Tuesday, 8 June, 2010

बंद पड़ी मिल

हर बार चाहता हूं
चुपचाप निकल जाना,
लेकिन हाहाकार लिए
लौटता हूं हर बार।


बंद पड़ी मिल में
गरीबी की चुड़ैलें बेखौफ नाचती हैं।
अभाव के विजयी भूत
ही...ही...ही...करते हैं।
बंद सूता मिल के एक पोर्च में
वर्षों से खड़ी है अकेली गाड़ी,
कब के भाग गए ड्राइवर
भाग गई सवारी।
हर बार वह गाड़ी चुनौती देती है
आओ देखो तो सही,
मेरे कितने पुर्जे सही?
ओ, सयाने,
कब तक भागोगे बनाकर बहाने।

सूनी मिल के आहते में सूने मकान
अतीत में लौट जाना चाहते हैं,
लेकिन टूट रहे हैं ईंट दर ईंट
लोग ले जा रहे
नई के अभाव में पुरानी तरक्की
काट-काट कर,
एक दिन पुराना कुछ न बचेगा।
लेकिन अभी तो पोर्च है,
गाड़ी है, मिल है, झाडिय़ां हैं।
इस बार भी जैसे हर बार।

1 comment:

संगीता पुरी said...

कडी प्रतिस्‍पर्धा के कारण बंद पडे मिलों और मिल मालिकों की परिस्थिति का यथार्थ चित्रण किया है !!