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Tuesday, 17 January 2017

बिरादरी का बोलबाला


ज्ञानेश उपाध्याय

आपकी जाति क्या है? जाति बता दिया, तो बताइए कि बिरादरी या उपजाति क्या है? जोधपुर शहर में आपकी बिरादरी की जानकारी हालिया माहौल में बहुत जरूरी है। मान लीजिए, आप ‘ए’ बिरादरी के हैं और ‘बी’ और ‘सी’ के लोग पकडक़र आपको बुरी तरह पीट रहे हैं, तो आप कृपया अपनी ‘ए’ बिरादरी के लोगों को ही मदद के लिए पुकारिए।  न बुलाया, पिट गए, पुलिस में शिकायत हो गई। पुलिस सक्रिय हुई, तो ‘बी’ और ‘सी’ के लोग अपनी बिरादरी के आरोपियों के बचाव में लग जाएंगे। कुछ इंतजार कीजिए, हम पुलिस में भी खूब जाति देखेंगे। ‘बी’ गिरफ्तार होगा, तो ‘बी’ बिरादरी वाले चाहेंगे कि गिरफ्तारकर्ता पुलिस वाला भी ‘बी’ हो, मुकदमा लडऩे वाला वकील भी ‘बी’ हो और न्याय के मंदिर में भी कोई ‘बी’ मिल जाए, तो सोने पर सुहागा हो जाए?
शहर के आयोजनों, सभाओं, विवाहों, प्रदर्शनों, रैलियों पर गौर कीजिएगा, लग जाएगा कि हमें बिरादरी में जीने की आदत पड़ रही है। ऐसा लगेगा कि हम देश में नहीं, बिरादरी में सांस ले रहे हैं। हम बिरादरी देखकर प्रतिभाओं के साथ-साथ अपराधियों का भी सम्मान करने लगे हैं। शिक्षक भर्ती घोटाले में गिरफ्तार महानुभावों और भय से छिपे लाभार्थियों का जाति-बिरादरीगत विश्लेषण पेश कर दिया गया है और इस आधार पर यह भी बता दिया गया है कि जोधपुर में सरकार किस-किस जाति का शोषण कर रही है। लेकिन यह कोई नहीं देख रहा कि कथित शोषक किस जाति-बिरादरी के हैं। मुख्यमंत्री से लेकर हवालात में ताले लगाने वाले पुलिसकर्मी तक की जाति-बिरादरी की सूची अगर बनाई जाए, तो साफ हो जाएगा कि जाति-बिरादरी का हल्ला बेमतलब है। 
जिस देश में वसुधैव कुटुंबकम का उद्घोष हुआ था, उसी देश में अपनी संकीर्ण बिरादरी को समाज मानते हुए जयकारे लग रहे हैं। जब देश को लूटा और तोड़ा जा रहा था, तब महान संत रामानंद ने सबको जोडऩे के लिए नारा दिया था, जात-पात पूछे नहीं कोई...हरि को भजे से हरि का होई। लेकिन आज सबसे पहले आपसे जाति-बिरादरी पूछी जाती है और देस-देश बाद में आते हैं। चिंतन की संकीर्ण शैली का एक उदाहरण देखिए कि भगवान परशुराम अब केवल ब्राह्मणों के बैनर पर नजर आते हैं, क्या मजाल कि कोई दूसरी जाति-बिरादरी परशुराम के चित्र का इस्तेमाल कर ले।  हालात ऐसे हैं कि तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की टिप्पणी याद आ रही है। चर्चिल ने भारत को आजाद करते हुए यह भाव प्रकट किया था कि ये इंडियन आपस में लड़ेंगे और इनका देश टूट जाएगा। बेशक, हम भारतीय जन चर्चिल का सपना कभी पूरा नहीं होने देंगे, लेकिन हम यह तो जरूर सोचें कि हम अपनी संगठन शक्ति कहां लगा रहे हैं। किसको संगठित होना चाहिए और कौन संगठित हो रहा है? ये कुछ लोगों के निहित स्वार्थ साधक संगठन किसके काम आएंगे? किस बिरादरी में गरीब या गैरबराबरी नहीं है? बिरादरी की संगठन शक्ति अगर पूरी तरह से बिरादरी में समानता-संपन्नता लाने में लग जाए, अगर बिरादरी के अपराधियों को सुधारने में लग जाए, अगर बिरादरी के भ्रष्ट अफसरों-उद्यमियों को ईमानदार बनाने में लग जाए, तो कोई गलत बात नहीं, लेकिन कहां लग रही है? बिरादरी की कोरी अपणायत हमें कहां ले जाएगी, यह जरूर देखिए और सोचिए। 

published in rajasthan patrika- jodhpur edition

Tuesday, 9 September 2008

याद हंसाती है

जाति के जर्रे : छह

छहभूख और गरीबी के बावजूद 75 साल लांघ चुके जवाहिर राम जिंदा हैं, सफेद मूंछ, सफेद बाल और कुटिल मुस्कान बिखेरता चेहरा। उन्हें गांव भर के बूढ़ों से मजाक करने का हक हासिल है। न केवल अपने हमउम्र बूढ़ों, बल्कि अपने से भी वरिष्ठ बूढ़ों को भी जवाहिर छेड़ देते हैं और गांव में बूढ़े भी ऐसे-ऐसे हैं कि पलट कर जवाब ऐसा देते हैं कि जवाहिर की आत्मा चिढ़कर मस्त हो जाती है। सुनने वाले भी मस्त हो जाते हैं। अक्सर मनोरंजन के लिए ही जवाहिर चुहलबाजियां किया करते हैं, इससे बोझिल माहौल भी हल्का हो जाता है। गांव से लगभग 1200 किलोमीटर दूर मुझे जब कुछ मजाक वाले वृतांत याद आते हैं, तो मन खिल जाता है।

हमारे यहां जब कोई यज्ञ या उत्सव होता है, तो कटहल की सब्जी भी बनती है। एक साथ करीब दस-बारह बड़े-बड़े कटहल छीलने का काम होता है। हलवाई हाथ खड़े कर देते थे, तो पाड़े लोहार को बुलाना पड़ता। पाड़े लोहार जब आते, तो आधा घंटे में दस-बारह कटहल छीलकर रख देते। शरीर से भारीभरकम पाडे़ लोहार जब लकड़ी छीलने वाले औजार से कटहल छील रहे होते, तो जवाहिर छेड़ते, `क्या लोहार मास्टर, घास छील रहे हो?´ जवाब मिलता, `आओ, तुम भी छीलवा लो।´

`लोहार से हजाम कब बन गए?´

यह सुनकर पाड़े लोहार दांत पीसते, गालियां देते। गुस्से में हांफने लगते। जोर का ठहाका लगता। हलवाई भी काम छोड़कर कान इधर ही लगा देते। जवाहिर की चुहलबाजी आगे बढ़ती, `खिसिया मत, नाई-हजाम नहीं बनना है, तो हलवाई बन जाओ? कटहल अच्छा छील रहे हो।´

पाडे़ जी के कुछ बोलने से पहले रामप्रवेश हलवाई बोल पड़ता, `सेना में कटहल छीलने वालों की नौकरी निकली है, पाड़े बाबा, बहाल हो जाइए।´

`ससुर के नाती, जाओ अपनी सास को बहाल करवाओ। कमीन...सेना में कटहल छीलने की नौकरी दोगे, हमको बोका समझे हो।´लोगों की जोरदार हंसी के बीच पाड़े लोहार कुछ देर बुदबुदाते। तभी वहां से हमारे बाबूजी गुजरते और सभी अपने-अपने काम में लग जाते। पाड़े लोहार निश्चिंत कटहल छीलने लगते।

बाद में जब वे बूढे़ हो गए, तो बहुत धीरे-धीरे चलकर हमारे घर तक आते थे और धीरे-धीरे कटहल छीलते थे। जवाहिर अपनी आदत से बाज नहीं आते और छेड़ देते, `पाड़े जी, कल तक तो छील ही लोगे।´

जवाब मिलता, `भूख लगी है, तो कच्चे खा लो।´

`कच्चे कटहल खाने की तुम्हारी आदत गई नहीं है?´

`तुम्हारी ही मां से सीखा था।´

`छूछे कटहल लेकर क्यों बैठो हो, नमक-मिर्च मंगवा दें।´

जवाहिर के शब्द वाण से पाड़े लोहार एकदम कुपित हो जाते, बुढ़ापे को झाड़ने की कोशिश करते हुए फुफकराते, `मंगवा ले, मंगवा ले, तुझमें लगाने के काम आएगी।´दोनों की चुहलबाजी सुनकर सभी मस्त हो जाते। काम का तनाव झटके में दूर हो जाता। पहली बार कोई सुने तो यही मानेगा कि जवाहिर और पाड़े लोहार में नहीं पटती है, लेकिन बता दें, दोनों में खूब अपनापा है। कटहल छीलने के बाद पाड़े लोहार पसीना पोछते हुए जवाहिर को बड़े अधिकार भाव से बोलते, `थोड़ी खैनी खिलाओ।´जवाहिर मुस्कराने लगते, `भूखे हो, अच्छा बैठो। खिलाता हूं।´ जवाहिर खोजते हुए हमारे पिताजी के पास पहुंचते और बोलते, `ऐ महाराज, जरा चुनौटी दीजिए न।´

हमारे पिताजी खैनी खाते हैं और जब घर में कोई पर्व-त्योहार हो, तो खूब सारी खैनी रखते भी हैं। गांव में खैनी का शौक फरमाने वालों की संख्या कम नहीं है। हम भाइयों को आज भी कोई नशा नहीं है, लेकिन पिताजी और खैनी का साथ पुराना है। तो जवाहिर के मांगने पर पिताजी चुनौटी थमाते। जवाहिर थोड़ी-सी खैनी और चूना लेकर, ताल पीटने लगते। कथित चमार जाति के एक व्यक्ति की हथेली पर पिटी और मसली गई खैनी के तीन भाग हो जाते, एक चुटकी ब्रह्मण पिता के मुंह में, तो एक पाड़े लोहार और आखिरी चुटकी जवाहिर के मुंह में। खैनी के साथ दोनों में घरेलू बातें होती थीं और शाम को भोज पर मिलने का वादा।

Tuesday, 29 July 2008

जाति के जर्रे : पांच

--विवेक हर लेती है गरीबी--
तो जवाहिर राम की आंखों में आंसू छलकने को बेताब थे। वह हमेशा की तरह बाबूजी से आंखें चुरा रहा था। घुटनों तक धोती, घनी मूंछें, छरहरा बदन। सिमट कर घुटनों पर हाथ और हाथ पर मुंह टिकाए बैठा था। बाबूजी सामने खाट पर थे, पूछा, `काहे मुंह लटकाए हो?´ `मोहन भाई दुनिया छोड़ गइलन।´बाबूजी घर के सामने पड़ने वाले नारा वाले खेतों के उस पार स्थित घनी बंसवारी को देखने लगे। मोहन भाई की यादों में उनकी नजरें ठहर गईं। एक साथ कई स्वर, कई घटनाएं, कई संवाद उभर आए। जवाहिर की आंखें बह चली थीं और बाबूजी याद कर रहे थे।

--- मोहन भाई बैलों को हल के लिए तैयार कर रहे हैं। बाबूजी भी खेत जाने के लिए तैयार हैं, `मोहन, आज चंवरा वाला खेत जुत जाना है। बारिश कभी भी शुरू हो जाएगी।´मोहन जोर की आवाज लगाता है, `जी मालिक।´और बैल चंवर की ओर बढ़ चलते हैं, उन्हें रास्ता पता है, बस खोलने और हल की रस्सी गले में बंधने की देर होती है। वे जान जाते हैं आज काम पर जाना है और मोहन भाई के कंठ से जब `चल, चलके´ आवाज निकलती है, तो बैलों का जोड़ा अपने गले में बंधी घंटियां बजाता चल पड़ता है।

हमारे चंवर वाले खेत घर से करीब चार किलोमीटर दूर पड़ते हैं। चंवर राजपूतों के गांव माने में पड़ता है। उसके पहले बिरती वाले खेत पड़ते हैं, जो नौतन गांव के तहत आते हैं और उसके पहले नहर के पास वाले और उसके बाद नौतन बाज़ार और नारा वाले खेतों की बारी आती है। घर के आसपास भी पर्याप्त जमीन है।जहां तक मेरी बात है, गांव में हमारी कितनी जमीन है, यह आज भी मैं नहीं जानता। कहां-कहां खेत हैं, यह भी मैं नहीं जानता। बस एक अंदाजा है, जिन-जिन खेतों में बचपन में गए हुए हैं, उन खेतों की याद है। विशेष रूप से जिन खेतों में हेंगाई के समय बास की पट्टी पर मोहन भाई ने बैठाया था, वे खेत अच्छी तरह याद हैं। खेत की जुताई यानी खोदाई के बाद हेंगी से खेत को समतल किया जाता है। बैलों के जोड़े के पीछे हल की जगह बांसों को जोड़कर बनाई गई पट्टी बांधी जाती है और बैलों का हांकने वाला हरवाह उस बांस की पट्टी पर चढ़ जाता है, बच्चे भी रस्सी पकड़कर मजे से हेंगी पर बैठ जाते हैं। हेंगी का कुछ भार हो जाता है, बैल चल पड़ते हैं और उबड़-खाबड़ जुते हुए खेत समतल होने लगते हैं। बचपन में हम चारों भाइयों को हेंगी पर बैठने में बड़ा मजा आता था। इतना मजा आता था कि पास वाले खेत में ही दो भाई बैल की भूमिका में होते, तो दो भाई पीढे़ से बनी हेंगी पर बैठकर आनंद लेते। सबसे बड़े भाई दिलीप उपाध्याय हम चार छोटे भाइयों को खेत में खेलते देख गदगद रहते थे और उससे भी ज्यादा गदगद बाबूजी होते थे कि शहरी बच्चे खेत में खेलकर मजबूत हो रहे हैं।

खैर, बाबूजी और मोहन भाई चंवर पहुंचते हैं। वहां पहुंचकर मोहन को खूब जोर की भूख लगती है। वह बाबूजी से बोलता है, ` पेट खाली है, घर जाएंगे, तो खाना भिजवा दीजिएगा।´ बाबूजी खेत बताकर वापस चले आते हैं। उन्हें स्कूल भी जाना है। घर आते हैं, खाना बांधने का आदेश देते हैं। नहा-धोकर स्कूल जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। स्कूल जाने से पहले मोहन भाई के पास खाना भी पहुंचाना है। बुआ पोटली बांध लाती हैं, पोटली में दस रोटियों के बराबर चार मोटी रोटियां हैं और बैंगन की सब्जी, मिर्च, नमक, प्याज। बाबूजी फिर चंवर के लिए चल पड़ते हैं। नारा वाले खेतों को पार करते हैं, नहर के पास वाले खेतों के करीब पहुंचते हैं, तो देखते हैं। अपने ही एक बिरादर उपाध्याय के खेत में मोहन की पत्नी अपने एक पुत्र के साथ काम में लगी है। बाबूजी सोचते हैं, मोहन को खाना देने चंवर तक जाऊंगा, तो स्कूल के लिए देर हो जाएगी, क्यों न मोहन की पत्नी को ही खाना पहुंचाने की जिम्मेदारी दे दूं, यह बेटे को भेजकर खाना पहुंचा देगी। बाबूजी ने ऐसा ही किया, मोहन की पत्नी ने बड़ी ललचाई निगाह से पोटली अपने पास रख ली और आश्वस्त कर दिया कि पोटली मोहन तक पहुंच जाएगी। बाबूजी स्कूल चले गए। दिन भर खूब कड़ी धूप रही थी, पसीने से परेशान जब बाबूजी शाम को स्कूल से घर पहुंचे, तो आश्वस्त थे कि चंवर वाला बड़ा खेत जुत गया होगा, बारिश कभी भी शुरू होने वाली है। मोहन की मेहनत से काम समय से हो गया। तभी बाबूजी के लिए पानी लेकर आई बुआ बताती है, `मोहन तो न जाने क्यों सुबह दस बजे ही बैल दरवाजे पर बांध गया।´ बाबूजी चौंक पड़े। पानी पीना थम गया। यानी चंवर वाले खेत नहीं जुत सके। यह तो बदमाशी है। खाना भी भिजवाया, तब भी मोहन ने दस बजे ही लाकर बैल दरवाजे पर बांध दिए और अपने घर लौट गया। आखिर क्या बात हुई? बाबूजी यही सोचते हुए फिर झटपट तैयार हुए और मोहन के टोले की ओर चले पड़े, जो कि करीब डेढ़ किलोमीटर दूर पड़ता था। मोहन घर के सामने ही खाट पर चित पड़ा था। बाबूजी को आता देखकर उठ बैठा। बाबूजी ने दूर से ही पूछा, `मोहन, खेत क्यों नहीं जुता? एकदम नाजायज बात है।´मोहन ने रोष के साथ कहा, `खाना नहीं भिजवाए, तो भूखे पेट हल कैसे चलाता?´ बाबूजी दंग रह गए। मामला समझ में आ गया। बोले, `अपनी मेहरारू से पूछो? क्या मैंने उसे खाना तुम्हारे पास पहुंचाने के लिए नहीं दिया था?´मेहरारू सब सुन रही थी, झोंपड़ी के अंदर ही कसमसा रही थी। मोहन ने आवाज देकर उसे बाहर बुलाया, वह बेवक्त बुलाने का बहाना करती मोहन पर नाराज होती हुई बेमन से बाहर आई। मोहन के एक बार पूछने पर उसने कोई जवाब नहीं दिया, जब मोहन ने डपट कर पूछा, तब उसने आंचल में मुंह छिपाए हुए कहा, `बड़ी भूख लगी थी, हम मां-बेटे ही खा गए, तुम्हारे लिए बचा नहीं।´बाबूजी आगबबूला हुए, `काम दूसरे के खेत में किया और खाना हमारे यहां का खा गई। मेरा खेत यों ही पड़ा रह गया, मेरे बैल गए और घूमकर आ गए, बताओ यह भी कोई बात हुई? सरासर नाजायज? बताओ, मैंने क्या गलत किया?´मोहन भी शर्मिंदा हुआ, बीवी को पीटने को तैयार हो गया, लेकिन वह चुपचाप वहां से खिसक गई। बाबूजी बहुत दुखी मन से घर लौट आए। मोहन एकाध दिन शर्म के कारण नजर नहीं आया। बताते हैं, उसकी बीवी बड़ी चंट थी, शायद अभी भी जिंदा है। उसे बड़ी भूख लगती थी। वह किसी के भी खेत में नजर चुराकर घुस जाया करती थी, सब्जियां कच्ची ही भकोस लिया करती थी। उसे लाज-लेहाज जरा न था। मोहन भी बेचारा क्या करता? समझा- बुझाकर हार चुका था।


बहरहाल, बाबूजी यादों में खोए थे। जवाहिर ने लंबी चुप्पी तोड़ते हुए बताया, `घर में एक भी दाना नहीं है, भाई का श्राद्ध न जाने कैसे होगा?´बाबूजी मानों यादों से जागे, हरकत में आए, `चिंता मत करो, श्राद्ध ढंग से होगा। जाओ घर से मलकिनी से बोलो, बीस किलो आटा, बीस किलो चावल ले लो, कुछ रुपये भी मैं दिए देता हूं। श्राद्ध ठीक से करो। मोहन अपने ही घर का आदमी था। बहुत किया उसने।´ जवाहिर फूट-फूटकर रोने लगा, तो कुछ बच्चे भी वहां जुट गए। बाबूजी ने पूछा, `रोओ मत, बहुत काम है, जाकर निपटाओ।´जवाहिर ने रोते हुए ही कहा, `मालिक, मोहन पर इतनी दया? आप नहीं जानते, हम लोग आपको कितना नुकसान पहुंचाए हैं। खेतों पर हमने क्या-क्या किया है, यह अगर आप जान जाएंगे, तो आपको बहुत दुख होगा। हम लोग दया के लायक नहीं हैं, मालिक।´ बाबूजी बोले, `मैं जानता हूं, याद मत करो, ये सब बेकार बात है।´जवाहिर ने रोते हुए जमीन में नजर गड़ाए हुए कहा, `मालिक, आपकी जगह कोई दूसरा होता, तो हमें बहुत पीटता, लेकिन आपने कभी कुछ नहीं कहा और आप हमारे बारे में इतना सोच रहे हैं। हम लोग कैसा सोचते थे और आप कैसा सोचते हैं? वाह रे मालिक, जाति तो जाति ही होती है न? बड़ा तो बड़ा ही होता है। आपको जान गए, किरिया (कसम) खाते हैं, आगे से हमेशा आपका भला सोंचेंगे। मेरा दोषी भाई भी आपको अजीज है, उसके लिए इतना दे रहे हैं? धन्य है।´ बाबूजी ने कहा, `चुप रहो । नीच-ऊंच मत करो। गलती तुम्हारे या तुम्हारे भाई की नहीं थी। दरअसल भूख और गरीबी अच्छे-अच्छों का विवेक हर लेती है। विवेक न हो, तो आदमी गलतियां करता चला जाता है। तुम लोगों के साथ भी ऐसा ही होता है।´

उसी क्षण जवाहिर की दुनिया बदल गई। उसकी दुनिया हमारे घर के लिए स्वार्थ से परे बस रही थी। जवाहिर आज भी है, हमारी सेवा के लिए समर्पित, अपनों से भी ज्यादा अपनों की तरह। सहज सम्मानित। मोहन भाई चले गए, काश, वे भी जवाहिर की तरह सम्मान से जी पाते, तो कितना अच्छा होता। क्रमश:

Tuesday, 15 July 2008

जाति के जर्रे : 4

--मोहन भाई--
मुझे लगा, इस कथा का एक शीर्षक रख लेते हैं, ताकि सुविधा हो जाए। मोहन भाई हमारे गांव से करीब दो किलोमीटर उत्तर की ओर नौतन बाजार गांव के एक अलग टोले में रहते थे। उनकी टोली अपनी जाति की वजह से गांव से बाहर एक कोने में बसाई गई थी। जहां मोहन भाई के पूर्वज बसाए गए थे, वहां एक जंगल हुआ करता था, जिसे लाला गाछी कहते थे। वहां दिन में भी अंधेरा रहता था, किसी जमाने में बाघ भी रहा करते थे। आजादी के बाद उस जंगल की कटनी शुरू हुई और आज उस जंगल का एक भी पेड़ नहीं बचा है । हम बचपन में जब एकमा रेलवे स्टेशन पर उतरकर टमटम से गांव जाया करते थे, तब भी लाला गाछी में कुछ पेड़ हुआ करते थे, बड़े-बड़े खूब घने, सड़कों पर छाए हुए, कुछ भय लगता था और एक खुशी भी कि लाला गाछी खत्म हुई, अब हमारा आम का बगीचा नजर आने लगेगा। मुझे याद पड़ता है, लाला गाछी के कुछ पेड़ों के आम मैंने चखे थे, खैर, वह जंगल या गाछी अब इतिहास है।
तो बात हो रही थी मोहन भाई की, जो उस जाति के थे, जिसके नाम के बाद का हिस्सा `मार´ है। याद है, लंबे कद के थे, चेहरे पर घनी मूंछें, सांवला रंग, हंसमुख चेहरा, तेज आवाज, मजबूत चुस्त बदन, बड़ी मीठी भोजपुरी बोलते थे। जब वे खेत जोतते थे और बैलों को आवाज देते थे, आव-आव-आव, चल जवान, तब हम देखते रह जाते थे। मोहन भाई हमें बहुत मानते थे। मेरे से बड़े वाले भाई साहब मालू अर्थात लोकेश उपाध्याय उन दिनों थोड़े शैतान हुआ करते थे, मोहन भाई को परेशान किया करते थे, तो मोहन भाई ने उनका नाम झंझट उपाध्याय रख दिया था। वे `उपाध्याय´ को `पधिया´ बोलते थे। जब हम अपने दूर स्थित खेतों से लौटते हुए थक जाते थे, छोटे-छोटे शहरी पांव जब दुखने लगते थे, कटे हुए खेतों से जब घिर जाते थे, तब मोहन भाई हमें कंधे पर बैठा लेते थे। मैं आज भी पसीने से तर-बतर मोहन भाई के ठंडे कंधे को महसूस कर सकता हूं। हमने जाति का भेद तब नहीं जाना था , हमें जाति के भेद के बारे में किसी बुजुर्ग ने बताया भी नहीं था। मुझे मोहन भाई का कंधा इतना सुरक्षित और मजबूत लगता था कि मुझे दुख होता था, यह कंधा शाम होते ही कहीं चला क्यों जाता है, हमारे घर क्यों नहीं रहता।
तब हम चारों भाई छोटे थे, शहर से गरमियों में गांव जाते थे। गांव में हमारे पांचवें बड़े भइया दिलीप उपाध्याय होते थे, पोस्ट ऑफिस में कार्यरत, आज भी नौकरी में हैं। उनके पिताजी यानी बड़े पिताजी, जिन्हें हम भी बड़े भैया की तरह की बाबूजी कहा करते हैं, अपने गांव के दक्षिण में स्थित बरेजा गांव के हाईस्कूल में भूगोल और इतिहास पढ़ाते थे। बाबूजी अर्थात शिवजी उपाध्याय अभी भी हैं, ढेर सारी शानदार पुरानी यादों से लबालब । 1986 में ही रिटायर हो चुके हैं। हार्ट के मरीज हैं। पेंशन मिलती है। समाजसेवा करते हैं। गांव के गिने-चुने अच्छे लोगों में गिने जाते हैं, लेकिन यह बात अलग है कि गांव में मनमानी करने वाले बहुसंख्य लोगों को अच्छे लोगों की कोई जरूरत नहीं रही । अच्छे लोगों की जरूरत केवल गरीबों को है, जिनके छोटे-छोटे बच्चों को बीमार पड़ने पर भी दो बूंद दूध नसीब नहीं होता, ऐसे ही लोगों के काम आते हैं बाबूजी।
खैर, 1991 की सर्दियों का समय था। दसियों दिन बाद धूप थोड़ी पसर आई थी। सुबह का समय था, मोहन भाई के छोटे भाई जवाहिर मुंह लटकाए बाबूजी के पास पहुंचे। बहुत दुखी थे, मानो कोई बड़ा आघात लगा हो। ...क्रमश:

Wednesday, 9 July 2008

जाति के जर्रे - 3

मुझे खुशी है, मेरे गांव में जातिवाद का शिकंजा उस तरह से कड़ा नहीं है, जैसा कि हरियाणा या पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में रहा है । पिछड़ी जातियों में भी कुछ लोगों ने खूब नाम कमाया है, जैसा भोजपुरी के शेक्सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर भी हमारे ही जिले के थे। वे जाति के नाई थे, उन्हें शुरुआती दिनों में अपमान भी खूब झेलना पड़ा, लेकिन अपने ज्ञान के दम पर उन्होंने पर्याप्त सम्मान अर्जित किया। भिखारी ठाकुर पर मेरे एक प्रिय लेखक संजीव सूत्रधार नाम से बेहतरीन उपन्यास लिख चुके हैं। भिखारी ठाकुर के जरिये बिहारी संस्कृति की श्रेष्ठता का साक्षात्कार हम करते हैं। बिहार में जाति व्यवस्था को जानने में भी सूत्रधार के जरिये काफी मदद मिलती है। बिहार की भूमि ने कला का सदैव सम्मान किया है, यह बात मैं अपने उत्तरी बिहार के बारे में दावे के साथ कह सकता हूं, क्योंकि इस इलाके को मैंने देखा है। नाच जैसी मुश्किल नाट्य शैली इसी क्षेत्र की देन है, जिसे भिखारी ठाकुर ने चरम सम्मान पर पहुंचाया था। नाच बड़े लोगों और पंडितों के बीच भी लोकप्रिय हुआ था, भिखारी ठाकुर पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन बहुत विद्वान थे, उन्हें धर्म के बारे में भी कई ब्राहमणों से ज्यादा ज्ञान था। तो भिखारी ठाकुर के ज्ञान के सामने मत्था टेकने वालों की संख्या कम नहीं थी। कहने का मतलब यह कि कला और ज्ञान के आगे जाति की दीवार को ढहते देर नहीं लगती।

बहरहाल, कला एक राह थी, जिसके माध्यम से दलितों को पर्याप्त सम्मान नसीब हुआ। कोई शक नहीं पिछडों मे जब कोई उभरता है तो उसका फायदा सबको मिलता है । उनके लिए पढ़ने के अवसर तो बाद में बने, क्योंकि शिक्षा सुविधाओं का विस्तार बहुत बाद में हुआ। कुछ दलितों का शोषण मेरे गांव में अवश्य हुआ होगा, लेकिन अगर कोई ब्रह्मण शोषण करता होगा, तो दूसरा ब्रह्मण उसका विरोध भी करता होगा। आज एक बड़ी बात यह है कि दलितों और पिछड़ों के पास अपने नेता हैं, उनका शोषण अकल्पनीय है। राजनीतिक जागरुकता ने पिछड़ों के लिए सुरक्षा कवच का निर्माण कर रखा है। राजनीतिक जागरुकता के कारण उनमें एकता आई है, वे किसी न किसी दबंग खेमे के साथ जा जुड़े हैं और ऐसा जरूरी भी है, क्योंकि अकेले रहने में शोषण की ज्यादा गुंजाइश रहती है। पिछड़े मजदूरों के एकजुट रहने की वजह से हमारे गांव में किसी से बेगार करवाने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। तो मैं देखता हूं, दलित-पिछडे़ जहां भी जागरूक और एकजुट हुए हैं, वहां उन्होंने शोषण की स्थितियों से पीछा छुड़ा लिया है। भिखारी ठाकुर भी अपनी स्थितियों से तभी ऊपर उठ पाए, जब उन्होंने अपना एक समृद्ध समुदाय बनाया, कलाकारों की एक मजबूत टोली बनाई।
क्रमश:

Tuesday, 1 July 2008

जाति के जर्रे - २


मेरा गांव यानी शीतलपुर बाजार एकमा रेलवे स्टेशन (सिवान और छपरा के बीच) से करीब चार किलोमीटर दूर पड़ता है, यहां दलितों में पर्याप्त जागृति आई है। जिन परिवारों में अक्षर का प्रवेश हुआ है, उन्होंने तरक्की की है और सुखी हैं, उन्हें कोई नहीं छेड़ता, लेकिन जिन परिवारों ने पढ़ाई का मोल नहीं समझा, उनकी हालत खराब है। मेरे गांव में एक अच्छी बात यह है कि पीडि़त जातियों को पढ़ाई से रोकने का दुस्साहस किसी में नहीं है। गांव के स्कूल में मास्टर भी हर जाति वर्ग से आते हैं, अत: वहां भेदभाव की गुंजाइश न के बराबर है। बिहार गरीबी के लिए बदनाम है, लेकिन जितने भी दिन मुझे गांव में रहने का मौका मिलता है, भयानक किस्म की गरीबी नजर नहीं आती। अभाव जरूर है, लेकिन भूख से किसी की मौत मैंने नहीं सुनी। हालांकि हमारे यहां जब जनेऊ, शादी जैसे अवसर आते हैं, तब मैंने ध्यान दिया है, ढेर सारे गरीब भी अंधेरे में आकर बैठ जाते हैं। बचपन में मुझे आश्चर्य होता था, इतने सारे गरीब कहां से आ जाते हैं, मैं बाबूजी (बड़े पिताजी) से पूछता था, जवाब मिलता था, `ये आसपास के गांव से भी आते हैं। अपने लिए और परिवार के लिए खाना ले जायेंगे ´। जवानों को तो नहीं, लेकिन गरीब बुजुर्गों और बच्चों को मैंने भोजन की प्रत्याशा में बैठे देखा है। हालांकि जूठन की प्रत्याशा में कोई नहीं होता, उन्हें ताजा भोजन ही मिलता है। मुझे ऐसा लगता है, बड़ जातियों को सम्मानजनक रूप से भोजन करते देखने और जल्दी से जल्दी भोजन प्राप्त करने के लिए जमीन पर बैठे उत्सुक लोग जाति से कम और गरीबी से ज्यादा मजबूर होते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि ब्राह्मण व अन्य सवर्णों में जो गरीब होते हैं, वे भी सम्मानजनक रूप से भोजन करते हैं और उनमें श्रेष्ठता का गुरूर कुछ ज्यादा ही होता है। गरीब सवर्ण बहुत मुस्तैदी से अपनी जाति का अहसास कराता है। उसे लगता है, गरीबी के बावजूद जाति ही है, जो उसके श्रेष्ठता बोध को बचाती है और गरीब दलितों से ऊपर रखती है। नए दौर में जाति अमीरों की जरूरत नहीं रही, लेकिन यह सवर्ण गरीबों की जरूरत है।

क्रमश :