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Wednesday, 8 October 2008

उनकी पुरानी बदमाशी

जाति के जर्रे : भाग आठ
तो नारा क्षेत्र की अहिमयत पूरे इलाके में है। जब ज्यादा बारिश होती है, तो पुलिया तक पानी चढ़ जाता है, सड़क पर से पानी बहने लगता है। लाठी के सहारे लोग जमीन खोजते हुए नारा पार करते हैं।
लेकिन उस साल बारिश शुरू ही हुई थी, मोहन और जवाहिर के पिताजी धूनीराम बीमार थे। जब बूंदाबांदी ठीक-ठाक होती दिखी, तो धूनीराम ने अपनी पत्नी को बुलाया और कहा, `मैं तो नहीं जा पाऊंगा। जाओ, बाबाजी लोग को बोलो, धान रोपाई का समय आ गया है। चंवर में पहले धान रोपा जाएगा, तो ठीक रहेगा।´ धूनीराम की पत्नी बारिश में पन्नी से खुद को ढके हुए हमारे घर तक आई थी और बाबूजी से कहा था, `चलिए बोआई करवाइए।´ बाबूजी भी तैयार बैठे थे, स्कूल में शायद छुट्टी का दिन होगा या फिर बारिश के कारण छुट्टी घोषित हो गई होगी। तो वे चल पड़े चंवर। खेत पर पहुंचे, तो वहां पहले से बोआई करने के लिए धूनीराम के परिवार के लोग व अन्य खेतिहर मजदूर जुटे थे, मोहन और जवाहिर भी मां और बीमार पिता के आदेश सुनकर चंवर में पहुंच गए थे। रुक-रुककर झीमी-झीमी बारिश हो रही थी, बोआई के लिए बिल्कुल सटीक समय था। धान के पौधे लेकर सबसे पहले धूनी की पत्नी पानी भरे खेतों में उतरी, तो पैर खेत में बिल्कुल नहीं गड़े। कुछ और चली, तो आगे भी खेत में पैर नहीं धंस रहे थे। चिंतित हो गई, भोजपुरी में चिल्लाई, `आहे राम, खेत में बोआई कइसे होई?´ बाबूजी मुस्कराए कि धूनी की पत्नी शायद मजाक कर रही है, लेकिन धूनी की पत्नी ने फिर ठेठ भोजुपरी में कहा, `ऐ बबुआ, बोआई कइसे होई?´
बाबूजी ने पूछा, `क्या बात है? क्यों नहीं होगी बोआई?´तब धूनी की पत्नी बोली, `मेड़ पर से उतर कर थोड़ा खेत में आइए और देखिए।´बाबूजी थोड़ा चिंतित हुए और मेड़ पर से उतर कर खेत में आए। यह क्या? खेत तो जुता ही नहीं था। बेहिसाब अचरज हुआ। थोड़ा और चले, फिर वही बात, खेत जुता ही नहीं था और ऊपर-ऊपर पानी जमा था। बोआई मुश्किल थी। उन्हें समझते देर नहीं लगी। उन्होंने गुस्से के साथ मोहन और जवाहिर की ओर देखा, जो जानबूझकर अनजान बनते हुए किसी और दिशा में देख रहे थे।धूनी की पत्नी ने भोजपुरी में कहा, `खेत त जोताइले नइखे, बोआई का हुई? रउआ, खेत न जोतवैनी हं?´ गुस्साए बाबूजी ने कहा, `अपने बेटों से पूछो, जो इस खेत को जोतने का पैसा मुझसे दो बार ले चुके हैं। पांच-छह दिन बैल खोलकर ले गए थे कि बारिश आने वाली है, चंवर में खेत जोतना है, लेकिन देख लो कैसी जोताई हुई है।´
धूनी की पत्नी ने बेटों से चिल्लाकर पूछा, `खेत की जुताई क्यों नहीं हुई?´
कोई जवाब न मिला। खेत पर बोआई के लिए आए अन्य मजदूर भी पूछने लगे, मोहन और जवाहिर की बोलती बंद थी। क्या जवाब देते? बाबूजी के बैल लेकर उन्होंने दूसरों के खेतों में जुताई की थी, कमाई की थी। दोनों ही तरफ से पैसे वसूले थे। दिमाग पर लोभ का परदा पड़ा था, उन्हें अंदाजा न था कि बारिश इतनी जल्दी आ जाएगी और उनमें बाबूजी के प्रति कोई डर भी नहीं था। वे जानते थे, बाबूजी थोड़ा-बहुत नाराज होने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकेंगे। मोहन और जवाहिर की चुप्पी में उनकी मां को जवाब मिल चुका था, वह गुस्से से कांप रही थी, `बाबूजी के बैल भी लिए, पैसे भी लिए, लेकिन दूसरों का खेत जोता और बाबूजी का खेत यों ही पड़ा रह गया। राक्षसों, तुम लोगों ने ऐसा क्यों किया? भले आदमी को ही ठगोगे? दूसरा कोई न मिला?´मोहन और जवाहिर चुप थे, मन ही मन पछता रहे थे। उनकी मां का गुस्सा चरम पर था, वह बेटों पर बुरी तरह कुपित थी, रहा न गया, लगी श्राप देने, `जिससे सबसे ज्यादा अन्न और धन मिलता है, उसी को तुम लोगों ने धोखा दिया है, जाओ, तुम लोग हमेशा अभाव में ही रहोगे, क्योंकि तुम लोगों के मन में बेईमानी है। तुम लोगों को अन्न-धन के लिए तरसना पड़ेगा।´
बाबूजी बिना कुछ बोले निराश होकर चंवर से भीगते हुए लौट आए थे। उन लोगों ने धोखा दिया था, जिन पर सर्वाधिक भरोसा था। बाबूजी को ऐसा लगा था, मानो वे सेना विहीन हो गए हों। उस साल चंवर में धान की काफी कम उपज हुई थी, लेकिन उस साल बहुत दिनों तक मोहन और जवाहिर नजर नहीं आए थे और उनके पिता धूनीराम दुख के कारण ज्यादा बीमार रहने लगे थे। बाद में धूनीराम के यहां जब अन्न का ज्यादा अभाव हो गया, तब भारी अपराध बोध के साथ उन्हें बाबूजी के पास आना ही पड़ा था। यहां न आते, तो कहां जाते? मां का श्राप जो मिला था, अन्न और धन के लिए तरस रहे थे। भूखे बच्चों का रोना बर्दास्त नहीं होता था, बीवियों ने ताना मारकर बेहाल कर रखा था। पहले मोहन भाई आए थे, बिना कुछ बोले हमारे यहां साफ-सफाई में लग गए थे। बाबूजी ने काम करते देखा, लेकिन कहा कुछ नहीं, स्कूल चले गए। शाम के समय बड़ी अम्मा ने सबसे छिपाकर मोहन को सेर भर गेहूं दिया और बाबूजी ने हथेली पर पांच रुपये मजदूरी के रखे, तो मोहन भाई की आंखों से पछतावे के आंसू बह निकले।

Tuesday, 29 July 2008

जाति के जर्रे : पांच

--विवेक हर लेती है गरीबी--
तो जवाहिर राम की आंखों में आंसू छलकने को बेताब थे। वह हमेशा की तरह बाबूजी से आंखें चुरा रहा था। घुटनों तक धोती, घनी मूंछें, छरहरा बदन। सिमट कर घुटनों पर हाथ और हाथ पर मुंह टिकाए बैठा था। बाबूजी सामने खाट पर थे, पूछा, `काहे मुंह लटकाए हो?´ `मोहन भाई दुनिया छोड़ गइलन।´बाबूजी घर के सामने पड़ने वाले नारा वाले खेतों के उस पार स्थित घनी बंसवारी को देखने लगे। मोहन भाई की यादों में उनकी नजरें ठहर गईं। एक साथ कई स्वर, कई घटनाएं, कई संवाद उभर आए। जवाहिर की आंखें बह चली थीं और बाबूजी याद कर रहे थे।

--- मोहन भाई बैलों को हल के लिए तैयार कर रहे हैं। बाबूजी भी खेत जाने के लिए तैयार हैं, `मोहन, आज चंवरा वाला खेत जुत जाना है। बारिश कभी भी शुरू हो जाएगी।´मोहन जोर की आवाज लगाता है, `जी मालिक।´और बैल चंवर की ओर बढ़ चलते हैं, उन्हें रास्ता पता है, बस खोलने और हल की रस्सी गले में बंधने की देर होती है। वे जान जाते हैं आज काम पर जाना है और मोहन भाई के कंठ से जब `चल, चलके´ आवाज निकलती है, तो बैलों का जोड़ा अपने गले में बंधी घंटियां बजाता चल पड़ता है।

हमारे चंवर वाले खेत घर से करीब चार किलोमीटर दूर पड़ते हैं। चंवर राजपूतों के गांव माने में पड़ता है। उसके पहले बिरती वाले खेत पड़ते हैं, जो नौतन गांव के तहत आते हैं और उसके पहले नहर के पास वाले और उसके बाद नौतन बाज़ार और नारा वाले खेतों की बारी आती है। घर के आसपास भी पर्याप्त जमीन है।जहां तक मेरी बात है, गांव में हमारी कितनी जमीन है, यह आज भी मैं नहीं जानता। कहां-कहां खेत हैं, यह भी मैं नहीं जानता। बस एक अंदाजा है, जिन-जिन खेतों में बचपन में गए हुए हैं, उन खेतों की याद है। विशेष रूप से जिन खेतों में हेंगाई के समय बास की पट्टी पर मोहन भाई ने बैठाया था, वे खेत अच्छी तरह याद हैं। खेत की जुताई यानी खोदाई के बाद हेंगी से खेत को समतल किया जाता है। बैलों के जोड़े के पीछे हल की जगह बांसों को जोड़कर बनाई गई पट्टी बांधी जाती है और बैलों का हांकने वाला हरवाह उस बांस की पट्टी पर चढ़ जाता है, बच्चे भी रस्सी पकड़कर मजे से हेंगी पर बैठ जाते हैं। हेंगी का कुछ भार हो जाता है, बैल चल पड़ते हैं और उबड़-खाबड़ जुते हुए खेत समतल होने लगते हैं। बचपन में हम चारों भाइयों को हेंगी पर बैठने में बड़ा मजा आता था। इतना मजा आता था कि पास वाले खेत में ही दो भाई बैल की भूमिका में होते, तो दो भाई पीढे़ से बनी हेंगी पर बैठकर आनंद लेते। सबसे बड़े भाई दिलीप उपाध्याय हम चार छोटे भाइयों को खेत में खेलते देख गदगद रहते थे और उससे भी ज्यादा गदगद बाबूजी होते थे कि शहरी बच्चे खेत में खेलकर मजबूत हो रहे हैं।

खैर, बाबूजी और मोहन भाई चंवर पहुंचते हैं। वहां पहुंचकर मोहन को खूब जोर की भूख लगती है। वह बाबूजी से बोलता है, ` पेट खाली है, घर जाएंगे, तो खाना भिजवा दीजिएगा।´ बाबूजी खेत बताकर वापस चले आते हैं। उन्हें स्कूल भी जाना है। घर आते हैं, खाना बांधने का आदेश देते हैं। नहा-धोकर स्कूल जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। स्कूल जाने से पहले मोहन भाई के पास खाना भी पहुंचाना है। बुआ पोटली बांध लाती हैं, पोटली में दस रोटियों के बराबर चार मोटी रोटियां हैं और बैंगन की सब्जी, मिर्च, नमक, प्याज। बाबूजी फिर चंवर के लिए चल पड़ते हैं। नारा वाले खेतों को पार करते हैं, नहर के पास वाले खेतों के करीब पहुंचते हैं, तो देखते हैं। अपने ही एक बिरादर उपाध्याय के खेत में मोहन की पत्नी अपने एक पुत्र के साथ काम में लगी है। बाबूजी सोचते हैं, मोहन को खाना देने चंवर तक जाऊंगा, तो स्कूल के लिए देर हो जाएगी, क्यों न मोहन की पत्नी को ही खाना पहुंचाने की जिम्मेदारी दे दूं, यह बेटे को भेजकर खाना पहुंचा देगी। बाबूजी ने ऐसा ही किया, मोहन की पत्नी ने बड़ी ललचाई निगाह से पोटली अपने पास रख ली और आश्वस्त कर दिया कि पोटली मोहन तक पहुंच जाएगी। बाबूजी स्कूल चले गए। दिन भर खूब कड़ी धूप रही थी, पसीने से परेशान जब बाबूजी शाम को स्कूल से घर पहुंचे, तो आश्वस्त थे कि चंवर वाला बड़ा खेत जुत गया होगा, बारिश कभी भी शुरू होने वाली है। मोहन की मेहनत से काम समय से हो गया। तभी बाबूजी के लिए पानी लेकर आई बुआ बताती है, `मोहन तो न जाने क्यों सुबह दस बजे ही बैल दरवाजे पर बांध गया।´ बाबूजी चौंक पड़े। पानी पीना थम गया। यानी चंवर वाले खेत नहीं जुत सके। यह तो बदमाशी है। खाना भी भिजवाया, तब भी मोहन ने दस बजे ही लाकर बैल दरवाजे पर बांध दिए और अपने घर लौट गया। आखिर क्या बात हुई? बाबूजी यही सोचते हुए फिर झटपट तैयार हुए और मोहन के टोले की ओर चले पड़े, जो कि करीब डेढ़ किलोमीटर दूर पड़ता था। मोहन घर के सामने ही खाट पर चित पड़ा था। बाबूजी को आता देखकर उठ बैठा। बाबूजी ने दूर से ही पूछा, `मोहन, खेत क्यों नहीं जुता? एकदम नाजायज बात है।´मोहन ने रोष के साथ कहा, `खाना नहीं भिजवाए, तो भूखे पेट हल कैसे चलाता?´ बाबूजी दंग रह गए। मामला समझ में आ गया। बोले, `अपनी मेहरारू से पूछो? क्या मैंने उसे खाना तुम्हारे पास पहुंचाने के लिए नहीं दिया था?´मेहरारू सब सुन रही थी, झोंपड़ी के अंदर ही कसमसा रही थी। मोहन ने आवाज देकर उसे बाहर बुलाया, वह बेवक्त बुलाने का बहाना करती मोहन पर नाराज होती हुई बेमन से बाहर आई। मोहन के एक बार पूछने पर उसने कोई जवाब नहीं दिया, जब मोहन ने डपट कर पूछा, तब उसने आंचल में मुंह छिपाए हुए कहा, `बड़ी भूख लगी थी, हम मां-बेटे ही खा गए, तुम्हारे लिए बचा नहीं।´बाबूजी आगबबूला हुए, `काम दूसरे के खेत में किया और खाना हमारे यहां का खा गई। मेरा खेत यों ही पड़ा रह गया, मेरे बैल गए और घूमकर आ गए, बताओ यह भी कोई बात हुई? सरासर नाजायज? बताओ, मैंने क्या गलत किया?´मोहन भी शर्मिंदा हुआ, बीवी को पीटने को तैयार हो गया, लेकिन वह चुपचाप वहां से खिसक गई। बाबूजी बहुत दुखी मन से घर लौट आए। मोहन एकाध दिन शर्म के कारण नजर नहीं आया। बताते हैं, उसकी बीवी बड़ी चंट थी, शायद अभी भी जिंदा है। उसे बड़ी भूख लगती थी। वह किसी के भी खेत में नजर चुराकर घुस जाया करती थी, सब्जियां कच्ची ही भकोस लिया करती थी। उसे लाज-लेहाज जरा न था। मोहन भी बेचारा क्या करता? समझा- बुझाकर हार चुका था।


बहरहाल, बाबूजी यादों में खोए थे। जवाहिर ने लंबी चुप्पी तोड़ते हुए बताया, `घर में एक भी दाना नहीं है, भाई का श्राद्ध न जाने कैसे होगा?´बाबूजी मानों यादों से जागे, हरकत में आए, `चिंता मत करो, श्राद्ध ढंग से होगा। जाओ घर से मलकिनी से बोलो, बीस किलो आटा, बीस किलो चावल ले लो, कुछ रुपये भी मैं दिए देता हूं। श्राद्ध ठीक से करो। मोहन अपने ही घर का आदमी था। बहुत किया उसने।´ जवाहिर फूट-फूटकर रोने लगा, तो कुछ बच्चे भी वहां जुट गए। बाबूजी ने पूछा, `रोओ मत, बहुत काम है, जाकर निपटाओ।´जवाहिर ने रोते हुए ही कहा, `मालिक, मोहन पर इतनी दया? आप नहीं जानते, हम लोग आपको कितना नुकसान पहुंचाए हैं। खेतों पर हमने क्या-क्या किया है, यह अगर आप जान जाएंगे, तो आपको बहुत दुख होगा। हम लोग दया के लायक नहीं हैं, मालिक।´ बाबूजी बोले, `मैं जानता हूं, याद मत करो, ये सब बेकार बात है।´जवाहिर ने रोते हुए जमीन में नजर गड़ाए हुए कहा, `मालिक, आपकी जगह कोई दूसरा होता, तो हमें बहुत पीटता, लेकिन आपने कभी कुछ नहीं कहा और आप हमारे बारे में इतना सोच रहे हैं। हम लोग कैसा सोचते थे और आप कैसा सोचते हैं? वाह रे मालिक, जाति तो जाति ही होती है न? बड़ा तो बड़ा ही होता है। आपको जान गए, किरिया (कसम) खाते हैं, आगे से हमेशा आपका भला सोंचेंगे। मेरा दोषी भाई भी आपको अजीज है, उसके लिए इतना दे रहे हैं? धन्य है।´ बाबूजी ने कहा, `चुप रहो । नीच-ऊंच मत करो। गलती तुम्हारे या तुम्हारे भाई की नहीं थी। दरअसल भूख और गरीबी अच्छे-अच्छों का विवेक हर लेती है। विवेक न हो, तो आदमी गलतियां करता चला जाता है। तुम लोगों के साथ भी ऐसा ही होता है।´

उसी क्षण जवाहिर की दुनिया बदल गई। उसकी दुनिया हमारे घर के लिए स्वार्थ से परे बस रही थी। जवाहिर आज भी है, हमारी सेवा के लिए समर्पित, अपनों से भी ज्यादा अपनों की तरह। सहज सम्मानित। मोहन भाई चले गए, काश, वे भी जवाहिर की तरह सम्मान से जी पाते, तो कितना अच्छा होता। क्रमश: