Sunday, 4 December, 2011

राजेन्द्र प्रसाद की याद

४ दिसम्बर देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद की जयंती थी, लेकिन सरकार ने उनकी याद में एक सेंटीमीटर विज्ञापन भी नहीं जारी किया, आपने अगर उनके नाम का विज्ञापन देखा हो, तो बताइएगा। वैसे यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। मनमोहन सिंह की ‘राजा’ टीम राजेन्द्र बाबू को भूल चुकी है। राहुल गांधी का तो राजेन्द्र बाबू से सम्बंधित सवालों के जरिये मुश्किल भरा टेस्ट लिया जा सकता है। राजेन्द्र बाबू परीक्षाओं में हमेशा टॉप करते थे, उनको देश का संविधान पूरा याद था, वे इतने तेज थे कि दस साल पहले किसी कागज पर देखा गया कोई नम्बर तक उन्हें याद रहता था। ऐसे राजेन्द्र बाबू को भुला देने से किसी बाबू-अधिकारी का कुछ नहीं बिगड़ता। आज के सांसद तो संसद में बिना काम के भी पूरे पैसे लेते हैं, जबकि राजेन्द्र बाबू अपना पूरा वेतन भी नहीं लेते थे। वे उतना ही पैसा लेते थे, जितने में उनका काम चल जाए। हालांकि आज के नेताओं से पूछा जाए कि बताइए कितना वेतन चाहिए, तो नेता बोलेंगे कि आप जितना भी वेतन दे सकें, हमारे लिए कम पड़ेंगे।
राजेन्द्र बाबू का मानना था कि हमारी स्वतंत्रता तभी बचेगी, जब हम अपनी जरूरतों को सीमित करेंगे। लेकिन आज तो होड़ जरूरतों को बढ़ाते-फैलाते जाने की है। बस अपनी स्वतंत्रता बची रहे, उसके लिए दूसरों को परतंत्र बनाए रखने की चेष्टा हमेशा होती है।
मनमोहन सिंह की सरकार ने मान लिया है कि बुरे दौर में अच्छे लोगों के विज्ञापनों की जरूरत नहीं है। अच्छे लोगों की फोटुएं भी दीवारों से उतरती चली जाएंगी। अच्छे लोगों की मूर्तियां टूट जाएंगी, तो फिर नई नहीं बनेंगी, उनकी जगह बुरे लोगों की मूर्तियां ले लेंगी। भूल जाइए कि राजेन्द्र बाबू जैसा ईमानदार व्यक्ति इस देश का १२ साल तक राष्ट्रपति रहा और तीसरी बार भी बन जाता, लेकिन स्वयं इनकार कर दिया। लोग कहते हैं, देश में दो ही राष्ट्रपति टक्कर के हुए हैं, एक राजेन्द्र बाबू और दूसरे एपीजे अब्दुल कलाम। ईमानदार मनमोहन सिंह की सरकार ने कलाम को दूसरी बार राष्ट्रपति नहीं बनने दिया, एक बार राष्ट्रपति रहकर ही कलाम राजेन्द्र बाबू के स्तर को छू गए। आज राजेन्द्र बाबू के विज्ञापन नहीं छप रहे हैं, आज से चालीस-पचास साल बाद शायद कलाम के भी विज्ञापन नहीं छपेंगे। अभी भी नहीं छपते हैं। कोई कांग्रेसी कलाम का नाम नहीं लेता, क्योंकि वे कांग्रेस के आदमी नहीं हैं, लेकिन राजेन्द्र प्रसाद तो कांग्रेस के सिपाही थे, उनका नाम क्यों नहीं लिया जाता? यह सवाल कांग्रेस नेताओं से पूछा जाना चाहिए।
राजेन्द्र बाबू को बिहार में भी बहुत याद नहीं किया जाता, उन पर आरोप लगते हैं कि उन्होंने बिहार के लिए कुछ नहीं किया, पूरे देश को अपना मानते रहे, लेकिन देखिए, राजेन्द्र बाबू न अपने बिहार के रहे और न देश के, देश उन्हें भूल चुका है और बिहार के पास उन्हें याद करने के बहाने नहीं हैं। जीरादेई और पटना में उन्हें याद करने की कहीं-कहीं रस्में भर बची हैं। राजेन्द्र बाबू बचे हैं, तो बस सामान्य ज्ञान की किताबों में, क्योंकि वहां से उन्हें कोई सरकार चाहकर भी नहीं हटा सकती।

1 comment:

manglam said...

so nice....Badhaai....