Saturday, 10 July, 2010

जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी से द्वितीय भेंट


सच कहा गया है, प्रेम की कथा अकथ होती है। हृदय प्रेम में ऐसा स्तब्ध हो जाता है कि भाव प्रवाह ठहर जाता है। वाणी पर ताले पड़ जाते हैं, पड़े भी क्यों न, उसकी चाभी तो मस्तिष्क के पास होती है और मस्तिष्क प्रेम में ऐसा डूबा हुआ होता है, मानो प्रेम में ही समाहित हो गया हो, मानो प्रेम प्रवाह में बह गया हो। कहते हैं रस में रस हो, तो रस की अनुभूति नहीं होती, रस की अनुभूति के लिए पात्र चाहिए और अगर पात्र ही रसमय या रसिक हो जाए, तो फिर रस की पृथक अनुभूति तो असंभव हो ही जाएगी।
ऐसा ही हुआ, जब रामानन्द संप्रदाय के प्रधान पूज्य श्री जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी से द्वितीय भेंट हुई। हम ऐसे मिले, मानो कभी बिछड़े न हों। जिस भाव धरा पर हम एक दूजे से ३० दिसम्बर २००९ को विलग हुए थे, ठीक उसी भाव धरा पर हम पुन: विराजमान हुए। मुझे तो ऐसा प्रतीत हुआ कि हमारा संवाद ३० दिसम्बर से निरंतर था और अभी भी है। कौन कहता है कि सदेह निकट उपस्थिति ही संवाद के लिए आवश्यक है, संवाद तो सतत है, जैसे प्रेम सतत है, जैसे भक्ति सतत है। दो प्रेमी साथ न हों, तब भी तो उनके हृदय में प्रेम सतत रहता है। संसार में हमारे राम जी कभी हुए थे सदेह, आज सदेह नहीं हैं, तो क्या उनसे हमारा संवाद टूट गया? अनुभूति की शक्ति को सप्रेम प्रज्जवलित करके देखिए, तो राम जी आज भी हमसे संवादरत अनुभूत होते हैं। कुछ अत्यधिक अनुभूत करके देखिए, तो राम जी की सदेह अनुभूति भी असंभव नहीं है। चिंतन में उतर जाइए, तो यह भी अनुभूति संभव है कि आप रामजी की गोद में बैठे हैं। यह अनुभव अभ्यास एक प्रयोग है और प्रयोग करते करते ही कोई आविष्कार होता है। कम से कम मैंने तो स्वयं का अर्थात अपने राम का आविष्कार ऐसे ही किया है। खैर, पूज्य श्री बोल रहे थे, समस्याओं और अविकास पर रोना ठीक नहीं है। यह उनकी खूबी है वे न तो निराश हैं और न दूसरों को निराश करते हैं। उनके अनुसार, विकास हुआ है और साफ दिख रहा है, उसे नकारना नहीं चाहिए। ईंधन की ही बात करें तो यह संकट दूर हुआ है। मैं जब बच्चा था, पढ़ता था रात-रात भर। लालटेन सारी रात जलती, तेल खत्म हो जाता था। कण्ट्रोल से सीमित मात्रा में तेल आता था। उसकी उपलब्धता सहज नहीं थी। दादी जी कहती थीं, तेल जलकर खर्च नहीं होता, ये तेल पी जाता है। इतना पढ़कर को कलेक्टर बनेगा क्या?... पूज्य श्री बोल रहे थे, आज स्थितियां बदल गई हैं, ऊर्जा है, सुविधा है। गरीब भी पढ़ रहे हैं। यही तो विकास है। किन्तु पूज्य श्री के बचपन की यह संक्षिप्त कथा मुझे झकझोर गई। मैं विकास के विषय पर नहीं अटका , मेरा मन कलेक्टर वाली बात पर अटका। धन्य हैं वो पूजनीया दादी जी और राम जी की इच्छा। पूज्य श्री कलेक्टर तो नहीं बने, परन्तु जो बने हैं, वह हजार कलेक्टर भी मिलकर नहीं बन सकते । हृदय यों हुआ, मानो देह-बाड़ तोड़ बाहर आ जाएगा। रात-रात भर की वह पढाई-कमाई आज यों काम आती है कि मेरे जैसे रस- कंगले लूट रहे हैं, छक रहे हैं और जो चीज छक रहे हैं, उसका कोई अंत नहीं है, कोई विकल्प नहीं है।
भारत भूमि की उर्वरा देखनी हो, तो कोई पूज्य श्री के सामने आ जाए। आधुनिक दौर में ज्यादातर फलदार व्यक्ति अकड़कर लंबे-चौड़े हो जाते हैं, झुकने को तैयार नहीं होते, लेकिन इसी दौर में पूज्य श्री जैसा एक फल-समृद्ध भी है, जो विनम्रता में झुका जा रहा है, जो उनसे ग्रहण कर सके , ग्रहण करे। साधु क्या है, जैसी प्रकृति । अच्छे साधु और प्रकृति के बीच भेद मिट जाता है। साधु के पास जो भी होता है, प्राकृतिक होता है। कृत्रिमता उसे तनिक भर भी छू नहीं पाती है। पूज्य श्री भी सहजता के वैभव से ऐसे लबालब होते हैं आपके और उनके बीच की दूरियां पलक झपकते नप जाती हैं, खाइयां तत्काल पट जाती हैं। वे अपनी बातों से ऐसा सेतु निर्मित करते हैं, जिस पर से होते हुए उन तक पहुंचना अति सहज हो जाता है।
उनसे मिलने के बाद मुझे आश्चर्य होता है कि मैं कभी नास्तिक होकर भी सोचता था। मेरी प्रगतिशीलता के अनुभव ऐसे थे कि किसी भी साधु को स्वीकार करना कठिन प्रतीत होता था। मेरे अनुभव कोष में जिस प्रथम साधु का समावेश हुआ, उनके बारे में मैं बताना चाहूंगा। उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में सरयू नदी के किनारे उनका आश्रम था, मेरा ननिहाल का गांव बभनियाव उन बाबा जी के आश्रम के समीप था। मैं करीब पांच-छह वर्ष का था, हम लोग सब बैलगाड़ी पर सवार उन्हें देखने गए थे। हम आश्रम पहुंचकर अभी बैलगाड़ी से उतर ही रहे थे कि मचान पर बैठे साधु हमें ‘जाओ-जाओ-जाओ’ कहने लगे। मैं तो उन साधु बाबा को ठीक से देख भी नहीं पाया, वहां जल्दी-जल्दी प्रसाद लेकर हम फिर बैलगाड़ी पर सवार हो गए थे। मौसियों ने बताया था, ‘इहे देवराहा बाबा हउवन।’ मतलब यही देवराहा बाबा हैं।
कुछ बड़ा हुआ, तो पता चला, देवराहा बाबा बड़े-बड़े लोगों से भेंट किया करते थे। उनका बड़ा सम्मान था, पहुंचे हुए संत थे। पिता बताते हैं, वे दो बार उनसे मिलने गए थे और दोनों ही बार उन्होंने पिता से दो बार संवाद किया था। मतलब कि वे हर किसी को नहीं भगाते थे। खासकर वे बच्चों और महिलाओं को दूर रखा करते थे। मेरे मन पर खराब प्रभाव पड़ा कि हम बड़े नहीं थे, इसलिए देवराहा बाबा ने हमें दुत्कार दिया। वे मचान पर बैठे रहते थे और हर आने वाले साधारण व्यक्ति को दूर से ही जाओ-जाओ कहने लगते थे। ये उनका अपना तरीका था। शायद इससे उनका आश्रम भीड़ से बच पाता होगा, वर्ना उनके आश्रम के आसपास तो मेला लगाने की इच्छा रखने वालों की कमी नहीं थी। लेकिन देवराहा बाबा के बचाव वाले ये तर्क मेरे मन में बाद में तैयार हुए। साधु सहज नहीं होते हैं, यह धारणा तो मन में जड़ें जमा चुकी थी। धर्म को जानने की इच्छा तो हृदय में सदैव रही, लेकिन धर्म के समीप जाने की इच्छा बचपन में ही मार दी गई।
मैं हृदय से स्वीकार करना चाहूंगा, पूज्य श्री से भेंट के बाद मैंने आध्यात्मिक बचपन का पुन: प्रारम्भ किया । घोषणा करता हूं मैं फिर जीने लगा हूं। अब केवल शब्दों ही नहीं, सांसों का भी मेरे लिए नया अर्थ है।

3 comments:

Jandunia said...

शानदार पोस्ट

Kosalendradas said...

Ishwar ki purnta ke pratinidhi sant hi ho sakte hai. shrishti ka palankarta in santon se apne pratinidhi ke roop me kaam karvate hai.
apki adhyatmik anubhuti ko pranam
Shastri Kosalendradas

ज्ञानेश उपाध्याय (gyanesh upadhyay) said...

pratikriya ke liye bahut-bahut dhanywaad, warna kisi patrkar ki aadhyatmik anubhuti ko kaun mahatw deta hai. aapko achcha laga yahi bahut hai.