Saturday, 7 January, 2017

और वो चले गए

प्रो. रामानुज देवनाथन

१८ फरवरी २०१६ को नई दिल्ली में उनसे अंतिम भेंट हुई थी। राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी पर केन्द्रित विद्वतापूर्ण आयोजन था। रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य और केन्द्रीय मंत्री उमा भारती के साथ मंच पर विराजमान वे अपना व्याख्यान दे चुके थे। विद्वतापूर्ण माहौल में वे अति प्रसन्न थे। वे भारतीय विद्या भवन के सभागार से दोपहर बाद उठे। मैं साथ था। मैंने पूछा, ‘कहां जाना है, गाड़ी बुलवाकर छुड़वा देता हूं।’ उन्होंने मेरा हाथ थामकर कहा, ‘आप विराजो, मैं चला जाऊंगा।’ फिर भी मेरा मन न माना, मैं बाहर गेट तक आया। वे एक कैब सर्विस को फोन लगा चुके थे। कैब की गाड़ी उन्हें खोज रही थी। शायद विद्या भवन स्ट्रीट से बाहर कैब खड़ी थी। मैंने कहा, ‘आप अकेले कैसे जाएंगे, मैं चौराहे तक साथ चलता हूं।’
लेकिन उन्होंने फिर मेरी हथेलियों को दबाकर कहा, ‘यहीं चौराहे तक ही तो चलना है। आप यहीं रहो, मैं तो चला जाऊंगा।’ 

और वे चले गए। मैं कुछ देर तक उन्हें पैदल जाते देखता रह गया। पवित्र हृदय संस्कृत विद्वान प्रो. रामानुज देवनाथन अब सदा के लिए संसार से ओझल हो गए हैं। अब देखना संभव नहीं, उन्हें बस याद करते रहना है।


इतना सहज, सरल, तपस्वी विद्वान, जिसने यश की ऊंचाइयों को छुआ। बड़े पदों पर रहे, विद्वान छात्रों-शिक्षकों से घिरे रहने वाले, जिन्हें विद्वता से लालबत्ती भी नसीब हुई। आज के दौर में जब लोग कुरसियों पर नहीं बैठते, कुरसियां लोगों पर बैठ जाती हैं, तब देवनाथन जी जैसे ऋषि चरित्र भारतीय संस्कृति के लिए प्रतिमान हैं। सहजता और विद्वता के अनुपम प्रतिमान।

यह देश भोगियों ने नहीं खड़ा किया। यह देश योगियों ने ही खड़ा किया है। तप से खड़ी हुई हैं हमारी विद्याएं। कहते भी हैं कि भारत मोक्ष भूमि है, जबकि बाकी दुनिया भोग भूमि। भारत की मोक्ष भूमि पर रामानुज देवनाथन जैसे चरित्र की महत्ता चमकदार विरासत है। सज्जन-योगियों-तपस्वियों का सम्मान तो आपको करना ही होगा, वरना भोगी आपसे आपका सबकुछ छीन लेंगे। जीवन और चरित्र की उसी कंगाली तक आपको पहुंचा देंगे, जहां केवल भोग-रास-पतन है। 

संस्कृत कोई आम भाषा नहीं है। इस भाषा का अपना विद्युत है। ज्ञान-चरित्र के सुरक्षा कवच और पवित्रता के बिना संस्कृत को छूना विद्युत के खुले तार को छूने जैसा है। आपने गुस्ताखी की, तो या तो आप पगला जाएंगे या फिर आपके परिजन-लोग भी आपको पागल-ढोंगी समझेंगे, दुनिया क्या कहती है या कहेगी, यह चर्चा फिर कभी।

वे भाषाविद् थे, जैसी उनकी संस्कृत, वैसी ही अंग्रेजी और वैसी ही तमिल। हिन्दी में तो उनके लेखन का माध्यम शायद मैं नाचीज ही बना, शास्त्री कोसलेन्द्रदास की मदद से उनसे राजस्थान पत्रिका के लिए शायद पहली बार मैंने ही लिखवाया। और वे लिखते चले गए।

रामानुज देवनाथन जी से मिलकर ऐसा लगता था कि हां, ये सच्चे आधुनिक ऋषि हैं, जिनके मुख से वेद और उपनिषद के शब्द स्वत: साकार हो रहे हैं। एक ऐसा ऋषि जीवन जो केवल कूप जल पर निर्भर था, स्वयं जल निकालना, स्वयं अपना भोजन पकाना, उसे दूसरों की छाया से भी बचाना। कहीं दूर जाना, तो अपना जल-भोजन साथ लेकर चलना। 

सितंबर २०१३ का वह पुस्तिका लोकार्पण कार्यक्रम याद आ रहा है, जो हरिद्वार में हुआ था। वे तब जगदगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर के कुलपति थे। लालबत्ती गाड़ी से ही सपरिवार हरिद्वार पधारे थे। उनके लिए शास्त्री कोसलेन्द्रदास के सहयोग से हरिद्वार में रामानुज संप्रदाय से जुड़ा एक ऐसा आश्रम खोजा गया था, जहां कूप जल की व्यवस्था थी। लालबत्ती गाड़ी से जब एक धवल वस्त्रधारी, चंदनपूर्ण ललाट, ऋषि-रूप कुलपति उतरता था, तब देखकर हर्ष होता था कि संस्कृत के पास एक ऐसा विद्वान भी है, जो दुनिया को संबोधित कर सकता है कि देखो - भारतीय जीवन किसे कहते हैं, भारत कोई ऐसे ही विश्व गुरु नहीं बना था। भारतीय जीवन की ऐसी अनेक परंपराएं हैं, जो लुप्त हो रही हैं। संस्कारित होने की परंपरा, सीखने की परंपरा, विनयशीलता की परंपरा, उज्ज्वल चरित्र की परंपरा, वरिष्ठों को आदर देने की परंपरा, कनिष्ठों को आशीर्वाद देने की परंपरा।

उन्हें देखकर उन पुरानी पीढिय़ों-पूर्वजों की याद आती थी, जिन्होंने देश और देश के निर्माण के लिए अपना सबकुछ लगा दिया। 
कवि आलोचक अशोक वाजपेयी ने एक वाकया मुझे सुनाया था। २६ जनवरी आने वाली थी। तब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति होने जा रहे थे। दीक्षांत समारोह में भाग लेने मध्य प्रदेश के सागर विश्वविद्यालय आए थे। ठंड के दिन थे, सर्किट हाउस के बगीचे में धूप में चबूतरे पर बैठकर हाथ में सुई धागा लिए अपने कपड़े दुरुस्त कर रहे थे। यह सहजता डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को भारतीयता के ज्ञान के उपरांत ही प्राप्त हुई थी, वरना आज भी उनका जीरादेई में विशाल महलनुमा भवन है। उनकी संपन्नता का अंदाजा आप इसी से लगा लीजिए कि जब राजेन्द्र बाबू छपरा के स्कूल में पढ़ते थे, तब उनके साथ सेवक रहा करते थे।
उन्हीं राजेन्द्र बाबू ने कहा था, ‘हमारी स्वतंत्रता तभी तक सुरक्षित है, जब तक हमारी जरूरतें सीमित हैं।’

जरूरतों को सीमित करके ही तपस्वी चरित्र तैयार होते हैं और ज्ञान की असली गंगा प्रस्फुटित होती है और तब भारत विश्व गुरु बनता है। तब दूर अरब में भी पैगंबर बरबस बोल पड़ते हैं कि मैं पूरब से इल्म की हवा आती महसूस कर रहा हूं।    

वह ज्ञान की पवन आज अवश्य कुछ शांत होगी, उसने अपना एक संत-सैनिक गंवा दिया है। उन्हें हृदय से चाहने वाले दुर्लभ चिंतन वाले सहज विद्वान मंत्री राजपाल सिंह शेखावत ने उचित ही कहा है कि यह संस्कृत की ही क्षति नहीं है, यह संस्कृति और इस ब्रह्मांड के पुण्य की क्षति है।

लेकिन व्यवस्था में राजपाल जी जैसे कितने लोग हैं, जो संस्कृति के वास्तविक महत्व को समझ रहे हैं। स्वयं संस्कृत का समाज क्या यह मान रहा है? अगर आप नहीं समझेंगे और सच्ची भारतीय संस्कृति पर आपको हंसी आएगी, तो फिर आप दिल्ली-बंगलूर से गांवों तक अपनी बहू-बेटियों को असुरक्षित होते देखते रहिए। अच्छे-सच्चे लोग नहीं होंगे, तो अच्छा-सच्चा ज्ञान भी नहीं होगा और तब जो समाज बनेगा, तय है, आपको खून के आंसू रुलाएगा। संस्कृति के निर्माण के लिए भोगी और योगी के अंतर को समझना ही होगा, वरना भारत और भारतीय का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। आप स्वयं भोगी रहना चाहते हैं और दूसरों से योगी होने की आशा कर रहे हैं, तो मुझे कतई माफ न करें, मैं पुरजोर तरीके से कहना चाहता हूं कि आप जरूरत से ज्यादा भोले हैं!

कहना न होगा, यह हमारी व्यवस्था के लिए भी सोचने का समय है कि हमने वास्तविक योगियों के साथ क्या किया। रामानुज देवनाथन ने कभी कहा नहीं, लेकिन शायद वे तनाव में थे। ५७ की उम्र हो चुकी थी, किसी ऐसी जगह पर पोस्टिंग चाहते थे, जहां कूप की व्यवस्था हो, जहां वे अपनी पवित्रता का निर्वाह सही तरीके से कर सकें, लेकिन केन्द्र सरकार और राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के प्रबंधन ने उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें पोस्टिंग दी। उनके तपस्वी जीवन को और दुष्कर बनाया गया। 

दुर्भाग्य से यह हमारी प्रवृत्ति में शामिल होता जा रहा है कि हम अपनी संस्कृति की दुहाई तो देते हैं, लेकिन उसकी पालना नहीं करते और सबसे खौफनाक सच यह कि जो लोग संस्कृति की सच्ची पालना कर रहे हैं, उनकी हम सुनना भी नहीं चाहते। 

रामानुज देवनाथन जिस भारतीय मार्ग से गए हैं, उसी मार्ग से हमारे अनगिन पूर्वज व ऋषि गए हैं। ये उज्ज्वल मार्ग मिटने वाला नहीं है। निश्चिंत रहिए, आ रहे हैं उसी मार्ग पर कई लोग चलते हुए।    

7 comments:

Pt. Hemant Dadhich said...

विनम्र श्रद्धांजलि 💐

DUSHYANT said...

खूब लिखा है आपने.. नमन आपकी लेखनी और उनकी स्मृति को.. निश्चय ही वे अप्रतिम थे.. एक मुलाकात मेरी भी है उनसे शास्त्री जी के सौजन्य से.. ऐसा वीसी नहीं देखा.. ऐसा विद्वान भी नहीं..

Arun Vyas said...

सरल सच्चे योगी गुरु के प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि।
अरूण व्यास

SUPERMAN ATIMANAV said...

विस्मृति के इस दौर में किसी की स्मृति को जिस्म दे देना..यह इस आलेख में टहलता हुआ अनुगूंजित आहटों के साथ सुनाई देता है.प्रोफेसर रामानुज से मुलाकात का सौभाग्य तो मुझे प्राप्त नहीं हुआ पर यह जरुर लिख सकता हूँ कि जहाँ भी जीवन और शब्द रूह की औस से गीला है..वहाँ गीता के श्रीकृष्ण जरुर उपस्थित होते हैं..भाई ज्ञानेश जी की लेखनी से भारत के प्राचीन सन्यासियों की नाल जुडी है..काल इसे कभी काट नही पाएगा...
मेरे प्रणाम स्वीकार करें..
रविदत्त मोहता

Varam Pvt. Ltd. said...

good one

Dr. SUDEEP KUMAR PATHAK said...

ईश्वर कृपा से सादरणीय नित्यप्रेरणास्पद गुरु जी का सानिध्य करीब करीब 2 वर्ष का मेरा रहा है। आपके समस्त आचरण अनायास ही समस्त मानव समुदाय के लिये पथ्य थे। बस केवल इतना ही कह सकता हूं की अगर कहीं भी संस्कृत के किसी वर्तमान मनिषी के आचरण मे मानवता दिख जाय, अकारण कारुण्य की झलक महसूस हो तो यह जरुर समझा जाए की उस मनिषी पर आचार्य रामानुज देवनाथ का प्रभाव अवश्य है।

Kuldeep Sharma said...

बहुत ही अच्छा है .पढ़ने के समय आंसू रोक पाना कठिन कार्य था .किसी समाचार पत्र में प्रकाशित होना चाहिए .भारत में ऐसे ऋषि गणों का सम्मान होना चाहिए ,ये भारत के अमूल्य निधि है ,इन्ही के कारण भारत का अस्तित्व है .हमारे आदर्श अभिनेता न होकर ऐसे आचार्य जी होने चाहिए .तभी भारत का कल्याण हो सकता है ,आचार्य जी हमारे जीवन में है कभी नहीं जा सकते ,इनके tweets में भारत के प्रति चिंता प्रतीत होती थी .चाहे वो डिग्री विवाद हो या गौ मांस का मुद्दा हो .विद्यार्थी ही सब कुछ थे ..नमन