Wednesday, 17 September, 2008

हिन्दी की हुकूमत

हिन्दी की दुर्दशा पर रोने-पीटने की पुरानी परंपरा रही है, जबकि पिछले पंद्रह-बीस सालों में हिन्दी की प्रगति अचंभित करती है। सत्ता, सरकार की भाषा भले अंग्रेजी हो, लेकिन समाज में हिन्दी का ऐसा धूम-धड़ाका है कि झूठा गर्व पालने वाली भाषा की बोलती बंद है जिस भाषा को उसका यथोचित नहीं दिया गया, जिसके खिलाफ दंगे हुए, जिसको सरकार ने स्वयं हाशिये पर धकेला, जिसको भारतीय-हिंगलिश बाबुओं ने दोयम दर्जे का माना, जिसे पिछड़ेपन की निशानी माना गया, आज उस भाषा के जलवे देखकर किसी को भी हैरत हो सकती है। देश की आजादी के बाद हम 41 प्रतिशत संकोची हिन्दीभाषी भारतीय अपनी भाषा के गौरव के लिए नहीं लड़ पाए थे, क्योंकि हममें शालीनता कूट-कूटकर भरी थी, हमारी रगों में क्षेत्रवादी विष नहीं था, हम देश और उसकी अखंडता के बारे में सोच रहे थे, लेकिन हमारी वही शालीनता आज खूब रंग ला रही है। पनवाड़ी की दुकान से संसद तक, बोलचाल से मीडिया तक और भाषणों से लेकर फिल्मों तक हिन्दी का लोहा मानने वाले कम नहीं हैं। अफसोस, फिर भी हिन्दी का रोना रोया जाता है। हिन्दी खत्म हो रही है, हिन्दी मर रही है, यहां तक कि हिन्दी के दम पर रोटियां तोड़ने वाले भी सिसकते मिल जाते हैं कि आने वाले सालों में हिन्दी का कोई नामेलवा न होगा। वास्तव में ऐसे लोगों को हिन्दी की ताकत का अंदाजा नहीं है। विरोधी रावणों के दरबार में 45 प्रतिशत भारतीयों की भाषा हिन्दी अंगद की तरह पांव जमाए खड़ी है, अब किसी माई के लाल में दम नहीं है कि हिन्दी के पांव हिला दे।


अखबार से आगाज


अंग्रेजी अखबार बाजार को बरगलाने के लिए लाख हल्ला मचाएं, लेकिन सच्चाई यह कि देश के सात सर्वाधिक बिकने वाले अखबारों में से पांच हिन्दी के हैं और अंग्रेजी अखबारों का नंबर दसवें से शुरू होता है। देश के `टॉप टू´ अखबार हिन्दी के ही हैं। जहां हिन्दी के अखबार लगातार बढ़त पर हैं, वहीं अंग्रेजी अखबारों की प्रसार संख्या कम से कम हिन्दी पट्टी में लगातार घट रही है। दिल्ली में तो अंग्रेजी अखबार अपने चरम पर पहुंचकर हांफ रहे हैं, पाठकों का टोटा है, जबकि हिन्दी पाठकों की संख्या इतनी है कि न केवल हिन्दी अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ी है, बल्कि नए हिन्दी अखबार भी बड़े उत्साह के साथ शुरू किए जा रहे हैं। अकेले दिल्ली में हिन्दी अखबारों को 400 करोड़ रुपये से ज्यादा का सालाना विज्ञापन मिल रहा है।


टीवी पर डंका


जहां हिन्दी के 25 से ज्यादा राष्ट्रीय न्यूज चैनल हैं, वहीं अंग्रेजी का आंकड़ा दस से पार नहीं पहुंच पा रहा है। दूसरी भारतीय भाषाओं की चैनल संख्या में पांच-छह की संख्या पार नहीं कर पाई है। हिन्दी फिल्में दिखाने वाले चैनल 12 हैं और अंग्रेजी फिल्मों वाले चैनल महज आठ। जहां 13 हिन्दी संगीत चैनल हैं, वहीं भारत भर में मात्र एक अंग्रेजी संगीत चैनल सांस ले रहा है। जहां हिन्दी के 14 मनोरंजन चैनल हैं, वहीं अंग्रेजी के मात्र 7 हैं। तो बताइए, हिन्दी किससे कमतर है? हिन्दी की बढ़त पर गुमान क्यों नहीं होना चाहिए? हिन्दी की अगर दुर्दशा हो रही है, तो इतने हिन्दी चैनल क्यों खुल रहे हैं? हम यह भी बता दें कि ज्यादातर हिन्दी चैनल विदेशी कंपनियों के हाथ में हैं। किसी दौर में हम हिन्दी वालों पर आरोप लगता था कि हम अपनी भाषा को देश पर लाद रहे हैं, लेकिन अब विरोधी आंख खोलकर देख लें, हिन्दी वालों ने हिन्दी को किसी पर लादा नहीं है, बल्कि दूसरी भाषाओं के लोग हिन्दी के मार्फत अपना व्यापार फैलाना चाहते हैं, हिन्दी के दम पर ऐश करना चाहते हैं। हिन्दी पट्टी में टीवी पर जो विज्ञापन प्रसारित होते हैं, उनमें से 98 प्रतिशत विज्ञापन हिन्दी में हैं। हिन्दी घर बैठे विज्ञापन पा रही है, जबकि अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं चैनलों को विज्ञापन के लिए नाको चने चबाने पड़ रहे हैं।


सिनेमाई जलवा


देश में मनोरंजन के क्षेत्र में महानायक का दर्जा हिन्दी के सितारे अमिताभ बच्चन को ही हासिल है। दक्षिण के महानायक रजनीकांत भी अमिताभ का लोहा मानते हैं। पूरा भारतीय सिनेमा जगत लगभग 8000 करोड़ रुपये का है, जिसमें हिन्दी फिल्मों की भागीदार चालीस प्रतिशत से ज्यादा है। वर्ष 2010 तक हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री का आकार 700 करोड़ रुपये के पार चला जाएगा। हिन्दी फिल्में न केवल दुनिया भर में देखी जाती हैं, बल्कि हिन्दी के फिल्म कलाकार दुनिया के पचास से ज्यादा देशों में पॉपुलर हैं। हिन्दी में अंग्रेजी फिल्मों की डबिंग का सिलसिला तेज हो गया है, डबिंग इंडस्ट्री प्रतिवर्ष 25 से 30 प्रतिशत की गति से विकसित हो रही है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी हिन्दी सिनेमा जगत में निवेश कर रही हैं। हिन्दी सिनेमा अपनी पूरी विशेषता के साथ विश्व में अलग पहचान बना चुका है और साथ ही इसने हिन्दी के प्रसार में भी बड़ा योगदान दिया है। विदेश में लोग हिन्दी फिल्में देखकर, हिन्दी गाने सुनकर हिन्दी सीख रहे हैं।


तो रोना क्यों?


कहना न होगा, हिन्दी को शासकीय स्तर पर समर्थन नहीं मिल रहा है। हिन्दी वालों का रवैया पेशेवर नहीं है। वे हिन्दी की ताकत समझ नहीं पा रहे हैं। विदेशी कंपनियां हिन्दी की ताकत को समझ चुकी हैं, जबकि हमारी अपनी कंपनियां अभी भी अंग्रेजीदां हैं। इसके अलावा हम 45 करोड़ हिन्दी वाले पांच करोड़ अंग्रेजी वालों से डरते भी हैं। यह डर केवल अज्ञानता की वजह से है, वरना हिन्दी उस मुकाम पर पहुंच चुकी है, जहां उसकी हुकूमत की शुरुआत हो सकती है।

2 comments:

Anonymous said...

Hindustani ho kar ke sarmaate hai hindi se
Neta dete English bhasan madam sarmati bindi se
Madam sharmati bindi se bachcho ko amrica padhwati
Hindi ka to shavd bhool gayee chitthee naukar se bachwati
Jitane neta afsar hai angreji me batiyaate hai
Koi ghabraate hindi se koi ghabraate shindhi se
Hindustani ho kar ke sarmaate hai hindi se
Neta dete English bhasan madam sarmati bindi se
Mantri ji bhasan jab dete angreji ke hawale
Angreji ko tauheen samajahte upaji bare gharane
Har daftar me angreji ki chalti dhar-dhar bhasha
Jo angreji bole na jaane chaprashi ki nahi hai aashaa
Inko to ab dolar chaahiye ghabraate hai khinni se
Hindustani ho kar ke sarmaate hai hindi se
Neta dete English bhasan madam sarmati bindi se
Hindi diwas pe neta kahate hindi ka utthan karo
Ham bharat ke rahane wale sari janata saath chalo
Bharat ki yahi bidambana dhoop chaaw jo sahati hai
Ham us desh ke washi hai jis desh ke ganga bahati hai
Jahar samajh parsaad na lete ghabraate hai sinnee se
Hindustani ho kar ke sarmaate hai hindi se
Neta dete English bhasan madam sarmati bindi se

shambhu nath

अनुनाद सिंह said...

मान गये। आपने हिन्दी की उत्साहवर्धक दशा और दिशा का बहुत सही आभास कराया। आपकी लेखनी भी बहुत सपाट चली है। आपका कहा एकेक वाक्य दम अरखता है। विशेष रूप से यह कि हम हिन्दीभाषी ही हिन्दी के शक्ति कानुबहव और अन्दाज नहीं कर पा रहे हैं।