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Friday, 15 June 2012

जाकर लौटती आवाजें



कुछ लोग हुए हैं, जिन्होंने यह अहसास ही नहीं होने दिया कि वे भारत के नहीं हैं। उन्हीं में से एक मेहदी हसन हैं, गजल के शहंशाह। वैसे तो ईमानदारी तो यह है कि मेहदी हसन से पहले गुलाम अली की आवाज मेरे कानों तक पहुंच गई थी, बचपन में खोज-खोजकर सुना करते थे, कहीं गाना बजता तो खड़े हो जाते थे - चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है। जब यहां-वहां गुलाम अली को सुनने लगे, तो जगजीत सिंह हाथ लगे, वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी...और थोड़ी रुचि बढ़ी, तो पता चला कि एक गजल गायक मेहदी हसन भी हैं, सुना तो पता चला कि गजल यहीं से शुरू होती है। अमिताभ बच्चन का कालिया में एक प्रसिद्ध संवाद है, मैं जहां खड़ा हो जाता हूं, लाइन वहीं से शुरू होती है। यह दावा मेहदी हसन कर सकते थे, क्योंकि जब वे १९७० के दशक में भारत आए थे, तो गजल का संक्रामक वायरस छोड़ गए थे। जगजीत सिंह, चित्रा सिंह, पंकज उधास, तलत अजीज, अनूप जलोटा, रूप कुमार राठौर, रिज्वी और भी कई नाम हैं। शायर, अग्रज व मित्र दिनेश ठाकुर जी ने भी यही कहा और मशहूर शायर शीन काफ निजाम ने भी इसकी तस्दीक की। दिनेश जी ने बड़ी खूबसूरती से बयान किया कि मेहदी हसन गजल गायकी के भागीरथ थे, जो गंगा लेकर आए। दिनेश जी और निजाम साहब ने मेहदी हसन को याद करते हुए मुझे भी भावुक कर दिया। दिनेश जी भी उनसे मिले थे और निजाम साहब भी। निजाम साहब ने बड़ी खूबसूरती से फरमाया कि लिखने वाला अहसास को अल्फाज में बदल देता है और अच्छा गाने वाला अल्फाज को फिर अहसास बना देता है। मेहदी हसन ऐसे ही गायक थे, जब तक गाते रहे अल्फाज को अहसास बनाया। दिनेश जी बताते हैं कि अपनी भारी आवाज को उन्होंने बखूबी साधा, जवानी में की गई पहलवानी काम आई, गाने में भी कभी दम न फूला, और आरोह-अवरोह में खूब जमे। मशीनों के जरिये भी उनकी गायकी में झोल खोजना मुश्किल है। वाकई।
१३ जून को मेहदी हसन चले गए। मैंने अपने अखबार में इंट्रो लिखा - शहशांह -ए-गजल भारत में जन्मे। पाकिस्तान चले गए, लेकिन बसे, तो सिर्फ दिलों में और जब गए हैं, तो सब बुला रहे हैं - रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ।
लेकिन अब वे नहीं आएंगे। अब मेहदी हसन नहीं हैं, तो लगता है, एक आवाज ही नहीं, एक कड़ी, एक रिश्ता चला गया।
यह मैंने काफी बाद में जाना कि मेहदी हसन पाकिस्तान के नागरिक थे, और कभी उनके ग्रुप में तबलची रहे गुलाम अली भी पाकिस्तानी। और जब यह जाना कि गजल गायिका फरीदा खानम भी पाकिस्तान की हैं, तो अजीब अहसास हुआ। मेहदी हसन गा रहे हैं, आ फिर से मुझे छोडक़े जाने के लिए आ, तो फरीदा खानम गा रही हैं, आज जाने की जिद ना करो, यूं ही पहलू में बैठे रहो और गुलाम अली ने आवाज को घुमा-घुमाकर अपनी छेड़ रखी है कि हमको किसके गम ने मारा, ये कहानी फिर कभी, खो गया है दिल हमारा, ये कहानी फिर कभी...। उधर रेशमा की आवाज दूर तक पीछा करती थी, मौत न आई तेरी याद क्यों आई, बड़ी लंबी जुदाई... देखिए, रेशमा भी पाकिस्तानी है।

यह एक ऐसे सिरा है, पाकिस्तान का यह एक ऐसा हिस्सा है, जिस पर बरबस प्यार आता है। फर्क इतना ही है कि भारतीयों ने इन आवाजों से खुलकर प्यार किया है, जबकि पाकिस्तान में भारतीय आवाजों और फिल्मों को आज भी पिछले दरवाजे से घुसकर सुना-देखा जाता है। जिन्होंने पाकिस्तान को केवल संगीनें भेजते देखा है, शायद उन्हें यह विश्वास करने या सराहने में परेशानी आएगी कि सीमा पार से काफी संगीत भी आया है, जो संगीनों पर भारी पड़ता है।
राजस्थान के लिए यह एक बड़ा नुकसान है।
अभी पिछले ही साल जगजीत सिंह गए और अब मेहदी हसन। मेहदी हसन को राजस्थान ने कभी पराया नहीं माना और मेहदी हसन भी जब अपने गांव लूणा, राजस्थान आए, तो जमीन पर लोटने लगे थे, रोने लगे थे। अपनी मिट्टी तो अपनी ही होती है, जहां जिंदगी के २० साल बिताए हों, वह जगह कोई भूलता है क्या? अब रेशमा बची हैं, और उनकी भी जन्म भूमि रतनगढ़, राजस्थान ही है। अभी रेशमा का ही एक आलाप याद आ रहा है।
बिछड़े अभी तो हम बस कल परसो
जीऊंगी मैं कैसे इस हाल में बरसों।
लंबी जुदाई.. बड़ी लंबी जुदाई।