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Tuesday, 7 July 2015

ए रंगबती रे रंगबती

ए रंगबती रे रंगबती
रंगबती-रंगबती कनक लोता हसी पदे कह लो कोथा
हाय गो लाजे-लाजे गो लाजे-लाजे
लाज लागे नोई जाउछे माथा गो
नाईकर नाईकर ओथा...

यह गाना जब बजता है या याद आता है, तो नोस्टेलजिक बना देता है। मन करता है, भागकर उड़ीसा की गलियों में चले जाएं। इस गीत पर विवाद छिड़ गया है, एमटीवी के एक कार्यक्रम में संगीतकार राम संपत ने इसका एक नया आधुनिक  संस्करण पेश किया है। इस गाने को उनकी ख्यात गायिका पत्नी सोना महापात्रा ने गाया है। सोना कटक की हैं, कुछ भारी लेकिन दमदार आवाज वाली सोना ने रंगबती गाने में नई जान डाल दी है। वैसे सोना इस गाने को पहले भी गाती रही हैं, लेकिन इस बार उन्होंने इस गाने को बहुत मन से गाया है।
रविवार को यह गाना मेरे हाथ लगा, मुझसे बड़े भाई ने वाट्सएप से भेजा, सुनकर आंखों में आंसू आ गए। लगा कि हम बेवकूफ रंगबती से जितने दूर आ गए, कितना पीछे छूट गया अपना राउरकेला, उड़ीसा।
वैसे इस गाने में रितुराज मोहंती भी हैं, जो उड़ीसा में ही पुरी के पास के हैं। रितुराज ने रिमिक्स का आगे का हिस्सा गाया है, जिसमें रंगबती के बोल नहीं हैं, कुछ और है.
काश! इस गाने को राम संपत युगल गीत ही रखते। मतलब पुरुष आवाज में रितुराज और महिला आवाज में सोना. वास्तव में रंगबती एक युगल गीत है, उसका पूरा अर्थ तभी उभरता है।
पुरुष पहले गाता है...
ए रंगबती रे रंगबती
रंगबती-रंगबती कनक लोता हसी पदे कह लो कोथा।
उसके बाद स्त्री गाती है...
हाय गो लाजे-लाजे गो लाजे-लाजे
लाज लागे नोई जाउछे माथा गो
नाईकर नाईकर ओथा...
कोई बात नहीं, सोना ने अकेले ही गाया है, लेकिन इससे सुनने वाले का मजा तो इसलिए भी बना रहेगा, क्योंकि यह गीत कालजयी का दर्जा रखता है, लेकिन समझने वाले को दिक्कत होगी।
खैर, बताते चलें कि रंगबती का अर्थ है रंगों वाली या कलरफुल लड़की अर्थात रंगवती।
इस गीत का मुखड़ा कुछ हिन्दी में बनाएं, तो संगीत को पकडऩा कठिन है, लेकिन अर्थ और भाव यों बनेगा - 
नायक गाता है...
ए रंगवती रे रंगवती...
रंगवती-रंगवती कनक लता हंसो कुछ कहो न बात।
नायिका गाती है... 
हाय ओ लाज-लाज ओ लाज-लाज
लाज लगे झुकता है माथा ओ
ना करो ना करो ऐसा।)

यह कोसली या संबलपुरी भाषा है। यह भाषा संबलपुर और उसके आसपास के सभी जिलों में आज भी बोली जाती है। भाषा बड़ी ही मीठी है, तो इसका असर बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और बंगाल तक दिखता है। यहां की भाषा शब्दों से अलग अनेक प्रकार की मीठी ध्वनियां हैं.. ए, ऐ, ओ, गो, हाय इत्यादि...
बहरहाल इस गीत को लेकर कॉपीराइट का एक मुकदमा किया गया है, जिसमें इस गीत के वास्तविक लेखक मित्रभानु गोंटिया और संगीतकार प्रभुदत्ता प्रधान ने राम संपत, सोना महापात्रा, एमटीवी व अन्य को घेर लिया है। मूल लेखक, मूल संगीतकार को पूरी तरह से श्रेय नहीं दिया गया है और ना ही इस गीत का रिमिक्स बनाने की मंजूरी ली गई है।
रही बात इसके मूल गायक जीतेन्द्र हरिपाल की, तो उन्हें लोग कम ही याद करते हैं। देश के बड़े पत्रकार पी. साईनाथ ने हरिपाल को आज से करीब 15  साल पहले संबलपुर के स्लम एरिया में खोज निकाला था। हरिपाल जीवित हैं। उनका गाया गीत आज उड़ीसा का सबसे समृद्ध गीत है, लेकिन हरिपाल आज भी गरीब हैं। डोम जाति के हरिपाल शिक्षा और संगीत की दीक्षा से आज भी परे हैं और जानने वाले बताते हैं कि शराब उनकी राह में बड़ी बाधा रही है।
हरिपाल की आवाज जब उड़ीसा और उसके आसपास के लोगों के कानों में गूंजती है या जब उनकी आवाज याद आती है, तो उत्कल प्रेमी हर व्यक्ति मचल उठता है। यह एक तरह से उड़ीसा का उत्सव गीत है। कोई भी पार्टी, पूजा पंडाल हो, यात्रा हो, विवाह हो, बैंड हो, रंगबती का बजना अनिवार्य है। हरिपाल की आवाज में जो लय, मस्ती और मिठास है, वह अंदर तक मन को सजल कर देती है। हरिपाल को याद करें, तो इसी गाने की स्त्री आवाज कृष्णा पटेल को भी अवश्य याद करना चाहिए। ये सब आमतौर पर गुमनामी में जीने वाले लोक कलाकार हैं, जिनको पूरा फोकस कभी नसीब नहीं होता। 
बेशक, रिमिक्स में राम संपत ने गाने को निखार दिया है, यह गाना पिछले सप्ताह यू ट्यूब पर जैसे ही लोड हुआ, उसे लाखों लोग ने हिट किया। कई लोग होंगे, जो इस गाने के लिए राम संपत और सोना महापात्रा को ही श्रेय देंगे, लेकिन क्या हरिपाल, कृष्णा, मित्रभानु, प्रभुदत्ता को भुला दिया जाए? नहीं, इस गीत के असली जन्मदाताओं को भूलना नहीं चाहिए। यह गीत अपने होने में नई पीढ़ी को इतना पुराना लगता है, मानो यह सदियों से उड़ीसा में रहा हो, जबकि इस गीत को बमुश्किल ३५-४० साल हुए हैं। सबसे खूबसूरत बात यह कि इसे बनाने वाले अभी जीवित हैं, लेकिन सबसे दुखद बात यह कि दुनिया उन्हें भूल-सी गई है। आज उन्हें फिर याद किया जा रहा है. रिमिक्स अगर कहीं मारता है, तो कहीं जिंदा भी तो करता है। राम संपत के काम को नकारा नहीं जा सकता। रिमिक्स ने रंगबती और उसके असली सृजनकर्ताओं को चर्चा में फिर जीवित कर दिया है, फैसला तो कोर्ट में होगा, लेकिन कोर्ट से बाहर रंगबती का आनंद क्यों खराब किया जाए। अपने दिल के पास चलते रहना चाहिए
ए रंगबती रे रंगबती...
ओ रंगबती रे रंगबती...

Tuesday, 1 November 2011

छठ, बिहारी और देश

छठ पूजा (सूर्य षष्टि व्रत) पर गांव चला जाता हूं, इस बार नहीं जा पाया। यह ऐसा महान लोक पर्व है, जिसके करीब आते ही बिहारियों के आसपास की फिजा बदल जाती है। मैं अक्सर कहता हूं, शायद ही कोई ऐसा बिहारी होगा, जिसे छठ का गीत सुनकर बिहार की याद नहीं आती। मैं तो बिहार में नहीं रहा, राउरकेला-उड़ीसा में जन्मा, वहीं पला-बढ़ा, लेकिन वहां भी बिहारी समाज अच्छी खासी संख्या में है। होश संभाला, तो मां को छठ पूजा करते पाया। छठ की यादें आज भी ताजा हैं, रिक्शा से पहले शाम और फिर सुबह के समय कोयल नदी के तट पर जाते थे, जो घर से करीब पांच किलोमीटर दूर बहती थी। साइकिल रिक्शावाले उड़ीसा के ही स्थानीय आदिवासी समाज के थे, लेकिन वे भी न केवल खुद नहा-धोकर आते थे, बल्कि रिक्शा भी धुलता था। पवित्रता का महत्व वे भी जान गए थे, छठ का ऐसा प्रभाव पड़ा था कि उन्हें भी घाट पर पहुंचने की जल्दी होती थी और हम बच्चों को भी। हम बच्चे जिस रिक्शावाले के रिक्शे पर बैठते थे, उसका नाम रामलाल था। रामलाल इसलिए अच्छा था, क्योंकि वह दूसरे रिक्शेवाले से आगे बढक़र रिक्शा चलाता था। पहले राउरकेला में भी छठ घाटों पर केवल बिहारी होते थे, वह भी कम संख्या में, लेकिन धीरे-धीरे उड़ीसा और बंगाली समाज के लोग भी तट पर श्रद्धा भाव के साथ आने लगे। भीड़ बढ़ती गई। भीड़ आज और बढ़ गई होगी और श्रद्धा भी, मैं तो आखिरी बार उड़ीसा में १९९५ की छठ में शामिल हुआ था। उसके बाद राउरकेला छूट गया, छठ नहीं छूटा, क्योंकि यह कोई छूटने वाली चीज नहीं है।
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि मगध की संस्कृति का वैभव छठ काल में चरम पर होता है। बिहार देखना हो, तो आप छठ के समय वहां जाइए और देखिए कि बिहार वास्तव में क्या है। १९६०-६५ के बाद के वर्षों में बिहारियां को इतनी गालियां मिली हैं कि उसकी खूबियां भी मजाक का विषय बनती रही हैं। अब तो खैर देश के हर शहर में बिहारी हैं और छठ भी मनाते हैं, लेकिन हर शहर में एक दौर ऐसा भी रहा, जब बिहारी सिर पर डाला या टोकरी को पीले या लाल कपड़े से ढककर ईंख के गुच्छे थामे, दीप जलाए हुए, छठ के गीत गाते जब किसी तालाब या नदी के किनारे पहुंचते थे, तो दूसरे लोगों को आश्चर्य होता था। वे सोचते थे कि आज बिहारियों को क्या हो गया है। शाम के समय भी सजधज कर तैयार होकर तालाब या नदी के तट पर आते हैं और फिर दूसरे दिन सुबह अंधेरे में ही तट पर पहुंचकर उसे रोशन कर देते हैं, बिहारियों को ये क्या हो जाता है? मैंने दिल्ली के भी छठ का आनंद लिया है, शायद ही ऐसा कोई पर्व होगा, जब दिल्ली वाले यमुना के किसी किनारे को साफ करते होंगे, दिल्ली वालों ने तो मानो यमुना को गंदा करने का ठेका ही ले रखा है, यह श्रेय बिहारियों को दिया जाना चाहिए कि यमुना के कुछ तट छठ के बहाने साफ हो जाते हैं, हरियाणा से आने वाली नहर में पानी छूटता है, उस नहर के भी कई तट साफ हो जाते हैं। कई तटों पर तो स्थायी सीढिय़ां बनी हैं, पहले बिहारी समाज के लोग ही मिट्टी काटकर सीढ़ीनुमा तट बना लेते थे। छठ के बहाने बड़े शहरों में भी तटों पर कुछ तो सकारात्मक हुआ है, वरना ऐसे कितने त्योहार भारत में हैं, जिनके चलते तालाबों, नदियों के तटों की सफाई होती है?
बिहारी स्वभाव से संकोची रहे हैं, दूसरे समाजों में झुककर, समझौते करते हुए मिलना उनका स्वभाव रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि इस देश को बांधकर रखने में मारवाडिय़ों और बिहारियों का सबसे ज्यादा योगदान है। ये भारत में हर जगह मिल जाएंगे। दुर्गम जगहों पर सडक़ बनानी हो, जान भी खतरे में हो, तो बिहारी मजदूर खटते हुए मिल जाते हैं। असम हो या अरुणाचल या लद्दाख, बिहारियों को देखा जा सकता है। पंजाब में खेती करने से लेकर कन्याकुमारी के घाटों पर मछली ढोने तक। बिहारियों ने अपने लोक पर्व को कभी नहीं भुनाया, उसे बाजार के हवाले नहीं किया, उसे पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाते रहे हैं। भारत के दूसरे प्रांत के लोग कहीं पहुंचते हैं, तो तुरंत संगठित हो जाते हैं, लेकिन बिहारी एक ऐसा समुदाय है, जिसने कहीं जाकर काली बाड़ी जैसा कोई प्रयोग नहीं किया। बिहारियों को केवल एक तट चाहिए छठ मनाने के लिए। दिल्ली सरकार भले ही सरकारी छुट्टी दे या न दे, बिहारी तो छठ मनाएंगे। बैंडबाजे के साथ मनाएंगे, हर्षोल्लास के साथ मनाएंगे। बिहारी के साथ अन्याय कहां नहीं हुआ, मुंबई में भी उन्हें छठ मनाने से रोकने वाले आगे आ जाते हैं। देश को सस्ते बिहारी मजदूर चाहिए, गुजरात को चाहिए, पंजाब को चाहिए, दिल्ली, कोलकाता, मुंबई को चाहिए, क्योंकि बिहारी ज्यादा मेहनती होते हैं, लेकिन बिहारियों की विशेषताओं को भी तो स्वीकार किया जाए, बिहारियों को केवल वोट बैंक न समझा जाए। मैं मीडिया में हूं, कहीं चोरी-डकैती हो, तो सबसे पहला शक बिहारियों पर किया जाता है। मैंने अज्ञानता में बहुतेरे लोगों को यह कहते सुना है कि बिहारियों ने माहौल बिगाड़ रखा है। मैं यह जरूर जानना चाहूंगा कि देश में कौन राज्य ऐसा है, जहां अपराध या अपराधी पैदा नहीं होते।
हालांकि यह सच है कि छठ के समय बिहार में ऐसी हवा चलती है कि अपराध कम हो जाते हैं। एक ऐसा पर्व, जिसमें जाति का बंधन नहीं, घाटों पर सूप और कलसूप देखकर कोई जाति के सवाल नहीं उठाता। बहुतों को आश्चर्य होगा, लेकिन मुसलमान भी छठ करते हैं। पुरुष भी छठ कर सकते हैं, महिलाएं भी। यह पर्व थोड़ा कठिन है, करवां चौथ जैसा नहीं है कि सुबह से शाम तक भूखे रहे और चांद देखने के बाद पार्टी मना ली। छठ में लगभग दो दिन का उपवास होता है और ध्यान दीजिएगा, जल पीना भी वर्जित है। इस सम्पूर्ण उपवास अवधि को कितना भी कम किया जाए, डेढ़ दिन से कम नहीं किया जा सकता। उपवास कठिन है, इसलिए छठ पर खतरा बताया जाता है। जिस संयम-व्रत-शुद्धता-संकल्प-इच्छाशक्ति की मांग यह पर्व करता है, क्या उसकी पूर्ति आधुनिक होते बिहारी कर पाएंगे, क्या झारखंड, बिहार उत्तर प्रदेश में यह पर्व धीरे-धीरे हाशिये पर होता चला जाएगा? आप भी जाइए, किसी छठ घाट पर, देखिए, क्या भीड़ कम हो रही है, मुझे तो ऐसा नहीं लगता। जूहू बीच से पटना घाट तक छठ का साम्राज्य बढ़ता चला जा रहा है। देश में जगह-जगह से आवाज गूंज रही है : केरवा जे फरेला घवद से, ओपर सूगा मेडराय... समझ में न आए, तो किसी बिहारी से पूछिए, उसे ढूंढऩे के लिए ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ेगा। बिहार आपके पास आ गया है। आपके घाटों पर बस दो वक्त रहेंगे बिहारी और फिर अपने-अपने काम पर लग जाएंगे। जय छठ, जय हिन्द।