Wednesday 17 September 2008

थोड़े तार्किक हो जायें

अगर किसी को धर्म परिवर्तन करने से रोकना सांप्रदायिकता है, तो किसी का धर्म परिवर्तन कराना भी सांप्रदायिकता है।

उड़ीसा, कर्णाटक , गुजरात और केरल में धर्मान्तरण के मुद्दे का भड़कना जितना निंदनीय, उतना ही शर्मनाक है। सांप्रदायिकता की आग ऐसी लगी है कि शांत होने का नाम नहीं ले रही। उड़ीसा में अब तक 26 लोग मारे जा चुके हैं। उड़ीसा का हाल यह कि राज्य पुलिस और अद्धसैनिक बलों की 35 कंपनियों के बावजूद हालात बेकाबू हैं, रह-रहकर हिंसा भड़क रही है। राज्य सरकार ने और चालीस कंपनियों की मांग की है, तो आप अंदाजा लगा लीजिए कि उड़ीसा में हालात कैसे होंगे। उड़ीसा में सांप्रदायिक हिंसा की वजह से 20,000 लोग 14 राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। उड़ीसा में 23 अगस्त को लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार शिष्यों की हत्या हुई थी। लक्ष्मणानंद ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्मान्तरण का विरोध करते थे, अत: स्वाभाविक ही लोगों का शक ईसाई मिशनरियों पर गया, लेकिन वास्तव में इस विवाद को बलपूर्वक संभालने की कोशिश हुई है।
पहली बात, सांप्रदायिकता किसी एक राजनीतिक दल की समस्या नहीं है, यह राज्य और देश की समस्या है। सांप्रदायिक हिंसा पर राजनीति से कोई मदद नहीं मिलेगी। कर्णाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने कहा, `ईसाई मिशनरी बलपूर्वक धर्मान्तरण न करें,´ तो पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा ने आरोप लगाया, `भाजपा कर्णाटक को दक्षिण का गुजरात बनाना चाहती है।´ ऐसी बयानबाजी से जनता भ्रमित होती है और सच्ची बातें दब जाती है। कोई हिन्दू के साथ खड़ा है, तो कोई ईसाई के साथ, लेकिन सचाई के साथ कोई नहीं है।
दूसरी बात, पुलिस के भरोसे सांप्रदायिकता का सामना नहीं किया जा सकता, इसके लिए राजनीतिक और सामाजिक प्रयास करने होंगे। सांप्रदायिक हिंसा का सामना पुलिसिया हिंसा के दम पर ज्यादा समय तक नहीं किया जा सकता। राजनेताओं और बुद्धिजीवियों को आगे आना चाहिए
तीसरी बात, धर्मान्तरण व्यक्तिगत मसला होना चाहिए। अगर कोई संगठन या कोई समूह धर्मान्तरण या धर्मान्तरण के खिलाफ जुटा है, तो उसे बाज आना चाहिए। आधुनिक दुनिया में धर्मान्तरण के सोचे-समझे सांगठनिक प्रयास असभ्यता की निशानी हैं, इसका विरोध राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी किया था। आदिवासी इलाकों में मिशनरियों की सक्रियता सदा से विवादित रही है।
अगर किसी को धर्म परिवर्तन करने से रोकना सांप्रदायिकता है, तो किसी का धर्म परिवर्तन कराना भी सांप्रदायिकता है। धर्म के प्रचार में लगे लोगों को हम धर्मनिरपेक्ष कैसे मान सकते हैं? संयम की जरूरत जितनी इधर है, उतनी ही उधर भी है, हर धर्म यही बोलता है, लेकिन कुछ लोग हैं, जो धर्म की बात नहीं मानते, खून-खराबा करते हैं।