Friday 28 September 2012

नीतीश जी को गुस्सा क्यों आया?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुशनसीब हैं कि उन्हें हर महीने तनख्वाह मिलती है, लेकिन बिहार में ज्यादातर सरकारी कर्मचारी बदनसीब हैं कि उन्हें समय पर तनख्वाह नहीं मिलती। न जाने किस कमाई पर ज्यादा ध्यान देने वाले लालू प्रसाद यादव ने सरकारी तनख्वाह के भुगतान चक्र को पटरी से ऐसे उतारा कि आज भी बिहार में तनख्वाह समय पर नहीं बंटती है। नीतीश कुमार को सुशासन बाबू कहा जाता है, लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल में भी वे तनख्वाह की गाड़ी को पटरी पर नहीं चढ़ा पाए हैं, तनख्वाह तीन-तीन, चार-चार महीने की देरी से मिलती है, एक ही बार में दो से चार तनख्वाहों का एलॉटमेंट होता है, मतलब मासिक वेतन भुगतान के कायदे को ही खारिज कर दिया गया है। नीतीश बाबू अपने राज्य में अधिसंख्य कर्मचारियों से उधारी पर ही काम लेते हैं और चाहते हैं कि उनके राज्य में भ्रष्टाचार न हो। जो सरकार समय से अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे सकती, वह भ्रष्टाचार को कैसे रोक सकती है और ऐसी सरकार का गुणगान कैसे किया जाए? बिहार में भी पेट रोज दो-तीन बार खाना मांगते हैं, बीमारी, शादी, जिंदगी के बाकी तामझाम भी चलते ही रहते हैं, खर्चे नहीं रुकते, लेकिन तनख्वाह रुक जाती है। किसी दुकान से कोई सरकारी कर्मचारी उधारी लेता है, तो यह नहीं बता सकता कि कब तक उधारी चुका देगा। दुकान वाले का भी सब्र टूटता है, वह सरकारी कर्मचारी के दफ्तर पहुंचकर पता लगाता है कि क्या तनख्वाह नहीं आई है, तनख्वाह कब आएगी। नीतीश कुमार बताएं कि समय पर तनख्वाह नहीं मिलेगी, तो घर कैसे चलाएंगे लोग? क्या चोरी और भ्रष्टाचार के लिए मजबूर नहीं होंगे? जाहिर है, अब लोग निंदा करने लगे हैं, तो नीतीश कुमार को गुस्सा आने लगा है। लालू को भी एक समय गुस्सा आता था, लालू भी लोगों की तकलीफों के प्रति लापरवाह हो गए थे, जिसका फायदा नीतीश कुमार को मिला, क्योंकि वे विनम्र नेता माने जाते हैं, लेकिन अब अपनी विनम्रता में स्वयं नीतीश कुमार ही पलीता लगा रहे हैं। जो भी उनके खिलाफ बात करता है, उसे वह दुनिया का सबसे बुरा आदमी मान बैठते हैं। पत्रकारों पर भी खूब मुंह फुलाते हैं? उन्होंने गुस्सा दिखा-दिखाकर बिहार में ज्यादातर अखबारों को घुटनों के बल कर दिया है। क्या चापलूसों से घिर गए हैं नीतीश? उनके नामी-गिरामी सलाहकारों को भी क्या कुछ सूझ नहीं रहा है? क्या सलाहकारों ने अपना उल्लू सीधा करने के बाद अच्छी सलाह देना बंद कर दिया है? क्या बिहार में आधारभूत व्यवस्था सुधार का काम पूरा हो गया है? क्या बिहार सरकार केन्द्र से प्राप्त राशि का पूरा और ईमानदार सदुपयोग करने लगी है? क्या बिहार में मनरेगा के तहत गांव-गांव में कायाकाल्प कर दिया गया है? क्या बिहार से बाहर जाने वालों का तांता टूट चुका है? क्या सडक़ें दुरुस्त हो चुकी हैं? क्या गांव-गांव में बिजली पहुंच गई है? क्या पुलिस के कामकाज में थोड़ा भी सुधार आया है? क्या पुलिस ने लोगों से मुंहदिखाई वसूलना छोड़ दिया है? तो फिर नीतीश कुमार को इन मूलभूत कार्यों को किए बिना गुस्सा क्यों आ रहा है? परिवार में भी उसी मालिक का गुस्सा परिजन सहते हैं, जो मालिक परिजनों की जरूरतों को पूरा करता है। नीतीश कुमार भूल रहे हैं, जनता ने उन्हें गुस्सा दिखाने के लिए नहीं चुना है। जनता किसी नेता का गुस्सा बर्दाश्त नहीं कर सकती। नेता के प्रेम को लोग भले भूल जाते हों, लेकिन उसके गुस्से को लोग याद रखते हैं। नीतीश लोगों का भरोसा तोड़ रहे हैं? नीतीश जितना ज्यादा गुस्सा होंगे, लालू की वापसी के लिए उतनी ही अच्छी जमीन तैयार होगी। उनके दूसरे कार्यकाल का आधा से भी ज्यादा हिस्सा अभी बाकी है, लेकिन वे अभी से अपनी विफलताओं को ढंकने की कोशिश में लग गए हैं। इन दिनों उन्होंने विशेष राज्य दर्जे की मांग का डंका पीट रखा है, इस दर्जे को वे बिहार का अधिकार मान रहे हैं। हां, बेशक विशेष राज्य का दर्जा मिलने से बिहार को फायदा होगा। विकास के लिए ज्यादा धन उपलब्ध होगा, लेकिन यह दर्जा भी कोई जादू की छड़ी नहीं है। अभी ११ राज्यों के पास विशेष राज्य का दर्जा है, लेकिन इनमें से कोई राज्य ऐसा नहीं है, जो देश की शान बना हो। ये लगभग सभी ११ राज्य देश पर बोझ बने हुए हैं। यह सही है कि बिहार की तुलना में दस गुना ज्यादा राशि जम्मू-कश्मीर को मिलती रही है, लेकिन तब भी देश के लिए बिहार का योगदान जम्मू-कश्मीर से कहीं ज्यादा है। बिहार पूरे देश को श्रमिक उपलब्ध करा रहा है, देश के खाद्यान्न भंडार में भी अनाज पहुंचा रहा है। बिहार की यह स्थिति बिना विशेष राज्य का दर्जा मिले हुए ही है। बिहार की विकास दर ज्यादा है, यह भी विशेष राज्य का दर्जा मिले बिना ही हुआ है। आगे की राह विशेष राज्य का दर्जा मिल जाने से आसान हो जाएगी, ऐसा कदापि नहीं है। अपने देश में विकास और लूट में अंतर काफी कम हो गया है। बिहार में भी विकास के नाम पर लूट थमने का नाम नहीं ले रही है। गांवों में भले ही सडक़ न हो, लेकिन सरपंचों के पास बोलेरो, पजेरो, बस, ट्रक, अनेक मकान और प्लॉट हैं। नीतीश कुमार ईमानदार हैं, हो सकता है सुशील कुमार मोदी भी ईमानदार हों, लेकिन यही बात वे स्वयं अपने मंत्रियों के बारे में नहीं कह सकते। अपने शासन के दौरान नीतीश कुमार मंत्रियों और विधायकों की तरक्की के बारे में जानते ही होंगे? क्या मंत्रियों-विधायकों-सरपंचों की विकास दर बिहार की विकास दर से कई गुना ज्यादा नहीं है? फिर कहां है सुशासन? वह दिखता क्यों नहीं? आज भी ऐसी सडक़ें हैं कि लोग सडक़ छोडक़र बगल में खेतों से होकर चलना पसंद करते हैं। ऐसे में, उन्हें जरूर सोचना चाहिए कि उन्हें गुस्सा क्यों आया? किस पर आया? क्या यह गुस्सा अपने ही लोगों पर नहीं है? उन्हीं लोगों पर आया गुस्सा है, जो दोबारा नीतीश कुमार को सत्ता में लेकर आए हैं। कभी खगडिय़ा में लोग हमला बोल रहे हैं, तो कभी शिक्षक चप्पलें दिखा रहे हैं और नीतीश कुमार इतने आग बबूला हैं कि तुम-तड़ाक पर उतर आए हैं। माफ कीजिएगा नीतीश जी, लोग दूसरे राज्यों में हुई तरक्की को भी देख रहे हैं, उनकी आंख पर आप पट्टी नहीं बांध सकते। लोग विकास के उन आंकड़ों को भी देख रहे हैं, जो बिहार सरकार छाप या छपवा रही है। आपने लोगों को बताया है कि विकास हुआ है, तो लोग विकास में हिस्सेदारी मांग रहे हैं। कुछ इलाके विकसित हो रहे हैं, तो कुछ इलाके लालू युग में ही छोड़ दिए गए हैं। मत भूलिए कि लोगों को विकास के सपने आपने ही दिखाए थे, आप करीब सात साल से सत्ता में हैं, लेकिन ज्यादातर सपने पूरे नहीं हुए हैं। सपनों के पूरे होने का हल्ला ज्यादा है। आपके द्वारा ही मचाया गया सुशासन और विकास का हल्ला जरूरत से ज्यादा है, हल्ला इतना ज्यादा है कि यह आपकी भी नींद उड़ा देगा। बिहारी उग्र हो रहे हैं, क्योंकि सदियों से चैन से सोए नहीं हैं। हजारों गांव हैं, जहां बिजली के इंतजार में लोगों को ठीक से नींद नहीं आती, नींद आती है, तो चोर-डकैत आते हैं, और सुबह-दोपहर जब पुलिस आती है, तो क्या करती है, यह डीजीपी अभयानंद जी बेहतर जानते होंगे। अभयानंद जी की बात करें, तो उन्होंने सैकड़ों गरीबों को सुपर थर्टी कोचिंग के जरिये लखटकिया इंजीनियर बना दिया, लेकिन वे पुलिस महकमे में शायद सुपर थ्री भी नहीं पैदा कर पाए हैं। आज बिहार के मुख्यमंत्री को भी केन्द्र सरकार से जरूरत से ज्यादा उम्मीदें हैं, और लोगों को भी जरूरत से ज्यादा उम्मीदें हैं। बिहार की यही त्रासदी है कि आज ख्वाब और उम्मीदें ही समस्याएं हैं। और अंत में अगर भोजपुरी में बात करें तो नीतीश कुमार के लिए दो लाइनें यों होंगी काहे खिसियाइल बाड़ जान लेबे का हो आरे नीतीश बाबू परान लेब का हो ?

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