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Wednesday, 27 November 2013

पीया तो से नैना लागे रे

प्रेमी नायक : 1960 का दशक
भाग - ५
यह दशक प्रेमियों का दशक था। इस प्रेम का जन्म समाजवाद की कोख से हुआ था, तो उसकी मस्ती भी देखने लायक थी, ताजा खिले फूल की तरह। राज कपूर ने ही एक तरह से प्रेम का ट्रेंड सेट किया, १९६२ में उनकी फिल्म आई 'जिस देश में गंगा बहती है', उसमें एक गाना है, 'प्यार कर ले, नहीं तो फांसी चढ़ जाएगा।' यह एक तरह से नारा था कि प्यार की ओर बढ़ा जाए, क्योंकि प्यार नहीं, तो कुछ भी नहीं। इसी दशक में 'मुगले आजम' का गीत - जब प्यार किया तो डरना क्या... खूब गूंज रहा था। प्यार की मांग बढ़ गई थी। दरअसल, १९६२ में भारत को युद्ध में पराजय मिली, लोग निराश थे, नेहरू और उनके युग की विदाई हुई। १९६५ में भारत को फिर युद्ध लडऩा पड़ा, ऐसे में, गीत-संगीत और प्रेम ने टूटे व घायल दिलों पर मरहम लगाने का काम किया। फिल्में राहत की तरह थीं।
इस दशक के बिल्कुल मध्य में १९६५ में शानदार गीतों से सजी 'गाइड' रिलीज हुई। प्रेम ही फिल्म का केन्द्र था। एक गाना मानो पूरी कहानी कह रहा है - कहीं बीते ना ये रातें कहीं बीते ना ये दिन, गाता रहे मेरा दिल, तू ही मेरी मंजिल...। १९६४-६५ में ही राज कपूर की फिल्म 'संगम' की धूम थी। मेरे मन की गंगा और तेरे मन की यमुना का, बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं...
नायक की इस मनोकामना ने इस दशक में अपना चरम देखा। प्रेम का दौर था, फिल्में सौभाग्य से रंगीन हो गई थीं। सपनों को चार चांद लग गए थे। 'संगम' में राज कपूर अपना कैमरा लेकर दुनिया घूमने निकल गए। यह रंगीन होने का ही नतीजा था कि फिल्मी नायक विदेश घूमने निकल गया। देश की राजनीति में भी तरह-तरह के बदलाव और प्रयोग चल रहे थे, सत्ता बदल रही थी, सत्ता का स्वभाव बदल रहा था, तनाव बढ़ रहा था, ऐसे में, फिल्मकारों ने महसूस किया कि उनका काम है लोगों को अच्छा अनुभव कराना, क्योंकि लोग पैसे खर्च करके सिनेमा देखने आते हैं। वे अच्छा देखें, अच्छा सुनें, फिल्मकारों का यही लक्ष्य बनने लगा। यह वही दशक है, जब मेकअप का काम बढ़ गया, बनावट पर जोर दिया जाने लगा। वास्तविकता पाश्र्व में जाने लगी। राजू गाइड (गाइड) से हीरामन गाड़ीवान (तीसरी कसम) तक, सारे नायक प्रेम के पीछे भाग रहे थे। दिल का मामला नाजुक हो रहा था। यह गाना भी खूब चला कि आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर सबको मालूम है और सबको खबर हो गई. . .। लोग भी बहुत खुश थे, इस दौर में प्रेम शायद इसलिए भी ज्यादा चल गया, क्योंकि गीतों के शब्द शानदार थे और संगीत भी। 
इस दशक की एक और खास बात है कि नायक और नायिका, दोनों के ही 'सेक्स अपील' में इजाफा हुआ। यह अपील कोई बुरी बात नहीं थी, क्योंकि इस अपील में उस दौर में बहुत साफगोई थी। प्यार था, सुन्दरता थी, लेकिन अनुशासन भी था। किसी के लिए मर मिटने का इरादा था, सुन्दर दिखने की चाहत थी, साफ-सुथरा रहने का प्रयास था। इसका निश्चित रूप से समाज पर गहरा असर पड़ा। एक अच्छा और साफ-सुथरा मध्य वर्ग और मध्यवर्गीय मानसिकता को तैयार करने में इस दौर के नायक ने काफी मदद की। शहरों में सुधार आया, कॉलेजों के माहौल में सुधार आया, कुछ खुलापन आया, परस्पर सामाजिकता बढ़ी, प्रेम की स्वीकारोक्ति बढ़ी, प्रेम विवाहों की संख्या बढ़ी। इस दौर की पारिवारिक फिल्मों ने भी समाज और देश को काफी कुछ सिखाया।
इस दशक के प्रतिनिधि नायक-अभिनेता अगर हम चुनें, तो शम्मी कपूर, देव आनंद और राजेश खन्ना सबसे आगे नजर आएंगे। विशेष रूप से, आज भी न देव आनंद जैसा कोई नायक मिला है और न राजेश खन्ना जैसा। दोनों ही नायकों का अलग-अलग स्नेहिल प्रभाव था, दोनों ही नायक ऐसे थे, जिनके लिए जान देने को लोग तैयार थे। कहा जाता है कि लोग इन नायकों को खून से खत लिखते थे। दोनों ही रोमांटिक और सुदर्शन अभिनेता थे। यह भी एक खास बात है कि इस दौर में अच्छा दिखने वाले अभिनेताओं की भारी मांग थी। इसी दशक में फिल्मी नायक या अभिनेता बनना कठिन हो गया। फिल्म बनाने का खर्च बहुत बढ़ गया था। स्टार छवि की मांग बढ़ गई थी। फिल्म निर्माण की चुनौती बढ़ गई थी। इस दशक के आखिर तक श्वेत-श्याम फिल्मों ने पूरी तरह से विदाई ले ली। रंगीन रुपहले पर्दे पर मजबूती से टिकना आसान नहीं रहा। वैसे प्रेम की डगर पर टिकना भी आसान नहीं होता। हम नहीं भुला सकते कि फिल्मी नायकों ने इस दशक में फिल्मों में जितना आदर्श प्यार किया, उतना अन्य किसी दशक में देखने में नहीं आया।
(क्रमश:)

पापियों के पाप धोते-धोते

यथार्थवादी नायक : 1980  का दशक
भाग - 7
दशक की शुरुआत में ही देश ने समझौता कर लिया। राजनीति में जिन नायकों को देश ने पिछले दशक में सत्ता से बाहर कर दिया था, उन्हीं लोगों को देश फिर सत्ता में ले आया यह सोचकर कि तुलनात्मक रूप से यही बेहतर नायक हैं। यानी देश ने यथार्थ या वस्तुस्थिति को स्वीकार कर लिया। कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस दौर में यथार्थवादी फिल्मों की बाढ़-सी आ गई। नायक का नजरिया जमीनी हकीकत की ओर मुड़ा। आदर्शवाद हो, प्रेम हो, असंतोष हो, हर जगह यथार्थ दिखाने की कोशिश होने लगी। समानांतर सिनेमा का आंदोलन इसी दौर में सशक्त होकर उभरा। नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल, शबाना आजमी, अनुपम खेर इस दौर के चर्चित यथार्थवादी नायक-नायिका थे। यह उम्मीद एक तरह से टूट चुकी थी कि फिल्मी नायक कोई क्रांति करेंगे, फिल्मी नायक तो उसी कथा को दर्शकों के सामने परोस रहे थे, जो कथा खुद दर्शकों के बीच बिखरी हुई थी। एक होड़-सी थी कि समाज की गंदगी या कमी को कौन बेहतर ढंग से सिनेमा में पेश करेगा, भ्रष्टाचार को कौन सबसे वीभत्स रूप में पेश करेगा। 
इसी दशक के बिल्कुल मध्य में १९८५ में राज कपूर ने 'राम तेरी गंगा मैली' का निर्माण किया। यह फिल्म सुपर हिट हुई। बात खुल चुकी थी, तो स्त्री शरीर बोलिए या स्त्री का सौंदर्य बोलिए, यह भी यथार्थ ही था। इस फिल्म पर अश्लील होने का आरोप लगा, तो फिर लोग क्यों इसे देखने गए? क्या यह एक यथार्थ नहीं है कि लोग अश्लीलता देखना चाहते थे, यह बात अलग है राज कपूर सौंदर्य दिखाना चाहते थे। यह बात ठीक उसी तरह से थी, मानो आपने समाज, शासन, प्रशासन का यथार्थ देख लिया, तो आप शरीर का भी यथार्थ देख लीजिए। भ्रष्टाचार, अन्याय हर किसी के साथ था, तो शरीर भी तो हर किसी के साथ था, फिर भी लोग देखना चाहते थे। पुरुष भी यथार्थ देखना चाहते थे और स्त्रियां भी। 'राम तेरी गंगा मैली' स्त्रियों के बीच भी बहुत चर्चित हुई। एक नदी या गंगा का प्रदूषण भी तो यथार्थ ही था, ...राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप ढोते-ढोते...। नदी का प्रदूषण आज भी व्यावसायिक सिनेमा का विषय नहीं बन पाया है, लेकिन १९८० का दशक ही कुछ ऐसा था कि इस दौर का सबसे बेहतरीन व्यावसायिक सिनेमा भी यथार्थवादी हथियार से लैस था।
इस दशक की प्रतिनिधि फिल्म के रूप में हम 'मशाल' फिल्म को भी देख सकते हैं। दिलीप कुमार और अनिल कपूर की भूमिका वाली इस शानदार फिल्म में बदलते और निष्ठुर होते समाज को बहुत अच्छी तरह से उकेरा गया था। समाज में लोग एक दूसरे की मदद करने से पीछे हटने लगे थे, लोग मतलबी होने लगे थे। लोग घी निकालने के लिए अपनी उंगली टेढ़ी करने लगे थे, इन सब सच्चाइयों को 'मशाल' फिल्म में बखूबी दर्शाया गया। 

इस दशक में टूटते परिवारों की सच्चाई को भी बेहतरीन तरीके से पेश किया गया। फिल्मी नायक ने पारिवारिक परेशानियों से जूझने में काफी वक्त लगाया। प्रेम भी था और हिंसा भी। इस दशक में यथार्थवाद की ऐसी लहर थी कि लगता था कि फिल्में फिर कभी सपनों की ओर नहीं लौटेंगी। व्यावसायिक फिल्में परिवार और मनुष्य सम्बंधों पर केन्द्रित होकर यथार्थ दिखा रही थीं, वहीं दूसरी ओर, समानांतर फिल्में समाज का ठोस यथार्थ दिखा रही थीं। इलाज दोनों में से किसी के पास नहीं था, इसलिए हम यह कह सकते हैं कि फिल्में एक तरह से पलायन की शिक्षा दे रही थीं। नायकत्व दाव पर लग गया था, क्योंकि नायक सताए जा रहे थे, दूसरे चरित्रों द्वारा संचालित होने लगे थे।
 देश की राजनीति में भी ठीक ऐसा ही हो रहा था, देश की राजनीति के नायक भी दूसरों के हाथों की कठपुतलियों-से बन गए थे। उन्हें तरह-तरह की चौकडिय़ां घेरने लगी थीं। नेताओं को मजबूर किया जा रहा था कि वे भ्रष्टाचार, गरीबी, भाई-भतीजावाद, सांप्रदायिकता जैसी सच्चाइयों को स्वीकार कर लें। इस दशक में नायक सांप्रदायिकता की ओर मुड़े, बड़े घोटाले हुए, उच्च स्तरीय धोखेबाजी हुई। असंतोष का इलाज न हुआ, तो आतंकवाद की भी जमीन तैयार हुई। इस दशक में देश का यथार्थ खुलकर सामने आ गया, हम भारतीय भले ही गंगा की पूजा करते हों, लेकिन हम स्वयं अपने हाथों से गंगा का गला घोंट रहे हैं। हम यह कह सकते हैं कि यह भारतीय नायकत्व के ढहने का दशक था। कोई भी नायक नैतिकता के पैमाने पर ज्यादा टिक नहीं पा रहा था, समझौते करने पड़ रहे थे। फिल्मी नायकों ने भी खूब समझौते किए। समाज को समझौतावादी और पलायनवादी बनाने में इस दशक के नायकों का सर्वाधिक योगदान है।
कोरा सच बहुत कम लोगों को अच्छा लगता है, इसलिए जो फिल्में ज्यादा यथार्थवादी थीं, उनको खरीदने वाला कोई न था। विडंबना है कि नायकत्व की हत्या करके स्वयं नायक के रूप में उभरने वाला समानांतर सिनेमा रोजी-रोटी के लिए तरसने लगा था। इस दशक में समाजवादी और कलावादी, दोनों ही तरह के नायक उभरे, इन दोनों को ही व्यावसायिकता पसंद नहीं थी। हालांकि यह भी बड़ा सच है कि दोनों ही तरह के नायक अपने सिद्धांतों पर मुस्तैदी से टिक नहीं सके, दोनों ने ही कम या ज्यादा, देर या सबेर व्यावसायिकता का लाभ लिया। 
इस दशक के अनेक प्रतिनिधि नायक-अभिनेता हैं - अनिल कपूर, ऋषि कपूर, जैकी श्रॉफ, सनी देओल, संजय दत्त, नसीरुद्दीन शाह इत्यादि। अनिल कपूर विशेष रूप से टपोरी वाला अंदाज लेकर आए। टपोरीपना भी अपने समय का एक सच था, जो बाद के दशकों में भी साथ-साथ चलता रहा।
(क्रमश:)

अब यहां से कहां जाएं हम

प्रवासी नायक : १९९० का दशक
(भाग - 8}
आदर्श भी देखे, प्रेम भी, असंतोष भी, यथार्थ भी, तो उसके बाद स्वाभाविक सवाल था ... अब यहां से कहां जाएं हम...। फिल्मी समाज ने समझ लिया कि खुद को बदलना होगा। ज्यादा यथार्थवादी हुए, तो संगीत-गीत की अहमियत घटती जाएगी, फिल्में सपना दिखाने का काम छोड़ देंगी, फिल्म का व्यवसाय मुश्किल हो जाएगा। तो फिल्मों ने यथार्थवाद की ओर से ध्यान हटाना शुरू किया। देशी नायक तो भ्रष्ट हो चुके थे, इतने यथार्थवादी हो चुके थे कि उनके सहारे सपने गढऩे का काम असंभव हो गया था। पिछले दशक में व्यावसायिक सिनेमा का नायक भीड़ में शामिल होकर बौना हो चुका था, नायिका सास या समाज के हाथों बुरी तरह से सताई गई थी, तो दूसरी ओर, खांटी समानांतर सिनेमा का नायक (नसीरुद्दीन शाह) 'पार' के बेघर मजदूर की तरह था या इसी फिल्म की नायिका (शबाना आजमी) की स्थिति एक गर्भवती सुअरी से भी बदतर हो चुकी थी। ऐसे नायक और नायिका सपनों की सौदागरी या कालाबाजारी में सहायक नहीं हो सकते थे, अत: १९९० के दशक में फिल्मों ने नायक-नायिका का विदेश से आयात किया। इसका मतलब यह नहीं कि अंग्रेज नायक-नायिका आयात हुए, आयात तो वही नायक-नायिका हुए, जिनके पूर्वज या पिता विदेश जाकर बस गए थे।
हम देखते हैं कि इसी दौर में देश ने आर्थिक उदारीकरण (वर्ष १९९१) को स्वीकार किया, विदेशियों, विदेश में बसे भारतवंशियों और प्रवासी भारतीयों की अहमियत बढ़ी। प्रवासी भारतीयों के लिए स्वर्ण युग शुरू हुआ। जैसे भारत सरकार ने विदेश में देश का भविष्य देखा, वैसे ही फिल्मों को भी अपना भविष्य विदेश में नजर आया। 

इस दशक के ठीक मध्य में फिल्म आई 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे। यह फिल्म ब्रिटेन-यूरोप से शुरू होती है और भारत आकर संपन्न होती है। प्रेम अंतरराष्ट्रीय हो चुका है और भारत एक मिलन स्थल या विवाह स्थल है। यह फिल्म न केवल सवाल उठाती है कि यहां से कहां जाएं हम, बल्कि उत्तर भी देती है कि तेरी बांहों में मर जाएं हम। यानी सपना फिर हावी हो गया, बांहों में मर जाने का सपना कितना यथार्थवादी है, यह सब जानते हैं, लेकिन लोग फिर भी सपनों की ओर मुड़े, क्योंकि वे कुछ देर के लिए अपनी जिंदगी के यथार्थ को भूल जाना चाहते थे। अपनी गंदी समस्याग्रस्त गलियों से दूर कहीं किसी मनोरम देश में लोग खुद को महसूस करना चाहते थे। कोई आश्चर्य नहीं, मानव सदा से ऐसा ही रहा है। वह जहां है, वहां से काफी दूर जाकर सोचना चाहता है। प्रसिद्ध साहित्यकार निर्मल वर्मा भी अकसर कहते थे कि 'एक अच्छी रचना पाठकों को दूसरे संसार में ले जाती है।' फिल्में भी तो यही करती हैं, हॉलीवुड की फिल्म हों या बॉलीवुड की।
सुभाष घई की 'परदेश' हो या करण जौहर की 'कुछ कुछ होता है', प्रवासी भारतीय चरित्रों को लेकर ऐसी अनेक फिल्में बनीं, जिन्होंने दुनिया भर में बसे भारतवंशियों को लुभाया, बुलाया। यह फिल्मी नायक के रूप में शाहरुख खान का चरम दौर था। वे ताजा हवा के झोंके की तरह दीवाना बनकर आए थे, यथार्थ का बोझ उनके साथ नहीं था। प्रेम की चाहत थी, जिसके लिए वे दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच सकते थे। पूंजी उनके पास बहुत थी। तलाश थी, तो सिर्फ प्रेम की। इसमें कोई शक नहीं कि यही वह दशक था, जब भारतीय समाज का प्रवासी नायकों के प्रति मोह अत्यधिक बढ़ गया। भारतीय बाप अपनी बेटियों के लिए प्रवासी दूल्हे खोजने लगे थे, मानो देश के अंदर पूंजीवाले दूल्हों का अभाव हो गया हो। सपनों को फिर पंख लग गए थे। भारतीय युवाओं को भी लगने लगा था कि उनकी कीमत तभी है, जब वे भी प्रवासी हो जाएं या फॉरेन रिटर्न हो जाएं। विदेश में पढ़ाई, नौकरी करने से नायकत्व हासिल होने लगा। लोग कबूतरबाजों के हाथों में फंसकर कबूतर बनकर विदेश जाने को लालायित थे, क्योंकि नायक होने का रास्ता विदेश में ही खुलने लगा था। यही वह दशक था, जिसमें विदेश में भारतीयों की संख्या बढ़ी और फिल्मकारों को प्रवासी दर्शकों के बारे में भी सोचना पड़ा। जैसे विदेशी पूंजी भारतीय लाभांश की ओर आकर्षित हुई, ठीक उसी तरह से विदेश में बसे अनेक प्रवासी व विदेशी कलाकार रुपहले पर्दे पर हिस्सेदारी के लिए भारत आने के सपने देखने लगे।
(क्रमश:)

इश्क दी गल्ली बिच...

विलासी नायक : २००० का दशक
(भाग - ९)
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के साथ भारत ने नई सदी में प्रवेश किया था। तकनीक, इंटरनेट से उपजी सूचना क्रांति ने देश के मिजाज को बदल दिया था। मल्टीप्लेक्स, मॉल, विदेशी उत्पादों, इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों की भरमार, विदेशी गाडिय़ों का चलन बढ़ गया था। युवा भारत की विकास गति सुधर गई थी। ऐसा लगने लगा था कि भारत अब तरक्की करता चला जाएगा, पीछे मुडक़र देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। खूब पैसा आया, ऋण लेकर घी पीना आसान हो गया। मध्य वर्ग के जो सपने पिछले दशकों में साकार नहीं हुए थे, वो इस दशक में साकार होने लगे। ऋण लेकर घर बनाना, पढ़ाई करना, विदेश जाना आसान हो गया। मस्ती की पाठशालाएं सज गईं। भारतीय समाज के एक हिस्से में कुछ संपन्नता आई। प्रभु वर्ग की तनख्वाहें बढ़ गईं। सरकारी योजनाओं में गांव के स्तर तक वितरण और लूट की संभावना बढ़ी। समाज में पैसा बढ़ा। तो सिनेमाई नायक विलासी हो गया। महंगी गाड़ी, महंगे ब्रांडेड कपड़े, महंगे विदेश दौरे, महंगे होटल, महंगी गर्लफ्रेंड, महंगे गिफ्ट का दौर आ गया। मुख्यधारा में जो फिल्में बन रही थीं, उनमें पैसा कोई मुद्दा नहीं रहा। नायक के पास ज्यादा काम नहीं था, समाज इत्यादि की ज्यादा चिंता नहीं थी, उसके पास पूरा समय था कि वह जिम जाकर 'सिक्स पैक' बना सके। सिक्स पैक बना लेने से दुश्मनों से लडऩे, शर्ट खोलने, नाचने-गाने, नायिका का दिल जीतने, खलनायकों को डराने और दर्शकों को लुभाने में सुविधा होने लगी। गरीबी से लडऩे वाले, समाज की समस्याओं से पीडि़त होने वाले सिंगल पैक बॉडी वाले नायक पीछे छूट गए, उनकी जगह सिक्स पैक वाली समृद्ध जमात आ गई। एक समय दारा सिंह और धर्मेन्द्र इत्यादि को अच्छी बॉडी का मालिक माना जाता था, ये भारतीय फिल्मों के ऐसे पहलवान थे, जिन्हें दुश्मनों से लडऩे के लिए मांसपेशियों की जरूरत नहीं पड़ी थी। अमिताभ बच्चन भी अपने चरम दौर में सिंगल पैक वाले नायक थे। २००० के दशक में पूरा मिजाज ही बदल गया। जिन फिल्मों को कभी खेतों में काम करने वाले मेहनती गठीले नायकों की जरूरत नहीं पड़ी थी, वे सिक्स पैक वाले नायक मांगने लगीं। इस दशक में यह पूरी तरह से स्थापित हो गया कि अंग प्रदर्शन एकतरफा नहीं रहेगा, नायक को भी ऐसा शरीर बनाना पड़ेगा कि वह भी अंग प्रदर्शन में नायिकाओं से मुकाबला कर सके। इस दशक में विलास का फायदा यह हुआ कि नायक अच्छे शरीर धारी होने लगे, लेकिन चरित्र का पतन भी प्रबल हुआ। 

२००० के दशक के मध्य वर्ष २००५ में एक फिल्म सुपर हिट हुई, 'नो एंट्री। यथार्थ के स्तर पर बेतुकी कॉमेडी फिल्म, लेकिन दर्शकों को खूब पसंद आई। फिल्म के केन्द्रीय नायक थे सलमान खान। अच्छे शरीरधारी नायकों में अग्रणी। वास्तविक जीवन में अविवाहित, लेकिन सिलसिलेवार प्रेम सम्बंधों वाले सबसे चर्चित और प्रशंसित फिल्मी नायक। 'नो एंट्री' में उनका किरदार पूरे इस दशक का प्रतिनिधि किरदार बनकर उभरता है। वे एक ऐसे नायक हैं, जो अपनी समर्पित पत्नी को छोडक़र दूसरी लड़कियों के पीछे भाग रहे हैं, उनके संपर्क आधुनिक गणिकाओं से भी हैं, बल्कि वे उनका अपनी कहानी आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल भी करते हैं। आधुनिक गणिका भी फिल्म की मुख्यधारा में अहम किरदार है, तो इसका श्रेय उस विलासी नायक को ही देना चाहिए, जिसके लिए मौज-मस्ती ही सबकुछ है, उसके सामने चरित्र चर्चा बेकार है। नायक दोगला भी है, वह अपनी पत्नी और प्रेमिका से तो पूरी ईमानदारी की मांग कर रहा है, लेकिन खुद अव्वल दर्जे का बेईमान है।  इस विलासी नायक के दौर में ही हम देखते हैं कि समाज में परिवार, सम्बंध, निष्ठा, बंधुत्व या मित्रता का पतन, भ्रष्टाचार, चारित्रिक पतन इत्यादि चिंता के विषय नहीं रह गए। फिल्मों ने ईमानदारी को क्षणिक तत्व या एक क्षणिक अवस्था मान लिया। इस दशक में विलास के प्रति आकर्षण ऐसे बढ़ा कि बेईमानी भी स्वीकार्य-सी हो गई। अच्छाई या अच्छी बातों का रोमांच खत्म-सा हो गया। पैसे का डंका बज उठा।
इसी दौर में 'थ्री इडियट्स' जैसी फिल्म भी आई, जिसमें नायक बहुत क्षमतावान था, कुशल था, लेकिन छात्र जीवन में ही वह शराब का सेवन करने लगा था। रेंचो नाम का यह नायक सफल रहा, फिल्म भी सफल रही, लेकिन सच्ची बात तो यह थी कि इस नायक ने एक झूठे नाम और परायी पूंजी के दम पर पढ़ाई की थी। उसकी पढ़ाई और उसके नायकत्व के आधार में झूठ था। नायक ने पराई पूंजी का सदुपयोग कर ढंग से पढ़ाई की, इसे तो लोगों ने देखा, लेकिन लोगों ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि नायक ने शराब पीकर और दोस्तों को पिलाकर इस पराई पूंजी का दुरुपयोग भी किया। अनजानी शादी में भोजन करने पहुंच गया, पिं्रसिपल के घर उत्पात में शामिल हुआ और प्रश्न पत्रों की चोरी भी की। इस फिल्म ने यह प्रमाणित कर दिया कि गरीबों के लिए भी नैतिकता ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं रही, केवल विलास महत्वपूर्ण हो गया। गरीबों को भी यही शिक्षा दी गई, पूंजी कहीं से भी ले लो, मस्त जीवन जीयो, अपना मतलब साधो और आगे निकल जाओ। इस दौर में नायकों के विलास की भी कोई सीमा नहीं रही, सारे बंधन टूट गए। ऐसी फिल्में भी आईं, जिनमें अधेड़ उम्र के नायकों को नई नवेली नायिकाओं से प्रेम हो गया। पिछली सदी के महानायक घोषित हो चुके अमिताभ बच्चन ने भी ऐसी भूमिकाओं को दो बार (चीनी कम और नि:शब्द) निभाया। विवाहेत्तर सम्बंधों वाले इस विलासी दौर में गरीब और देहाती नायक दुर्लभ हो गए। अमिताभ अपने चौथे फिल्मी दशक में विराजमान थे, लेकिन उन्होंने पूरी तरह से बदलते वक्त का साथ दिया, कभी बैंक में डाका डालने वाले बने, तो कभी डॉन, तो कभी केवल पैसे के पीछे भागने वाले चरित्र। चरित्र की बात करें, तो अमिताभ बच्चन ने 'कभी अलविदा ना कहना में 'सेक्सी सैम जैसे विलासी चरित्र को निभाकर अच्छे चरित्र की अहमियत को गौण कर दिया।
विलास के पीछे भागने और विलास में जीने वाले फिल्मी नायकों की भीड़ लग गई, लेकिन इस दशक के एक प्रतिनिधि अभिनेता-नायक को अगर चुनें, तो बेशक वह नाम सलमान खान का होगा। जो अपनी वास्तविक जिंदगी में भी युवाओं के मॉडल रहे, विश्व सुन्दरी से प्यार, नशा करके महंगी गाड़ी में सवारी, वन्य जीव का शिकार इत्यादि। समय बदल चुका था, कोई आश्चर्य नहीं, वे आदर्श बने और लोगों द्वार खूब पसंद किए गए।
(क्रमश:)

Tuesday, 26 November 2013

तोरे नैना बड़े दगाबाज रे

- भ्रमित नायक : २०१० का दशक-
(समापन भाग)
इस दशक की शुरुआत में पूरी दुनिया को आर्थिक मंदी से गुजरना पड़ा। पैसा वापस जाने लगा, नए पैसे ने आना कम कर दिया। विदेशी-प्रवासी-विलासी दूल्हे धोखेबाज निकलने लगे। कई सपने टूटे, नायक आसमान से जमीन पर गिरने लगे, लेकिन जमीन बदल चुकी थी। देश वैसा नहीं था, जैसा पहले सोचा गया था। सरकार और सरकार के नायक भ्रमित थे कि किधर जाएं। फिल्मों में तो प्यार हुक्का बार हो गया था। सुन्दर कन्या भ्रमित हो गई थी - गा रही थी कि मेरे फोटो को सीने से यार चिपकाले सैंया फेविकॉल से। ऐसा नहीं है कि यह बेतुका गाना फ्लॉप हो गया हो, इसे लोगों ने खूब पसंद किया। लोग अलग तरह की आवाज और धुन सुनकर मस्त थे, उन्हें अर्थ से ज्यादा मतलब नहीं रहा। दिखावा पूरी तरह से हावी हो गया। समलैंगिक समूह रैली निकालने का साहस करने लगे। फिल्मों के लिए समलैंगिकता एक प्रिय विषय बन गई। कुछ लोगों को अपने लिंग को लेकर भी भ्रम होने लगा। इस दशक में फिल्मों ने इस विकल्प को और मजबूत करना शुरू कर दिया कि जरूरी नहीं कि नायक किसी नायिका की ही तलाश करे, वह किसी सह-नायक को भी अपनी नायिका मान सकता है, उसके साथ जिंदगी बिता सकता है। ऐसा नहीं है कि केवल फिल्में ही भ्रम का शिकार हों, देश में भी नाना प्रकार के भ्रम चलन में हैं। नेता कितने विश्वसनीय हैं, इसे लेकर भ्रम है। घोटाले हुए हैं, तो कितना नुकसान हुआ है, इसे लेकर भी भ्रम है। हमारे देश का पैसा हमारा है या नहीं, इसे लेकर भी भ्रम है। पैसा जेब में कब तक रहेगा, इसे लेकर भ्रम है। बीवी या प्रेमिका निष्ठावान है या नहीं, इसे लेकर भ्रम है। केवल देश में ही नहीं, उसकी फिल्मों में भी विचारों की मंदी का दौर है। विचार और नैतिकता का ऐसा अकाल पड़ा कि अब पोर्न उद्योग से भी कलाकार लेने में संकोच नहीं रहा। अच्छाई और बुराई के बीच भ्रम को मानो स्वीकार कर लिया गया है। पिछले दशक में एक प्रवासी से विवाह करके विदेश चली गई स्टार अभिनेत्री माधुरी दीक्षित वापस लौट आई। भ्रम खड़ा हो गया कि लौटना था, तो गए क्यों थे? संशय बरकरार है कि यह लौटना सफल होगा या नहीं। हो सकता है, माधुरी एक अपवाद मात्र हों, क्योंकि फिलहाल ज्यादातर लोग देश से भाग जाना चाहते हैं। जो भी सक्षम है, भाग रहा है कि अब इस देश में रखा क्या है? देश के सच से भागते विदेशी निवेशकों, कंपनियों, सरकारों, नेताओं के लिए यह गाना मुफीद है ...कल मिले ये हमको भूल गए आज रे, तोरे नैना बड़े दगाबाज रे... 
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-  ज्ञानेश उपाध्याय 
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संदर्भ ग्रंथ : 1 : हीरो - पहला और दूसरा खंड - लेखक अशोक राज 
2 : वर्तमान साहित्य, सिनेमा विशेषांक - वर्ष 2002 
3 : बॉलीवुड - ए हिस्ट्री, लेखक : मिहिर बोस 
4 : आइडोलॉजी ऑफ हिन्दी फिल्म , लेखक : एम. माधव प्रसाद

Tuesday, 15 July 2008

जाति के जर्रे : 4

--मोहन भाई--
मुझे लगा, इस कथा का एक शीर्षक रख लेते हैं, ताकि सुविधा हो जाए। मोहन भाई हमारे गांव से करीब दो किलोमीटर उत्तर की ओर नौतन बाजार गांव के एक अलग टोले में रहते थे। उनकी टोली अपनी जाति की वजह से गांव से बाहर एक कोने में बसाई गई थी। जहां मोहन भाई के पूर्वज बसाए गए थे, वहां एक जंगल हुआ करता था, जिसे लाला गाछी कहते थे। वहां दिन में भी अंधेरा रहता था, किसी जमाने में बाघ भी रहा करते थे। आजादी के बाद उस जंगल की कटनी शुरू हुई और आज उस जंगल का एक भी पेड़ नहीं बचा है । हम बचपन में जब एकमा रेलवे स्टेशन पर उतरकर टमटम से गांव जाया करते थे, तब भी लाला गाछी में कुछ पेड़ हुआ करते थे, बड़े-बड़े खूब घने, सड़कों पर छाए हुए, कुछ भय लगता था और एक खुशी भी कि लाला गाछी खत्म हुई, अब हमारा आम का बगीचा नजर आने लगेगा। मुझे याद पड़ता है, लाला गाछी के कुछ पेड़ों के आम मैंने चखे थे, खैर, वह जंगल या गाछी अब इतिहास है।
तो बात हो रही थी मोहन भाई की, जो उस जाति के थे, जिसके नाम के बाद का हिस्सा `मार´ है। याद है, लंबे कद के थे, चेहरे पर घनी मूंछें, सांवला रंग, हंसमुख चेहरा, तेज आवाज, मजबूत चुस्त बदन, बड़ी मीठी भोजपुरी बोलते थे। जब वे खेत जोतते थे और बैलों को आवाज देते थे, आव-आव-आव, चल जवान, तब हम देखते रह जाते थे। मोहन भाई हमें बहुत मानते थे। मेरे से बड़े वाले भाई साहब मालू अर्थात लोकेश उपाध्याय उन दिनों थोड़े शैतान हुआ करते थे, मोहन भाई को परेशान किया करते थे, तो मोहन भाई ने उनका नाम झंझट उपाध्याय रख दिया था। वे `उपाध्याय´ को `पधिया´ बोलते थे। जब हम अपने दूर स्थित खेतों से लौटते हुए थक जाते थे, छोटे-छोटे शहरी पांव जब दुखने लगते थे, कटे हुए खेतों से जब घिर जाते थे, तब मोहन भाई हमें कंधे पर बैठा लेते थे। मैं आज भी पसीने से तर-बतर मोहन भाई के ठंडे कंधे को महसूस कर सकता हूं। हमने जाति का भेद तब नहीं जाना था , हमें जाति के भेद के बारे में किसी बुजुर्ग ने बताया भी नहीं था। मुझे मोहन भाई का कंधा इतना सुरक्षित और मजबूत लगता था कि मुझे दुख होता था, यह कंधा शाम होते ही कहीं चला क्यों जाता है, हमारे घर क्यों नहीं रहता।
तब हम चारों भाई छोटे थे, शहर से गरमियों में गांव जाते थे। गांव में हमारे पांचवें बड़े भइया दिलीप उपाध्याय होते थे, पोस्ट ऑफिस में कार्यरत, आज भी नौकरी में हैं। उनके पिताजी यानी बड़े पिताजी, जिन्हें हम भी बड़े भैया की तरह की बाबूजी कहा करते हैं, अपने गांव के दक्षिण में स्थित बरेजा गांव के हाईस्कूल में भूगोल और इतिहास पढ़ाते थे। बाबूजी अर्थात शिवजी उपाध्याय अभी भी हैं, ढेर सारी शानदार पुरानी यादों से लबालब । 1986 में ही रिटायर हो चुके हैं। हार्ट के मरीज हैं। पेंशन मिलती है। समाजसेवा करते हैं। गांव के गिने-चुने अच्छे लोगों में गिने जाते हैं, लेकिन यह बात अलग है कि गांव में मनमानी करने वाले बहुसंख्य लोगों को अच्छे लोगों की कोई जरूरत नहीं रही । अच्छे लोगों की जरूरत केवल गरीबों को है, जिनके छोटे-छोटे बच्चों को बीमार पड़ने पर भी दो बूंद दूध नसीब नहीं होता, ऐसे ही लोगों के काम आते हैं बाबूजी।
खैर, 1991 की सर्दियों का समय था। दसियों दिन बाद धूप थोड़ी पसर आई थी। सुबह का समय था, मोहन भाई के छोटे भाई जवाहिर मुंह लटकाए बाबूजी के पास पहुंचे। बहुत दुखी थे, मानो कोई बड़ा आघात लगा हो। ...क्रमश: