Friday, 15 January, 2010

जेपी का गांव


जब भी जयप्रकाश नारायण के बारे में पढ़ता था, मन में यह बात उठती थी कि एक बार उनके गांव जाकर देखना चाहिए। बचपन से ही यह सुनता आया था कि मेरे अपने गांव से जयप्रकाश नारायण का गांव बहुत दूर नहीं है। पिछले साल 28 अक्टूबर को जेपी के गांव जाने का सपना साकार हुआ। यात्रा में दो भतीजियां, जया और विजया, भी साथ थीं, दोनों ही गांव में खुले कान्वेंट स्कूल में पढ़ाती हैं। उनमें जेपी के गांव जाने का उत्साह इतना था कि दोनों ने स्कूल से एक दिन का अवकाश ले लिया। बहरहाल, अपने गांव शीतलपुर बाजार से मांझी तक सड़क ऐसी थी कि नीतीश कुमार पर बहुत गुस्सा आ रहा था। नीतीश ने उत्तरी बिहार पर बहुत कम ध्यान दिया है। स्थानीय नेता तो बस चुनाव जीतने और हारने के लिए ही आते हैं। कई नेता तो यह मानकर लूट मचाते हैं कि अगली बार जनता मौका नहीं देगी। कहीं सड़क पर खड्ढे हैं, तो कहीं खड्ढे में सड़क। ऐसी सड़कों पर पैदल चलना भी चुनौतीपूर्ण है। सात किलोमीटर दूर मांझी पहुंचने में लगभग पैंतालीस मिनट लग गए। फिर सरयू पर बना नया पुल पार किया, यह पुल भी लगभग बीस साल में तैयार हुआ है। खराब सड़कों की वजह से पुल से वाहनों की आवाजाही अभी कम ही है। खैर, आगे भी सड़क कहने को राजमार्ग है, हालत खस्ता है।
जेपी के गांव सिताब दीयरा के लिए छपरा-बलिया सड़क मार्ग से बाईं ओर मुड़ना होता है। दीयर का इलाका भी मैंने पहली बार देखा। दूर-दूर तक सपाट खेत, ऊंची सड़क से कहीं कहीं धूल उड़ाती गुजरती कार। सिताब दीयरा बहुत बड़ा गांव है, शायद 27 टोलों का। सड़क की बाईं ओर समानांतर लगभग पांच सौ मीटर दूर गांव शुरू हो चुका है, अपेक्षाकृत अच्छी, लेकिन सूनी सड़क पर पूछते-पूछते हम आगे बढ़ रहे हैं। जेपी ने चंबल में डकैतों से समर्पण करवाया, लेकिन उनका खुद का इलाका हमेशा से चोरों-लुटेरों से परेशान रहा है। जिस सड़क से हम गुजर रहे हैं, वह सुरक्षित नहीं है। बाईं ओर कई टोलों को पार करते हुए दाईं ओर एक टोला नजर आता है, पूछने पर पता चलता है, हां, इधर ही जयप्रकाश नारायण का घर है। उनके टोले में प्रवेश करते हुए लगता है कि किसी पॉश कॉलोनी में आ गए हैं। कई शानदार भवन, बागीचे, द्वार, अच्छी सड़कें। कोई भीड़भाड़ नहीं है। टोले के ज्यादातर लोग शायद बाहर ही रहते हैं। बाहर से भी यहां देखने के लिए कम ही लोग आते हैं। इस टोले का नाम पहले बाबुरवानी था, यहां बबूल के ढेरों पेड़ थे। जेपी के जन्म से काफी पहले जब सिताब दीयरा में प्लेग फैला, तो बचने के लिए जेपी के पिता बाबुरवानी में घर बनाकर रहने आ गए।
दीयर इलाका वह होता है, जो नदियों द्वारा छोड़ी गई जमीन से बनता है। सिताब दियरा गांव गंगा और सरयू के बीच पड़ता है। नदियां मार्ग बदलती रहती हैं। कभी यह गांव बिहार में था, लेकिन अब उत्तर प्रदेश में है, हालांकि बताया जाता है, राजस्व की वसूली बिहार सरकार ही करती है। वैसे भी ऐसी जमीनें हमेशा से विवादित रही हैं। जेपी के दादा दारोगा थे और पिता नहर विभाग में अधिकारी, अतः जेपी के परिवार के पास खूब जमीन थी। आजादी के बाद भी काफी जमीन बच गई। चूंकि दीयर इलाके में हर साल बाढ़ आती है, इसलिए मजबूत घर बनाना मुश्किल काम है, अतः जेपी के घर की छत खपरैल वाली ही थी। आज भी उनका घर बहुत अच्छी स्थिति में रखा गया है। देख-रेख बहुत अच्छी तरह से होती है। जेपी के गांव जाने से दो दिन पहले मैं डॉ राजेन्द्र प्रसाद के गांव भी गया था। जेपी का गांव मेरे गांव से 34 किलोमीटर दूर, तो राजेन्द्र बाबू का गांव 52 किलोमीटर दूर है। राजेन्द्र जी के गांव में उनकी उपेक्षा हुई है, जबकि सिताब दीयरा में जेपी सम्मानजनक स्थिति में नजर आते हैं।
यहां यह उल्लेख जरूरी है कि राजेन्द्र प्रसाद और जेपी के बीच रिश्तेदारी भी थी। राजेन्द्र बाबू के बड़े बेटे मृत्युंजय प्रसाद और जेपी साढ़ू भाई थे।
जेपी का घर, दालान, उनका अपना कमरा, उनकी वह चारपाई जो शादी के समय उन्हंे मिली थी, उनकी चप्पलें, कुछ कपड़े, वह ड्रेसिंग टेबल जहां वे दाढ़ी बनाया करते थे, सबकुछ ठीक से रखा गया है, जिन्हें देखा और कुछ महसूस किया जा सकता है। उनके घर की बाईं ओर शानदार स्मारक है। जहां उनसे जुड़े पत्र, फोटोग्राफ इत्यादि संजोए गए हैं। पत्रों में डॉ राजेन्द्र प्रसाद द्वारा राष्ट्रपति रहते हुए भोजपुरी में लिखा गया पत्र भी शामिल है। इंदिरा गांधी, महात्मा गांधी, पंडित नेहरू इत्यादि अनेक नेताओं के पत्र व चित्र दर्शनीय हैं। दरअसल, बलिया में सांसद रहते चंद्रशेखर ने जेपी के प्रति अपनी भक्ति को अच्छी तरह से साकार किया है। चंद्रशेखर की वजह से ही बाबुरवानी का नाम जयप्रकाश नगर रखा गया है। उन्हीं की वजह से बाहर से आने वाले शोधार्थियों के पढ़ने लिखने के लिए पुस्तकालय है, तीन से ज्यादा विश्राम गृह, स्थानीय लोगों के रोजगार के लिए कुटीर उद्योग हैं। काश, राजेन्द्र प्रसाद को भी कोई चंद्रशेखर जैसा समर्पित प्रेमी नेता मिला होता। चंद्रशेखर वाकई धन्यवाद के पात्र हैं। उजाड़ दीयर इलाके में उन्होंने जयप्रकाश नगर बनाकर यह साबित कर दिया है कि अपने देश में नेता अगर चाहें, तो क्या नहीं हो सकते।
लेकिन न जेपी रहे और न चंद्रशेखर। तो क्या जयप्रकाश नारायण नगर का वैभव बरकरार रह पाएगा? मोटे तोर पर जयप्रकाश नगर का विकास चंद्रशेखर की ही कृपा से हुआ, सांसद निधि से भी कुछ पैसा मिला करता था। स्मारक इत्यादि के लिए सरकार ने कभी कोई बजट नहीं दिया। जो नेता या पदाधिकारी आते थे, अपने विवेक से कुछ दान की घोषणा कर जाते थे। चंद्रशेखर के पुत्र नीरज शेखर, जो अब बलिया से सांसद हैं, स्मारक का ध्यान रख रहे हैं, लेकिन जयप्रकाश नगर में कुछ न कुछ बदलेगा, लेकिन जो भी बदलाव हो, उससे वैभव में वृद्धि ही हो, ताकि यहां आने वालों को सुखद अहसास हो।
यह पावन भूमि जेपी जैसे महान नेता की जन्मभूमि है। एक ऐसे नेता की भूमि है, जो महात्मा गांधी को चुनौती देने की हिम्मत रखता था। जिसमें पंडित नेहरू भी प्रधानमंत्री होने की सारी योग्यताएं देखते थे। जिन्होंने सदैव दलविहीन लोकतंत्र की पैरोकारी की। वे चाहते थे कि प्रतिनिधि सीधे चुनाव जीत कर आएं, राजनीतिक दलों के चुनाव लड़ने को वे गलत मानते थे। वे किसी भी क्षण सत्ता के चरम पर पहुंच सकते थे, लेकिन उन्होंने सत्ता के बजाय जन-संघर्ष का रास्ता चुना। सरकारी लोग उनके नाम से कांपते थे। उनका प्रभाव सत्ता में बैठे नेताओं से भी ज्यादा था। उन्होंने संपूर्ण क्रांति से देश की भ्रष्ट सत्ता को चुनौती दी। उन्होंने देश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार को संभव बनाया। उन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया। जीवन में सदैव नैतिक ऊंचाइयों को छूते रहे। उनके योगदानों की बड़ी लंबी सूची है। उनको चाहने वाले दुनिया के हर कोने में थे। अमेरिकी उन्हें पसंद करते थे, क्योंकि जेपी को बनाने में तब के जुझारू व मेहनतकश अमरीका का भी योगदान था, जेपी ने 1922 से 1929 तक अमरीका में रहकर मजदूरी करते हुए अध्ययन किया था। जब उनका निधन हुआ, तब सात दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा हुई थी। पटना में उनके अंतिम दर्शन के लिए विशेष रेलगाड़ियाँ चलाई गई थीं। निस्संदेह, उनकी यादों व स्मारकों की अहमियत हमेशा बनी रहेगी।
वाकई याद रहेगा जेपी का गाँव, मौका मिला तो फिर आयेंगे।

11 comments:

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

आपने बहुत अच्छा लिखा है. बधाई

Bhagat said...

J P ji ke goan ke baare main batanae ke liye bahut bahut dhanyavaad.Unke hi vicharon se prabhavit ek aur vyakti hai apne desh main ukna naam Rajiv dixit hain jinke baare main aap www.rajivdixit.in per jaakar jaan sakte hain. sayad aapne suna bhi hoga unke baare main.

Maa Bharati ki Jai

Prakriti (A call to return to the nature) said...

Aapne bahut hee badhiya likha hai. Aap iske liye badhai ke patra hain. Yah jaankar achchha laga ki aap aur JP donon bhi mere najdidk ke rahnewale hain. Ho sake to prakriti.pune@gmail.com par sampark karen.

Amit upadhyay said...

Kalam ke lakiro se jp ji ko prastut karna mushkil hi nahi namumkin hai.........JAY HIND JAI BHARAT..........

Amit upadhyay said...

Kalam ke lakiro se jp ji ko prastut karna mushkil hi nahi namumkin hai.........JAY HIND JAI BHARAT..........

चंदन कुमार मिश्र said...

बहुत अच्छा। मैं भी कोशिश करूंगा ऐसे आदमी का घर देखने की। महान आदमी ऐसे ही लोगों को तो कह सकते हैं। आपने उनके गाँव की सैर कराई, यह बहुत अच्छा किया। फिर से धन्यवाद,

Harbansh Dixit said...

Bahut achchhi shailee mein samayik jankari .Badhai,kritagyata.

ajay kumar said...

Bhut acha lga jan ke, mera ghar unke gaw se 10 km h phir v nhi gya hu.. lekin bhut jld mai jaunga....!

awanish jha said...

बहुत अचछा मै तो धन हो गया

shekhar sahay said...

jp babu ke village ka bhraman karane ke liye dhanyavad. mere papa ki jp babau se kafi najdiki restedari hai. mai apne parivar ke sabhi baccho ke sath us pavitra bhumi ka darsan karne jaunga.

Ranjit Kumar Ray said...

Bahuttt accha. Thanksss...