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Monday, 6 November 2017

पाण्डेय कपिल के इयाद में - खोल द दुआर भोर हो गइल

पाण्डेय कपिल - भोजपुरी के स्तंभ
श्रद्धांजलि  
मेरे गांव का एक हीरा दो नवंबर(२०१७) को संसार से हमेशा के लिए चला गया। भोजपुरी का ऐसा कौन पढऩे-लिखने वाला होगा, जो पाण्डेय कपिल को न जानता हो। वे आधुनिक दौर में भोजपुरी के स्तंभ थे, जहां तक सांसें चलीं, भोजपुरी का झंडा लिए चले। उनकी एक प्रसिद्ध भोजपुरी रचना है ‘फुलसुंघी’, एक ऐसी रचना, जो आपको भोजपुरी संसार में बहुत मन-मनुहार से स्नेह का आंचल बिछाकर बिठा लेती है। 
पाण्डेय कपिल की पंक्तियां यहां मैं प्रसंगवश पेश कर रहा हूं -
बीत गइल कब के शरद, कब के शिशिर-हेमंत।
जाने कब एह बाग में अइहें बहुरि बसंत।
वाकई वे लौटकर नहीं आएंगे, लेकिन अपने पीछे जो वो छोड़ गए हैं, उसे हमेशा याद किया जाएगा। मुझे लगता है, भोजपुरी के एक स्तंभ को यदि भोजपुरी में ही याद किया जाए, तो ज्यादा बेहतर होगा। 
(हमार त जनमे बाहर भइल रहे, त हम कबहू गांवें जमके न रह पवनीं, पहले ओडिय़ा लोग का बीचे, फेरु मध्य-प्रदेश, दिल्ली, राजस्थानी आउर एने छत्तीसगढिय़ा लोग के बीचे रहत बानीं। लेकिन जब लइकाईं में गर्मी के छुटियन में गांव जाईं, तो माटी में खूब लोटाईं। गांव के माटी के मजा ही कुछ आउर होला। खैर, हमार छुटियन के कहानी फेर कबहू सुनाइब।)
पाण्डेय कपिल के हम दू हाली देखले बानी। ऊंहां के बड़ आदमी रहनीं। उंहां के लिखत हम पढ़त रहनीं, बहुते नीमन लागत रहे कि भोजपुरियो में साफ-सुघड़ रचना होता, आउर सबसे बड़ बात ई कि हमरे गांव के लिखनीहार एतना नीमन लीख तानीं। सोच ही के सीना चउड़ा हो जात रहे।   
पाण्डेय कपिल के ज्यादा समय पटने में बीतल। ऊंहां के कायथ रहनीं, माने लालाजी। एक समय उनकर-हमार गांव शीतलपुर बाजार में लाला लोग के बड़ा चलती रहे। अलगे शान रहे, गांव में रौनक रहे। बडक़ा-पुरनिया बतावेला, एगो ऊहो दौर रहे जब शीतलपुर बाजार में 13 गो वकील रहे लोग आउर ओमे १२ गो लाला जी हिन्दी मंदिर नाम से शीतलपुर में एक बड़ पुस्तकालय रहे, हर तरह के किताब ओमे मिल जाओ। न जाने केतना लोग इहां पुस्तक पढिक़े बडक़ा साहब हो गइल। हमरा पापा और बडक़ा पापा लोग भी ऐजा से किताब लेके पढ़ले बा लोग। ई हिन्दी मंदिर पुस्तकालय पाण्डेय कपिल के परिवार के ही धरोहर रहे। पाण्डेय कपिल के बाबूजी पाण्डेय जगन्नाथ प्रसाद सिंह भोजपुरी-हिन्दी में लिखत रहनीं। एगो उपन्यास भोजपुरी में भी लिखले रहनीं, जेमे शीतलपुर के ही जगे-जगे जिकिर बा। पाण्डेय कपिल के दादा द्विवेदी युग के लेखक रहनीं दामोदर सहाय सिंह कविकिंकर, परदादा शिवशंकर सहाय संगीतज्ञ व मुख्तार रहनीं। पाण्डेय कपिल परिवार के परंपरा बड़ा संपन्न रहे। 
भोजपुरी के एगो कालजयी रचना

पाण्डेय कपिल के उपन्यास फुलसुंघी बड़ा तहलका मचवलख। ई कितबवा 1977 के बाद से भोजपुरी के एगो कालजयी रचना हवे। जे अंगरेज साहब रिविलगंज बसवलन सर रिविल, ढेला बाई, मीना बाई, बाबू हलिवंत सहाय, पंडित रामनारायण मिसिर, ख्यात गीतकार-गायक महेन्दर मिसिर. . . फुलसुंघी के एक-एक पात्र जोरदार बा। गोदना सेमरिया, रिविलगंज, सरयू, मांझी, छपरा, शीतलपुर के पाण्डेय कपिल अपना लेखनी से जिया देले बाडऩ। ओह समय के राजनीति, ओह समय के शासन, ओह समय के रस-रंग-गंध भाव फुलसुंघी में बेजोड़े जीयता। 
पाण्डेय कपिल ८७ बरिस के हो गइल रहनीं। राजभाषा विभाग में नौकरी कके रिटायर रहनीं। एक दिन खटिया पर से गिर गइनीं, चोट लागल, जांघ के हड्डी टूटल, ऑपरेशन भइल, देहिया में सुधारो भइल लेकिन अचानक से चली गइनीं। बाद के दिनन में उनकर इयाद के ताकत भी कमजोरे पड़ गइल रहे। कभी इयाद लउटे, त कभी सब भोर पर जाओ। ऊंहां के पीछे दू बेटिये रह गइल बा लोग। 
पाण्डेय कपिल के दूनो भाई भी भोजपुरी के बड़ा नाम बा लोग। ऊंहां के छोट भाई पी. चंद्रविनोद मूर्तिकला के विद्वान बाडऩ। सबसे छोट भाई पाण्डेय सुरेन्द्र भी मूर्तिकला पढ़ावेनी। शांतिनिकेतन से दूनो भाई के पढ़ाई भइल बा। 
सब लोग पटना आ बाहरे रह गइल लोग। अब शीतलपुर में केहू नइखे। तनी गौर करीं लोग, पाण्डेय कपिल के परिवार के इतिहास बतावेला कि ईहां के पुरखा पाण्डेय शीतल सिंह ब्रज भाषा के कवि रहनीं, जिनकर नाम पर गांव के नाम शीतलपुर पड़ल। शीतल सिंह जी के एगो पांती प्रसिद्ध बा -
जेकर घर मइल, ओकर घर गइल। 
समय बदल गइल। अब शीतलपुर में लालाजी लोग के एको परिवार नइखे बाचल। बाकी बाहर निकलना के बाद भी ई लोग के शीतलपुर मन से नइखे छूटल। ई लोग के लेखनिया में छने-छने गांव कूद के आ जाला। 
पी. चंद्रविनोद के दू गो पांती देखीं -
ना धनकल ना बुझ सकल खाली रहल धुआँत।
जिनिगी असहीं कट गइल आँखिन लोर कमात।।

गांव छुटला के दर्द पर पाण्डेय सुरेन्द्र के दू गो पांती देखीं - 
ताला चुअल दुआर से, घर पीपर का भेस।
सपना जमकल गांव में, बडक़ा बसल विदेस।   
कइसे गांव के घर पर ताला लटकत चल जाता। कइसे संभार बिना गांव के घर पर पीपर-पेड़-पउधा उग आवता। कइसे गांव के सपना जम गइल बा, कइसे लइका लोग विदेस में बस जाता। गांव छूटल जाता। 
पाण्डेय भाई लोग खूब नाम कमावल, एक नंबरिया नौकरी कइल लोग, लेकिन मन में गांव छूटे के कसक रहई गइल। पाण्डेय कपिल के ही दू गो लाइन देखीं - 
मन के मन में रह गइल बीत गइल सब बात।
धइले-धइले रह गइल जिनिगी के सौगात।

शीतलपुर बाजार गांव में २४ सितंबर 1930 के जनमले पाण्डेय कपिलदेव नारायण सिंह अर्थात पाण्डेय कपिल के हमेशा याद रखल जाइए। कह ना संकली, भोर हो गइल, चीभ बेचारी का कही, दुनिया के सतरंज बिछल बा इत्यादि उनकर जोरदार रचना हवे। ऊंहां के श्रीमदभागवतगीता के भोजपुरी अनुवाद भी कइनीं - श्रीकृष्णार्जुन वार्ता। 
पाण्डेय कपिल जी लगातारे नीमन लिखनीं। 1971 में प्रकाशित पहला भोजपुरी संग्रह के दू गो पांती देखीं -
बतिए में रतिया बीत गइल भोर हो गइल
बहुते भइल रहे जे मन थोर हो गइल।  

पत्रिका निकाले में भी ऊंहां के खूब संघर्ष कइनीं। छपाई के ज्यादा काम ऊंहे करत रहनीं। पइसा जुटवला से लेके ओकरा के रिक्शा पर धके बडक़ा पोस्ट ऑफिस पोस्ट करे जाए तकले, उनकर मेहनत आउर गुणवत्ता कबहू कम ना भइल। ऊंहां के भोजपुरी के लेके खूबे चिंतित रहनीं और अपना तरीका से भोजपुरी के मजबूत बनावे के काम में जुटल रहनीं। पाण्डेय कपिल ईमानदार लेखनीहार रहनीं। लोग कुछो लिखत रहेला, ना बुझाला, लेकिन पाण्डेय कपिल के जब पिछला गजल संग्रह- दुनिया के सतरंग बिछल बा - आइल त ऊं साफ लिखले कि हमरा पता बा कि हमरा में अब पुरनका बात नइखे। ये लिखे खातिर साहस चाहीं। सबकोई न लिख पाला एइसे। 
इहे संग्रह में एगो शेर बा -
पुरल उम्र अस्सी, शुरू बा एकासी।
थकल जिंदगी अब लागत बाटे बासी।

दुख बा लेकिन हार नइखे। बाजार के चिंता बा, समय, समाज के चिंता बा, बाकिर ऊ हार माने के तैयार नइखन। इहे संग्रह के एगो आउर शेर देखीं -
जे पड़ल बा सामने ऊ काम सब करही के बा।
जिंदगी के ई लड़ाई, अंत ले लड़हीं के बा।
आप कबले रोक राखब आंख में आंसू भरल।
दुख-सुख कवनो घरी ऊ आंख से झरही के बा।
लेकिन गौर करे के बात बा कि शीतलपुर भुलात नइखे। बार-बार कूद-कूछ के आवता। 
पाण्डेय कपिल जी के रचना देखीं - 
मन में ललक रहेला शीतलपुर खातिर।
जन्मभूमि जे आपन असली घर खातिर।।
बचपन बीतल बा जहवां के माटी पर।
मोह रहेला ओही गांव-नगर खातिर।।
छूट गइल शीतलपुर जब मैट्रिक कइलीं।
गइलीं पढ़े बनारस कॉलेज के खातिर।।
भइल पढ़ाई पूरा तब अइलीं पटना।
रोजी रोटी के तलाश-चक्कर खातिर।।
साठ बरिस के उमिर तलक नोकरी कइली।
बस गइलीं पटना के जिनिगी भर खातिर।।
अब त ईहे गांव-नगर आपन बाटे।
बाकिर मन तरसेला शीतलपुर खातिर।।

शीतलपुर इंतजार करता आउर अब करते रही। ऊ दौर लउटे वाला नइखे। जे बच गइल बा ओकरा के बचा लेवे के बा। पाण्डेय कपिल पर भोजपुरी में काम होखे के चाहीं। ऊंहां के काम के आगे बढ़ावे के होई। भोजपुरी साहित्य सम्मेलन खातिर उनकर योगदान पर बडक़ा पोथी तैयार हो सकता। एक से एक विशेषांक निकलल, ई एगो अलगे इतिहास बा। सांचो फुलसुंघी उड़ गइल बा, भोर त बार-बार होई और पाण्डेय कपिल के ही बोली में कहे के पड़ी - 
खोल द दुआर भोर हो गइल।


https://gyanghar.blogspot.in/2010/06/blog-post_105.html

Wednesday, 9 July 2008

जाति के जर्रे - 3

मुझे खुशी है, मेरे गांव में जातिवाद का शिकंजा उस तरह से कड़ा नहीं है, जैसा कि हरियाणा या पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में रहा है । पिछड़ी जातियों में भी कुछ लोगों ने खूब नाम कमाया है, जैसा भोजपुरी के शेक्सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर भी हमारे ही जिले के थे। वे जाति के नाई थे, उन्हें शुरुआती दिनों में अपमान भी खूब झेलना पड़ा, लेकिन अपने ज्ञान के दम पर उन्होंने पर्याप्त सम्मान अर्जित किया। भिखारी ठाकुर पर मेरे एक प्रिय लेखक संजीव सूत्रधार नाम से बेहतरीन उपन्यास लिख चुके हैं। भिखारी ठाकुर के जरिये बिहारी संस्कृति की श्रेष्ठता का साक्षात्कार हम करते हैं। बिहार में जाति व्यवस्था को जानने में भी सूत्रधार के जरिये काफी मदद मिलती है। बिहार की भूमि ने कला का सदैव सम्मान किया है, यह बात मैं अपने उत्तरी बिहार के बारे में दावे के साथ कह सकता हूं, क्योंकि इस इलाके को मैंने देखा है। नाच जैसी मुश्किल नाट्य शैली इसी क्षेत्र की देन है, जिसे भिखारी ठाकुर ने चरम सम्मान पर पहुंचाया था। नाच बड़े लोगों और पंडितों के बीच भी लोकप्रिय हुआ था, भिखारी ठाकुर पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन बहुत विद्वान थे, उन्हें धर्म के बारे में भी कई ब्राहमणों से ज्यादा ज्ञान था। तो भिखारी ठाकुर के ज्ञान के सामने मत्था टेकने वालों की संख्या कम नहीं थी। कहने का मतलब यह कि कला और ज्ञान के आगे जाति की दीवार को ढहते देर नहीं लगती।

बहरहाल, कला एक राह थी, जिसके माध्यम से दलितों को पर्याप्त सम्मान नसीब हुआ। कोई शक नहीं पिछडों मे जब कोई उभरता है तो उसका फायदा सबको मिलता है । उनके लिए पढ़ने के अवसर तो बाद में बने, क्योंकि शिक्षा सुविधाओं का विस्तार बहुत बाद में हुआ। कुछ दलितों का शोषण मेरे गांव में अवश्य हुआ होगा, लेकिन अगर कोई ब्रह्मण शोषण करता होगा, तो दूसरा ब्रह्मण उसका विरोध भी करता होगा। आज एक बड़ी बात यह है कि दलितों और पिछड़ों के पास अपने नेता हैं, उनका शोषण अकल्पनीय है। राजनीतिक जागरुकता ने पिछड़ों के लिए सुरक्षा कवच का निर्माण कर रखा है। राजनीतिक जागरुकता के कारण उनमें एकता आई है, वे किसी न किसी दबंग खेमे के साथ जा जुड़े हैं और ऐसा जरूरी भी है, क्योंकि अकेले रहने में शोषण की ज्यादा गुंजाइश रहती है। पिछड़े मजदूरों के एकजुट रहने की वजह से हमारे गांव में किसी से बेगार करवाने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। तो मैं देखता हूं, दलित-पिछडे़ जहां भी जागरूक और एकजुट हुए हैं, वहां उन्होंने शोषण की स्थितियों से पीछा छुड़ा लिया है। भिखारी ठाकुर भी अपनी स्थितियों से तभी ऊपर उठ पाए, जब उन्होंने अपना एक समृद्ध समुदाय बनाया, कलाकारों की एक मजबूत टोली बनाई।
क्रमश: