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Wednesday, 21 September 2011

मेरी किताब पर राजेंद्र शेखर जी की टिप्पणी

मैंने आपकी पुस्तक बड़े चाव और चिंतन भाव से पढ़ी. आपकी भाषा सहज, एक बहती नदी के निरंतर प्रवाह के माफिक है और शैली आकर्षक और ज्ञान वर्धक है. पुस्तक केवल पत्रकारिता के ही लिए नहीं बल्की आकांक्षी लेखकों के लिए भी उपयोगी है. क्योंकी पत्रकार और लेखक का ध्येय एक ही है की रोचक और आकर्शंपूर्ण सामग्री से पाठक को प्रभावित करना. और यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है की पत्रकारिता और लेखन स्थाई छाप तभी छोड़ सकते हैं जब की वे बेलाग इरादों से और पूरी इमानदारी से अपना पक्ष पेश करें.
यह तथ्यात्मक सत्य है की जन तंत्र में खबर जनता के लिए होती है और अधिनायकवाद में सरकार के लिए. आपने इस विचार को सटीक तरीके से यूं उद्धृत किया है की पत्रकार का काम प्रसार करना है न की प्रचार. इसी सन्दर्भ में अन्ना प्रकरण से आहत सरकार ने पत्रकारिता पर नकेल डालने के उपाय सोचने शुरू कर दिए हैं.क्योंकी वह अपने पक्ष के प्रचार को ज्यादा महत्व देती है.
इस विषय में आपने गांधीजी का उद्धरण किया है. महात्मा लिखते हैं की बाहर से आया हुआ अंकुश , निरंकुशता से भी विषैला होता है; अंकुश तो अन्दर से ही लाभदायक है.
दुर्भाग्य वश बढ्ता हुआ व्यवसाय-केन्द्रित सोच, अनैतिक होड़ और २४गुना ७ के बेतहाशा दबाब ने पत्रकारिता अथवा इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर से यह अंकुश कमोवेशी गायब ही कर दिया है. जैसा की आपने बड़ी निर्भीकता और ठोस तरीके से कई स्थानों पर ज़िक्र किया है. प्रबंधन भी स्व-अस्तित्व बनाए रखने की फिराक में अंदरूनी अंकुश लगाने मैं संकुचित है. इलेक्ट्रोनिक मीडिया में तो यह बीमारी टी.आर. पी. और ब्रेकिंग न्यूज़ के रूप में नैतिकता को पीछे धकेल कर काले बादल की तरह परदे पर छा गयी है. जब की ये दोनों उबाने वाले नौटंकी के घिसे पिटे अविश्वनीय औजार बन गए हैं.
आपने आंकड़ों से हिन्दी भाषा में पत्रकारिता की लोकप्रियता में अभूतपूर्व बढ़ोतरी की भविष्यवाणी की है और में आप से सहमत हूँ. इस झुकाव का एक अहम कारण है हिन्दी का शब्दकोष दूसरी भाषाओं के अंतर्वाह, खासकर अंग्रेज़ी से. आपने भी अपनी पुस्तक में ऐसे आयातित शब्दों का उपयुक्त उपयोग किया है
जन तंत्र में व्यक्तिगत गोपनीयता का महत्व सर्वोपरी है। इस लिए पत्रकारिता खोजपूर्ण हो सकती है लेकिन इओस प्रयास में अनधिकृत घुसपैठ का वर्जित होना ज़रूरी है. आपने इस कमजोरी का कई स्थानों पर ज़िक्र किया है. पत्रकारिता का असली चेहरा आपने निर्भीकता से बेनकाब किया है. और न्यूज़ रूम तथा सम्पादकीय डेस्क का चित्रण अति इमानदारी और उपयोगी ढंग से किया है.,जिससे आशा की जा सकती है की आपके सहकर्मी और संचालक पत्रकारिता की शुचिता बनाए रखने के लिए ज़रूरी अहतियात बरतेंगे और उचित प्रकार से अंकुश लगाने को प्रेरित होंगे.
मेरी ओर से आपको सहर्ष शुभ कामनाएं इस आशा के साथ की आप भविष्य में भी रोचक और उपयोगी प्रसंग लिखते रहेंगे।
शुभेच्छ
(श्री राजेंद्र शेखर, पूर्व सीबीआई निदेशक व नॉट अ लाइसेंस टू किल जैसी पुस्तक के लेखक)

Wednesday, 30 March 2011

अपनी बात


पत्रकारिता आधार, प्रकार और व्यवहार पत्रकारिता एक अत्यधिक व्यावहारिक क्षेत्र है। यहां मची आपाधापी में शायद ही किसी के पास फुरसत है कि वह समस्याओं के विस्तार में जाए और विधिवत समाधान बताने का कष्ट करे। मैंने पत्रकारिता में अनेक नए व पुराने लोगों को भी अपने सवालों के साथ परेशान-भटकते देखा है। एक बड़ी जमात है, जो गलतियां तो निकालती है, आलोचना भी करती है, लेकिन यह नहीं बताती कि आखिर काम कैसे किया जाए, काम कैसे सुधारा जाए। हर काम अच्छा नहीं होता, लेकिन जो अच्छा नहीं है, उसे अच्छा कैसे बनाया जा सकता है, ऐसे ही अनेक सवाल हैं, जिनके जवाब खोजने की कोशिश में ही धीरे-धीरे यह किताब लिखी गई है। प्रस्तुत पुस्तक में अकादमिक पहलुओं को लगभग छोड़ दिया गया है और केवल व्यावहारिक दृष्टि से उत्तर देने या समाधान बताने की कोशिश की गई है। यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि मैंने इस पुस्तक में अनेक विषयों पर स्वतंत्रतापूर्वक विचार करने की कोशिश की है, समस्याओं के समाधान बढऩे की कोशिश की है। हमेशा इस लक्ष्य का ध्यान रखा है कि पुस्तक लाभदायक बने। इस किताब को लिखते हुए कई बार मैंने विचार किया कि क्या मैं ठीक लिख रहा हूं, क्या ऐसी किताब की वाकई जरूरत है। न जाने कितने नए व प्रशिक्षु पत्रकारों ने अनजाने में ही मुझे यह पुस्तक लिखने की प्रेरणा दी है, मैं सबसे पहले उन्हीं का शुक्रगुजार हूं। प्रस्तुत पुस्तक में प्रथम खंड आधार में मैंने पत्रकारिता के आधारभूत पक्षों को समझने-समझाने की कोशिश की है। प्रकार खंड में मैंने विभिन्न तरह की पत्रकारिता की चर्चा की है। अंतिम खंड व्यवहार में मैंने कुछ ऐसे पक्षों को उठाया है, जिनसे आम तौर पर बचने की परंपरा रही है। पुस्तक में न केवल पत्रकार बिरादरी की बेहतरी की कामना की गई है, बल्कि पाठकों-श्रोताओं-दर्शकों की भी मदद करने की कोशिश हुई है। आदरणीय रामशरण जोशी जी को जरूर याद करूंगा, उन्हें मैंने लगभग साल भर पहले पुस्तक के कुछ अध्याय दिखाए थे और पूछा था कि क्या ऐसी कोई पुस्तक अभी है, क्या मुझे लिखना चाहिए। उन्होंने उत्साह भी बढ़ाया, सुझाव भी दिए। मित्र डॉ. राजेश कुमार व्यास ने मुझे किताब को जल्दी लिखने के लिए हमेशा प्रेरित किया। शास्त्री कोसलेन्द्रदास से हुई चर्चाएं प्रेरणादायी रहीं। राजीव जैन जैसे कुशल युवा पत्रकार और मनीष शर्मा जैसे नवागंतुक को मैंने कुछ अध्याय पढऩे के लिए दिए, ताकि यह पता चले कि मैं जो लिख रहा हूं, वह फायदेमंद है या नहीं। आदरणीय रामबहादुर राय द्वारा प्राप्त सहयोग अतुलनीय रहा। मैं तो न्यू मीडिया जैसे विषय को छोड़कर आगे बढ़ रहा था, लेकिन उन्होंने मुझे प्रेरित किया और इस विषय पर भी शोध व लेखन की सलाह दी। पुस्तक के रूप में मेरी यह कोशिश अगर पत्रकारों की नई व पुरानी पीढ़ी और पत्रकारिता में रुचि रखने वाले आम पाठकों को थोड़ी भी लाभान्वित कर सके, तो मैं अपनी मेहनत को सार्थक मानूंगा।