Thursday, 27 October, 2011

उठती उंगलियों को तोड़ती सत्ता

सत्ता का अपना स्वभाव है, उसे आलोचना मंजूर नहीं, सत्ता तानाशाह की हो या लोकतांत्रिक। अमरीका ने विकिलीक्स के जूलियन असांज को जिस तरह से निशाना बनाया, यह किसी से छिपा नहीं है। जब खुद को असली लोकतांत्रिक कहने वाला अमरीकी प्रशासन आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकता, तो फिर भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान से तो उम्मीद ही क्या की जा सकती है? पहले तो सत्ता ने सीधे अन्ना को ही निशाने पर ले लिया था, लेकिन अन्ना आज के दौर के एक ऐसे सामाजिक संत हैं, जिन्होंने खुद को सामान्य जीवन से ऊपर कर लिया है, उन्हें आसानी से निशाना नहीं बनाया जा सकता। मनीष तिवारी ने अन्ना को भ्रष्ट बताने की पुरजोर कोशिश की थी, लेकिन उन्हें मुंह की खानी पड़ी, माफी भी मांगनी पड़ी और प्रवक्ता के रूप में उनका आकर्षण भी क्षतिग्रस्त हो गया, अत: इन दिनों वे अवकाश पर हैं।
लेकिन जरूरी नहीं कि हर आदमी का दामन अन्ना की तरह ही साफ-सुथरा और बेदाग हो। किरण बेदी का भी नहीं है, अरविंद केजरीवाल का भी नहीं है। टीम अन्ना में तरह-तरह के लोग हैं, स्वामी अज्निवेश भी उसमें शामिल थे। अज्निवेश अन्ना की टीम में रहते हुए भी सरकार के आदमी बने हुए थे, सत्ता का यह तरीका भी पुराना है, विरोधियों की टीम में अपना आदमी शामिल करवाना या तैयार करना। अज्निवेश को टीम से बाहर कर दिया गया, तो अज्गिवेश अपने असली रंग में आ गए। जब तक वे टीम अन्ना में थे, तब तक उनको रुपये-पैसों में कोई गड़बड़ी नजर नहीं आई थी, बताया जाता है, रुपये-पैसे का हिसाब रखने में उनका बड़ा योगदान था, लेकिन जब वे टीम से बाहर आ गए, तो उन्हें अन्ना की टीम को मिले लाखों रुपए की चिंता सताने लगी है। अगर दान के पैसे में घोटाला हुआ है, तो वे उसी घोटाले पर पहले बैठे हुए थे और जब उन्हें खड़ा करके चलता कर दिया गया, तो वे घोटाले को दूर से सूंघ रहे हैं और बार-बार चोर-चोर का शोर मचा रहे हैं। ऐसा करते हुए जाहिर है, वे निरंतर उसी सत्ता की ही सेवा कर रहे हैं, जो किसी भी कीमत पर किसी भी तरह से अन्ना के आंदोलन के नैतिक बल को खत्म करना चाहती है, ताकि जनलोकपाल जैसे कानून की मांग करने की कोई हिमाकत न करे।
सरकार का तर्क यही है कि किसी का दामन साफ नहीं, सभी चोर हैं, इसलिए किसी भी चोरी पर कोई आपत्ति न करे, सभी चुप रहें, सरकार भी चुप रहेगी, लूट की छूट जारी रहेगी। किरण बेदी ने जो किया है, उसका १०० फीसद बचाव नहीं किया जा सकता। रोबिन हुड अमीरों को गरीबों के हित में लूटा करते थे, किरण बेदी ने किसी को लूटा नहीं है, लेकिन उन्होंने अपने भाषणों-दौरों के पर्याप्त पैसे लिए हैं, ताकि अपनी संस्था इंडिया विजन फाउंडेशन को दे सकें। मैं यह व्यक्तिगत रूप से जानता हूं कि किरण बेदी को अखबारों से जो पारिश्रमिक या मानेदय मिलता है, वे उनके फाउंडेशन के नाम से ही जाता है। बड़े-बड़े समाजसेवी हैं, जिनके नाम से कटे चैक पर अगर स्पेलिंग की त्रुटि हो, तो हल्ला मचा देते हैं कि मानदेय कहीं इधर-उधर न हो जाए। आज भारतीय मीडिया के लिए लिखने वालों में ऐसे कितने लोग होंगे, जो अपना मानदेय अपने नाम से नहीं, धर्मार्थ किसी संस्था के नाम से लेते होंगे?
स्वयं अपने लिए पैसा लेने वाले और बार-बार अखबारों में फोन करके अपने मानदेय का तकादा करने वाले लेखकों-पत्रकारों में ढेरों ऐसे होंगे, जो किरण बेदी को निशाना बनाएंगे और बना रहे हैं। सत्ता यही तो चाहती है।
वास्तव में किरण बेदी के खिलाफ सरकार को मुकदमा करना चाहिए या शिकायतकर्ताओं को तैयार करके आगे लाना चाहिए। लेकिन अभी स्थिति यह है कि कोई शिकायतकर्ता आगे नहीं आ रहा है, लेकिन सरकार की पेट में दर्द हो रहा है। मकसद साफ है, किरण बेदी को पीटा कम और घसीटा ज्यादा जाएगा। सत्ता अपने बड़े और नामी विरोधियों के खिलाफ ऐसा ही करती है, परेशान करो, भितरघात करो, अंदर से हिलाकर खोखला कर दो, ताकि विरोधी या आलोचक को खड़ा होने में भी दिक्कत होने लगे।
सत्ता का यह स्वभाव पुराना है, ईसा मसीह को सत्ता ने सूली पर चढ़ा दिया था, जूलियस सीजर मारे गए, सत्ता ने ही एकलव्य का अंगूठा ले लिया, सत्ता ने ही द्रौपदी के वस्त्र खींचे थे, सत्ता ने गांधी जी जैसी महान हस्ती को मर जाने दिया। श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण इत्यादि को निपटाने में सत्ता ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा। १२ से ज्यादा ऐसे लोग मारे गए हैं, जिन्होंने सूचना के अधिकार के तहत सूचना की मांग की थी। सत्ता को निशाना बनाते हुए एक फिल्म बनी थी : किस्सा कुर्सी का, प्रधानमंत्री पुत्र ने उस फिल्म की ब्लू प्रिंट को ही जलवा दिया। सत्ता किस हद तक जा सकती है, इसके अनेक प्रमाण हैं। बड़ी-बड़ी बातें सुन लीजिए, प्रधानमंत्री कोई हो, नैतिकता की दुहाई देते थकता नहीं है। दिज्विजय सिंह अपनी पार्टी के गिरेबां में नहीं झांकते, दूसरों के ही कुरते पर सबसे आगे बढक़र गंदगी खोजने का उनका स्वभाव हो गया है। विरोधियों पर गंदगी खोजने और गाल बजाने व तीखा हमला बोलने से ही पार्टी में नंबर बढ़ते हैं। किन्तु वे यह क्यों नहीं कहते कि किरण बेदी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाए, उसी तिहाड़ में भेजा जाए, जहां कि वे कभी प्रभारी रह चुकी हैं। और तो और, राजा से किरण बेदी की तुलना की जा रही है, किरण बेदी अगर पैसा लौटा दें, तो भी उन्हें माफ नहीं किया जा सकता, अगर ऐसा किया जाए, तो राजा को भी माफ कर दिया जाए, अगर राजा घोटाले के पैसे लौटा दें। क्या गजब की तुलना है? क्या हमारा लोकतंत्र ऐसी ही तुलनाओं से धनी होगा? क्या हमारे लोकतंत्र को ऐसे ही कुतर्कों की जरूरत पडऩे लगी है?
चोरों पर या उन्हें बचाने वालों पर कोई उंगली न उठाए, सरकार की यह कोशिश अगर कामयाब हुई, तो भारत को चोरों के मुहल्ले में तब्दील कर देगी। तब सरकार के पास केवल एक ही रास्ता बचेगा कि जनलोकपाल जैसा कानून न बने, उसके बदले भ्रष्टाचार को मान्य करने वाला कानून बन जाए। सरकार के प्रवक्ताओं के पास जो तर्क हैं, वे हमें इसी दिशा में ले जा रहे हैं।
किरण बेदी ने वही गलती की है, जो रोबिन हुड ने की थी, रोबिन हुड सत्ता की नजरों में दोषी था, किरण बेदी भी दोषी हैं। रोबिन हुड आम लोगों के बीच लोकप्रिय था, किरण बेदी भी हैं। रोबिन हुड को छिपकर रहना पड़ता था, लेकिन किरण बेदी को छिपना नहीं चाहिए, खुद आगे बढक़र अपनी आर्थिक चालाकियों को स्वीकार करना चाहिए। अगर वे पहले ही अपनी चालाकी को स्वीकार कर लेतीं, सच उजागर कर देतीं, तो सरकार को बोलने का मौका नहीं मिलता। सत्ता सच से डरती है, उसके सामने सच समय से पहले आ जाए, तो उसके हाथ-पैर फूल जाते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ जो भी आंदोलन होगा, उसमें शामिल होने वालों को अपने पूर्व के जीवन की तमाम गलतियों को पहले ही खुलेआम स्वीकार करना होगा, ताकि छिपाने के लिए कुछ भी न रह जाए। अगर वे आगे बढक़र सच स्वीकार कर लेंगे, तो इससे उनका नैतिक बल ही बढ़ेगा और सरकार दबाव में आ जाएगी। अगर वह नैतिक दबाव में नहीं आई, तो वह हमेशा की तरह ही अपनी ओर उठने वाली उंगलियों को तोड़ती रहेगी।
भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन की इच्छा रखने वाले तमाम लोगों को सावधान हो जाना चाहिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कोई फैशन नहीं है कि मैं भी अन्ना की टोपी पहन ली, राष्ट्र ध्वज लेकर लहरा दिया, हम जीयेंगे और मरेंगे ऐ वतन तेरे लिए गीत पर झूम लिए, तो रातोंरात देश में हीरो बन जाएंगे, मीडिया की आंखों के तारे बन जाएंगे। अगर आप दागदार रहते हुए सरकार के खिलाफ उतरना चाहते हैं, तो तैयार रहिए, सत्ता आपको इतना घसीटेगी कि आपकी कमर टूट जाएगी।
जय हिन्द, जय भारत

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