Monday 17 September 2012

के. एस. सुदर्शन को श्रद्धांजलि


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे के. एस. सुदर्शन को श्रद्धांजलि देने से मैं स्वयं को रोक नहीं पा रहा हूं। वे बाद के दिनों में अपने विवादित या भ्रम पैदा करने वाले बयानों की वजह से और आखिरी दिनों में स्मृतिलोप की वजह से मीडिया के लिए हल्के महत्व के हो गए थे, लेकिन सुदर्शन जब अपने अच्छे दिनों में थे, तो दक्षिणपंथ के एक सबसे जीवंत प्रतिमान थे, उन्हें राष्ट्र की ताकत का पूरा अहसास था। वे राष्ट्र की नसों से परिचित थे, उन्होंने कई मौकों पर वामपंथियों और कांग्रेसियों को भी अचंभित किया था।
मैंने उन्हें पहली बार आमने-सामने बैठकर भोपाल में सुना था। स्वदेशी उनका एक प्रिय मुद्दा था, जिस पर वे बोल रहे थे। यह घटना संभवत: १४ साल पुरानी है। उनकी पूरी बात मुझे आज याद नहीं, लेकिन उन्होंने एक कथा सुनाई थी, जो मुझे आज भी याद है। वह मैं आप सबों को सुनाता हूं।
एक भारतीय सेठ ने जर्मनी से मैदा बनाने वाली मशीन मंगवाकर व्यवसाय शुरू किया। विदेशी मशीन का अपना जलवा था, खूबसूरत और भव्य दिखने वाली मशीन रंग-ढंग में अद्भुत थी, लेकिन जब मशीन ने काम करना शुरू किया, तो अचानक बंद हो गई। मैकेनिक ने वाशर बदला, मशीन फिर चली और फिर खराब हो गई, वाशर फिर बदला गया, फिर घिस गया। मशीन विफल सिद्ध हुई। मशीन बनाने वाली कंपनी से संपर्क साधा गया, तो पता चला जर्मनी से इंजीनियर के आने में महीने-दो महीने लग जाएंगे। सेठ बहुत परेशान हुआ, तभी उसे किसी ने बताया कि रामगढिय़ा समुदाय पास ही शहर में टिका हुआ है, क्यों नहीं आप किसी रामगढिय़ा को अपनी मशीन दिखवाते हैं। क्या पता वह ठीक कर दे?
यह सुनकर सेठ बिगड़ गया, विदेशी मशीन के बारे में देहाती-खानाबदोश रामगढिय़ा क्या जानें? मशीन सुधारने के लिए हाथ भी लगाया, तो और बिगाड़ कर रख देंगे।
उस व्यक्ति ने सेठ को समझाया, रामगढिय़ा लोगों को कम मत समझिए, यंत्र व अभियांत्रिकी के मामले में बड़े सिद्ध होते हैं। वैसे भी आपकी मशीन तो महीने भर बाद सुधरेगी, जब जर्मनी से इंजीनियर आएगा, इस बीच बैठने से अच्छा है कि किसी रामगढिय़ा को बुलाकर मशीन दिखलाई जाए और पूछा जाए।
सेठ को यह बात जंच गई। उनसे एक रामगढिय़ा को बुलवाया। बिल्कुल एक आम भारतीय की तरह ठेठ देहाती रामगढिय़ा सेठ के कारखाने पहुंचा। थोड़ी बहु़त बातचीत के बाद सेठ ने उसे मशीन का दर्शन कराया। उसने काफी देर तक मशीन को गौर से देखा, उसके बारे में मशीन चलाने वालों से चर्चा की। उसने कुछ कवरआदि को खोलकर देखा।
सेठ ने पूछा, क्या कुछ समझ में आ रहा है?
रामगढिय़ा ने जवाब दिया, हां, पता लग गया है। एक जगह वाशर बार-बार टूट जा रहा है, क्योंकि थोड़ा चलते ही मशीन गर्म हो जा रही है।
सेठ ने पूछा, यह तो हमें भी पता है, हमें तो यह बताओ कि क्या तुम ठीक कर सकोगे?
रामगढिय़ा ने जवाब दिया, हां, ठीक कर दूंगा।
सेठ चकित हुआ, पूछा, क्या करोगे?
जवाब मिला, कुछ देर का काम है? एक कांटी और हथौड़ी मंगवाइए।
सेठ ने डरते हुए ही अपने कर्मचारियों को कांटी और हथौड़ी देने का आदेश दिया।
रामगढिय़ा ने मशीन में एक निश्चित स्थान पर कांटी को अड़ाया और हथौड़ी मारकर छेद कर दिया और फिर वाशर बदल दिया। उसने कहा, सेठ जी अब मशीन चलवाइए।
सेठ ने पूछा, बन गई क्या? कोई और परेशानी तो नहीं हो जाएगी?
रामगढिय़ा ने आश्वस्त किया, घबराइए नहीं, अब कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए।
मशीन चलाई गई और खूब देर तक चली, बंद नहीं हुई।
सभी चकित और खुश थे। सेठ ने पूछा, तुमने क्या किया?ï क्या खराबी थी?
रामगढिय़ा ने जवाब दिया, वाशर को लगातार तेल नहीं मिल रहा था, इसलिए वह कट जा रहा था। उस तक तेल आने का रास्ता तो है, लेकिन घूमकर है, जब तक तेल की बूंद वाशर तक पहुंचती है, तब तक वाशर गर्म होकर कट जाता है। अब मैंने ऐसी जगह पर छेद किया है कि वाशर वाली जगह को लगातार तेल मिलता रहेगा, जिससे वह नहीं घिसेगा, मशीन चलती रहेगी।
सेठ बड़ा खुश हुआ। मैदा बनाने का काम चल निकला। सेठ ने रामगढिय़ा को खिलाया-पिलाया। बड़े प्रेम से चर्चा की। कई सवाल पूछने के सिलसिले में एक सवाल यह भी पूछ लिया, क्या तुम ऐसी ही मशीन बना सकते हो?
रामगढिय़ा ने जवाब दिया, हां, बना सकता हूं, मेरी बनाई मशीन इतनी सुंदर तो नहीं दिखेगी, लेकिन काम पूरा करेगी।
सेठ के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। उसने रामगढिय़ा को नई मशीन बनाने के लिए कह दिया।
लगभग महीने भर बाद जर्मनी से इंजीनियर आया, मशीन चलती हुई मिली। उसने पूछताछ की कि क्या खराबी थी, किसने ठीक की।
उसे बताया गया कि एक लोकल इंजीनियर ने मशीन ठीक कर दी है। मशीन चलाने वाले ने ही बताया कि रामगढिय़ा ने क्या किया कि मशीन चल पड़ी। जर्मन इंजीनियर के आश्चर्य का ठिकाना न था, उसने अपनी रिपोर्ट लिखी। उसके बाद बताते हैं कि उस कंपनी ने अपनी मशीन में सुधार किया। जो भी मशीन दक्षिण एशिया के गर्म देशों बेची गई, उसमें एक रामगढिय़ा इंजीनियर का आविष्कार भी शामिल था।
. . .
तो सुदर्शन जी इस कथा की सहायता से यह बता रहे थे कि भारतीयों में कोई कमी नहीं है, जो आदमी गरीब दिखता है, उपेक्षित दिखता है, उसमें भी कोई न कोई टैलेंट है। नई व्यवस्था कुशल भारतीय समुदायों के टैलेंट को भुलाकर काम कर रही है। हम स्वदेशी शक्ति को भुलाकर पश्चिम की ओर भाग रहे हैं। न जाने कितनी ऐसी ही सक्षम जातियों-उपजातियों को इस देश ने भुलाया और मिटाया है।
सुदर्शन जी हमेशा याद रहेंगे और उनकी यह कथा मेरे हृदय में हमेशा बसी रहेगी।
उनको मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि। आवश्यकता से अधिक स्वाभिमान, सत्ता सुख और पूंजीवादी हवा के कारण निरंतर कमजोर होता और आदर्श गंवाता दक्षिणपंथ अपने एक सशक्त स्तंभ से वंचित हो गया है।

1 comment:

GYanesh Kumar said...

भाई ज्ञानेश जी खुशी हुयी आप जैसे मेरे नामराशि मित्र से मिलकर और ज्यादा खुशी हुयी कि आप इस नाम को सार्थक कर रहे हैं मैं तो केवल एक छोटा सा ब्लागर हूँ जो या तो आयुर्वेद या फिर राष्ट्रीय भावनाओं पर कभी कभी अपनी लेखनी भर चला लेता हूँ।आपके इस लेख का कुछ अंश लेकर मैंने अपने ब्लाग पर आपके लिंक सहित लगा ली है उद्देश्य कुछ नही बस इतना कि आपका लेख हमारे पाठकों को भी उपलब्ध हो जाए और परम पूजनीय श्री सुदर्शन जी के विचारों से राष्ट्र के प्रति आदर की जो भावना प्रकट होती है मैरे पाठक ब अन्य ब्लागर जो मेरे ब्लाग पर आये उन्हैं भी ये विचार मिल पाए।आप भी मेरे ब्लाग पर आमंत्रित हैं।मेरा एक ब्लाग आयु्र्वेद को समर्पित है।मुझे खुशी होगी अगर आप मेरे ब्लागों पर अपनी विजिट करेगं और यथा योग्य जानकारी भी देंगे।
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