Tuesday 19 February 2013

दुखद बहस

प्रेस परिषद के अध्यक्ष पूर्व जस्टिस मार्कण्डेय काटजू का फिर एक बार गलत कारण से चर्चा में आना दुखद और अफसोसजनक है। जस्टिस काटजू को पत्रकारों और पत्रकारिता की भलाई के लिए जिम्मेदार बनाया गया है, लेकिन यदि वे राजनीति को प्रभावित करते दिख रहे हैं, तो जाहिर है, उनसे नाराज होने वालों की संख्या भी बढ़ेगी। लोकतंत्र तभी ढंग से काम करता है, जब हर आदमी अपनी जिम्मेदारी को ढंग से निभाता है। प्रेस परिषद का अध्यक्ष पद काफी गरिमामय और महत्वपूर्ण है, यहां से अगर कोई आवाज उठती है, तो उसे लोग गंभीरता से लेते हैं और इस आवाज को लोग प्रेस या मीडिया से जोड़कर भी देखते हैं। आज प्रेस के क्षेत्र में ऎसी कई समस्याएं हैं, प्रेस रिपोर्टिग को बाघित किया जा रहा है, प्रेस पर हमले हो रहे हैं, अखबारों को बंटने से रोकने तक की घटनाएं हुई हैं, पत्रकारों को विधानसभा कवरेज से भी रोका गया है। क्या प्रेस परिषद के अध्यक्ष को प्रेस से जुड़ी बड़ी समस्याओं तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए? यह एक बड़ा सवाल है। यह भी एक बहस का विषय है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना प्रेस परिषद के अध्यक्ष का विषय है या नहीं। यह भी एक विषय है कि प्रेस परिषद के अध्यक्ष को क्या यह शोभा देता है कि वे देश के 99 प्रतिशत लोगों को मूर्ख ठहराएं? प्रेस परिषद के अध्यक्ष को क्या यह शोभा देता है कि वे एक पोर्न स्टार का पक्ष लें? अगर गौर किया जाए, तो काटजू ने ऎसा काफी कुछ कहा है, जो उन्हें नहीं कहना चाहिए था। वे चर्चा में रहना चाहते हैं, तो रहें, लेकिन अच्छी वजहों से रहें, विवादों की वजह से नहीं। कोई गलती करे, तो वे मुखर होकर डांट दें, उसके पूरे ज्ञान को चुनौती दे डालें, पर उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि उनका सम्मान न केवल न्यायपालिका, बल्कि प्रेस के सम्मान से भी जुड़ा है। उन्हें अक्खड़ता व अभद्रता का संकेत देने से भी बचना चाहिए। आज राजनीति कैसी है, राजनेता कैसे हैं, सब जानते हैं। उनसे जनता को शालीनता की हमेशा उम्मीद नहीं रहती है, राजनीति में तो मानो सब चलता है। राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरूण जेटली ने जिस तरह से काटजू पर हमला बोला, भाजपा जिस तरह से गुस्से में है, उसकी भी तारीफ कोई नहीं करेगा। किसी के द्वारा नरेन्द्र मोदी की आलोचना पर ऎसे बिफरना पार्टी को ही मुश्किल में डालेगा। पार्टी को नरमी से जवाब देना चाहिए, गुस्सा कोई जवाब नहीं है। किन्तु ज्यादा संयम काटजू को दिखाना चाहिए, वे तू-तू मैं-मैं में जितना ज्यादा फंसेंगे, स्वयं को उतना ही ज्यादा हास्यास्पद बनाएंगे। (For patrika edit)

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