Tuesday, 29 June 2010
लाइब्रेरी वाला गांव
शीतलपुर या गरमपुर
पहले मेरे गांव के लोग कम बीमार पड़ते थे, लेकिन अब ज्यादा बीमार पडऩे लगे हैं। पूछता हूँ , तो हर कोई अपनी या किसी अपने की बीमारी की दास्तान सुनाता है। चेहरों की रौनक बुझने लगी है। क्या हो गया है मेरे गांव को?
कहते हैं, जो गांव पूरब से पश्चिम तक लंबा बसा होता है, उस गांव में बहुत शांति कभी नहीं रहती। किसी की हुकूमत ज्यादा दिन तक नहीं चलती है। बड़े बड़े आते हैं और चले जाते हैं। तो गांव तो उत्तर से दक्षिण दिशा में लंबवत होकर बसना चाहिए। हमारा गांव पूरब-पश्चिम वाला है, उसे चाहकर भी शायद उत्तर-दक्षिण वाला नहीं बनाया जा सकता। मेरा मानना है, यह गांव लंबा होता जा रहा है, लेकिन घर के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि गांव शुरू से ही ऐसा ही है। कभी किसी ने कोशिश नहीं की कि इसे सुधारा जाए। जिसे जहां बसना था, बस गया, घर बना लिया। लेकिन यह बात बिल्कुल सही है कि कभी गांव में किसी की ज्यादा दिन तक नहीं चली। एक से एक लाला जी हुए गांव में, लेकिन कोई जमा नहीं। एक से एक साह हुए, सोनार हुए, लेकिन लंबे समय तक कोई जमा नहीं रहा। ब्राह्मणों का वर्चस्व तो शायद ही कभी रहा हो। अब इधर आरक्षण वाली जमात मजबूत हुई है, उन्हीं का वर्चस्व है, वही तय करते हैं कि किसे सरपंच व मुखिया बनाना है।
पिछली बार एक दागी छवि वाले व्यक्ति को लोगों ने मुखिया बनवाया, हालांकि उनका मुखिया पद छिन चुका है। मुखिया जी की नेतागिरी बिल्कुल ठीक चल रही थी, पूरा सम्मान मिलने लगा था, पैसा आने लगा था, लेकिन शायद उनकी किस्मत खराब थी। एक चाट वाले से लड़ बैठे कि उनके लोग खाएंगे चाट, लेकिन पैसा नहीं देंगे। गरीब चाट वाला अड़ा, तो अपने कुछ दांतों से हाथ धो बैठा। कानून कड़ा है, सिर के किसी भाग पर प्रहार को खास गम्भीरता से लेता है, मुखिया जी को अंदर जाना पड़ा। अब जमानत पर बाहर आ गए हैं, लेकिन उनकी मुखियाई तो गई। नया मुखिया बनाया गया है, वह भी आरक्षित वर्ग से ही है। सब लोगों ने मिलकर उसे पंचायत के बाकी बचे हुए कार्यकाल के लिए मुखिया चुन लिया गया है।
नेता आज भी हैं, लेकिन पहले जैसी गुणवत्ता नहीं रही। सेवा का भाव कम हुआ है। शीतलपुर एक अच्छा गांव है, संपन्न गांव है, उसे आज काफी आगे होना चाहिए था, लेकिन आस-पास के गांवों से भी पिछडऩे लगा है, क्योंकि नेतृत्व उतना कुशल नहीं है, जितना होना चाहिए। आपस में झगड़े सुलझाए नहीं जाते, झगड़े लगाए और कराए जाते हैं। उदाहरण के लिए, मेरे घर के सामने जो सड़क सदियों से है, वह आज भी कागज पर नहीं आई है। व्यावहारिकता में सड़क है, लेकिन वहां कोई ईंट नहीं बिछाता, वहां कोई सिमेंटेड सड़क नहीं बनाता। मुखिया आते हैं, चले जाते हैं। हमारे सामने जिनका घर है, उनसे हमारा झगड़ा है, गांव के चतुर लोग जानते हैं कि सड़क बन जाएगी, तो झगड़ा खत्म हो जाएगा। चलने के लिए सड़क तो है ही, चलते रहिए, कागज पर नहीं है, तो क्या हुआ? कागज पर थोड़े चलने जाना है। एक और बात बता दूं, आसपास के सभी गांवों में सड़कें सीमेंटेड हो गई हैं, लेकिन हमारे गांव में इसकी कोई सुगबुगाहट नहीं है। तो यह है नेतृत्व?
बहरहाल, मेरी चिंता दूसरी है, गांव के प्रति गांव के लोगों में जो प्रेम होना चाहिए, वह नदारद है। गांव पर गर्व करने के बहाने लगातार कम होते जा रहे हैं। मैंने अपनी उम्र के छत्तीस वर्षों में अपने गांव के समाज को लगातार गिरते हुए, टूटते हुए और बिगड़ते हुए देखा है। शायद जैसे जैसे मेरा गांव पिछड़ता गया है, वैसे वैसे बिहार के गांव और शायद स्वयं बिहार भी पिछड़ता गया है। जैसे जैसे योग्य लोग मेरे गांव को छोड़ते गए हैं, वैसे-वैसे योग्य लोग बिहार को छोड़ते गए हैं।
क्रमश:
Sunday, 6 June 2010
बिहार से फिर लौटकर
जो अच्छा है,
सिमटकर थोड़ा बचा है।
जो बुरा है,
चादर फाड़कर पसरा है।
रिस रही अच्छाई,
सिलन से बेहाल दीवारों पर
बचे हैं बस नारे
जिन्हें कोई लिख जाता है
बार-बार बचाकर नजरें।
लिखने-लिखवाने वालों से
मैं समझना चाहता हूं
नारों का सच।
यहां का सच
बाहर नारों से ढंक जाता है
अंदर सिलन से उधड़ जाता है
लेकिन पहलू दो ही नहीं
अनेक हैं।
दीवार में सीमेंट कम
ज्यादा मिट्टी है,
ईंटें कम
बेडौल पत्थर अधिक हैं।
शायद दीवार बनाई नहीं
केवल दिखाई गई है।
या शायद केवल आभास है
कि खड़ी है दीवार।
तभी तो
जो अच्छा है,
सिमटकर थोड़ा बचा है।
जो बुरा है,
चादर फाड़कर पसरा है।
Monday, 20 October 2008
चावल का चक्कर
जाति .... : भाग नौ
उस वर्ष धान बहुत कम हुआ था, लेकिन तब मैं पैदा नहीं हुआ था। मुझसे बड़े वाले भाई साहब का दुनिया में पदार्पण होने वाला था। पिता जी परिवार लेकर राउरकेला से शीतलपुर आए हुए थे। इस छोटे परिवार का मतलब, माता, पिता, मेरे दो बड़े भाई, जो तब तीन और एक साल के हुआ करते थे।
उन्हीं दिनों बांग्लादेश की आजादी के लिए संघर्ष तेज होने लगा था। बड़ी तादाद में बांग्लादेशी भारत आ रहे थे, मेरे गांव की ओर तो नहीं, लेकिन मेरे शहर राउरकेला में पलायन का प्रभाव दिखने लगा था। इंदिरा गांधी ने कुछ ही महीने पहले गरीबी हटाओ का नारा दिया था, लेकिन ये वही वर्ष थे, जब बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा जैसे राज्य पिछड़ने लगे थे। महाराष्ट्र, पंजाब और दक्षिण के राज्यों में तरक्की तेज होने लगी थी। बिहार विकास की सीढियों पर लुढ़क रहा था। यह वह दौर था, जब बिहार अपने पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह के दौर में अर्जित दिशा और दशा को गंवाना शुरू कर चुका था।
खैर, उस साल हमारे खेतों में धान नहीं के बराबर हुआ था, जो चावल उपलब्ध था, वह मां को अच्छा नहीं लगता था और बार-बार रोटियों से पाला पड़ता। मुझसे बड़े वाले भाई साहब पेट में थे, शायद चावल के शौकीन, धमाल मचा देते होंगे। मां की इस तकलीफ से बुआ लालदेई अनभिज्ञ नहीं थीं। दादी तो थी नहीं, वैसे मेरे किसी भाई को दादी या दादा की गोद में खेलने का सौभाग्य हासिल नहीं हुआ। मेरे बड़े पिताजी अर्थात बाबूजी की भार्या अर्थात मेरी बड़ी मम्मी भी नहीं थी, लेकिन एक बूçढ़या अम्मा और एक बड़ी अम्मा थीं। बड़ी अम्मा घर की मालकिन थीं। दुर्भाग्य से घर में बेवाओं का जमावड़ा था, उनमें यदा-कदा विवाद भी होता क्योंकि वे सब अपने-अपने दुख से परेशान थीं। लेकिन मां को मैंने आज तक कभी कलह में नहीं देखा है। तब मां गांव में घूंघट भी काढ़ती थीं, दुलहिन बोली जाती थीं। अच्छे चावल खाने की इच्छा बोलें, तो किससे बोलें। पिता को बोलना बेकार था, वे आज भी कहते हैं, `जो है, क्या वह कम है?´ लेकिन मां का मन न मानता, काश, कहीं से अच्छे चावल का इंतजाम किया जाता। चावल खरीदने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता, बदनामी होती। इतने खेत हैं, फिर भी चावल खरीदते हैं। गांवों में बनियों की दूकानों से ही तमाम घरों के रसोईघरों की कमियां दुनिया में फैलती हैं, वैसे भी तब गांव के बाजार पर गिनती की तीन-चार दूकानें हुआ करती थीं और सभी पहचान के बनिये थे। तो चावल खरीदने का विचार दमदार नहीं था। चुपचाप रहने वाली मां ने किसी से नहीं कहा, हालात से समझौते के लिए मन को तैयार कर लिया। फिर भी मन न मानता, शायद गर्भ में पल रहे भाई साहब को चावल बिना चैन नहीं था। जो चावल उपलब्ध था, वह न देखने में ठीक, न खाने में और न सूंघने में।
वैसे भी जिन महिलाओं के पैर भारी होते हैं, वे सूंघ-सूंघकर खाती हैं, बल्कि सूंघती ज्यादा हैं और खाती कम हैं। अगर एक बार किसी चीज की गंध से घृणा हो गई, तो फिर वह चीज पास नहीं दिखनी चाहिए।
लेकिन भाई साहब के हिस्से में ढेर सारा अच्छा चावल लिखा था और है। अगर ऊपर से देने वाला तैनात हो, तो लेने वाला तो मात्र दर्शक है। उन्हीं दिनों हमारे एक सामा बाबा था। बर्नपुर कारखाने से रिटायर होकर लौटे थे। घर के बंटवारे में वे पहले ही अलग हो गए थे। अकेले थे, शादी नहीं हुई थी। बासठ-तीरसठ की उम्र में ही काफी बूढ़े लगने लगे थे। बीमार रहते थे। अपना घर तो बनाया नहीं। जवानी कारखाने और बर्नपुर में झोंक दी, रिटायर होकर लौट आए गांव। यहां-वहां किसी-किसी के यहां रहते थे। गांवों के अनेक लोगों ने उन्हें प्यार दिखाकर खूब लूटा था। उनका पैसा किसी के पास, बर्तन-सामान किसी और के पास, तो अनाज किसी और के खलिहान में होता था। गांव में पॉपुलर थे, क्योंकि उनमें लोगों की मदद करने का माद्दा था। सामा बाबा को मेरे पिता और बाबूजी से काफी लगाव था, जो दुनिया से धोखा खाते हुए निरंतर बढ़ता जा रहा था। पिता और बाबूजी ही थे, जो बिना स्वार्थ के अपने सामा चाचा की सेवा करते थे। वे कई-कई दिनों पर हमारे घर आते थे, लेकिन घर की महिलाएं भी उनकी सेवा करने, उन्हें भोजन करवाने को तत्पर रहती थीं। पिताजी परिवार के साथ गांव आए हैं, इसकी सूचना सामा बाबा को लग चुकी थी। एक दिन सुबह मिलने के लिए हमारे घर आए। वे सीधे आवाज देते हुए आंगन में चले आए। दीन-हीन, दुबले, मटमैली होती धोती, पुराना पड़ता कुर्ता, चारों ओर से तेजी से घेरता बुढ़ापा। उन्हें आंगन में देख सहर्ष हलचल हुई। बुआ, मां सबने आगे बढ़कर उनके चरण छुए। बैठने के लिए खाट गिरा दी, चादर बिछ गई। पीने को पानी आ गया। सामा बाबा सबसे हालचाल पूछने लगे। सबने गौर किया, उनकी रूखी त्वचा पर छोटे-छोटे चकते बन गए थे। वे किसी अनाथ बूढे़ से लग रहे थे। घर की सभी महिलाओं को उन पर दया आई, तो मां बैठ गई चचिया सुसर की सेवा करने। बूçढ़या अम्मा, बड़ी अम्मा, बुआ, घर के काम करने वाली काकी, सभी से वे बात करते रहे। हमने तो सामा बाबा को नहीं देखा, लेकिन सुनते हैं, गजब के मिलनसार और दिल के बड़े मीठे आदमी थे। खड़ा और साफ-सुथरा बोलते थे, दिखावे से कोसों दूर। कुछ देर बाद उनके हाथ-पैर की त्वचा के चकते दूर हो गए, रूखापन गायब हो गया, उनकी आत्मा प्रसन्न हो गई। वे कुछ भावुक भी हुए होंगे, उन्हें अपना-सा अहसास हुआ होगा। बातों-बातों में बुआ ने मां की स्थिति और चावल की कमी के बारे में उन्हें बता दिया था। बाबा ने चावल की कमी पर कुछ नहीं कहा। खाट पर कुछ देर सुस्ताने के बाद चुपचाप आंगन से बाहर आ गए। पिता, बाबूजी और बच्चों के बारे में पूछा और नारा की ओर बढ़ चले। नारे से होते हुए नौतन बाजार की ओर जाती सड़क के पश्चिम में नारे वाले खेत में बाबूजी, पिता काम में जुटे थे। मेरे दोनों छोटे-छोटे बड़े भाई भी खेत में मिटटी-मिटटी खेल रहे थे। सामा बाबा तेजी से खेत में उतरे, सभी ने बढ़कर उनका अभिवादन किया। आदेश पर मेरे बड़े भाइयों ने भी उनके चरण छुए। उन्हें देखकर बाबा का मन खिल उठा। उन्हें पुचकारते रहे, दूसरे ही पल मन में चावल की बात उभर आई, वे थोड़े गुस्से में बाबूजी की ओर मुखातिब हुए, `मास्टर, घर में चावल का अभाव हो गया है और मुझे पता नहीं है? मुझे पराया समझे हो?´बाबूजी चुपचाप सुन रहे थे। उनमें वैसे भी पहाड़-सा संयम रहा है। `हम और तुम मिट्टी में पैदा हुए, मिट्टी में मर जाएंगे। तरह-तरह के अभाव देखे, लेकिन अब यहां से हमारी पीढ़ी बदल रही है। देखो, इन बच्चों के सुंदर-साफ चेहरे देखो, ये मिट्टी के लिए नहीं बने हैं। ये गांव में नहीं रुकने वाले। ये हमारी मेहनत के हीरे-मोती हैं, इन्हें कोई अभाव नहीं होना चाहिए। कुछ दिन के लिए गांव आए हैं और हमारे रहते, इन्हें अभाव हो?´
बाबूजी चुप रहे, पिताजी काम में लगे रहे। भाई साहबों का खेल जारी रहा, बाबा पुलिया पार करते हुए नौतन बाजार चले गए। कुछ देर बाद नौतन बाजार की ओर से एक मजदूर हमारे घर की ओर आता दिखा। कंधे पर भरा-भारी बोरा था, वह पुलिया पार करके हमारे दरवाजे पर पहुंचा। कंधे से बोरे को उतारकर बोला, `सामा बाबा, अपने खलिहान से धान भिजवाए हैं? बोले हैं, घटे, तो संकोच करने की जरूरत नहीं है।´ बुआ ने आगे बढ़कर बोरे में बनी एक छेद से थोड़ा-सा धान निकला, चावल के कुछ दाने निकाले , हथेली पर लिया, सूंघा और खुश होकर कहा, `ए दुलहिन, ये चावल बहुत अच्छा है।´
Wednesday, 8 October 2008
हमारे गांव का नारा
जाति के जर्रे : भाग सात
मेरे नारा का नाता कतई राजनीति से नहीं है। मेरे नारा का मतलब है नाला। भोजपुरी में नाला को नारा ही बोला जाता है, जो ध्वनि के लिहाज से नाला की तुलना में ज्यादा बेहतर सुनाई पड़ता है। यह नारा मेरे लिए शुरू से रहस्य और रोमांच का विषय रहा है। हम नारा पार करके ही अपने घर पहुंचते हैं , हम अपने खेतों की ओर जाते हैं , तो नारा पार करना पड़ता है । हमारे आम के बगीचे भी नारा के उस पार पड़ते हैं। मोहन और जवाहिर राम के घर भी नारा पार ही स्थित हैं। लेकिन माफी कीजिएगा, नारा का मतलब यह नहीं है कि उसमें गांव का बदबूदार पानी बहता हो। लगभग दो सौ मीटर चौड़ा यह नारा अब सूख चुका है, किसी जमाने में यहां दरिया हुआ करता था। बताते हैं, कमर तक पानी बहा करता था। शायद यह नारा गंडक और सरयू नदी के बीच बहता होगा। यह दशकों तक एकमा और मांझी थाना की सीमा रेखा रहा है, लेकिन अब एक नया थाना बन गया है दाऊदपुर। इसमे पानी भले न रहा हो, लेकिन नारा की निशानियां अभी भी बरकरार हैं। मैंने जहां तक चलकर देखा है, नारा करीब तीन से चार किलोमीटर लंबा है। थोड़ी-सी बारिश होते ही नारा पानी से भर जाता है और गवाही देता है कि मैं कभी जिंदा था, बहता था। नारा के उत्तर में नौतन बाजार गांव है और दक्षिण में शीतलपुर बाजार। नारा के ऊपर एक पक्की सड़क है, जो शायद राज्यमार्ग है, एकमा और मांझी को जोड़ता है। पक्की सड़क से लगभग तीन सौ मीटर पश्चिम में कच्ची सड़क है, जो नौतन बाजार और शीतलपुर बाजार को जोड़ती है। इस कच्ची सड़क से आप नौतन बाजार से जब शीतलपुर की ओर आते हैं, तो पहला मकान हमारा ही पड़ता है। इस कच्ची सड़क पर एक पुलिया भी है, क्योंकि नारा के एक हिस्से में गहरे गड्ढे हैं। एक दूसरे से जुड़े इन गड्ढों का भी अपना इतिहास है। जब गांवों में मिट्टी के घर बना करते थे, तब नौतन बाजार के लोग अपने ओर के नारा की मिट्टी काट-काट कर ले जाते थे। नारा की मिट्टी काफी मजबूत है, सिमेंट के रंग की, सिमेंट जैसी। मिट्टी काटते-काटते जब गड्ढे गहरे हो गए होंगे, तो इस जगह पर एक गांव से दूसरे गांव जाना मुश्किल हो गया होगा। तब शायद नारा से ही और मिट्टी काटकर नारा और उसमें पैदा हुए गड्ढों पर बांध जैसा बनाया गया होगा और बांध पर सड़क बनाई गई होगी। बांध के नीचे से पानी आर-पार हो जाए, इसके लिए पुलिया बनाई गई होगी, जो आज भी है।
यह पुलिया अंग्रेजों के समय ही बनाई गई थी। आज भी पुलिया ऊपर-ऊपर भले टूट जाती है, लेकिन उसका ढांचा मजबूत है। हर तीन-चार साल बाद पुलिया पर ऊपर से चढ़ाया गया ज्यादा बालू और कम सिमेंट का लेप उधड़ जाता है, तो पुराने जमाने की तगड़ी ईंटें झांकने लगती हैं। ईंटों को झांकते देख हमारे बाबूजी और अन्य बुजुर्गों को शर्म आने लगती है। वे पंचायतों पर दबाव बनाते हैं, कई गांवों के लोगों का दबाव पड़ता है, तब जाकर पुलिया की मरम्मत होती है, लेकिन बस तीन-चार साल के लिए।
हमारे नारा पर बनी यह पुलिया ही नहीं, बल्कि बिहार में असंख्य पुल हैं, तो अंग्रेजों की ईमानदारी की मिसाल हैं। केवल सड़क वाले पुल ही नहीं, कई रेल पुल भी हैं, जो अंग्रेजों के समय के हैं, आदर्श हैं। वरना पटना में गंगा नदी पर बने विशाल गांधी सेतु को बने तीस साल भी तो नहीं हुए, लेकिन हालत जर्जर है। मरम्मत जारी रहती है, खत्म होने का नाम नहीं लेती।
खैर नारे के गहरे हिस्सों पर बनी पुलिया हमारे घर से मात्र डेढ़ सौ मीटर उत्तर में स्थित है। अगर आप पुलिया पर साइकिल को बिना पैडल मारे लुढ़कने दें, तो साइकिल हमारे घर के सामने आकर रुकेगी। यह पुलिया मेरे लिए आज भी कौतूहल का विषय है। जब हम छोटे थे, तो पुलिया और घर के बीच रोज दस बार अप-डाउन किया करते थे। मेरे पिता और बाबूजी ने भी खूब अप-डाउन किया होगा। मेरे भाइयों ने भी खूब अप-डाउन किया है और अब मेरे छोटे-बड़े तमाम भतीजे भी बड़े मजे से अप डाउन करते हैं। गांव के दूसरे बच्चे भी आते हैं अप-डाउन के लिए। यह अप-डाउन एडवेंचरस स्पोट्र्स की तरह है। चुनौतीपूर्ण है बच्चों के लिए विशेष रूप से, इसलिए उन्हें आनंद भी आता है।
पुलिया लगभग आठ फीट चौड़ी है, उससे जब शीतलपुर या हमारे घर की ओर उतरते हैं, तो दोनों ओर बीस-बीस फीट गहरे गड्ढे हैं, जो लगभग तीस फीट तक साथ-साथ चलते हैं। उसके बाद ही हमारे घर की ओर थोड़ी समतल भूमि शुरू होती है। इन गड्ढों को किसी से बैर नहीं है। इन्हीं भोजपुरी में गड़हा कहा जाता है। उच्चारण से ही जाहिर है, गड्ढा की तुलना में गड़हा शब्द में ज्यादा आकर्षण है। हां, पुलिया पर से साइकिल लुढ़काते हुए अगर संभलकर न चला जाए, तो लुढ़कते हुए गड्ढों में जाना पड़ता है। फिर अपने आप धूल झाड़ते हुए गड्ढे से निकलना पड़ता है या फिर कोई न कोई मददगार मिल ही जाता है। बारिश के महीने में लगभग डेढ़ महीने पूरे नारा में पानी जमा रहता है और नारा में जब पानी सूख जाता है, तब भी नारे में स्थित इन गड्ढों में लगभग तीन-चार महीने तक पानी बचा रहता है। पानी भर जाए, तो ये गड्ढे इतनी मछलियां देते हैं कि आस-पास के दस-दस गांवों के शौकीनों की आत्मा तृप्त हो जाती है।
नारा वाले गड्ढे शुरू से ही मेरे लिए आकर्षण का केन्द्र रहे हैं। आज भी जब गांव जाता हूं, मौसम चाहे कोई हो, मौका पाते ही पहले गड्ढों में झांक आता हूं कि पानी है या सूख गया। मेरे पिताजी और बाबूजी भी शायद ऐसा ही करते होंगे। मेरे भाई भी गांव जाते हैं, तो उन्हें मैं गड्ढों का मुआयना करते देख ही लेता हूं और मेरे छोटे-बड़े तमाम भतीजे तो बेशक गड्ढों का मुआयना करते होंगे।
कई बार मैं नारे और गड्ढों को लेकर भावुक या नोस्टेलजिक हो जाता हूं। सोचता हूं, अगर जल स्रोतों को ठीक से सहेजा जाए, तो यह नारा भी बह चलेगा, लेकिन मेरा अनुमान है कि जब गंडक या सरयू पर बांध नहीं बने थे, तब उनका पानी इस नारे में आता होगा। आज मजबूत बांध बन गए हैं, तो नारों में पानी कम ही आता है। उत्तर बिहार का एक बड़ा इलाका गंडक और सरयू पर बने बांधों के कारण बाढ़ से बचा रहता है, मधेपुरा, सुपौल जैसी तबाही नहीं होती है, लेकिन बांधों का एक खामियाजा यह हुआ है कि हमारे इलाके में पानी की कमी हो गई है। हालांकि अब एक नहर इधर चार-पांच साल से बह रही है, लेकिन उससे दो बातें जुड़ी हैं, अव्वल तो इस नहर के बनने में लगभग तीस साल का समय बरबाद हुआ है और दूसरी बात, यह नहर जल-कुप्रबंधन का शिकार है। जरूरत के समय पानी नहीं होता और पानी जब आता है, तो खड़ी फसल सड़ा जाता है। मेरा खयाल है, अगर नारा में बहता दरिया आज जीवित होता, तो इलाके में नहर की जरूरत ही नहीं पड़ती। इलाके के लोग न दरिया को भूले हैं और न नारा विस्मृत हो रहा है। आज भी कोई भी इस नारे में घर नहीं बनाता है। क्या पता कब नारा जाग जाए और बह चले?
Tuesday, 29 July 2008
जाति के जर्रे : पांच
--विवेक हर लेती है गरीबी--
तो जवाहिर राम की आंखों में आंसू छलकने को बेताब थे। वह हमेशा की तरह बाबूजी से आंखें चुरा रहा था। घुटनों तक धोती, घनी मूंछें, छरहरा बदन। सिमट कर घुटनों पर हाथ और हाथ पर मुंह टिकाए बैठा था। बाबूजी सामने खाट पर थे, पूछा, `काहे मुंह लटकाए हो?´ `मोहन भाई दुनिया छोड़ गइलन।´बाबूजी घर के सामने पड़ने वाले नारा वाले खेतों के उस पार स्थित घनी बंसवारी को देखने लगे। मोहन भाई की यादों में उनकी नजरें ठहर गईं। एक साथ कई स्वर, कई घटनाएं, कई संवाद उभर आए। जवाहिर की आंखें बह चली थीं और बाबूजी याद कर रहे थे।
--- मोहन भाई बैलों को हल के लिए तैयार कर रहे हैं। बाबूजी भी खेत जाने के लिए तैयार हैं, `मोहन, आज चंवरा वाला खेत जुत जाना है। बारिश कभी भी शुरू हो जाएगी।´मोहन जोर की आवाज लगाता है, `जी मालिक।´और बैल चंवर की ओर बढ़ चलते हैं, उन्हें रास्ता पता है, बस खोलने और हल की रस्सी गले में बंधने की देर होती है। वे जान जाते हैं आज काम पर जाना है और मोहन भाई के कंठ से जब `चल, चलके´ आवाज निकलती है, तो बैलों का जोड़ा अपने गले में बंधी घंटियां बजाता चल पड़ता है।
हमारे चंवर वाले खेत घर से करीब चार किलोमीटर दूर पड़ते हैं। चंवर राजपूतों के गांव माने में पड़ता है। उसके पहले बिरती वाले खेत पड़ते हैं, जो नौतन गांव के तहत आते हैं और उसके पहले नहर के पास वाले और उसके बाद नौतन बाज़ार और नारा वाले खेतों की बारी आती है। घर के आसपास भी पर्याप्त जमीन है।जहां तक मेरी बात है, गांव में हमारी कितनी जमीन है, यह आज भी मैं नहीं जानता। कहां-कहां खेत हैं, यह भी मैं नहीं जानता। बस एक अंदाजा है, जिन-जिन खेतों में बचपन में गए हुए हैं, उन खेतों की याद है। विशेष रूप से जिन खेतों में हेंगाई के समय बास की पट्टी पर मोहन भाई ने बैठाया था, वे खेत अच्छी तरह याद हैं। खेत की जुताई यानी खोदाई के बाद हेंगी से खेत को समतल किया जाता है। बैलों के जोड़े के पीछे हल की जगह बांसों को जोड़कर बनाई गई पट्टी बांधी जाती है और बैलों का हांकने वाला हरवाह उस बांस की पट्टी पर चढ़ जाता है, बच्चे भी रस्सी पकड़कर मजे से हेंगी पर बैठ जाते हैं। हेंगी का कुछ भार हो जाता है, बैल चल पड़ते हैं और उबड़-खाबड़ जुते हुए खेत समतल होने लगते हैं। बचपन में हम चारों भाइयों को हेंगी पर बैठने में बड़ा मजा आता था। इतना मजा आता था कि पास वाले खेत में ही दो भाई बैल की भूमिका में होते, तो दो भाई पीढे़ से बनी हेंगी पर बैठकर आनंद लेते। सबसे बड़े भाई दिलीप उपाध्याय हम चार छोटे भाइयों को खेत में खेलते देख गदगद रहते थे और उससे भी ज्यादा गदगद बाबूजी होते थे कि शहरी बच्चे खेत में खेलकर मजबूत हो रहे हैं।
खैर, बाबूजी और मोहन भाई चंवर पहुंचते हैं। वहां पहुंचकर मोहन को खूब जोर की भूख लगती है। वह बाबूजी से बोलता है, ` पेट खाली है, घर जाएंगे, तो खाना भिजवा दीजिएगा।´ बाबूजी खेत बताकर वापस चले आते हैं। उन्हें स्कूल भी जाना है। घर आते हैं, खाना बांधने का आदेश देते हैं। नहा-धोकर स्कूल जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। स्कूल जाने से पहले मोहन भाई के पास खाना भी पहुंचाना है। बुआ पोटली बांध लाती हैं, पोटली में दस रोटियों के बराबर चार मोटी रोटियां हैं और बैंगन की सब्जी, मिर्च, नमक, प्याज। बाबूजी फिर चंवर के लिए चल पड़ते हैं। नारा वाले खेतों को पार करते हैं, नहर के पास वाले खेतों के करीब पहुंचते हैं, तो देखते हैं। अपने ही एक बिरादर उपाध्याय के खेत में मोहन की पत्नी अपने एक पुत्र के साथ काम में लगी है। बाबूजी सोचते हैं, मोहन को खाना देने चंवर तक जाऊंगा, तो स्कूल के लिए देर हो जाएगी, क्यों न मोहन की पत्नी को ही खाना पहुंचाने की जिम्मेदारी दे दूं, यह बेटे को भेजकर खाना पहुंचा देगी। बाबूजी ने ऐसा ही किया, मोहन की पत्नी ने बड़ी ललचाई निगाह से पोटली अपने पास रख ली और आश्वस्त कर दिया कि पोटली मोहन तक पहुंच जाएगी। बाबूजी स्कूल चले गए। दिन भर खूब कड़ी धूप रही थी, पसीने से परेशान जब बाबूजी शाम को स्कूल से घर पहुंचे, तो आश्वस्त थे कि चंवर वाला बड़ा खेत जुत गया होगा, बारिश कभी भी शुरू होने वाली है। मोहन की मेहनत से काम समय से हो गया। तभी बाबूजी के लिए पानी लेकर आई बुआ बताती है, `मोहन तो न जाने क्यों सुबह दस बजे ही बैल दरवाजे पर बांध गया।´ बाबूजी चौंक पड़े। पानी पीना थम गया। यानी चंवर वाले खेत नहीं जुत सके। यह तो बदमाशी है। खाना भी भिजवाया, तब भी मोहन ने दस बजे ही लाकर बैल दरवाजे पर बांध दिए और अपने घर लौट गया। आखिर क्या बात हुई? बाबूजी यही सोचते हुए फिर झटपट तैयार हुए और मोहन के टोले की ओर चले पड़े, जो कि करीब डेढ़ किलोमीटर दूर पड़ता था। मोहन घर के सामने ही खाट पर चित पड़ा था। बाबूजी को आता देखकर उठ बैठा। बाबूजी ने दूर से ही पूछा, `मोहन, खेत क्यों नहीं जुता? एकदम नाजायज बात है।´मोहन ने रोष के साथ कहा, `खाना नहीं भिजवाए, तो भूखे पेट हल कैसे चलाता?´ बाबूजी दंग रह गए। मामला समझ में आ गया। बोले, `अपनी मेहरारू से पूछो? क्या मैंने उसे खाना तुम्हारे पास पहुंचाने के लिए नहीं दिया था?´मेहरारू सब सुन रही थी, झोंपड़ी के अंदर ही कसमसा रही थी। मोहन ने आवाज देकर उसे बाहर बुलाया, वह बेवक्त बुलाने का बहाना करती मोहन पर नाराज होती हुई बेमन से बाहर आई। मोहन के एक बार पूछने पर उसने कोई जवाब नहीं दिया, जब मोहन ने डपट कर पूछा, तब उसने आंचल में मुंह छिपाए हुए कहा, `बड़ी भूख लगी थी, हम मां-बेटे ही खा गए, तुम्हारे लिए बचा नहीं।´बाबूजी आगबबूला हुए, `काम दूसरे के खेत में किया और खाना हमारे यहां का खा गई। मेरा खेत यों ही पड़ा रह गया, मेरे बैल गए और घूमकर आ गए, बताओ यह भी कोई बात हुई? सरासर नाजायज? बताओ, मैंने क्या गलत किया?´मोहन भी शर्मिंदा हुआ, बीवी को पीटने को तैयार हो गया, लेकिन वह चुपचाप वहां से खिसक गई। बाबूजी बहुत दुखी मन से घर लौट आए। मोहन एकाध दिन शर्म के कारण नजर नहीं आया। बताते हैं, उसकी बीवी बड़ी चंट थी, शायद अभी भी जिंदा है। उसे बड़ी भूख लगती थी। वह किसी के भी खेत में नजर चुराकर घुस जाया करती थी, सब्जियां कच्ची ही भकोस लिया करती थी। उसे लाज-लेहाज जरा न था। मोहन भी बेचारा क्या करता? समझा- बुझाकर हार चुका था।
बहरहाल, बाबूजी यादों में खोए थे। जवाहिर ने लंबी चुप्पी तोड़ते हुए बताया, `घर में एक भी दाना नहीं है, भाई का श्राद्ध न जाने कैसे होगा?´बाबूजी मानों यादों से जागे, हरकत में आए, `चिंता मत करो, श्राद्ध ढंग से होगा। जाओ घर से मलकिनी से बोलो, बीस किलो आटा, बीस किलो चावल ले लो, कुछ रुपये भी मैं दिए देता हूं। श्राद्ध ठीक से करो। मोहन अपने ही घर का आदमी था। बहुत किया उसने।´ जवाहिर फूट-फूटकर रोने लगा, तो कुछ बच्चे भी वहां जुट गए। बाबूजी ने पूछा, `रोओ मत, बहुत काम है, जाकर निपटाओ।´जवाहिर ने रोते हुए ही कहा, `मालिक, मोहन पर इतनी दया? आप नहीं जानते, हम लोग आपको कितना नुकसान पहुंचाए हैं। खेतों पर हमने क्या-क्या किया है, यह अगर आप जान जाएंगे, तो आपको बहुत दुख होगा। हम लोग दया के लायक नहीं हैं, मालिक।´ बाबूजी बोले, `मैं जानता हूं, याद मत करो, ये सब बेकार बात है।´जवाहिर ने रोते हुए जमीन में नजर गड़ाए हुए कहा, `मालिक, आपकी जगह कोई दूसरा होता, तो हमें बहुत पीटता, लेकिन आपने कभी कुछ नहीं कहा और आप हमारे बारे में इतना सोच रहे हैं। हम लोग कैसा सोचते थे और आप कैसा सोचते हैं? वाह रे मालिक, जाति तो जाति ही होती है न? बड़ा तो बड़ा ही होता है। आपको जान गए, किरिया (कसम) खाते हैं, आगे से हमेशा आपका भला सोंचेंगे। मेरा दोषी भाई भी आपको अजीज है, उसके लिए इतना दे रहे हैं? धन्य है।´ बाबूजी ने कहा, `चुप रहो । नीच-ऊंच मत करो। गलती तुम्हारे या तुम्हारे भाई की नहीं थी। दरअसल भूख और गरीबी अच्छे-अच्छों का विवेक हर लेती है। विवेक न हो, तो आदमी गलतियां करता चला जाता है। तुम लोगों के साथ भी ऐसा ही होता है।´
उसी क्षण जवाहिर की दुनिया बदल गई। उसकी दुनिया हमारे घर के लिए स्वार्थ से परे बस रही थी। जवाहिर आज भी है, हमारी सेवा के लिए समर्पित, अपनों से भी ज्यादा अपनों की तरह। सहज सम्मानित। मोहन भाई चले गए, काश, वे भी जवाहिर की तरह सम्मान से जी पाते, तो कितना अच्छा होता। क्रमश: