Sunday 9 September 2012

राजनीति बनाम लोकनीति 2


दूसरा भाग
ऐसा क्यों हो रहा है? राजनीति का कौन-सा ककहरा हमारे राजनेताओं ने पढ़ा है? दरअसल, हमारे यहां पॉलिटिक्स नहीं, राजनीति होती है, अर्थात राज करने की नीति चलती है। जनता पर कैसे राज करना है, राजनीति का यही लक्ष्य है।
माफ कीजिएगा, मुझे इस ‘राजनीति’ शब्द पर ही आपत्ति है, इस शब्द से राजतंत्र की बू आती है। भारत को राजनीति का देश बनाने की बजाय लोकनीति का देश बनाना चाहिए था। पॉलिटिक्स शब्द लोकनीति के ज्यादा निकट है, जहां पॉलिटिक्स होती है, वहां यह बात दिखती भी है, लेकिन हमारे यहां राजनीति होती है, जहां नेता और जनता के बीच लंबी दूरी दिखती है। नेताओं और जनता के बीच शिकायतों का अंबार लगा हुआ है। शिकायतों का अंबार लगा ही इसलिए है, क्योंकि भारत में पॉलिटिक्स को समझा नहीं गया है, यहां पॉलिटिक्स नहीं, सतत राजनीति हुई है।
अगर थोड़ा विस्तार में जाएं, तो दरअसल यह राजनीति हमें अंग्रेज सिखा गए थे, हमने ‘लोकतंत्र’ को तो अपनाया, लेकिन हमने ‘राजनीति’ को कायम रखा, जबकि ‘लोकतंत्र’ में ‘लोकनीति’ चलनी चाहिए थी। राज या सत्ता को मजबूत करने के चक्कर में नीतियों का बंटाधार कर दिया गया। क्या हमारे राष्ट्रनिर्माताओं से यह भूल हुई थी? क्या राष्ट्रपति महात्मा गांधी से गलती हुई थी? गांधी जी को पढि़ए, गांधी जी कहते हैं, ‘स्वराज्य का अर्थ है सरकार के नियंत्रण से स्वतंत्र रहने का निरन्तर प्रयास, फिर वह विदेशी सरकार हो या राष्ट्रीय सरकार। यदि देश के लोग जीवन की हर बात की व्यवस्था और नियमन के लिए स्वराज्य-सरकार की ओर ताकने लगें, तब तो उस सरकार का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।’
मतलब गांधी जी बिल्कुल सही सोच रहे थे। गलती उनसे नहीं हुई, गलती तो उन लोगों से हुई, जिन्होंने आजाद भारत की सत्ता का संचालन किया। सत्ता को मजबूत करने की नीति के बीज बोए गए। गांधी जी कहते थे, ‘सच्चा लोकतंत्र केन्द्र में बैठे हुए बीस व्यक्तियों द्वारा नहीं चलाया जाएगा, उसे प्रत्येक गांव के लोगों को नीचे से चलाना होगा।’ लेकिन आज राजनेता और राजनीति क्या कर रहे हैं, राजधानी में बिजली नहीं जाती, लेकिन गांवों में जब चाहे चली जाती है, पचास प्रतिशत से ज्यादा ऐसे गांव हैं, जहां बिजली आज भी वैसे नहीं पहुंची है, जैसे उसे पहुंचना चाहिए था। तो बिजली कहां पहुंची है? बिजली राजनेताओं की राजधानियों में पहुंची है। बिजली ठीक उसी तरह से राजधानियों में कैद हो चुकी है, जैसे सत्ता कैद हो चुकी है। सत्ता ने गांवों की ओर निकलना छोड़ दिया है। एकतरफा ट्रैफिक आजादी के बाद से ही चल रहा है, लोग गांवों से निकलकर शहर तो जाते हैं, लेकिन शहर से शायद ही कोई गांव लौट पाता है। राजधानियों में उजाला है और लोकधानियों यानी गांवों में अंधेरा है। गांधी जी जो करते थे, वह राजनीति नहीं, लोकनीति थी। उन्होंने कपड़ा त्याग दिया कि तभी पहनेंगे, जब सारे देशवासियों तक कपड़ा पहुंच जाएगा। रिचर्ड एटनब्रो ने १९८२ में फिल्म बनाई थी - ‘गांधी’। उसके उस दृश्य को मैं भूल नहीं पाता, जब गांधी जी किसी नदी के पुल के पास ठहरी ट्रेन से उतर कर नदी के जल से हाथ मुंह धो रहे हैं, पूरे भव्य गुजराती पहनावे में - लंबी पगड़ी से लेकर लंबी धोती तक और नदी के ही उस किनारे पर ही एक महिला कम वस्त्रों में अपनी लाज बचाने में जुटी है, गांधी जी से रहा नहीं जाता, वे अपने वस्त्र को नदी में बह जाने देते हैं, ताकि नदी की लहरें उस वस्त्र को जरूरतमंद गरीब महिला तक पहुंचा दें। ऐसा ही होता है, भावविभोर गांधी भीतर तक हिल जाते हैं कि वे इतने सारे वस्त्र ढो रहे हैं, इनकी जरूरत क्या है?
राजनेता और राजनीति गांधी जी की इस लोकनीति को आज भी नहीं समझ पाए हैं। गांधी जी अगर आज जीवित होते, तो आज भी वे पूरे वस्त्र नहीं पहन पाते, क्योंकि आज की राजनीति उन्हें पूरे वस्त्र पहनने नहीं देती। बिजली, पानी, सडक़ नहीं दे पाए, लेकिन लोकलुभावन योजनाओं का दौर सा चल रहा है। कहीं साइकिल बंटती है, कहीं अनाज, सिलाई मशीन, गैस स्टोव, रेडियो, कहीं आवास, कहीं नकद खैरात, कहीं अधूरी नौकरी, कहीं गाय-भेड़ का वितरण चल रहा है। तो कहीं शराब बंट रही है कि आदमी नशे में रहे और उसी को वोट दे, जो पिला रहा है। क्या यही राजनीति है? राज या सत्ता में बने रहने की नीति? माफ कीजिए, अगर यह राजनीति है, तो यह वाकई सफल है। आज के संदर्भ में राजनेता और राजनीति इस देश में सबसे कामयाब शब्द हैं। राजनेता वोटों के उद्योगपति हैं और राजनीति उद्योग। राजनीति की शेयरहोल्डिंग कंपनियां चल रही हैं, राजनीति के कारपोरेट घराने चल रहे हैं, राजनीति के बड़े-बड़े ऐसे सुगठित निगम चल रहे हैं, जिनका एक ही काम है, सत्ता में बने रहने की कोशिश व साजिश रचना। ऐसा नहीं है कि देश में केवल गरीब ही राजनीति का शिकार हो रहा है, अमीर भी उतने ही शिकार हैं। गरीबों को भी लूटा जा रहा है और अमीरों को भी। गरीब ज्यादा लाचार हैं, अमीर थोड़ा कम लाचार हैं। गरीब किसी को लूट नहीं सकता, लेकिन अमीर लोग राजनीति द्वारा होने वाली लूट की भरपाई करने में सक्षम हैं। नेताओं की बढ़ती आय पर जरा गौर फरमाइए, दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की जारी है। लोकनीति चलती, तो लोगों की आय तेजी से बढ़ती, राजनीति चल रही है, तो राजनेताओं की आय तेजी से बढ़ रही है।
क्रमश:

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