(महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा की पत्रिका बहुवचन के सिनेमा विशेषांक में प्रकाशित मेरा एक शोध लेख - जो सिनेमा के १०० साल पर एक दृष्टि डालने का प्रयास कि कैसे देश बदला है, कैसे दशक और कैसे फिल्म नायक)
- ज्ञानेश उपाध्याय -
हम मनुष्य जब गर्भ में रहते हैं, तब भी हमारे पास दिल होता है धडक़ता हुआ। तब हमारे पास दिमाग भी होता है, लेकिन सुप्त-सा। छोटी-सी बंद और दबी-दबी-सी, गीली और रिसती हुई-सी जगह पर हम सब नौ महीने बिताते हैं। उन नौ महीनों की बातें किसी को याद नहीं रहतीं। ये नौ महीने तो ऐसे रहते हैं कि हमारी जिंदगी में जोडऩे लायक भी नहीं समझे जाते, लेकिन हम जब गर्भ से निकलकर खुले में आते हैं, तब हमारे दिन जुडऩे लगते हैं, हमारा इतिहास शुरू हो जाता है, लेकिन किसी को भी अपना शुरुआती इतिहास याद नहीं रहता। क्या यह संयोग नहीं है कि शुरुआती दौर की बहुत कम फिल्में हमें याद हैं। बताया जाता है कि मूक दौर में १२८८ फिल्में बनी थीं, लेकिन उनमें से मात्र १३ फिल्में ही राष्ट्रीय अभिलेखागार में मिलती हैं। बाकी को हम भूल गए या भुला दिया। कहा जाता है कि गर्भकाल और शिशुकाल बहुत परतंत्र और कष्टमय होता है, इसलिए यह बेहतर है कि उसे भुला दिया जाए। प्रकृति ने कुछ ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि हम स्वत: अपने बीज और शिशु दौर को भूल जाते हैं। वैसे उन दिनों में जो फिल्में आईं, उनके नाम और परिचय तो हमें मिलते ही हैं और उनके दम पर भी हिन्दी फिल्मों का इतिहास बनता है।
कुछ लोग मानते हैं कि भारत में फीचर फिल्म का जन्म १९१२ में ही 'पुंडलिक' नामक फिल्म से हो गया था, लेकिन सर्वस्वीकार्य रूप से भारतीय फीचर फिल्मों का जन्म १९१३ में माना गया है। यह वही वर्ष था, जब महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिला था। उसके बाद साहित्य भले ही खूब रचा गया, लेकिन किसी भी भारतीय साहित्यकार को नोबेल नहीं मिला, दूसरी ओर, सिनेमा ने भी बहुत विकास किया, लेकिन कोई भी सम्पूर्ण भारतीय फिल्म सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान - ऑस्कर नहीं जीत सकी। अब इस पर बहस हो सकती है कि भारतीय सिनेमा और भारतीय साहित्य कितना परिपक्व हुआ है। इसी के साथ हम एक बहस यह भी जोड़ लेते हैं कि भारतीय नायक कितना परिपक्व हुआ है। यह तो दुनिया के परिप्रेक्ष्य में एक दृष्टि हो गई, लेकिन वास्तव में अगर मुख्य धारा की भारतीय फिल्मों की बात करें, तो उनमें अभी भी काफी बचपना है। सौ की उम्र पार करने के बाद भी फिल्मों में कमी खोजी जा सकती है, बचपना खोजा जा सकता है। सिनेमा, साहित्य और नायक, तीनों में यह बचपना बरकरार है। ऐसा नहीं है कि पश्चिमी सिनेमा, साहित्य या नायक एकदम परिपक्व हो गए हैं या उनमें बचपना नजर नहीं आता, लेकिन वहां तुलनात्मक रूप से परिपक्वता और तार्किकता ज्यादा है और तभी वह सिनेमा पूरी दुनिया को अपील करता है, जबकि मुख्यधारा के भारतीय सिनेमा की अपनी एक सीमा है। जैसे भारत, भारतीय समाज और भारतीय आधुनिक मन की एक सीमा है।
देश बदलता रहा है और उसके साथ-साथ फिल्में भी कुछ-कुछ बदलती रही हैं और साथ में उनके नायक भी बदलते रहे हैं। आज के देश, सिनेमा और नायक में हर दौर का कुछ न कुछ शामिल है। एक ही साथ अलग-अलग समय के दृश्य, प्रतीक, गुण और दोष चल रहे हैं। थोड़ा बचपन, थोड़ा किशोरपन, थोड़ी जवानी, थोड़ी प्रौढ़ता और थोड़ा बुढ़ापा, मानो मिलजुलकर कभी थोड़ा-तो कभी ज्यादा साथ-साथ चल रहे हैं। वैसे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बच्चा जब जवानों की तरह बात करता है, तो उसे अपवाद स्वरूप लिया जाता है, ठीक वैसे ही जवानी में बचपन के लक्षण को अपवाद स्वरूप ही लिया जाता है। बचपन वास्तव में बचपन है और जवानी वास्तव में जवानी। इस बात को ध्यान में रखते हुए मोटे तौर पर समय और उसके प्रभावों को लेकर हम एक रोचक अध्ययन यह कर सकते हैं कि बदलते देश में बदलते दशक के साथ फिल्मी नायक कैसे बदलता चला गया।
दशक वार अगर हम देखें, तो नायक कुछ यों नजर आते हैं।
बीज नायक : 1910 का दशक
शिशु नायक : 1920 का दशक
किशोर नायक : 1930 का दशक
वयस्क नायक : 1940 का दशक
आदर्श नायक : 1950 का दशक
प्रेमी नायक : 1960 का दशक
असंतुष्ट नायक : 1970 का दशक
यथार्थवादी नायक : 1980 का दशक
प्रवासी नायक : 1990 का दशक
विलासी नायक : 2000 का दशक
भ्रमित नायक : 2010 का दशक
भारतीय फिल्मों के शुरुआती दो दशक बीज नायक और शिशु नायक को समर्पित रहे। हम जीना और चलना सीख रहे थे। हमें ठोकर लग रही थी, हम गिर रहे थे, फिर उठकर चल रहे थे। फिल्मों ने भी पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियां सुनकर-सुनाकर बचपन बिताया। हमें यह अहसास नहीं था कि हम समाज से भी नायक उठा सकते हैं, तो हमने लगभग सभी नायक अपने पुराणों और इतिहास से उठाए। भारतीय सिनेमा ने पौराणिक कथाओं के साथ ही शुरुआत की और यह कहा जाता है कि शुरुआती वैचारिक बुनियाद तो बचपन में ही बनती है, हमें बचपन में जो संस्कार मिलते हैं, उनसे ही हमारा मानस बनता है। तो कोई आश्चर्य नहीं, आज भी भारतीय फिल्मों की ज्यादातर कहानियां पौराणिक कथाओं-महाभारत-रामायण के कथा-ढांचे से बाहर नहीं आ पाई हैं। दर्शकों को नायक और खलनायक के संघर्ष में आज भी बहुत आनंद आता है। ज्यादातर आधुनिक भारतीय फिल्मों ने भी यह आनंद लेना और देना नहीं छोड़ा है। अच्छे-अच्छे निर्देशक यह ढांचा तोडऩे की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर को फिर पारंपरिक ढांचे में आकर काम करना पड़ता है। यानी भारतीय फिल्मों के बीज और शिशु नायक ने आज भी हमारा पीछा नहीं छोड़ा है।
यह वही दौर था, जब भारत की आजादी के नायक सिर उठा रहे थे, उनके सब्र का बांध टूटने लगा था, उन्हें समझ में आने लगा था कि देश की मुक्ति के लिए खड़ा होना पड़ेगा। यह कहा जाता है कि बिना मांगे कुछ नहीं मिलता और बिना रोए मां दूध नहीं पिलाती, तो यह वह दौर था, जब फिल्मों ने रोना और मांगना शुरू किया।
क्रमश:
किशोर नायक : 1930 का दशक
भाग - 2
१९३० वह वर्ष था, जब गांधी जी दांडी मार्च पर निकले थे। उन्होंने फैसला कर लिया था कि अंग्रेजों द्वारा थोपे गए उन तमाम कानूनों को तोड़ेंगे, जो अन्याय के प्रतीक हैं। इसी वर्ष गांधी जी को अन्य भारतीय नेताओं के साथ प्रथम गोलमेज बैठक के लिए लंदन बुलाया गया था। देश की आवाज सुने जाने की बुनियाद तैयार हो चुकी थी और संयोग है कि १९३१ में भारतीय फिल्मों ने भी बोलना शुरू कर दिया। फिल्मकार अर्देशर ईरानी की 'आलम आरा' रिलीज हुई। विश्व पटल पर भारत की आवाज को साफ होने में वक्त लगा, ठीक उसी तरह से १९३० के दशक में फिल्मों में आवाज को साफ होने में वक्त लगा। कई फिल्में तो १९३४ तक मूक ही बनती रहीं। जैसे एक शिशु धीरे-धीरे बोलना शुरू करता है और धीरे-धीरे ही उसकी आवाज साफ होती जाती है, ठीक उसी तरह से १९३० का दशक भारतीय फिल्मों की आवाज साफ होने का दौर है। कहा जाता है कि छोटे बच्चे खूब बोलते-गाते हैं, तो १९३२ में बनी फिल्म इंद्रसभा में ६९ गीत थे, क्या यह चौंकने वाली बात है?
इस दौर में भारत में संघर्ष के अनेक स्रोत तैयार हो रहे थे, ठीक उसी तरह से फिल्मों में भी निर्माण के स्तर पर संघर्ष के अनेक स्रोत सामने आ रहे थे। अंग्रेजी राज का फिल्मों पर साफ असर था, अंग्रेज चाहते थे कि फिल्मों में खुलापन तो हो, लेकिन आजादी या संघर्ष की गूंज न हो। ऐसे में इस दशक में भी लगभग दो तिहाई फिल्में धार्मिक चरित्रों व पौराणिक आख्यानों को आधार मानकर बनीं। पौराणिक आख्यानों पर फिल्म बनाना फिल्मकारों के लिए भी लाभ का सौदा था, क्योंकि तब तक ऐसे आख्यानों को लोगों ने किताबों में ही पढ़ा था। बोलती-भागती तस्वीरों का आनंद बढऩे लगा था, ऐसे में, लोग पर्दे पर किसी सुनी-पढ़ी कहानी को देखकर भावविभोर हो जाते थे।
वैसे इसी दशक में समकालीन सामाजिक कथाओं पर फिल्म बनाने की शुरुआत हो गई थी, जैसे मुंशी प्रेमचंद ने फिल्मकार मोहन भवनानी के लिए फिल्म लिखी थी 'द मिल', जो १९३४ में रिलीज हुई थी। बताया जाता है कि इस फिल्म का मजदूर समाज पर गहरा असर हुआ था, फिल्म देखकर मजदूर भडक़ जाते थे। प्रदर्शन के बाद दंगे जैसी स्थिति पैदा हो जाती थी, लाहौर, पंजाब, दिल्ली इत्यादि शहरों में इसे प्रतिबंधित भी किया गया था। लोगों को उद्वेलित-उत्तेजित करने वाली फिल्मों में 'द मिलÓ को भारत की पहली फिल्म माना जाता है।
इस दशक के बिल्कुल मध्य में १९३५ में वी. शांताराम की 'अमृत मंथन' रिलीज हुई थी और आगे के दशकों में एक मास्टर फिल्मकार के रूप में स्थापित हुए महबूब खान की 'जजमेंट ऑफ अल्लाह'। बताते हैं कि 'अमृत मंथन' में जूम शॉट्स की शुरुआत हुई थी, यानी चीजों पर करीब से फोकस करने की शुरुआत। १९३० के दशक में फिल्मों के बारे में यह अहसास होने लगा था कि इन्हें हंसी में नहीं उड़ाया जा सकता। देश का मानस बनाने में फिल्मों का बहुत योगदान न था, लेकिन फिल्में उस दिशा में बढऩे लगी थीं। समाज और फिल्मों के बीच सम्बंध बनने लगा था। समाज फिल्मों को समझ रहा था और फिल्में समाज को समझ रही थीं। १९३० के दशक में ही भारतीय सिनेमा की कुछ अच्छी हस्तियों की फिल्मी मानसिकता तैयार हुई। फिल्में नौटंकी, रामलीला और पारसी थियेटर से बढक़र भी कुछ हो सकती हैं, इसका अहसास होने लगा। अच्छे घरों के युवक-युवतियां भी फिल्मों में आने के बारे में सोचने लगे थे। जो लोग फिल्मों को बुरा माध्यम समझते थे, वे भी फिल्मों की उपेक्षा नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि ईश्वरीय चरित्रों, संतों, ऐतिहासिक चरित्रों इत्यादि पर ढेरों फिल्में बन रही थीं। लोग विज्ञान का जादू और धार्मिक कथा के आकर्षण में खिंचे चले आते थे। कुल मिलाकर १९३० के दशक में यह लगने लगा था कि फिल्में कुछ खास करने वाली हैं। इस दौर में के.एल.सहगल सबसे बड़े स्टार थे, वे अभिनेता से ज्यादा गायक थे। उनका अभिनय सादा और सतही-सा होता था, मानो किशोर दौर का शिशु स्तरीय अभिनय। वे ढंग से नाटकीय भी नहीं हो पाते थे। दूसरे शब्दों में कहें, तो सहगल के अभिनय में भी अलग तरह का भोलापन था, जैसे इस देश के लोग भोले थे, ठीक उसी तरह से। के.एल.सहगल न गायकी में प्रशिक्षित थे, न अभिनय में, वे अभिव्यक्ति एवं प्रदर्शन के लिए संघर्षरत थे, जैसे यह देश संघर्षरत था। जैसे देश के लिए किया जा रहा संघर्ष सबको प्रेरित कर रहा था, ठीक उसी तरह से सहगल द्वारा किया गया संघर्ष भी बहुतों को प्रभावित कर रहा था। उस दौर में अभिनेता और आम लोग सहगल की तरह गीत गाने और अभिनय करने में आनंद की अनुभूति करते थे और लगता था कि सबकुछ ऐसे ही चलेगा। १९३५ में ही पी.सी. बरुआ ने सहगल को मुख्य भूमिका में लेकर 'देवदास' का निर्माण किया था। आज अगर इस 'देवदास' को कोई देखे, तो सबकुछ बड़ा बचकाना लगेगा, लेकिन हंसने वाली कोई बात ही नहीं है, क्योंकि वाकई यह फिल्मों के लिए किशोर दौर था। फिल्में ठीक से बढऩा, बोलना और दौडऩा सीख रही थीं।
फिल्में तो अपने बचपन व किशोरवय को छोडक़र आगे बढ़ गईं, लेकिन वास्तव में देश १९३० के दौर की बहुत-सी चीजों को आज भी ढो रहा है। जैसे इसी दौर में सांप्रदायिकता और जातिवादी राजनीति भी उभरने लगी थी। १९३५ में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट पास हो चुका था और देश में विभिन्न स्तरों पर संघर्ष के अनेक बचकाने प्रयोग हो रहे थे, कुछ ऐसे प्रयोग आगे चलकर युवा या अधेड़ हुए, लेकिन कई प्रयोग आज भी बचकाने ही लगते हैं और वैसे ही बने हुए हैं। १९३० के दशक का अध्ययन अगर किया जाए, तो हम पाएंगे कि इस दशक में अंग्रेज देश को बांट रहे थे, भारत को ११ प्रांतों में बांट दिया गया था, बर्मा को भारत से अलग कर दिया गया था। कांग्रेस में फूट पड़ गई थी। सुभाष चंद्र बोस ने अपना अलग रास्ता चुन लिया था। वैसे संयोग व दुर्भाग्य से नेताजी का यह प्रयोग भी अगले दशक में बहुत हद तक बचकाना-सा ही सिद्ध हुआ।
दूसरी ओर, यह सुखद संयोग है कि इस दशक में भारतीय राजनीति और समाज में पुख्ता रूप से कुछ हस्तियां उभरीं, ठीक उसी तरह से फिल्मों में भी के.एल. सहगल, सोहराब मोदी, मोतीलाल, अशोक कुमार, पृथ्वीराज कपूर जैसे अच्छे अभिनेता उभरे, जिन्होंने बाद की पीढिय़ों को अपने अच्छे काम से बहुत प्रभावित किया।
क्रमश:

वयस्क नायक : १९४० का दशक
भाग - 3
इस दशक में फिल्मी माहौल कुछ गंभीर होने लगा था, लडक़पन तो काफी हद तक पीछे छूट गया था। पौराणिकता के प्रति आकर्षण कम होने लगा था और फिल्में समकालीन समाज को सम्बोधित करने लगी थीं। इस दौर में फिल्मी नायक को एक पुख्ता रूप देने में जिन गंभीर फिल्मकारों का नाम लिया जा सकता है, उनमें देविका रानी, महबूब खान, नितिन बोस, वी. शांताराम, अमिय चक्रवर्ती, के.ए.अब्बास, केदार शर्मा, कमाल अमरोही और राज कपूर इत्यादि प्रमुख हैं। इनमें से कुछ फिल्मकार कहीं न कहीं इटली में उभरे फिल्मी नवयथार्थवाद से प्रभावित थे। नवयथार्थवादी फिल्में समय की मांग थीं। विश्व युद्ध से पीडि़त दुनिया, जिसमें बहुत गरीबी, बेरोजगारी और असमानता थी, वर्ग संघर्ष बढ़ गया था, आजादी की मांग बढ़ गई थी, विज्ञान भी तेज तरक्की कर रहा था, ऐसे में फिल्मों को ज्यादा समय तक समकालीन चेतना से बचाया नहीं जा सकता था। जैसे दुनिया में नवयथार्थवादी सिनेमा सशक्त होकर उभरा, वैसे ही भारत में भी ऐसे फिल्मकार होने लगे, जिनकी नजर केवल बाजार या टिकट खिडक़ी पर नहीं थी, जो समाज के बारे में भी निरंतर सोच रहे थे। हालांकि लोगों में भी मुक्ति की चाहत थी। भारत की अगर बात करें, तो आजादी की चाहत इस दशक में शिखर पर थी, समस्याओं से स्वतंत्र होने और राहत पाने की इच्छा थी। यह दुनिया में अंग्रेजों की हार का दशक था, भारतीय युवा विजेता के रूप में खड़ा हो चुका था और भारतीय फिल्मी नायक भी विजेता के रूप में पहचान बनाने लगा था। फिल्में राह दिखाने की मुद्रा में आने लगी थीं। जहां मनोरंजन करना उनका ध्येय होता था, वहीं उनमें यह प्रगतिशीलता भी गहरे बसने लगी थी कि लोगों और समाज का भी कुछ भला करना है, कोई न कोई अच्छा संदेश देना है। गांधीवादी, माक्र्सवादी या समाजवादी प्रभाव फिल्मों में स्पष्ट दिखने लगा था।
यह वही दशक है, जिसमें संगीत भी खुलकर रंग जमाने लगा। यह महज संयोग नहीं है कि संगीत का आनंद और संगीत की मनमोहक लय तभी बनी, जब देश आजाद हुआ। आजाद हवा में गीत गाने और सुनने का आनंद बढ़ गया। देश १९४७ में आजाद हुआ, तो मानो फिल्मी संगीत को कोठों और नाटकीयता के करीब पहुंच रही शास्त्रीयता से आजादी मिली। दो फिल्मों ने भारत में संगीत के व्याकरण को काफी हद तक बदल दिया और संगीत को सुगम-सुलभ-सरस बना दिया। १९४९ में ही राज कपूर की 'बरसात' फिल्म रिलीज हुई थी, जिसमें शंकर-जयकिशन ने कमाल कर दिया था। इसी वर्ष दूसरी संगीत प्रभावी फिल्म थी, कमाल अमरोही की 'महल', जिसमें संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने भी संगीत को सुगम बनाने में योगदान दिया। लता मंगेशकर के नेतृत्व में देश के ज्यादातर गायकों की आवाज भी आजाद हुई और नकल या नाक के प्रभाव से अपनी-अपनी मौलिक आवाज की ओर गायक बढ़ चले। वाकई मौलिकता ही शानदार निर्माण में कारगर होती है। देश में भी अनेक मौलिक कार्य हो रहे थे और फिल्मी दुनिया में भी अनेक मौलिक कार्य हो रहे थे। फिल्में पूरी तरह से देश का साथ देने लगी थीं। पंडित नेहरू की नीति समाजवाद की निकट थी, तो ज्यादातर फिल्में भी समाजवादी प्रभाव में थीं।
इस दशक में हम अगर कोई एक प्रतीक नायक खोजने की कोशिश करें, तो थोड़ी मुश्किल होती है, लेकिन दिलीप कुमार को हम इस दशक का प्रतिनिधि नायक मान सकते हैं। वर्ष १९४५-४६ में नितिन बोस के निर्देशन में दिलीप कुमार की भूमिका वाली फिल्म 'मिलन' आई थी। बाम्बे टॉकीज की यह फिल्म दिलीप कुमार की पहली हिट थी। इसके पहले दिलीप कुमार 'ज्वार भाटा' और 'प्रतिमा' फिल्म में काम कर चुके थे, लेकिन जब 'मिलन' आई, तो उनकी मैथड एक्टिंग या पद्धतिबद्ध अभिनय को देखकर स्पष्ट हो गया कि न केवल भारतीय फिल्मों को एक वयस्क नायक मिल गया है, बल्कि अभिनय में भी वयस्कता आ गई है। 'मिलन' के बाद दिलीप कुमार की इसी दशक में नौ और फिल्में आईं और वे प्रेमी, समर्पित नायक के रूप में हर दिल अजीज हो गए।
क्रमश:
आदर्श नायक : १९५० का दशक
भाग - 4
१९५० का दशक आदर्श दौर है। इस दौर में फिल्मकारों के दिमाग में भी देश और समाज के प्रति चिंतन हावी था। यह महबूब खान, दिलीप कुमार, राज कपूर, बिमल राय, के.ए.अब्बास, गुरुदत्त, चेतन आनंद, देव आनंद का चरम दौर है। इसी दशक में सत्यजीत राय ने भी अपनी सजग चेतना से पूरे भारतीय चिंतन को प्रभावित किया। इस दौर की शुरुआत में 'आवारा' जैसी बेहतरीन फिल्म आई, 'मदर इंडिया और 'जागते रहो, जैसी फिल्म भी इसी दौर में बनी। १९५५ में राज कपूर की फिल्म 'श्री ४२० आई। इस फिल्म में नायक अमीर होने के लिए गलत राह पर चल पड़ता है, लेकिन अभिनेत्री अपने आदर्श से जरा भी नहीं डिगती और अंतत: नायक भी आदर्श की ओर लौट आता है। इस दौर की फिल्मों में आदर्श की जीत बहुत आम परिघटना थी। गलत से गलत व्यक्ति भी आदर्श की ओर लौट आता था या जो नहीं लौटता था, वह मारा जाता था। इसी दौर में शंभु मित्रा की 'जागते रहो' जैसी शानदार फिल्म आई, जिसमें यह दिखाया गया कि अमीर होने के लिए लोग क्या-क्या करते हैं और एक ईमानदार गरीब आदमी पानी के लिए भी तरस जाता है, वह पानी भी पीता है, तो उसे चोर कहा जाता है। इस फिल्म का गरीब नायक खड़े होकर पूरे समाज को आईना दिखा देता है।
वास्तव में १९५० का दशक भारतीय फिल्मों में नायकत्व के सशक्त होने का समय है। भारतीय समाज सदा से नायक की तलाश में रहा है, कोई ऐसा नायक, जो सबके लिए बात करे, सबके लिए लड़े, सबको सम्बोधित करे। इस दशक में सरकार के अंदर ही अनेक नायक थे, जो आजादी की लड़ाई से होकर उभरे थे। महात्मा गांधी का दौर बीत चुका था, पंडित जवाहरलाल नेहरू का दौर चल रहा था। नेहरू फिल्म प्रेमी व्यक्ति थे। वे फिल्म वालों की लोकप्रियता से प्रभावित रहते थे। उनके समय सरकार ने फिल्मों के विकास के लिए कई तरह से प्रयास शुरू किए, इससे भी फिल्मों में नायकत्व को बल मिला। पहले के दशकों की अपेक्षा इस दशक में फिल्में ज्यादा बेहतर ढंग से सुलझने लगीं, साफ-साफ अपनी बात रखने लगीं। गरीबी, अभाव, तरह-तरह के भेदभाव, जातिवाद, सांप्रदायिकता, फासीवाद, हिंसा इत्यादि देश की बड़ी समस्याओं को फिल्मों ने बहुत तरीके से भरपूर मनोरंजन करते हुए भी प्रस्तुत किया।
इस दशक के प्रतिनिधि नायक-अभिनेता का अगर चुनाव किया जाए, तो दिलीप कुमार, देव आनंद और राज कपूर के बीच में हमें राज कपूर को चुनना चाहिए, क्योंकि वे एक ही साथ कई तरह की प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे थे। निर्माता, निर्देशक, अभिनेता, संपादक इत्यादि की भूमिका में वे अपने समकालीन स्टारों से आगे थे। हां, इसी दौर में एक और प्रतिनिधि नायक-अभिनेता को भी श्रेय देना चाहिए, बलराज साहनी। इनके बिना यह दशक आदर्श नहीं बनता, बिमल राय के निर्देशन में 'दो बीघा जमीन' फिल्म बलराज साहनी के लिए ही नहीं, बल्कि इस दशक में नया सिनेमा के लिए भी उत्कर्ष है।
इस दशक की एक और खास बात है कि नायक आदर्शों और समाजवादी मूल्यों का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थक था, लेकिन उसे ठीक से प्यार करना नहीं आता था। प्यार की अनुभूति मजबूत आकार नहीं ले सकी थी। 'अरेंज्ड मैरेज' का समाज था, जैसी समाज और परिवार की इच्छा होती थी, युवा वैसा ही करते थे। अपने प्यार की बलि चढ़ा देते थे या समझ ही नहीं पाते थे कि प्यार में क्या किया जाए। ध्यान दीजिए, इसी दौर में बिमल राय ने 'देवदास' का निर्माण किया। एक ऐसा नायक जो न ठीक से प्यार कर सका, न ठीक से प्यार पा सका। गुरुदत्त की 'प्यासा' में भी यही हुआ। देवदास अगर चाहता, तो बहुत आसानी से पारो से विवाह करके सुखी हो जाता, पारो उसे बहुत चाहती थी, लेकिन फिर वही जमींदारी, लोकलाज, परिवार, समाज इत्यादि-इत्यादि। फिर उसे चंद्रमुखी से प्यार हुआ, लेकिन वह भी मुकाम पर नहीं पहुंच सका, फिर वही लोकलाज, परिवार, समाज इत्यादि-इत्यादि। शायद यह एक तरह से प्रगतिशीलता का आह्वान था कि देखो, व्यक्तिगत प्यार की कोई औकात नहीं, देश को देखो, समाज को देखो और तब फैसला लो। एक तरह से इस दशक में नायक यह तो बोल सका कि मैंने दिल तुझको दिया, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ा सका, क्योंकि उसमें साहस का अभाव था। प्रेम की पुकार की तुलना में देश, समाज और परिवार की पुकार बड़ी थी। फिर भी १९५० के दशक का फिल्मी नायक सम्पूर्ण हिन्दी सिनेमा का सबसे प्रभावी नायक है, इसकी नकल आज भी हो रही है। हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि १९५० के दशक का नायक ही भारतीय सिनेमा को विश्व पटल पर ले गया था। राज कपूर दुनिया के कई देशों में लोकप्रिय थे, ठीक वैसे ही जैसे विश्व पटल पर नेहरू राजनीतिक दुनिया में चर्चित थे। पंडित नेहरू समाजवादी थे और उस दौर के राज कपूर भी समाजवादी। यह एक अलग तरह के आश्चर्य का समय था, सरकार भी नैतिकता के साथ समता और संपन्नता के सपने देख रही थी और फिल्मों ने भी यही किया। उस दौर की सरकार भी सेकुलर होने के प्रयास में थी और फिल्में भी ठीक ऐसा ही कर रही थीं। कोई शक नहीं, जब भी भारतीय फिल्मी नायक का विश्वास डिगेगा, उसे १९५० के दशक के पूर्वज नायक से सीखना पड़ेगा और देश को तो अपनी बेहतरी के लिए उस दशक के अनुभवों से हमेशा सीखना चाहिए। इस दशक में बहुत कुछ है सीखने के लिए।
क्रमश:

प्रेमी नायक : 1960 का दशक
भाग - ५
यह दशक प्रेमियों का दशक था। इस प्रेम का जन्म समाजवाद की कोख से हुआ था, तो उसकी मस्ती भी देखने लायक थी, ताजा खिले फूल की तरह। राज कपूर ने ही एक तरह से प्रेम का ट्रेंड सेट किया, १९६२ में उनकी फिल्म आई 'जिस देश में गंगा बहती है', उसमें एक गाना है, 'प्यार कर ले, नहीं तो फांसी चढ़ जाएगा।' यह एक तरह से नारा था कि प्यार की ओर बढ़ा जाए, क्योंकि प्यार नहीं, तो कुछ भी नहीं। इसी दशक में 'मुगले आजम' का गीत - जब प्यार किया तो डरना क्या... खूब गूंज रहा था। प्यार की मांग बढ़ गई थी। दरअसल, १९६२ में भारत को युद्ध में पराजय मिली, लोग निराश थे, नेहरू और उनके युग की विदाई हुई। १९६५ में भारत को फिर युद्ध लडऩा पड़ा, ऐसे में, गीत-संगीत और प्रेम ने टूटे व घायल दिलों पर मरहम लगाने का काम किया। फिल्में राहत की तरह थीं।
इस दशक के बिल्कुल मध्य में १९६५ में शानदार गीतों से सजी 'गाइड' रिलीज हुई। प्रेम ही फिल्म का केन्द्र था। एक गाना मानो पूरी कहानी कह रहा है - कहीं बीते ना ये रातें कहीं बीते ना ये दिन, गाता रहे मेरा दिल, तू ही मेरी मंजिल...। १९६४-६५ में ही राज कपूर की फिल्म 'संगम' की धूम थी। मेरे मन की गंगा और तेरे मन की यमुना का, बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं...
नायक की इस मनोकामना ने इस दशक में अपना चरम देखा। प्रेम का दौर था, फिल्में सौभाग्य से रंगीन हो गई थीं। सपनों को चार चांद लग गए थे। 'संगम' में राज कपूर अपना कैमरा लेकर दुनिया घूमने निकल गए। यह रंगीन होने का ही नतीजा था कि फिल्मी नायक विदेश घूमने निकल गया। देश की राजनीति में भी तरह-तरह के बदलाव और प्रयोग चल रहे थे, सत्ता बदल रही थी, सत्ता का स्वभाव बदल रहा था, तनाव बढ़ रहा था, ऐसे में, फिल्मकारों ने महसूस किया कि उनका काम है लोगों को अच्छा अनुभव कराना, क्योंकि लोग पैसे खर्च करके सिनेमा देखने आते हैं। वे अच्छा देखें, अच्छा सुनें, फिल्मकारों का यही लक्ष्य बनने लगा। यह वही दशक है, जब मेकअप का काम बढ़ गया, बनावट पर जोर दिया जाने लगा। वास्तविकता पाश्र्व में जाने लगी। राजू गाइड (गाइड) से हीरामन गाड़ीवान (तीसरी कसम) तक, सारे नायक प्रेम के पीछे भाग रहे थे। दिल का मामला नाजुक हो रहा था। यह गाना भी खूब चला कि आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर सबको मालूम है और सबको खबर हो गई. . .। लोग भी बहुत खुश थे, इस दौर में प्रेम शायद इसलिए भी ज्यादा चल गया, क्योंकि गीतों के शब्द शानदार थे और संगीत भी।
इस दशक की एक और खास बात है कि नायक और नायिका, दोनों के ही 'सेक्स अपील' में इजाफा हुआ। यह अपील कोई बुरी बात नहीं थी, क्योंकि इस अपील में उस दौर में बहुत साफगोई थी। प्यार था, सुन्दरता थी, लेकिन अनुशासन भी था। किसी के लिए मर मिटने का इरादा था, सुन्दर दिखने की चाहत थी, साफ-सुथरा रहने का प्रयास था। इसका निश्चित रूप से समाज पर गहरा असर पड़ा। एक अच्छा और साफ-सुथरा मध्य वर्ग और मध्यवर्गीय मानसिकता को तैयार करने में इस दौर के नायक ने काफी मदद की। शहरों में सुधार आया, कॉलेजों के माहौल में सुधार आया, कुछ खुलापन आया, परस्पर सामाजिकता बढ़ी, प्रेम की स्वीकारोक्ति बढ़ी, प्रेम विवाहों की संख्या बढ़ी। इस दौर की पारिवारिक फिल्मों ने भी समाज और देश को काफी कुछ सिखाया।
इस दशक के प्रतिनिधि नायक-अभिनेता अगर हम चुनें, तो शम्मी कपूर, देव आनंद और राजेश खन्ना सबसे आगे नजर आएंगे। विशेष रूप से, आज भी न देव आनंद जैसा कोई नायक मिला है और न राजेश खन्ना जैसा। दोनों ही नायकों का अलग-अलग स्नेहिल प्रभाव था, दोनों ही नायक ऐसे थे, जिनके लिए जान देने को लोग तैयार थे। कहा जाता है कि लोग इन नायकों को खून से खत लिखते थे। दोनों ही रोमांटिक और सुदर्शन अभिनेता थे। यह भी एक खास बात है कि इस दौर में अच्छा दिखने वाले अभिनेताओं की भारी मांग थी। इसी दशक में फिल्मी नायक या अभिनेता बनना कठिन हो गया। फिल्म बनाने का खर्च बहुत बढ़ गया था। स्टार छवि की मांग बढ़ गई थी। फिल्म निर्माण की चुनौती बढ़ गई थी। इस दशक के आखिर तक श्वेत-श्याम फिल्मों ने पूरी तरह से विदाई ले ली। रंगीन रुपहले पर्दे पर मजबूती से टिकना आसान नहीं रहा। वैसे प्रेम की डगर पर टिकना भी आसान नहीं होता। हम नहीं भुला सकते कि फिल्मी नायकों ने इस दशक में फिल्मों में जितना आदर्श प्यार किया, उतना अन्य किसी दशक में देखने में नहीं आया।
(क्रमश:)