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Wednesday, 27 November 2013

देना पड़ेगा मोहब्बत का इम्तेहान

असंतुष्ट नायक : 1970 का दशक
भाग - 6
जब यह दशक शुरू हुआ, तो लोगों में असंतोष की भावना आ चुकी थी। यह असंतोष संगीतमय ढंग से भी उभरने लगा था। १९७१ में कमाल अमरोही की फिल्म 'पाकिजा' के एक गाने की देश में बड़ी गूंज थी - इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा...  हमरी न मानो सिपहिया से पूछो, जिसने... भरी बजरिया में छीना दुपट्टा मेरा...। इस दौर का नायक व्यवस्था से निराश होने लगा था। सरकारी नीतियों और सरकारी लोगों का शिकंजा कसने लगा था। देश में लोगों और नायकनुमा तमाम लोगों को यह अहसास हो गया था कि देश की समस्याओं का समाधान उतना आसान नहीं है, जितना कि १९५० के दशक में सोचा गया था। राजनीति कोरे वादों से अपना काम चला रही थी। तत्कालीन राजनीतिक नायक सरकार के समक्ष शिकायत दर्ज कराने लगे थे। साहित्य में भी सरकार के प्रति निराशा और रोष का भाव आने लगा था। नायक विचलित होने लगे थे। ऐसे में, जब यह गाना बजा कि इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा, तो मानो यह अहसास हुआ कि देश की धरती गुहार लगा रही है, शिकायत कर रही है कि उसके साथ बहुत बुरा हो रहा है। 

इस दशक में नायक का गुस्सा धीरे-धीरे बढ़ा, 'जंजीर' आई, तब भी ठीक था, क्योंकि नायक सरकार के दायरे में ही था, वह सरकार का अंग बनकर समाधान तलाश रहा था, लेकिन उसके बाद दशक के ठीक बीच में १९७५ में 'शोले' आई, जिसमें नायक सरकार से बाहर आ चुका था, क्योंकि सरकार में रहते हुए उसे न्याय नहीं मिला था, 'शोले' का ठाकुर पहले पुलिस अधिकारी था, लेकिन जब पुलिस की नौकरी करते हुए उसका परिवार मार दिया गया, उसके हाथ काट दिए गए, तब निराश होकर उसे व्यवस्था से बाहर आना पड़ा और तब उसके सहयोगी बने दो अपराधी। सरकार की व्यवस्था से इतर एक व्यवस्था बनी, जिसने डकैतों से लोगों को मुक्ति दिलाई। एक तरफ पीडि़त पक्ष था, दूसरी तरफ खलनायक था, जिसका व्यवस्था में कोई विश्वास नहीं था, तो तीसरी तरफ दो अपराधी थे, जो पैसे के लिए ही खलनायक को मारने के लिए तैयार हुए थे। देश की व्यवस्था ऐसे बिगड़ रही थी कि एक भ्रम खड़ा हो गया कि इसमें नायक कौन है। कुछ लोगों ने पीडि़त पक्ष - ठाकुर - को नायक माना, तो किसी ने अपराधी जय-वीरू को नायक माना, तो ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने खलनायक गब्बर सिंह को ही नायक मान लिया। यह कहा जाता है कि असंतोष से क्रोध होता है और क्रोध के माहौल में आदमी अंधा हो जाता है। हम यह देखते हैं कि यह भ्रम समाज में बाद के दशकों में बढ़ता चला गया, एक दौर ऐसा भी आया, जब गब्बर सिंह ही नायक मान लिया गया, 'शोले' के जय (अमिताभ बच्चन) ने गब्बर सिंह जैसा किरदार बहुत शौक से -दूसरों से छीनकर- निभाया। इसमें कोई शक नहीं कि १९७० का दशक असंतुष्ट नायकों का दौर है। तत्कालीन राजनीति पर अगर गौर करें, जहां एक ओर, प्रतिपक्ष (जयप्रकाश नारायण) में असंतोष का भाव था, वहीं दूसरी ओर, सत्ता पक्ष (इंदिरा गांधी) में देश में फैले असंतोष के प्रति रोष का भाव था। संघर्ष की स्थिति बनी, तो पीडि़त पक्ष को एक हद तक खुशी मिली, लेकिन वह वास्तविक जीत से वंचित रह गया। दोनों पक्ष के नायकों ने उसे निराश किया। सम्पूर्ण क्रांति का उत्थान और उसकी विफलता इसी दशक की घटनाएं हैं। यह असंतोष और विरोधाभास का दशक है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता पक्ष ने सेंसरशिप का प्रयोग किया था, आपातकाल लगा था। अखबारों ही नहीं, फिल्मों पर भी नजर रखी जाती थी। एक फिल्म 'किस्सा कुर्सी का' में सत्ता के प्रति विरोध का भाव था, तो इस फिल्म की मूल कॉपी को सत्ता पक्ष के महाबलियों ने नष्ट कर दिया था। कला से राजनीति तक चहुंओर असंतोष का भाव था।
हम यह कह सकते हैं कि इस दशक में भी निराशा, असंतोष या दुख का टोन राज कपूर ने सेट किया था। वर्ष १९७०-७१ में चर्चित रही 'मेरा नाम जोकर' फिल्म की ब्यंजना बहुत गहरी है। गरीबी और प्रेम में जब निरंतर निराशा हाथ लगती है, तब नायक जोकर बन जाता है। हम गरीब जनता ने सरकारों को चुना, बनाया, लेकिन सरकारें कहीं और समर्पित रहीं। इस फिल्म का जोकर भी तो यही करता है, अपने भोलेपन से अपने बड़े होने तक, एक के बाद एक नायिकाओं को चुनता है, चाहता है, आगे बढ़ाता है और नायिकाएं किसी और को समर्पित हो जाती हैं, तो यह अकेला, निराश आम आदमी जोकर ही तो है! वह समस्याओं से भरपूर सर्कस में खड़ा है और उसके हिस्से की तमाम खुशियां-नायिकाएं दूर चली गई हैं। वास्तव में सरकार की उपेक्षा ने आम आदमी को जोकर बनाकर रख दिया। 'मेरा नाम जोकर' को ऐसे भी देखना चाहिए। वैसी बड़े दिल वाली फिल्म बनाने का साहस फिर किसी ने नहीं किया, क्योंकि जनता जोकर दिखना नहीं चाहती। उसे तो उन सबसे बदला लेना है, जिन्होंने उसे ठगा है, लूटा है, तरह-तरह से उत्पीडि़त किया है। इस दशक में यह सिद्ध हो गया कि भारतीय नायक जोकर नहीं बनेगा, वह लड़ेगा, दुश्मनों को चुन-चुनकर मारेगा। पर्दे पर गुंडे जब पिटते थे, तब लोगों की आंखों में खुशी के आंसू आ जाते थे, आज भी आ जाते हैं। गुस्से को हिंसा से रिलीज करने का शौक भारतीय नायकों को १९७० के दशक में ही हुआ है और वे आज भी अपना यह शौक पूरा करते हैं और जनता तालियां बजाती है। १९६० के दशक का प्रेमी फॉर्मूला और १९७० के दशक की मारधाड़ - एक्शन का फॉर्मूला आज भी आजमाया जाता है और हिट होता है। सफल फिल्मी व्याकरण इस दशक में ज्यादा स्पष्ट हुआ। प्रेम, संगीत, ड्रामा, हास्य और मारधाड़, ये पांच विधाएं ऐसी थीं, जिन्होंने भारतीय फिल्मों में खुद को मजबूत कर लिया। इन विधाओं का अच्छा सम्मिश्रण आज भी हिट और सुपर हिट होता है। 
इसमें कोई संदेह नहीं कि इस दशक के प्रतिनिधि नायक अमिताभ बच्चन हैं। इस दशक का मध्य वर्ष १९७५ बहुत महत्वपूर्ण है, अमिताभ की 'दीवार', 'शोले' और 'फरार' इसी वर्ष की फिल्में हैं, जिनमें वे एंग्री यंगमैन की भूमिका में बेहतरीन तरीके से उभरे। वैसे इस दशक में रोष को जाहिर करने वाले अभिनेताओं में धर्मेन्द्र को नहीं भुलाया जा सकता। कुत्ते, मैं तेरा खून पी जाऊंगा. . . जैसा सिनेमाई संवाद धर्मेन्द्र के अलावा और किसी पर नहीं जमा। अमिताभ समय के साथ खुद को बदलते रहे, लेकिन १९७० के दशक में गुस्से वाले आदमी के रूप में धर्मेन्द्र की जो छवि बनी, उसने उनका पीछा नहीं छोड़ा और इसका प्रभाव उनके बेटे सनी देओल की छवि पर भी पड़ा। ठीक इसी तरह से १९७० के दशक में जो हिंसक मानसिकता पैदा हुई, वह आगे की पीढिय़ों को मिलती चली गई। देश में मुखर रोष के प्रतिनिधि इस दशक ने देश और फिल्मी नायक को भी हमेशा के लिए बदल दिया। 
(क्रमश:)

अब यहां से कहां जाएं हम

प्रवासी नायक : १९९० का दशक
(भाग - 8}
आदर्श भी देखे, प्रेम भी, असंतोष भी, यथार्थ भी, तो उसके बाद स्वाभाविक सवाल था ... अब यहां से कहां जाएं हम...। फिल्मी समाज ने समझ लिया कि खुद को बदलना होगा। ज्यादा यथार्थवादी हुए, तो संगीत-गीत की अहमियत घटती जाएगी, फिल्में सपना दिखाने का काम छोड़ देंगी, फिल्म का व्यवसाय मुश्किल हो जाएगा। तो फिल्मों ने यथार्थवाद की ओर से ध्यान हटाना शुरू किया। देशी नायक तो भ्रष्ट हो चुके थे, इतने यथार्थवादी हो चुके थे कि उनके सहारे सपने गढऩे का काम असंभव हो गया था। पिछले दशक में व्यावसायिक सिनेमा का नायक भीड़ में शामिल होकर बौना हो चुका था, नायिका सास या समाज के हाथों बुरी तरह से सताई गई थी, तो दूसरी ओर, खांटी समानांतर सिनेमा का नायक (नसीरुद्दीन शाह) 'पार' के बेघर मजदूर की तरह था या इसी फिल्म की नायिका (शबाना आजमी) की स्थिति एक गर्भवती सुअरी से भी बदतर हो चुकी थी। ऐसे नायक और नायिका सपनों की सौदागरी या कालाबाजारी में सहायक नहीं हो सकते थे, अत: १९९० के दशक में फिल्मों ने नायक-नायिका का विदेश से आयात किया। इसका मतलब यह नहीं कि अंग्रेज नायक-नायिका आयात हुए, आयात तो वही नायक-नायिका हुए, जिनके पूर्वज या पिता विदेश जाकर बस गए थे।
हम देखते हैं कि इसी दौर में देश ने आर्थिक उदारीकरण (वर्ष १९९१) को स्वीकार किया, विदेशियों, विदेश में बसे भारतवंशियों और प्रवासी भारतीयों की अहमियत बढ़ी। प्रवासी भारतीयों के लिए स्वर्ण युग शुरू हुआ। जैसे भारत सरकार ने विदेश में देश का भविष्य देखा, वैसे ही फिल्मों को भी अपना भविष्य विदेश में नजर आया। 

इस दशक के ठीक मध्य में फिल्म आई 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे। यह फिल्म ब्रिटेन-यूरोप से शुरू होती है और भारत आकर संपन्न होती है। प्रेम अंतरराष्ट्रीय हो चुका है और भारत एक मिलन स्थल या विवाह स्थल है। यह फिल्म न केवल सवाल उठाती है कि यहां से कहां जाएं हम, बल्कि उत्तर भी देती है कि तेरी बांहों में मर जाएं हम। यानी सपना फिर हावी हो गया, बांहों में मर जाने का सपना कितना यथार्थवादी है, यह सब जानते हैं, लेकिन लोग फिर भी सपनों की ओर मुड़े, क्योंकि वे कुछ देर के लिए अपनी जिंदगी के यथार्थ को भूल जाना चाहते थे। अपनी गंदी समस्याग्रस्त गलियों से दूर कहीं किसी मनोरम देश में लोग खुद को महसूस करना चाहते थे। कोई आश्चर्य नहीं, मानव सदा से ऐसा ही रहा है। वह जहां है, वहां से काफी दूर जाकर सोचना चाहता है। प्रसिद्ध साहित्यकार निर्मल वर्मा भी अकसर कहते थे कि 'एक अच्छी रचना पाठकों को दूसरे संसार में ले जाती है।' फिल्में भी तो यही करती हैं, हॉलीवुड की फिल्म हों या बॉलीवुड की।
सुभाष घई की 'परदेश' हो या करण जौहर की 'कुछ कुछ होता है', प्रवासी भारतीय चरित्रों को लेकर ऐसी अनेक फिल्में बनीं, जिन्होंने दुनिया भर में बसे भारतवंशियों को लुभाया, बुलाया। यह फिल्मी नायक के रूप में शाहरुख खान का चरम दौर था। वे ताजा हवा के झोंके की तरह दीवाना बनकर आए थे, यथार्थ का बोझ उनके साथ नहीं था। प्रेम की चाहत थी, जिसके लिए वे दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच सकते थे। पूंजी उनके पास बहुत थी। तलाश थी, तो सिर्फ प्रेम की। इसमें कोई शक नहीं कि यही वह दशक था, जब भारतीय समाज का प्रवासी नायकों के प्रति मोह अत्यधिक बढ़ गया। भारतीय बाप अपनी बेटियों के लिए प्रवासी दूल्हे खोजने लगे थे, मानो देश के अंदर पूंजीवाले दूल्हों का अभाव हो गया हो। सपनों को फिर पंख लग गए थे। भारतीय युवाओं को भी लगने लगा था कि उनकी कीमत तभी है, जब वे भी प्रवासी हो जाएं या फॉरेन रिटर्न हो जाएं। विदेश में पढ़ाई, नौकरी करने से नायकत्व हासिल होने लगा। लोग कबूतरबाजों के हाथों में फंसकर कबूतर बनकर विदेश जाने को लालायित थे, क्योंकि नायक होने का रास्ता विदेश में ही खुलने लगा था। यही वह दशक था, जिसमें विदेश में भारतीयों की संख्या बढ़ी और फिल्मकारों को प्रवासी दर्शकों के बारे में भी सोचना पड़ा। जैसे विदेशी पूंजी भारतीय लाभांश की ओर आकर्षित हुई, ठीक उसी तरह से विदेश में बसे अनेक प्रवासी व विदेशी कलाकार रुपहले पर्दे पर हिस्सेदारी के लिए भारत आने के सपने देखने लगे।
(क्रमश:)

इश्क दी गल्ली बिच...

विलासी नायक : २००० का दशक
(भाग - ९)
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के साथ भारत ने नई सदी में प्रवेश किया था। तकनीक, इंटरनेट से उपजी सूचना क्रांति ने देश के मिजाज को बदल दिया था। मल्टीप्लेक्स, मॉल, विदेशी उत्पादों, इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों की भरमार, विदेशी गाडिय़ों का चलन बढ़ गया था। युवा भारत की विकास गति सुधर गई थी। ऐसा लगने लगा था कि भारत अब तरक्की करता चला जाएगा, पीछे मुडक़र देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। खूब पैसा आया, ऋण लेकर घी पीना आसान हो गया। मध्य वर्ग के जो सपने पिछले दशकों में साकार नहीं हुए थे, वो इस दशक में साकार होने लगे। ऋण लेकर घर बनाना, पढ़ाई करना, विदेश जाना आसान हो गया। मस्ती की पाठशालाएं सज गईं। भारतीय समाज के एक हिस्से में कुछ संपन्नता आई। प्रभु वर्ग की तनख्वाहें बढ़ गईं। सरकारी योजनाओं में गांव के स्तर तक वितरण और लूट की संभावना बढ़ी। समाज में पैसा बढ़ा। तो सिनेमाई नायक विलासी हो गया। महंगी गाड़ी, महंगे ब्रांडेड कपड़े, महंगे विदेश दौरे, महंगे होटल, महंगी गर्लफ्रेंड, महंगे गिफ्ट का दौर आ गया। मुख्यधारा में जो फिल्में बन रही थीं, उनमें पैसा कोई मुद्दा नहीं रहा। नायक के पास ज्यादा काम नहीं था, समाज इत्यादि की ज्यादा चिंता नहीं थी, उसके पास पूरा समय था कि वह जिम जाकर 'सिक्स पैक' बना सके। सिक्स पैक बना लेने से दुश्मनों से लडऩे, शर्ट खोलने, नाचने-गाने, नायिका का दिल जीतने, खलनायकों को डराने और दर्शकों को लुभाने में सुविधा होने लगी। गरीबी से लडऩे वाले, समाज की समस्याओं से पीडि़त होने वाले सिंगल पैक बॉडी वाले नायक पीछे छूट गए, उनकी जगह सिक्स पैक वाली समृद्ध जमात आ गई। एक समय दारा सिंह और धर्मेन्द्र इत्यादि को अच्छी बॉडी का मालिक माना जाता था, ये भारतीय फिल्मों के ऐसे पहलवान थे, जिन्हें दुश्मनों से लडऩे के लिए मांसपेशियों की जरूरत नहीं पड़ी थी। अमिताभ बच्चन भी अपने चरम दौर में सिंगल पैक वाले नायक थे। २००० के दशक में पूरा मिजाज ही बदल गया। जिन फिल्मों को कभी खेतों में काम करने वाले मेहनती गठीले नायकों की जरूरत नहीं पड़ी थी, वे सिक्स पैक वाले नायक मांगने लगीं। इस दशक में यह पूरी तरह से स्थापित हो गया कि अंग प्रदर्शन एकतरफा नहीं रहेगा, नायक को भी ऐसा शरीर बनाना पड़ेगा कि वह भी अंग प्रदर्शन में नायिकाओं से मुकाबला कर सके। इस दशक में विलास का फायदा यह हुआ कि नायक अच्छे शरीर धारी होने लगे, लेकिन चरित्र का पतन भी प्रबल हुआ। 

२००० के दशक के मध्य वर्ष २००५ में एक फिल्म सुपर हिट हुई, 'नो एंट्री। यथार्थ के स्तर पर बेतुकी कॉमेडी फिल्म, लेकिन दर्शकों को खूब पसंद आई। फिल्म के केन्द्रीय नायक थे सलमान खान। अच्छे शरीरधारी नायकों में अग्रणी। वास्तविक जीवन में अविवाहित, लेकिन सिलसिलेवार प्रेम सम्बंधों वाले सबसे चर्चित और प्रशंसित फिल्मी नायक। 'नो एंट्री' में उनका किरदार पूरे इस दशक का प्रतिनिधि किरदार बनकर उभरता है। वे एक ऐसे नायक हैं, जो अपनी समर्पित पत्नी को छोडक़र दूसरी लड़कियों के पीछे भाग रहे हैं, उनके संपर्क आधुनिक गणिकाओं से भी हैं, बल्कि वे उनका अपनी कहानी आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल भी करते हैं। आधुनिक गणिका भी फिल्म की मुख्यधारा में अहम किरदार है, तो इसका श्रेय उस विलासी नायक को ही देना चाहिए, जिसके लिए मौज-मस्ती ही सबकुछ है, उसके सामने चरित्र चर्चा बेकार है। नायक दोगला भी है, वह अपनी पत्नी और प्रेमिका से तो पूरी ईमानदारी की मांग कर रहा है, लेकिन खुद अव्वल दर्जे का बेईमान है।  इस विलासी नायक के दौर में ही हम देखते हैं कि समाज में परिवार, सम्बंध, निष्ठा, बंधुत्व या मित्रता का पतन, भ्रष्टाचार, चारित्रिक पतन इत्यादि चिंता के विषय नहीं रह गए। फिल्मों ने ईमानदारी को क्षणिक तत्व या एक क्षणिक अवस्था मान लिया। इस दशक में विलास के प्रति आकर्षण ऐसे बढ़ा कि बेईमानी भी स्वीकार्य-सी हो गई। अच्छाई या अच्छी बातों का रोमांच खत्म-सा हो गया। पैसे का डंका बज उठा।
इसी दौर में 'थ्री इडियट्स' जैसी फिल्म भी आई, जिसमें नायक बहुत क्षमतावान था, कुशल था, लेकिन छात्र जीवन में ही वह शराब का सेवन करने लगा था। रेंचो नाम का यह नायक सफल रहा, फिल्म भी सफल रही, लेकिन सच्ची बात तो यह थी कि इस नायक ने एक झूठे नाम और परायी पूंजी के दम पर पढ़ाई की थी। उसकी पढ़ाई और उसके नायकत्व के आधार में झूठ था। नायक ने पराई पूंजी का सदुपयोग कर ढंग से पढ़ाई की, इसे तो लोगों ने देखा, लेकिन लोगों ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि नायक ने शराब पीकर और दोस्तों को पिलाकर इस पराई पूंजी का दुरुपयोग भी किया। अनजानी शादी में भोजन करने पहुंच गया, पिं्रसिपल के घर उत्पात में शामिल हुआ और प्रश्न पत्रों की चोरी भी की। इस फिल्म ने यह प्रमाणित कर दिया कि गरीबों के लिए भी नैतिकता ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं रही, केवल विलास महत्वपूर्ण हो गया। गरीबों को भी यही शिक्षा दी गई, पूंजी कहीं से भी ले लो, मस्त जीवन जीयो, अपना मतलब साधो और आगे निकल जाओ। इस दौर में नायकों के विलास की भी कोई सीमा नहीं रही, सारे बंधन टूट गए। ऐसी फिल्में भी आईं, जिनमें अधेड़ उम्र के नायकों को नई नवेली नायिकाओं से प्रेम हो गया। पिछली सदी के महानायक घोषित हो चुके अमिताभ बच्चन ने भी ऐसी भूमिकाओं को दो बार (चीनी कम और नि:शब्द) निभाया। विवाहेत्तर सम्बंधों वाले इस विलासी दौर में गरीब और देहाती नायक दुर्लभ हो गए। अमिताभ अपने चौथे फिल्मी दशक में विराजमान थे, लेकिन उन्होंने पूरी तरह से बदलते वक्त का साथ दिया, कभी बैंक में डाका डालने वाले बने, तो कभी डॉन, तो कभी केवल पैसे के पीछे भागने वाले चरित्र। चरित्र की बात करें, तो अमिताभ बच्चन ने 'कभी अलविदा ना कहना में 'सेक्सी सैम जैसे विलासी चरित्र को निभाकर अच्छे चरित्र की अहमियत को गौण कर दिया।
विलास के पीछे भागने और विलास में जीने वाले फिल्मी नायकों की भीड़ लग गई, लेकिन इस दशक के एक प्रतिनिधि अभिनेता-नायक को अगर चुनें, तो बेशक वह नाम सलमान खान का होगा। जो अपनी वास्तविक जिंदगी में भी युवाओं के मॉडल रहे, विश्व सुन्दरी से प्यार, नशा करके महंगी गाड़ी में सवारी, वन्य जीव का शिकार इत्यादि। समय बदल चुका था, कोई आश्चर्य नहीं, वे आदर्श बने और लोगों द्वार खूब पसंद किए गए।
(क्रमश:)

Tuesday, 26 November 2013

तोरे नैना बड़े दगाबाज रे

- भ्रमित नायक : २०१० का दशक-
(समापन भाग)
इस दशक की शुरुआत में पूरी दुनिया को आर्थिक मंदी से गुजरना पड़ा। पैसा वापस जाने लगा, नए पैसे ने आना कम कर दिया। विदेशी-प्रवासी-विलासी दूल्हे धोखेबाज निकलने लगे। कई सपने टूटे, नायक आसमान से जमीन पर गिरने लगे, लेकिन जमीन बदल चुकी थी। देश वैसा नहीं था, जैसा पहले सोचा गया था। सरकार और सरकार के नायक भ्रमित थे कि किधर जाएं। फिल्मों में तो प्यार हुक्का बार हो गया था। सुन्दर कन्या भ्रमित हो गई थी - गा रही थी कि मेरे फोटो को सीने से यार चिपकाले सैंया फेविकॉल से। ऐसा नहीं है कि यह बेतुका गाना फ्लॉप हो गया हो, इसे लोगों ने खूब पसंद किया। लोग अलग तरह की आवाज और धुन सुनकर मस्त थे, उन्हें अर्थ से ज्यादा मतलब नहीं रहा। दिखावा पूरी तरह से हावी हो गया। समलैंगिक समूह रैली निकालने का साहस करने लगे। फिल्मों के लिए समलैंगिकता एक प्रिय विषय बन गई। कुछ लोगों को अपने लिंग को लेकर भी भ्रम होने लगा। इस दशक में फिल्मों ने इस विकल्प को और मजबूत करना शुरू कर दिया कि जरूरी नहीं कि नायक किसी नायिका की ही तलाश करे, वह किसी सह-नायक को भी अपनी नायिका मान सकता है, उसके साथ जिंदगी बिता सकता है। ऐसा नहीं है कि केवल फिल्में ही भ्रम का शिकार हों, देश में भी नाना प्रकार के भ्रम चलन में हैं। नेता कितने विश्वसनीय हैं, इसे लेकर भ्रम है। घोटाले हुए हैं, तो कितना नुकसान हुआ है, इसे लेकर भी भ्रम है। हमारे देश का पैसा हमारा है या नहीं, इसे लेकर भी भ्रम है। पैसा जेब में कब तक रहेगा, इसे लेकर भ्रम है। बीवी या प्रेमिका निष्ठावान है या नहीं, इसे लेकर भ्रम है। केवल देश में ही नहीं, उसकी फिल्मों में भी विचारों की मंदी का दौर है। विचार और नैतिकता का ऐसा अकाल पड़ा कि अब पोर्न उद्योग से भी कलाकार लेने में संकोच नहीं रहा। अच्छाई और बुराई के बीच भ्रम को मानो स्वीकार कर लिया गया है। पिछले दशक में एक प्रवासी से विवाह करके विदेश चली गई स्टार अभिनेत्री माधुरी दीक्षित वापस लौट आई। भ्रम खड़ा हो गया कि लौटना था, तो गए क्यों थे? संशय बरकरार है कि यह लौटना सफल होगा या नहीं। हो सकता है, माधुरी एक अपवाद मात्र हों, क्योंकि फिलहाल ज्यादातर लोग देश से भाग जाना चाहते हैं। जो भी सक्षम है, भाग रहा है कि अब इस देश में रखा क्या है? देश के सच से भागते विदेशी निवेशकों, कंपनियों, सरकारों, नेताओं के लिए यह गाना मुफीद है ...कल मिले ये हमको भूल गए आज रे, तोरे नैना बड़े दगाबाज रे... 
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-  ज्ञानेश उपाध्याय 
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संदर्भ ग्रंथ : 1 : हीरो - पहला और दूसरा खंड - लेखक अशोक राज 
2 : वर्तमान साहित्य, सिनेमा विशेषांक - वर्ष 2002 
3 : बॉलीवुड - ए हिस्ट्री, लेखक : मिहिर बोस 
4 : आइडोलॉजी ऑफ हिन्दी फिल्म , लेखक : एम. माधव प्रसाद

Thursday, 3 March 2011

दिनों बाद दो फिल्में

सिनेमा हॉल में मैंने इतनी कम फिल्में देखी हैं कि बचपन से आज तक मैं गिना सकता हूं कि कौन-कौन-सी फिल्म देखी हैं और किसके साथ देखी हैं। पहली फिल्म शायद गंगा की सौगंध थी, जो पूरे परिवार के साथ देखी थी। फिर नूरी, मासूम, दर्द का रिश्ता, ताजमहल, हम हैं राही प्यार के, हम आपके हैं कौन, बाम्बे, रंगीला, बड़े मियां-छोटे मियां, जख्म, वाटर, सरकार, आजा नचले, सरकार राज इत्यादि। इनमें से हर फिल्म को देखने के साथ छोटी व यादगार कहानी भी जुड़ी है। संक्षेप में कहूं, तो मासूम मैंने राउरकेला, उड़ीसा के रज्जाक सिनेमा हॉल में देखी थी, जिसके लिए टिकट सिनेमा हॉल के बाहर चार घंटे सपरिवार इंतजार के बाद पिताजी ने कहीं से जुटाए थे। हम हैं राही प्यार के, मैंने राउरकेला में ही अफ्सरा सिनेमा हॉल में कालेज के दिनों में अपने अर्थशास्त्र विभाग के संगियों-सहेलियों के साथ देखी थी। याद आ रहा है, अफ्सरा सिनेमा के मालिक गफूर मियां थे, उनका एक शराब का कारखाना हुआ करता था, जहां बनाई शराब अनारकली नाम से बिकती थी। प्रदीप कुमार-बीना राय की मुख्य भूमिका वाली ताजमहल मैंने दरभंगा में देखी, जब फिल्म देखकर निकला था, तो तेज बुखार पीछे छूट चुका था। पहली बार गाजियाबाद में मैंने मल्टीप्लेक्स में सरकार फिल्म देखी, तो सरकार राज राजस्थान के कोटा के सिनेमा हॉल नटराज में देखी। बाकी कहानियां फिर कभी। तो छोटी-सी सूची है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैंने फिल्में कम देखी हैं। छोटे पर्दे पर ही सही, फिल्में ठीक-ठाक संख्या में देख रखी हैं। फिल्मों के प्रति रुचि तब जगी थी, जब राजकपूर को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिला था और सिलसिलेवार ढंग से दूरदर्शन पर राजकपूर की फिल्में दिखाई गई थीं। आज फिल्मों की ठीक-ठाक विवेचना कर सकता हूं। लगभग सभी महत्व के अभिनेताओं, अभिनेत्रियों पर बोल व लिख सकता हूं। थोड़ी मेहनत से इतना ज्ञान तो अर्जित कर ही लिया है। हालांकि फिल्मों पर लिखने के अवसर मुझे ज्यादा नहीं मिले हैं, लेकिन फिल्मों के बारे में मैंने दूसरों का ज्ञान अवश्य बढ़ाया है। फिल्म पत्रकारिता पर कुछ काम भी किए हैं और सौभाग्य से दो-तीन बार फिल्म पत्रकारिता पढ़ा भी चुका हूं।
बहरहाल, बहुत दिनों बाद जयपुर के पिंक स्क्वायर में मधुर भंडारकर की फिल्म 'दिल तो बच्चा है जी देखने गया। यह मेरे पौने तीन साल के बेटे द्वारा सिनेमा हॉल में देखी गई पहली फिल्म है, जो उसने जागते हुए और पॉपकॉर्न खाते हुए देखी। यह फिल्म खराब तो नहीं ही कही जाएगी, लेकिन भंडारकर ब्रांड की फिल्म यह नहीं है। आजकल एक ट्रेंड है कि किसी फिल्म में एक साथ अनेक कहानियां चलती हैं। दिल तो बच्चा है जी में भी तीन या चार-पांच प्रेम कहानियां चलती हैं, लेकिन तीनों ही प्रेम कहानियां एकतरफा प्रेम या प्रेम की गलतफहमी की कहानियां हैं। गीत नीलेश मिश्र ने लिखे हैं, जो हिन्दुस्तान टाइम्स में पत्रकार हैं, एक गीत को छोड़ दीजिए, तो फिल्म में गीत-संगीत मामूली ही है, भंडारकर जैसे निर्देशक इस बात को नजरअंदाज कर गए कि प्रेम कहानी या कहानियों पर आधारित फिल्मों में गीत-संगीत आला दर्जे का होना चाहिए। भारतीय समाज में प्रेम और संगीत का चोली-दामन का साथ है। भारतीय फिल्मों में आज भी बिना गीत-संगीत के प्रेम असंभव, अप्रभावी व अनाकर्षक है।
मैंने दूसरी फिल्म ७ खून माफ देखी। ख्यात निर्देशक विशाल भारद्वाज की यह फिल्म रस्किन बांड की कहानी पर आधारित है और भारद्वाज ने एक अमरीकी स्क्रीन प्ले राइटर की मदद से फिल्म भी ठीक-ठाक बनाई है। निर्देशन अच्छा है, लेकिन अंधेरा कुछ ज्यादा है। कई बार फिल्म अपनी मूल धारा से भटक जाती है। अब लगभग सब जानते हैं, फिल्म की नायिका सुजन्ना बारी-बारी से परिस्थितिवश अपने छह पतियों का खून करती है, उसका सातवां पति ईश्वर है। फिल्म अभिनय के लिहाज से शानदार है। प्रियंका चोपड़ा के लिए यह फिल्म यादगार होगी। नील नितिन मुकेश, अन्नू कपूर खास तौर पर प्रभावी हैं, जबकि इरफान खान और नसरुद्दीन शाह ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाते हैं। इन चरित्रों में जरूरत से ज्यादा कोण या झोल हैं, जिसकी वजह से यह फिल्म आम दर्शकों के सिर के ऊपर से निकल सकती है। हुआ भी यही, कोटा के नटराज सिनेमा में, ९ बजे के बाद के शो में बामुश्किल २५ लोग थे।फिल्म पर जो चर्चा हुई, उसमें यह बात सामान्य तौर पर उभरी है कि यह बिगाडऩे वाली फिल्म है। साथी या जीवन साथी बारबार बदलने को उकसाने वाली फिल्म है, लेकिन मेरी नजर में इस फिल्म में जो अंत है, उससे गहरा अध्यात्मिक बोध पैदा होता है। यह फिल्म स्थापित करती है कि भोग या काम से ज्यादा महत्वपूर्ण है संयम और मोक्ष। जहां तक मेरा मानना है, यह फिल्म यह भी संदेश देती है कि अगर आप बिगड़े हुए हों, विचलित हों, तो या तो आप मार दिए जाओगे या फिर आप किसी को मार डालोगे। सुजन्ना किसी आम महिला की तरह मारी नहीं जाती, बल्कि मारती है। यह शायद उत्तरआधुनिक नारीवाद है, या बदला या एक तरह का जयघोष है, एक तरह की खोज है, जिसे यह फिल्म मुकाम तक पहुंचाती है। वाकई, यह याद रह जाने वाली फिल्म है।

Friday, 18 December 2009

सिंपल की स्पेशल यादें


मेरे साथ बड़ी मुश्किल है, जितना मैं वर्तमान में जीता हूं, उतना ही अतीत में और भविष्य की चिंता का दौर शुरू करने के बारे में केवल सोचता रहता हूं। पिछले दिनों कुछ फालतू की व्यस्तताएं रहीं, कुछ थोपी गईं, तो कुछ ओढ़ी हुईं। मौका ही नहीं मिला, कई ऐसी घटनाएं निकल गईं, जिन पर लिख न सका। अखबार के लिए लिखा भी, तो ब्लॉग पर डालना न हुआ। अब जब ब्लॉग खोलता हूं, तो उदासी का अहसास होता है। तो आइए उदासी दूर करने की कोशिश करते हैं।
किशोरवय में देखी गई फिल्में, अभिनेता व अभिनेत्रियां जिंदगी भर याद आते हैं। पिछले दिनों मेरी एक प्रिय अभिनेत्री सिंपल कपाडिया का निधन हो गया। सिंपल वाकई सिंपल थीं, अपनी बहन डिंपल की ग्लैमरस इमेज से बिल्कुल अलग। डिंपल में एक उच्च्वार्गियता थी, आज भी है, लेकिन सिंपल ने हमेशा मध्यवर्गीयता का ही प्रतिनिधित्व किया। जैसे मध्य वर्ग को निर्णायक मौके कम मिलते हैं, ठीक उसी तरह सिंपल को भी कम मिले। जितना भी काम किया, अच्छा किया, सच्चा किया। खूब बतियाती शरारती आंखें, चेहरे पर दूसरों को सहज ही अपना बना लेने का भाव। सिंपल के जमाने में अभिनेत्रियों को जीरो फीगर का सपना नहीं आता था, अभिनेत्रियां खाते-पीते घरों की हुआ करती थीं। गौर कीजिए, तो पहले की अभिनेत्रियां स्वस्थ्य नजर आती हैं, यह बात नई अभिनेत्रियों के साथ नहीं है। शायद इसीलिए पहले की अभिनेत्रियां याद रह जाती हैं और अब की अभिनेत्रियों को बीतते समय नहीं लगता। सिंपल भी स्वस्थ्य थीं, सुंदर थीं।
तब मैं दस-ग्यारह का बच्चा था। शायद 1985-86 की बात है। पिता जी वेस्टन का रंगीन टीवी 1984 में ही खरीद चुके थे। बचपन में हम सिनेमा हॉल तो कम ही गए। बामुश्किल तीन फिल्में मैंने बचपन में सिनेमा हॉल में देखीं। पहली फिल्म मैंने दीपक टॉकीज, राउरकेला में नूरी देखी थी, दूसरी फिल्म मासूम और तीसरी दर्द का रिश्ता कोणार्क टॉकीज में देखी। हां, सामुदायिक भवनों के पास खुले में पर्दा टांगकर प्रोजेक्टर से दिखाई जाने वाली कुछ फिल्मों की यादें हैं, जैसे डॉन, मां, धर्मात्मा, रास्ते का पत्थर इत्यादि। बहरहाल, सिंपल का जो चेहरा सर्वाधिक ध्यान में आता है, वह अनुरोध फिल्म का है, जो मैंने घर में टीवी पर देखी थी। राजेश खन्ना गायक हैं। सफेद कोट पर नीली-लाल धारियां। खड़े होकर झूमते हुए रेडियो पर गा रहे हैं - आते जाते खूबसूरत आवरा सड़कों पर....। दूसरी ओर, सिंपल, नीली साड़ी, नीला ब्लाउज, खुले बाल, खिला-खिला, मुस्कराता, लजाता मादक चेहरा। पांच मिनट के इस गाने के फिल्मांकन में शक्ति सामंत के निर्देशन की शक्ति भी चरम पर है। रेडियो के शीशे पर सिंपल का ठिठका हुआ चेहरा उभरता है। और गीत जारी है - ...किस कदर ये हसीन खयाल मिला है, राह में एक रेशमी रुमाल मिला है, जो गिराया था किसी ने जानकर, जिसका हो ले जाए वो पहचानकर...। मुझे अच्छे से याद है, इस गीत के समय कोई हिल भी नहीं रहा था। सब मोहित थे। मैंने तब अहसास किया था कि मेरे जीवन में कुछ विशेष घट रहा है। वह गीत खत्म हो गया, लेकिन जो गीत मेरे अंदर शुरू हुआ, वह अभी भी जारी है। इसी गीत की एक पंक्ति मुझे बार-बार याद आती है - काश फिर कल रात जैसी बरसात हो, और मेरी उसकी कहीं मुलाकात हो, मुलाकात हो।
अफसोस, केवल यादें रह जाएंगी, न वैसी बरसात होगी, न मुलाकात होगी। जब भी दिल या दिल के बाहर यह गीत बजेगा, यही ध्यान आएगा कि सिंपल अब संसार में नहीं रहीं।