करें, तो धारावाहिक के समय विज्ञापन प्रसारण की कीमत अधिकतम एक लाख रुपये प्रति दस सेकंड होती है, जबकि रियलिटी शो के दौरान विज्ञापन प्रसारण से प्रति दस सेकंड दो लाख रुपये तक कमाई होती है। जाहिर है, रियलिटी में पैसा बरस रहा है।

Sunday, 16 August 2009

फिर जिन्ना पर आया प्यार

हमारे देश में कुछ नेताओं का चिंतन इतना फिजूल है कि इससे केवल उनका बौद्धिक विलास झलकता है और यह भी जाहिर होता है कि वे जमीनी हकीकत से कितने कटे हुए हैं। आज अनेक समस्याएं विकराल रूप ले चुकी हैं, लेकिन इन नेताओं का शर्मनाक अतीत में झांकने का शौक देश की आम गरीब जनता को केवल निराश करता है। दार्जिलिंग से चुनाव जीतने वाले राजस्थानी नेता जसवंत सिंह ने किताब लिखी है जिन्ना - इंडिया, पार्टीशन, इंडिपेंडेंस। किताब में पंडित नेहरू को निशाना बनाया गया है और जिन्ना की छवि को सुधारने की कोशिश हुई है। जसवंत के मुताबिक, देश के विभाजन के लिए पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना नहीं, बल्कि पंडित नेहरू की बेहद केन्द्रीयकृत राजनीतिं जिम्मेदार थी। यह बात भारतीयों के मनोबल पर कितना नकारात्मक असर डालेगी, इस पर जसवंत ने कोई चिंतन नहीं किया है। कांग्रेस को निशाना बनाने की कोशिश में जिन्ना का महिमामंडन निंदनीय है। इतिहास गवाह है, जिन्ना बहुसंख्यक जमात के साथ रहने को तैयार नहीं थे, जबकि पंडित नेहरू को मजहब से कोई परेशानी नहीं थी। जिन्ना ने मुस्लिम राष्ट्र बनाया और पंडित नेहरू ने जो बनाया, वह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बना। सांप्रदायिकता के आधार पर भारत वर्ष को विभाजित करने के बाद जिन्ना खुद भी चिंतित थे, क्योंकि पाकिस्तान में कथित धर्म प्रेम कट्टरता की हदें पार करने लगा था, तभी तो जिन्ना ने अपने देशवासियों से आह्वान किया था कि आज से हम हिन्दू या मुस्लिम नहीं, बल्कि पाकिस्तानी होंगे, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। जिन्ना भी भारत के अंदर कई पाकिस्तान देखना चाहते थे, कश्मीर हड़पने का अभियान उनके ही इशारे पर शुरू हुआ होगा। भाजपा नेताओं में पहले लालकृष्ण आडवाणी और अब जसवंत सिंह ने जिन्ना के प्रति अपने प्रेम को उजागर किया है। जसवंत ने एक वार्ता में कहा है कि जिन्ना महान थे। गांधी जी ने भी उन्हें महान भारतीय कहा था। जसवंत ने यह नहीं बताया है कि गांधी जी ने जिन्ना को महान भारतीय क्यों कहा था और जिन्ना किस तरह से भारतीयता को ठोकर मारकर भारतीयों को खून के आंसू रुलाकर पाकिस्तानी हो गए। जिन्ना के मुख से आए किन्हीं एक-दो बयानों का हवाला देते हुए उन्हें महान नहीं ठहराया जा सकता। वह ब्यक्ति राजनेता भले ही हो, लेकिन महान कैसे हो सकता है, जिसे दूसरे धर्म के लोगों के साथ रहना तक स्वीकार न हो। जिन्ना तो उसी दिन नाकाम हो गए थे, जब उनके वंशजों ने भारत में रहने का फैसला किया। आज जिन्ना के वंशज भारत में बेहद अमीर और सम्मानित हैं, लेकिन जसवंत को लगता है कि भारत में मुसलमानों के साथ दूसरे ग्रह के प्राणियों जैसा व्यवहार किया जाता है। क्या शाहरुख खान दूसरे ग्रह के प्राणी हैं, जिन्हें अमेरिका में परेशान किए जाने पर सभी जागरूक भारतीय नाराज हैं? जसवंत को केवल यही नजर आया कि मुसलमानों ने विभाजन की कीमत चुकाई है। क्या हिन्दुओं ने कीमत नहीं चुकाई है? जसवंत की इस बात का समर्थन किया जा सकता है कि अविभाजित भारत में मुसलमान ज्यादा मजबूत हो सकते थे, लेकिन क्या उन्हें यही बात हिन्दुओं के लिए नहीं कहनी चाहिए थी? इस किताब से आतंकवाद, महंगाई, मंदी और मौसम की मार झेल रहे देश को कोई लाभ नहीं होने वाला, उल्टे इससे पाकिस्तान और बांग्लादेश में भारत विरोध को ही बढ़ावा मिलेगा।

Tuesday, 7 July 2009

चाणक्य की कोरी यादें

बजट में गांवों और किसानों का खूब जोर चला है। गांवों के लिए इतना कुछ दिया गया है कि अगर तंत्र ईमानदारी हो, तो एक ही बजट राशि से गांवों का कायापलट हो सकता है। कागज पर नरेगा की सफलता से उत्साहित केन्द्र सरकार ने नरेगा के लिए आवंटित धन को 144 प्रतिशत बढ़ाकर 39,100 करोड़ रुपये कर दिया है। यह धन इतना ज्यादा है कि देश के किसी भी गांव में कोई भी मजदूर ऐसा नहीं बचेगा, जो नरेगा से न जुड़ा हो। इसके अलावा सरकार ने गांवों में सड़कों के लिए 12,000 करोड़ रुपये, आवास निर्माण वाली दो योजनाओं के लिए 10800 करोड़ रुपये, विद्युतिकरण के लिए 7000 करोड़ रुपये, स्वास्थ्य के लिए 257 करोड़ रुपये प्रस्तावित किए हैं। गरीबी को पचास फीसदी घटाने की कागजी घोषणा भी स्वागतयोग्य है।
लेकिन दुख की बात है कि प्रणव मुखर्जी महत्वाकांक्षी विकास योजनाओं को विफल करने वाले तंत्र पर कुछ नहीं बोले, उनका तंत्र वही है, जिसने ज्यादातर गांवों में नरेगा के तहत 100 दिन की बजाय लोगों को केवल 10-12 दिन का रोजगार प्रदान किया है। प्रणव अपने बजट भाषण में बार-बार कौटिल्य या चाणक्य का जिक्र कर रहे थे, लेकिन उन्होंने चाणक्य की नीतियों के बारे में कुछ खास नहीं कहा। उन्होंने यह नहीं बताया कि नरेगा या अन्य योजनाओं का धन खाने वाले भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों या अधिकारियों के लिए बारे में चाणक्य ने क्या कहा था। उन्होंने यह नहीं बताया कि चाणक्य के समय भ्रष्ट लोगों के साथ क्या सलूक होता था। उन्होंने कहा कि आयकर की नई संहिता 45 दिन में आ जाएगी, वित्त आयोग की रिपोर्ट अक्टूबर तक आ जाएगी, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि भ्रष्टाचार पर रोक के लिए संहिता कब आएगी। राहुल गांधी ने भी भ्रष्टाचार पर उंगली उठाई थी, लेकिन प्रणव मुखर्जी योजनाओं में ईमानदारी और पारदर्शिता संबंधी किसी भी घोषणा से बच निकले। गरीबों को तीन रुपये प्रति किलो चावल देने की घोषणा कर दीजिए, बजट में अरबों-खरबों आवंटित कर दीजिए, चाणक्य का बार-बार नाम ले लीजिए, लेकिन जब तक बेईमानी है, तब तक बजट बनते रहेंगे और नतीजों के इंतजार में आंखें पथराती रहेंगी।

Saturday, 4 July 2009

रेलवे में भी मजहब की पूछ?

मदरसा छात्रों को मुफ्त मासिक टिकट देने का फैसला कितना सही है? यह एक विचारणीय प्रश्न है। क्या यह रेलवे में धर्म आधारित रियायत की शुरुआत नहीं है? क्या यह कदम एक नए तरह के झमेले की शुरुआत नहीं करेगा? अगर हम गंभीरता से देखें, तो यह एक नया ताला खुलवाने जैसी बात है, अयोध्या में ताला खुलवाने का काम श्री राजीव गांधी ने किया था और उसके बाद लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट तक वह खुला ताला कितने कमाल दिखा गया, पूरा देश जानता है।

मुस्लिम विद्वान इस रियायत को किस आधार पर जायज व समानता आधारित ठहराएंगे? सभी भारत को हिन्दू प्रधान देश कहते हैं, लेकिन क्या यहां गुरुकुल में पढ़ने वाले छात्रों को कभी रेलवे से रियायत मिली है? भारत की अपनी भाषा संस्कृत की सेवा में लगे बच्चों को रियायत के बारे में कोई नहीं सोचता, लेकिन मदरसा छात्रों को खुश करने की कोशिश क्यों होती है? अगर सरकार को मदरसों का भला ही करना है, तो वह मदरसों की डिगि्रयों को देश की मुख्य धारा की डिगि्रयों के समकक्ष क्यों नहीं मान लेती? हर बार मदरसों के लिए कुछ न कुछ घोषणा बजट में होती है, लेकिन इस बार रेलवे ने भी मेहरबानी की है। क्या ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर अभी से तुष्टिकरण के महत्वपूर्ण काम में लग गई हैं?

ये नेता नहीं जानते कि मदरसे में पढ़ाई कितनी मुश्किल होती है? मदरसों में पढ़ने-पढ़ाने वालों के घरों में चूल्हे कैसे जलते हैं? उन्हें व्यापक भारतीय समाज में कितनी इज्जत नसीब होती है? उन्हें नौकरी कहां-कहां मिलती है? मदरसों में पढ़कर निकले कितने लोगों को ममता बनर्जी के विभाग ने नौकरी दी है? मदरसों से पढ़कर निकले कितने युवाओं को राहुल गांधी ने भारत के भविष्य के लिए चुना है? ऐसी उम्मीद भाजपा से कोई नहीं कर सकता, लेकिन कांग्रेस से सबको उम्मीद रहती है? लेकिन वह भी मुस्लिमों के विकास के लिए कृत्रिम उपाय करती रहती है, तो आइए, मन मसोस कर नई रियायत का इस्तकबाल करें और उम्मीद करें कि रियायत पाकर पढ़े बच्चे भी कभी लाखों रुपये कमाएंगे।

Sunday, 28 June 2009

कोई नहीं तुम जैसा


मेरा man तैयार नहीं हो रहा था कि अपनी एक प्रिय संगीत हस्ती पर लिखे शब्दों को ब्लॉग पर दूँ , जब से ब्लॉग शुरू किया सोचता ही रहा माइकल पर लिखूंगा, लेकिन लिखा तब जब माइकल नहीं रहे और वह भी सम्पादकीय के लिए, देर से ही सही सम्पादकीय के कुछ अंश यहाँ पेश हैं


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पॉप के बादशाह माइकल जैक्सन का दुनिया से जाना न केवल संगीत जगत, बल्कि पूरे मनोरंजन जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। जिसे दुनिया भर में पॉपुलर कल्चर कहा जाता है, माइकल लगभग तीस साल तक उसके आइकन बने रहे। दुनिया में पॉप, रॉक, हिप हॉप और आर एंड बी (रीदम एंड ब्लू) के दीवानों के दिलोदिमाग पर माइकल का ऐसा नशा चढ़ा था कि वे माइकल-मय हो गए थे। भारत के छोटे शहरों और कस्बों में अल्विस प्रिस्ले, बीटल्स जैसे पश्चिमी संगीत के पुरोधा के नाम नहीं पहुंच सके, लेकिन माइकल जैक्सन का नाम पहुंच गया। उनकी छाप इतनी प्रभावी रही कि उनकी नकल करने वालों को भी खूब नाम-दाम मिला। भारत में अराजक नृत्य शैली डिस्को के दिन लद गए, ब्रेक डांस और अफ्रीकी-अमेरिकी शैली आर एंड बी का एक दौर चल गया। उनकी खास मूनवॉक शैली तो लाजवाब रही। वे दौलत व ख्याति के शीर्ष पर पहुंचे। एक समय उनकी सालाना कमाई 5 अरब 62 करोड़ रुपये हो गई थी। उनका अलबम थ्रिलर दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाला अलबम है, उसकी 11 करोड़ 90 लाख से ज्यादा रिकॉर्ड, कैसेट या सीडियां बिक चुकी हैं। वाकई उन्होंने संगीत की दुनिया में जो नए सुरूर, सलीके व साहस का दौर शुरू किया, उसे अब कभी खत्म नहीं किया जा सकेगा।


दुर्भाग्य की ही बात है कि माइकल संगीत की दुनिया में जितने सफल हुए, उससे कहीं ज्यादा विफल वे अपनी जिंदगी में रहे। उनके पास सबकुछ था, लेकिन जिंदगी ने उन्हें हर कदम पर रुलाया। पिता के अत्याचार को सहते होश संभाला, अंत तक किसी न किसी अत्याचार-विवाद से गुजरते रहे। एक समय दौलत इतनी थी कि बसने के लिए 11 वर्ग किलोमीटर जमीन खरीद ली थी, लेकिन अंतिम सांसें लीं, तो किराये के मकान में। दो शादियां, कई रिश्ते, अपने तीन बच्चे, यौन शोषण के आरोप, ड्रग्स की लत, सुंदर दिखने की कोशिश में तन से कृत्रिम खिलवाड़, कई बीमारियां, माइकल ने जीवन में क्या नहीं देखा? लोग तो उनके जीवन का केवल उज्ज्वल पक्ष ही देख पाते थे, लेकिन पचास की उम्र में ही माइकल शरीर से इतने मजबूर हो गए थे कि पलभर के लिए धूप भी उनके नसीब में न थी। उन पर अकूत धन वर्षा हुई, उन्होंने दान कर्म में भी कीर्तिमान बनाया। अपने मुकदमों को सुलझाने में जरूरत से ज्यादा लुटाया, दिवालिया हुए, लेकिन तब भी हारे नहीं थे। 13 जुलाई से प्रस्तावित अपने अंतिम वल्र्ड टूर की तैयारी कर रहे थे, लेकिन ईश्वर ने अपने इस प्रतिभावान पुत्र को अंतिम बार स्टेज पर आने का मौका नहीं दिया।


तो क्या यही है, पॉप कल्चर का नतीजा? क्या यह बढ़िया संगीत और खराब संगति का मामला है? वास्तव में पॉप कल्चर में जाना आसान है, लेकिन उसमें जीना मुश्किल है। ऐसा नहीं है कि पॉप या हिप्पी कल्चर में फिसलन से बचा नहीं जा सकता, जरूरत संयम और सोच में बदलाव की है। गौर कीजिए, मशहूर गायिका-कलाकार मैडोना पॉप कल्चर को अच्छी तरह से संभाल रही हैं, लेकिन माइकल नाकाम हुए। वे चले गए, लेकिन अपने पीछे जो अथाह संगीत, शैलियां व कलात्मकता छोड़ गए हैं, बस वही रह जाएगा उनके दीवानों के साथ।


२६ जून २००९

Sunday, 14 June 2009

ताड़ी लीजिए...ताड़ी..?


छपरा से बलिया के बीच रिवीलगंज नामक एक स्टेशन पड़ता है, इसे गौतम स्थान भी कहते हैं। किसी समय यहां गौतम ऋषि का आश्रम हुआ करता था, आज यहां उनका एक मंदिर है। यही वह जगह है, जहां राम ने पाषाण बनी ऋषि पत्नी अहल्या का उद्धार किया था। हनुमान का भी जन्म यहीं हुआ बताया जाता है। बहुत ऐतिहासिक स्थान है। कभी यहां खूब अंग्रेज रहा करते थे, अब एक भी अंग्रेज नहीं बचा। यहां से पांच किलोमीटर दूर स्थित छपरा में किसी समय बड़ी संख्या में डच और फुर्तगीज भी रहे थे। यहाँ बड़े पैमाने पर टैक्स वसूली होती थी, रिविलगंज एक टाउन है और यहां नगरपालिका की स्थापना बहुत पहले हो गई थी। मैं 29 मई की उस गर्म दोपहर को ट्रेन में बैठा-बैठा रिविलगंज की खास बातों को याद कर रहा था और सोच रहा था कि यह स्थान कितना उपेक्षित रह गया। अगर यह स्थान बिहार से बाहर होता, तो रिविलगंज एक चर्चित पर्यटन स्थल में परिवर्तित हो गया होता। खैर, बिहार में कदम-कदम पर इतिहास बिखरा पड़ा है, अफसोस, समेटने वाला कोई नहीं है।


बहरहाल, रिविलगंज स्टेशन के आउटर पर जब गरीब नवाज एक्सप्रेस रुकी, तो मैं यह देखकर दंग रह गया कि छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियां ताड़ी बेच रहे थे। जैसे रेल में चाय बिकती है, चाय लीजिए चाय... की आवाज के साथ, ठीक उसी तरह वहां ताड़ी लीजिए ताड़ी की आवाज के साथ ताड़ी बिक रही थी। ताड़ के पेड़ का यह रस नशीला होता है, पानी मिले दूध के रंग का, छपरा और बिहार के अनेक इलाकों में लोग इसे नशे के लिए पीते हैं। आज भी बिहार के अच्छे घरों में ताड़ी का नाम लेना वर्जित है। पहले एक खास जाति पासी के जिम्मे यह काम था, लेकिन अब कई अन्य निम्न जातियों के लोग भी इस धंधे से जुड़ गए हैं। पांच रुपये प्रति लोटे के हिसाब से ताड़ी बिक रही थी। लोग पानी की बोतलों में ताड़ी ले रहे थे। पास ही एक चाट ठेला भी खड़ा हो गया था, तो चखने या स्नेक्स की भी समस्या हल हो गई थी। कइयों ने ट्रेन से उतरकर छककर पीया। गोलगप्पे और चाट खाए, जब वहां ट्रेन ज्यादा देर रुकी, तो लोगों में यह भी चर्चा हुई कि ट्रेन के ड्राइवरों ने भी ताड़ी-पान किया है।


सवाल है , जिन यात्रियों ने यहां ताड़ी-पान किया, उन्होंने किस नजर से रिविलगंज को देखा होगा? अब जब भी उनकी ट्रेन यहाँ से गुजरेगी, तो वे शायद ताड़ी की ही उम्मीद लगाएंगे। गौतम ऋषि, हनुमान जी और राम जी को तो उनमें से शायद ही कोई याद करेगा।


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ताड़ से विकास की राह


बिहार के कई इलाकों में बड़ी संख्या में ताड़ के पेड़ हैं, जिनसे केवल ताड़ी और पेड़ के बहुत पुराने होने पर लकड़ी का इंतजाम होता है। इसके पत्ते से झाड़ू और हाथ-पंखे भी बनाए जाते हैं। ताड़ का व्यावसायिक उपयोग बिहार में किया जा सकता है। अगर जगह-जगह पॉम ऑयल इंडस्ट्री का विकास किया जाए, तो ताड़ से ज्यादा कमाई की जा सकती है। इससे ताड़ी का नशे के लिए उपभोग भी कम हो जाएगा और लोगों को रोजगार भी मिलेगा। इस दिशा में बिहार सरकार को सोचना चाहिए।


एक और बात...


बिहार में बड़ी संख्या में तंबाकू उत्पादन होता है, लेकिन तंबाकू के प्रसंस्करण व पैकेजिंग का काम ज्यादातर मध्यप्रदेश में होता है, अगर प्रसंस्करण इकाइयां बिहार में ही लग जाएं, तो भी बिहार में रोजगार पैदा हो सकता है। फिलहाल ताड़ हो या तंबाकू, दोनों से बिहार को केवल नशा मिलता है और कुछ नहीं।

Friday, 12 June 2009

ये किसकी बदबू है?

कोई शक नहीं, पिछड़े हुओं को हर कोई लतियाता है। मिसाल के लिए बिहार आने-जाने वाली ट्रेनों को देख लीजिए। या तो पूरी ट्रेन फटीचर होगी या फिर एक-दो ऐसी बॉगी जोड़ दी जाएगी कि उसमें सवार लोग पछताते-रोते-गरियाते मजबूरन सफर तय करेंगे। सहरसा-अमृतसर जनसेवा एक्सप्रेस को तो देखने की भी जरूरत नहीं है, केवल सूंघ लीजिए, तो उल्टी के आसार बन आते हैं। सीवान स्टेशन पर दूसरी बार जनसेवा एक्सप्रेस से सामना हुआ, तो देख- सूंघकर मन घबराने लगा। ऐसा लगा मानो, घोड़े की लीद से भरी ट्रेन प्लेटफार्म पर आ लगी हो। ट्रेन में बनियान या नंगे बदन ठसाठस भरे लगभग एक रंग के बिहारी मजदूरों की आंखें ट्रेन के अंदर पसरे अंधेरे में चमक रही थीं। एक अजीब तरह की निष्ठुरता- निर्लिप्तता का भाव उनकी आंखों में तारी था। शायद वे अगर निष्ठुर न हों, तो भूखों मारे जाएं। बॉगियों में शौचालय तो थे, लेकिन वहां भी उनकी खिड़कियों से मजदूर सांस ले रहे थे। ट्रेन में जो जहां था, बस वहीं रुका हुआ था। एक पर एक। मजदूरों ने ऊपर सीटों के बीचों बीच गमछियां-धोतियां बांधकर भी बर्थ बना रखे थे। बाहुबली सहाबुद्दीन की वजह से कुख्यात सीवान में सात घंटे लेट से आ रही दिल्ली जाने वाली लिच्छवी एक्सप्रेस का इंतजार करते हुए जनसेवा एक्सप्रेस को देखते मुझे मानवता पर भी संदेह हुआ।
वो कौन-सी परिस्थितियां हैं, जो मानव को पशु समान जीने को मजबूर कर रही हैं? सहरसा, सुपौल, मधेपुरा और बिहार के अन्य बेहद पिछड़े इलाकों में किन कमीनों ने विकास के पहियों को जाम कर रखा है? अव्वल तो इस ट्रेन का नाम ही अपने आप में मजाक है, यह कैसी जनसेवा हो रही है? गरीबों को गाय-गोरू के समान सफर करने पर मजबूर किया जा रहा है?
मेरी आंखों के सामने सीवान स्टेशन पर एक गरीब मजदूर का परिवार चढ़ने में नाकाम हो रहा था। तब दो कुली उन्हें चढ़ाने के लिए आगे आए। आपातकालीन खिड़की में मोटा लट्ठ घुसेड़कर एक कुली ने कुछ जगह तैयारी की, दूसरे कुली ने मजदूरों के दोनों बच्चों को पहले चढ़ाया, फिर मजदूर को चढ़ाया गया, अंदर जिंदगियां ठसाठस हो रही थीं, ट्रेन चलने की सीटी बजा चुकी थी, लगा कि मजदूर की बीवी छूट जाएगी। लट्ठ वाले कुली ने एक बार फिर खिड़की के अंदर लट्ठ घुसेड़कर जौहर दिखाया, तब किसी तरह से दूसरे कुली ने मजदूर की पत्नी को उठाकर खिड़की से अंदर टांग दिया, तभी ट्रेन चल पड़ी। कुछ गरीब प्लेटफार्म पर दौड़ते रह गए कि दरवाजे पर ठसे मजदूरों को दया आ जाए, तो कुछ कमजोर मजदूरों की आंखों की कगार पर आंसू आ गए कि ट्रेन फिर छूट गई।
अब मैं और दावे के साथ कह सकता हूं। हां, मैंने देखी है गरीबी। अब मुझे एक सवाल बहुत परेशान कर रहा है कि वह बदबू किसकी थी? जनसेवा एक्सप्रेस की या बिहार की या देश की या देश के निकम्मे अंधे तंत्र की?
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बिहार यात्रा की कुछ और बातें आगे

Sunday, 17 May 2009

नतीजों की गूँज


पंद्रहवें लोकसभा चुनाव के नतीजों ने इतना चौंका दिया है कि कई नेताओं को धरातल पर आने में वक्त लग जाएगा। न तो कांग्रेस ने ऐसी जीत की कल्पना की थी और न भाजपा ने ऐसी हार का अंदाजा लगाया था। देश में खुशनुमा माहौल का अंदाजा लगाया जा सकता है, लोग इस बात से ज्यादा खुश हैं कि केन्द्र में पहले से ज्यादा मजबूत सरकार बनेगी और क्षेत्रीय दलों के नेताओं के नखरे कम होंगे। पूरे पांच साल शासन में रहने के बाद प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह की वापसी ने उन्हें विशेष प्रधानमंत्री की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। नतीजों से साबित हो गया, अगर आपके पास दिखाने लायक नाम और काम हों, तो क्वएंटीइनकमबेंसीं का फैक्टर नाकाम हो जाता है। जनता ने महसूस किया कि कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए से बेहतर कोई विकल्प नहीं है, तो उसने यूपीए को ही चुना। बेशक, लोगों ने इस बार चतुराई और अच्छी सोच का परिचय दिया है। सोनिया गांधी लगातार यह बोल रही थीं कि कांग्रेस व यूपीए से बेहतर कोई विकल्प नहीं है और लोगों ने भी उनकी बात को माना। भाजपा नाकाम हुई, क्योंकि उसके पास न तो कांग्रेस की टक्कर के नाम थे और न काम था। लालकृष्ण आडवाणी और नरेन्द्र मोदी की एक सीमा है, जिसका अंदाजा भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ राजग के भी अनेक नेताओं को हो गया है। मौका गंवाने वाले कथित लौहपुरुष और दामन पर दंगों के दाग वाले भाजपा के नेतृत्वकर्ताओं को अब नए सिरे से सोचना होगा। अच्छा गुजराती नेता होने और अच्छा राष्ट्रीय नेता होने में फर्क है। गड़बड़ तो वहां शुरू हुई, जब हमले राष्ट्रीय स्तर के क्वपीएम इन वेटिंगं पर होते थे और जवाब एक मुख्यमंत्री की ओर से आता था। गड़बड़ वहां हुई, जब आडवाणी ने मनमोहन की चुनावी आरोपों पर दुख के इजहार के साथ अघोषित समर्पण कर दिया। -कांग्रेस अति-आत्मविश्वास में नहीं थी, तभी तो मनमोहन के लिए नया मकान तक खोजा जा रहा था। कांग्रेस नेता विपक्ष में बैठने को तैयार नजर आ रहे थे। कांग्रेस को अपनी विफलताओं का अंदाजा था, इसलिए कांग्रेस ने बार-बार आतंकवाद की बात की और लोगों को बताया कि राजग शासन के समय ज्यादा बुरी स्थिति थी। कांधार प्रकरण का बार-बार जिक्र और जवाब देने में भाजपा की विफलता ने कमाल दिखाया। एक हद तक यूपीए सरकार का कामकाज भी काम आया है। हालांकि कहना न होगा, पूरी सरकार नहीं जीती है। वाघेला, मणिशंकर अय्यर, रामविलास पासवान जैसे दिग्गज मंत्री लुट गए, लालू जैसा यूपीए सरकार का सबसे वाचाल मंत्री भी एक जगह से लुट गया। चिदंबरम जैसा काबिल मंत्री बामुश्किल जीता है। यह भी ध्यान रहे कि प्रधानमंत्री सहित छह से ज्यादा कैबिनेट मंत्री चुनाव मैदान में नहीं उतरे थे। तो अगर सरकार का कामकाज बहुत प्रभावी होता, तो सारे मंत्री न केवल चुनाव लड़ते, बल्कि जीत कर लौटते। लालू दिल्ली पहुंचकर फिर सबसे हंसी-मजाक कर सकेंगे, लेकिन वह हंसी पहले जैसी नहीं होगी, उसमें एक मलाल होगा। यूपीए की क्वबड़ी जीतं में क्वथोड़ी-सी हारं शामिल है। यह देश के लिए अच्छा। अब काम और विकास पर पहले से ज्यादा गौर किया जाएगा। बहरहाल, कांग्रेस पूरी तारीफ की हकदार है, उसने वषो बाद उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में अकेले चलने का साहस दिखाया। यह साहस राहुल गांधी के विश्वास का नतीजा है, जिसके अनेक भावी नतीजे कांग्रेस को और सशक्त करेंगे।

Friday, 8 May 2009

वो हमें धोखा देंगे

नेता अपनी-अपनी मूंछें दुरुस्त कर रहे हैं और उनके पैरों में विचारधारा औंधेमुंह गिरी पड़ी है। छोटे दल विचारधारा को गदगद भाव के साथ बुरी तरह कुचल रहे हैं और बड़े दल भी मौका खोज रहे हैं, सत्ता करीब नजर आए, तो विचारधारा को दुलत्ती जमाकर कुर्सी पर विराजमान हो जाएं। जितनी बड़ी पार्टी है, उतना बड़ा जाल, मछलियों का न तो प्रकार देखा जा रहा है और न आकार। जाल में जो भी आ जाए, स्वागत है। लोकतांत्रिक योग्यता की चर्चा मत कीजिए। कायदा तो यह बोलता है कि पहले सीटों के आंकड़े तो आ जाएं, लेकिन नेताओं में धैर्य कहां? बड़ी पार्टियाँ अभी से छोटी पार्टियों को बुक कर लेना चाहती हैं, ताकि बहुमत के इंतजाम में आसानी हो। सोनिया गांधी जब राजनीति में सक्रिय हुई थीं, तब पचमढ़ी में कांग्रेस ने किसी से गठबंधन न करने का फैसला किया था, लेकिन आज उस फैसले को खुद सोनिया याद नहीं करना चाहेंगी। अब कांग्रेस ने गठबंधन धर्म को अपना परम धर्म मान लिया है। देश की सबसे बड़ी पार्टी की नई पीढ़ी से आप विचारधारा की उम्मीद नहीं कर सकते। राहुल गांधी को सरकार बनाने के लिए त्रृणमूल कांग्रेस के साथ-साथ वामपंथियों का भी साथ चाहिए। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वामपंथी कांग्रेस के बारे में क्या-क्या कह रहे हैं। इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि ममता बनर्जी के साथ कांग्रेस का गठबंधन है और यह गठबंधन पश्चिम बंगाल में लाल झंडे-डंडे को उखाड़ने के लिए बना है। यह कैसी नई राजनीति है? राहुल का बयान तब आया, जब पश्चिम बंगाल में मतदान बाकी था। अब ममता बनर्जी कसमसा रही हैं। कांग्रेस की ढुलमुल नीति की वजह से ही वाम खेमा मजबूत हुआ है। उधर, तमिलनाडु में कांग्रेस को करुणानिधि के साथ-साथ जयललिता का भी समर्थन चाहिए। क्या यह संभव है?

कांग्रेस बिहार में लालू के साथ-साथ नीतीश कुमार पर डोरे डाल रही है। बिहार की राजनीति में फिलहाल नीतीश और लालू दो विपरीत ध्रुव हैं। और तो और, कांग्रेस को अपने धुर विरोधी चंद्रबाबू नायडू का भी समर्थन चाहिए। यह आला दर्जे की मौकापरस्ती गठबंधन युग की अगली पीढ़ी के दिमाग की उपज है, जिसने सत्ता को सबकुछ समझ लिया है। पहले के चुनावों के समय नेता सीधे जनता से मेल बढ़ाते थे, सीधे जनता से अपील करते थे, लेकिन चुनाव 2009 में जितनी बेचैनी सभाओं में नहीं है, उससे ज्यादा बेचैनी नेताओं के मंच पर देखी जा रही है। परदे के पीछे ही नहीं, परदे के सामने भी राजनीतिक जोड़तोड़ का स्वरूप इतना विशाल है कि चुनाव भी बौना नजर आ रहा है। आम आदमी सवालों से भरा हुआ है और नेता परस्पर सेटिंग में जुटे हैं। चुनाव में एक ही राज्य में एक दूसरे का बाजा बजाने के इरादे से गाली-गलौज तक कर चुके नेता अगर केन्द्र में सत्ता के लिए सेटिंग कर लें, तो क्या लोकतंत्र मजबूत होगा? लालू, पासवान यूपीए की एकता को ठेंगा दिखाकर कांग्रेस को औकात बताने के बाद भी कह रहे हैं कि कांग्रेस हमारे साथ है, हम यूपीए में हैं और सरकार हमारी बनेगी। कांग्रेस भी कभी लालू को हां बोल रही है, तो कभी ना। यह जनता के साथ धोखा नहीं, तो और क्या है? आप पार्टी नंबर 1 के खिलाफ पार्टी नंबर तीन को वोट देते हैं, लेकिन वह पार्टी केन्द्र में पहुंचकर पार्टी नंबर 1 से ही सेटिंग कर लेती है, यह आपके साथ चार सौ बीसी नहीं, तो और क्या है? अपने देश में मामूली ठगी पर धारा 420 लागू हो सकती है, लेकिन करोड़ों लोगों को धोखा देकर पाला बदलने वालों के खिलाफ धारा 420 क्यों नहीं लगाई जाती? ऐसा नहीं है कि ऐसी राजनीतिक चार सौ बीसी पहली बार हो रही है, लेकिन संभवत 2009 का लोकसभा चुनाव ऐसा पहला चुनाव है, जब बीच चुनाव में पार्टियों ने एक दूसरे पर जमकर डोरे डाले हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि सब जानते हैं, दो-तीन परितियों के बलबूते सरकार नहीं बनने वाली, सरकार बनाने के लिए आठ दस पार्टियों की जरूरत पड़ेगी। कांग्रेस के रणनीतिकार चतुर हैं, वे पहले बुकिंग करके भाजपा की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। वैसे भाजपा भी अपने पूर्व सहयोगियों के संपर्क में है। उसके रणनीतिकारों ने भी फार्मूले तैयार कर रखे हैं, जिन पर अमल 16 मई से शुरू होगा। भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन भी कोई विचारधारा आधारित नहीं है। अभी पिछले दिनों राजग के संयोजक शरद यादव अपनी पार्टी के प्रत्याशी के प्रचार के लिए जयपुर आए थे और भाजपा को जनविरोधी नीतियों वाली पार्टी बताया था। तो यह है शरद यादव की ईमानदारी? वे जयपुर के लोगों को बरगला रहे थे या सीधे कहें, तो ठग रहे थे। उधर, बाला साहेब की शिव सेना आडवाणी को कितना सम्मान देती है, यह हम देख चुके हैं, गठबंधन के मुखिया आडवाणी को मिलने तक का समय नहीं दिया गया था। समकालीन राजनीतिक परिदृश्य में अलग-अलग राजनीतिक सेनाएं एक ही मैदान में इस तरह गडमड होकर खड़ी हो गई हैं कि कौन रथी किस ओर है और किस ओर जाएगा, कहना मुश्किल है। तय है, केन्द्र में जो गठबंधन की सरकार बनेगी, उसमें विचारधारा को औंधेमुंह गिरे रहने दिया जाएगा। मतदाताओं के साथ धोखा होगा, उनके जनप्रतिनिधि अपने दुश्मनों के साथ ही दोस्ती गांठ लेंगे। सत्ता का शामियाना तनता देख सभी ललचाएंगे, खिंचे चले आएंगे। चुनाव की मंझधार में ही जब बेमेल गठबंधन की बातें हो सकती हैं, तो फिर नेताओं के घाट पर उतरते ही मतदाताओं के साथ घात को कौन टाल सकता है? चिंता जब केवल आंकड़े जुटाकर सरकार बनाने की है, तो फिर जनता से जुड़े मुद्दों की अवहेलना क्यों न हो? भारतीय राजनीति के लिए यह खतरनाक संकेत है। नेताओं के मन में यह भावना प्रबल होने लगी है कि बहुमत लायक पूरे वोट तो मिलते नहीं हैं, गठबंधन करना पड़ता है, तो क्यों न पूरा जोर वोट की बजाय गठबंधन गठन पर दिया जाए, ज्यादा से ज्यादा पार्टियों को पक्ष में पटाने पर दिया जाए। नेताओं की बिरादरी बहुमत न जुटने से दुखी है, वह अपने दुख के उपचार में लगी है, उसका जनता के दुख से सरोकार कम होता जा रहा है। दुख इसका नहीं है कि लोगों की आकांक्षाएं पूरी नहीं हो रही हैं, दुख इसका है कि बहुमत नहीं मिल रहा। आज लालू जैसे नेता तो यही कहेंगे कि गरीबी, आतंकवाद की बात बाद में करेंगे, पहले सरकार तो बना लें। एक बार जब सरकार बन जाएगी, तो बस सारा ध्यान उसे बचाने की ओर लग जाएगा। दिग्वजय सिंह जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब एक कार्यक्रम में बच्चों ने उनसे पूछा था, आप खाली समय में क्या करते हैं, तो उन्होंने बताया था, खाली समय में अपनी कुर्सी बचाने के बारे में सोचता हूं।

अब आप सोच लीजिए, एक अकेली पार्टी का मुख्यमंत्री जब यह कह सकता है, तो फिर कई पार्टियों की मदद से चुना गया प्रधानमंत्री कुर्सी बचाने के बारे में क्या कहेगा? दूसरी ओर, आम लोगों में यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि सब नेता एक जैसे हैं, किसी के आने या जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। आतंकवाद, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी, शोषण खत्म नहीं होने वाला। सब नेता एक ही तरह से बात कर रहे हैं, तो काम भी एक ही तरह से करते हैं। नेताओं की जात एक है, उनमें से ज्यादातर किसी विचारधारा से चिपक कर नहीं रहने वाले। अनीस अंसारी का एक शेर नेताओं को संबोधित है

बात तुम्हारी सुनते-सुनते ऊब गए हैं हम बाबा।

अपनी जात से बाहर झांको, बाहर भी हैं गम बाबा।