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Tuesday, 8 June 2010

बंद पड़ी मिल

हर बार चाहता हूं
चुपचाप निकल जाना,
लेकिन हाहाकार लिए
लौटता हूं हर बार।


बंद पड़ी मिल में
गरीबी की चुड़ैलें बेखौफ नाचती हैं।
अभाव के विजयी भूत
ही...ही...ही...करते हैं।
बंद सूता मिल के एक पोर्च में
वर्षों से खड़ी है अकेली गाड़ी,
कब के भाग गए ड्राइवर
भाग गई सवारी।
हर बार वह गाड़ी चुनौती देती है
आओ देखो तो सही,
मेरे कितने पुर्जे सही?
ओ, सयाने,
कब तक भागोगे बनाकर बहाने।

सूनी मिल के आहते में सूने मकान
अतीत में लौट जाना चाहते हैं,
लेकिन टूट रहे हैं ईंट दर ईंट
लोग ले जा रहे
नई के अभाव में पुरानी तरक्की
काट-काट कर,
एक दिन पुराना कुछ न बचेगा।
लेकिन अभी तो पोर्च है,
गाड़ी है, मिल है, झाडिय़ां हैं।
इस बार भी जैसे हर बार।

Sunday, 6 June 2010

बिहार से फिर लौटकर

मेरे बचपन का बिहार अर्थात गर्मी की छुट्टियों वाला बिहार, पके आम, घोड़ागाड़ी, बैलगाड़ी, खेत-खलिहान, बंसवारी, बगीचों, अनथक धमा-चौकड़ी वाला बिहार, गांव के साप्ताहिक बाजार वाला बिहार, गांव के सुन्दर मंदिर वाला बिहार। अब पीछे छूटता जा रहा है। मैं उसे पकड़ नहीं पा रहा हूं और उसकी मुझे पकडऩे में कोई रुचि नहीं है। वह शायद चाहता है कि मेरे जैसी थोड़ी समझ वाले लोग बाहर रहें, ताकि उसका कारोबार निर्विघ्न चलता रहे। बदलते बिहार में चिन्ताएं दूसरी दिशा में मुडऩे लगी हैं। बढ़ती उम्र के साथ आंखें कुछ और देखने-खोजने लगी हैं। मेरे लिए अब एक सांस्कृतिक, सामाजिक, मानसिक आघात की तरह होने लगी हैं बिहार यात्राएं। अब मजा कम आता है और तकलीफ ज्यादा होती है। अंधेरा पहले लगता था कि केवल बाहर है, लेकिन सबसे ज्यादा अंधेरा तो लोगों के दिलों में बस गया है। विकास की गाड़ी ठहर गई है, कहीं कोई नरेगा नहीं है, है तो बस लूट है। नीतीश कुमार जहां जाते हैं, वहां सड़कों को कामचलाऊं बना दिया जाता है, जैसे हमारे गांव शीतलपुर बाजार से गुजरने वाली मुख्य सड़क (एकमा-मांझी) को बना दिया गया। सड़क पर बने गड्ढों को मिट्टी और गिट्टी से भर दिया गया है। जब बारिश शुरू होगी, तो नीतीश कुमार बिहार के इस पिछड़े इलाके में झांकने भी नहीं आ पाएंगे। यहां के स्थानीय नेता हमेशा की तरह दूसरों के चेहरे पर अपनी बड़ी गाडिय़ों के बड़े पहियों से कीचड़ उछालते हुए लापरवाह गुजर जाएंगे। विकास का रायता बुरी तरह फैल जाएगा। सड़कों पर बड़े आराम से गड्ढे खोद जाएगी बारिश। अपने गांव में बिजली का मुझे बचपन से इंतजार है। वह आती है, सरकारी बाबुओं की तरह हाजिरी बनाती है और चली जाती है। परंपराओं का पतन हो रहा है। अच्छी बातें बीत रही हैं। खराब बातें जम रही हैं। जर्रा-जर्रा बेईमान होने का बेताब नजर आता है। ज्यादातर लोगों की आंखों में ईष्र्या में सनी बदमाशी नजर आती है। लाज के मोटे-मोटे परदों को लोग बेलेहाज फाड़ रहे हैं। क्रोध से जी मचल जाता है, नायकत्व जागने लगता है कि कुछ किया जाए। आखिर क्यों?
जो अच्छा है,
सिमटकर थोड़ा बचा है।
जो बुरा है,
चादर फाड़कर पसरा है।

रिस रही अच्छाई,
सिलन से बेहाल दीवारों पर
बचे हैं बस नारे
जिन्हें कोई लिख जाता है
बार-बार बचाकर नजरें।
लिखने-लिखवाने वालों से
मैं समझना चाहता हूं
नारों का सच।

यहां का सच
बाहर नारों से ढंक जाता है
अंदर सिलन से उधड़ जाता है
लेकिन पहलू दो ही नहीं
अनेक हैं।
दीवार में सीमेंट कम
ज्यादा मिट्टी है,
ईंटें कम
बेडौल पत्थर अधिक हैं।
शायद दीवार बनाई नहीं
केवल दिखाई गई है।

या शायद केवल आभास है
कि खड़ी है दीवार।

तभी तो
जो अच्छा है,
सिमटकर थोड़ा बचा है।
जो बुरा है,
चादर फाड़कर पसरा है।

Saturday, 18 October 2008

स-स्वाद यादें

(एक मित्र के लिए )
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यादों का भी स्वाद
दिल में आबाद
कुछ मीठी और ढेर सारी खट्टी
बेकार, बेमजा यादें
पीछा नहीं छोड़तीं
रहरहकर जीवन की जीभ पर
दौड़ती बिना ब्रेक
हंसती, दुखी देख।

मन करता है बुलाऊं
जो छोड़ गए ढेर सारा खट्टापन जिंदगी में मेरे
रस में गिरा गए
कुछ ऐसा, जो घुल न सका
निर्मम हठी ढेले-सा
उजड़े हुए मेले-सा
कुछ लगा है मेरे दिल में।

वर्षों से अधपकी कढ़ाई चढ़ी जलेबियां,
आंच मांगते समोसे,
तलने के इंतजार में पूरियां,
बासी होने पर अड़ी तरकारी
झूलने को लालायित झूले,
खेले जाने के इंतजार में बैलून,
अकेलेपन के राग में बांसूरी
मेले के माइक में अटका कोई विरह गीत
किसी मित्र का छूटा हुआ हाथ
जगह-जगह टूटे ठेले
तोल-मोल के झमेले,
कादो-कीचड़ कौन हेले,
यादों में उजड़े पड़े मेले में
छूटा बहुत कुछ बदसूरत।

कटारी-सा काटता कसैलापन
कभी टनों मिर्चियों का तीखापन
दौड़ता रगों में
चिढ़ता रतजगों में।

बार-बार, हर बार मजबूरन
चखा, तो जाना
स-स्वाद होती हैं यादें।

लबालब भरा दिल
लेकिन मुंह में नहीं आती
वरना थूककर चल देते हम
मुंह में रह जाता मीठा
और धूल चाटता
कसैला, खट्टा और तीखा।