Monday 19 December 2011

वाइ दिस कोलावेरी?

जो गीत नई धुन में हमें रुलाते हैं, दिल को झकझोरते हैं, उस पर मरहम लगाते हैं, वो हमें कुछ देर तक झुमाने में कामयाब हो जाते हैं। दक्षिण के गायक धनुष के कोलावेरी गीत के साथ भी ऐसा ही हुआ। हमारी दुनिया में देवदासपना हमेशा से पसंद किया गया है। यह बात केवल भारत की नहीं है, दुनिया में हर कहीं कोलावेरी या ‘किलर रेज’ या मरने या मारने पर उतारू भावना वाले गीत पसंद किए जाते रहे हैं। यह कहा जा रहा है कि दक्षिण और उत्तर भारत को इस कोलावेरी गीत ने अपनी तरह से एक कर दिया है, लेकिन वास्तव में इतना कह देना ही पर्याप्त नहीं होगा। अक्सर हिंगलिश को लेकर शिकायत होती है, जबकि यह कोलावेरी गीत तमिलिश में है। यानी तमिल के भी शब्द हैं और इंगलिश के भी। यह एक तरह से देवदासपने का एक मोबाइल संस्करण है। भानुमती के कुनबे की तरह यहां केवल भावनाएं ही नहीं मिलतीं, शब्द भी मिलते हैं, अलग-अलग जगह से आकर धुनें भी मिलती हैं, इसमें नई तकनीक लगती है, यू ट्यूब लगता है और गीत देखते-देखते पूरी दुनिया में किसी संक्रमण की तरह फैल जाता है। तो क्या ऐसा पहली बार हुआ है? नहीं ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, हां यह जरूर पहली बार हुआ है कि देवदासपने को इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों का साथ मिला है, इंटरनेटीय सोशल मीडिया माध्यमों का साथ मिला है। पहले गीतों को सुनने के स्रोत कम हुआ करते थे।
जब ग्रामोफोन का जमाना था, थोड़ा-बहुत रेडियो भी सुना जाने लगा था, देश आजाद भी नहीं हुआ था, १९४६ में के. एल. सहगल ने एक गीत गाया था, ‘जब दिल ही टूट गया, तो जीके क्या करेंगे . . . वह गीत उस जमाने में सुपर हिट हुआ था। साधन सीमित थे, लेकिन जिसे भी जहां भी मिला था, उसने सहगल के गीत को सुना था। जमाना बदल गया, आज गाने की वह शैली युवाओं में हंसी का मुद्दा भी बन जाती है। लेकिन के.एल. सहगल ने जब दिल ही टूट गया, गाया था, तब लोगों को वाकई महसूस हुआ था कि हां कोई दिल टूटा है, जबकि वह जमाना ऐसा था कि देश को आजादी मिलने ही वाली थी। इस गाने में ऐसा देवदासपना था कि जिसने सभी को छू लिया था। सहगल या सैगल को इस गीत के लिए हमेशा याद किया जाएगा। हां, हो सकता है, देश विभाजन के दर्द ने भी इस गीत को लोकप्रिय बनाया हो।
त्रासदी की भावना वाले सैड सांग तो बहुत बने, लेकिन शूप सांग अर्थात टूटे दिल का गीत या प्यार में विफलता का कोलावेरी जैसा गीत जब भी आया है, दुनिया ने उसे दिल से लगाया है। कई बार तो ऐसा लगता है कि दुनिया को ऐसे गीतों का इंतजार रहता है। १९६० में जब मुगल-ए-आजम आई थी, तबमुहब्बत की झूठी कहानी पे रोए, गाने ने झकझोर कर रख दिया था। जहां एक ओर ‘जब प्यार किया, तो डरना क्या’ गीत था, वहीं दूसरी ओर, ‘मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोए’ गाने ने न जाने कितने दिलों को सुकून दिया। इस गाने पर अनेक पैरोडियां बनीं। १९६९ में मुकेश का एक गाना ‘चांदी की दीवार न तोड़ी, प्यार भरा दिल तोड़ दिया, एक धनवान की बेटी ने निर्धन का दामन छोड़ दिया’ आया, इस गीत में अमीरी गरीबी का फासला था, फिर भी इसे खूब पसंद किया गया, वह इंदिरा गांधी का गरीबी हटाओ का दौर था। १९७० में हीर रांझा का गीत ‘ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नहीं,’ गली-गली में गूंजा। रफी की आवाज ने दीवाना बना दिया था। उसके बाद जिस गीत ने युवाओं को बहुत प्रभावित किया, वह था १९७७ में आया ‘क्या हुआ तेरा वादा’। इसने रिकॉर्ड तोड़ दिए। यह गीत आज भी टूटे दिल आशिकों को सहारा बनता है।
१९८० के दशक में भी कई गीत आए, लेकिन १९९० में खासकर पाकिस्तान से एक आवाज आई, जिसने सरहद को भुला दिया। पाकिस्तानी गायक अताउल्लाह खान ने गाया, ‘अच्छा सिला दिया तुने मेरे प्यार का, यार ने ही लूट लिया घर यार का।’ यह एक ऐसी आवाज थी, जो कोलावेरी जैसे कम से कम तीन-चार गानों को साथ लेकर थोक में आई थी। ‘इधर जिंदगी का जनाजा उठेगा, उधर जिंदगी उनकी दुल्हन बनेगी।’ और ‘इश्क में हम तुम्हें क्या बताएं, किस कदर चोट खाए हुए हैं।’ वह इंटरनेट का जमाना नहीं था, लोग वीसीपी और वीसीआर से फिल्में देखते थे, मोबाइल की तो कल्पना ही नहीं थी। अताउल्लाह खान साहब खूब सुने गए, टूटे दिलों का सहारा बने। उनके गाए गीतों को सोनू निगम, मुहम्मद अजीज, अनुराधा पौडवाल, उदित नारायण और न जाने कितने भारतीय गायकों ने गाया। १९९४ में गुलशन कुमार ने अपने छोटे भाई साहब किशन कुमार को लेकर फिल्म भी बना डाली बेवफा सनम। उस दौर अताउल्लाह खान के बारे में कई तरह की अफवाह भी उड़ी थीं कि उन्हें उनकी प्रेमिका ने धोखा दे दिया है, प्रेमिका को मारकर वह जेल में हैं, फांसी का इंतजार कर रहे हैं और इसी इंतजार के दौरान उनके दिल से ये गीत फूटे हैं। अफवाहें आज भी फैलती हैं, लेकिन उनका निदान भी जल्दी हो जाता है, लेकिन पहले तो कानों-कान ही अफवाह फैलती थी और निदान होने में महीनों लग जाते थे। अखबार इत्यादि भी फिल्मों और गीत-संगीत में कोई खास रुचि नहीं लेते थे, पेज-३ का तो सपना भी नहीं देखा गया था। बहरहाल, अताउल्लाह खान आज भी जीवित हैं और पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में बहुत सम्मान के साथ रह रहे हैं।
अताउल्लाह खान की जो लोकप्रियता है, धनुष उसके आधे पर भी नहीं हैं। चमके तो अल्ताफ रजा भी थे, जिन्होंने गाया था, ‘तुम तो ठहरे परदेसी साथ क्या निभाओगे’, लगता था, टूटे दिलों को आवाज मिल गई। हर तरफ अल्ताफ छा गए थे। रेडियो से टीवी और फिर सिनेमा के बड़े परदे पर भी वे परदेसी के जलवे बिखेरने लगे थे।
बहरहाल, अच्छा सिला और कोलावेरी में काफी फर्क है। कोलावेरी में कहानी तो है, लेकिन टुकड़ों में, टूटते भाव व अल्फाज में। जबकि अच्छा सिला में पूरी कहानी है। ऐसी कहानी कि जिस पर फिल्म बन गई थी।
तो देवदासपने के गाने पहले भी बनते थे, लेकिन कहना न होगा, उन्हें जन-जन का इलेक्ट्रॉनिक साथ नहीं मिलता था।
कोलावेरी के अनेक संस्करण बने हैं, लेकिन उसकी असली ख्याति की परीक्षा छह महीने बाद होगी, अगर यह गीत लोगों की जुबान पर टिक गया, अंताक्षरियों में शामिल हो गया, तो वाकई उसका लोहा मान लेना होगा। यह देखने वाली बात होगी कि यह ‘किलर रेज’ टिकती कितनी है।

3 comments:

BS Pabla said...

असली ख्याति की परीक्षा छह महीने बाद होगी

सही है

Kosalendradas said...

आपको पढ़ा, पढ़कर लगा जैसे हकीकत को नजदीक से पढ़ रहा हूँ. बहुत अच्छा लेख है यह........

ज्ञानेश उपाध्याय (gyanesh upadhyay) said...

bahut bahut aabhaar