Friday 21 June 2013

सबका फिर आभार

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आप पाठकों और प्रिय जनों की कृपा से मेरी किताब पिछले वित्त वर्ष में राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा प्रकाशित मीडिया किताबों में सबसे ज्यादा बिकी है, इसके लिये बहुत आभार. काम की अधिकता के कारण मैं इस किताब को उतना समय नहीं दे सका, जितना मुझे देना चाहिए था. इसका मुझे बहुत अफसोस रहेगा. तीन साल बाद इस किताब को फिर लिखने का इरादा है. इस किताब के लिए मैं तीर चार प्रिय गुरुजनों को फिर याद करना चाहूँगा श्री रामशरण जोशी, श्री रामबहादुर राय, श्री शशि शेखर... इस किताब को लेकर एक दुःख यह भी है जिसे मैं छिपा नहीं पाता हूँ, मुझे लगता है कि इस किताब ने बहुतों को मेरा विरोधी भी बना दिया, इसमें से कुछ लोग किताब के लोकार्पण में भी शामिल थे, जो किताब के लोकार्पण में नहीं आ पाये थे, और जिन्होंने मेरा कभी समर्थन नहीं किया, उनसे मुझे कोई शिकायत नहीं, भगवान ने मुझे इतना शक्तिशाली बनाया है कि मुझे कभी बैसाखियों की जरूरत नहीं पड़ी. कुछ मित्र रहे जिन्होंने मेरा भरपूर साथ दिया, और कुछ मुझसे सीखने वाले भी मेरी ताकत बने. मेरी किताब बार बार यही कहती है कि जो अपने दम पर खड़ा होता है. दरअसल वही टिकता है. निंदा, आलोचना, पीठ पीछे से प्रहार इत्यादि आपको सचेत और तैयार रखते हैं, अंततः मज़बूत बनाते हैं. अगर आपमें योग्यता है तो फिर डर कैसा? जोड़-तोड़ से हासिल सम्मान जूठा और झूठा होता है. अपने काम का डंका पीटना जरूरी नहीं, यह कला हर किसी में नहीं होती. ईमानदारी से काम करते जाइये, जिन्हे आपका काम नहीं दिखता, उन्हें तो बस माफ ही किया जा सकता है. जीवन दूसरों की निंदा और दूसरों को नीचा दिखाने और दूसरों की लकीर मिटाने के लिए नहीं, ख़ुद को सशक्त बनाने और अपनी लकीर लंबी करने के लिए मिला है. तो आइये वही करें.

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