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Tuesday, 16 October 2018

प्रशांत बाबू अब क्या करेंगे?

प्रसिद्ध चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर पिछले महीने जनता दल यूनाइटेड में शामिल हुए थे और उम्मीद के अनुरूप ही उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। प्रशांत किशोर एक कुशल युवा हैं, जिनकी मदद नरेन्द्र मोदी ने भी प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में ली थी। वे २०१३-२०१४ में नरेन्द्र मोदी के मुख्य रणनीतिकार थे और फिर वर्ष २०१५ में वे नीतीश कुमार के रणनीतिकार बन गए। उनकी रणनीति से केन्द्र में भाजपा सत्ता में आई, तो अगले साल बिहार में हार गई और नीतीश-लालू सत्ता में आ गए। 
पहला स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है कि वह क्या रणनीति थी, जिसकी बदौलत नरेन्द्र मोदी सत्ता में आए थे। क्या जो बड़े-बड़े वादे किए गए थे, जो जुमले उछाले गए थे, उनके पीछे भी प्रशांत किशोर का हाथ था? बड़े-बड़े वादे करके सत्ता में आने की जिस रणनीति का खुलासा विगत दिनों गडकरी जी ने किया था, उसमें प्रशांत किशोर का कितना हाथ है? चूंकि प्रशांत किशोर राजनीति में आ गए हैं, तो ऐसे प्रश्न उनसे पूछे ही जाएंगे।
अब प्रश्न यह उठता है कि जनता दल यूनाइटेड में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद का क्या अर्थ है। क्या वे पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर अर्थात बिहार से बाहर दूसरे राज्यों में फैलाने का काम करेंगे? क्या पार्टी उनकी रणनीति की बदौलत दूसरे राज्यों में पैर जमा लेगी? बिहार में शराबबंदी, अपराधियों पर थोड़ी रोक और भ्रष्टाचार के विरुद्ध कुछ कदमों को छोड़ दीजिए, तो अभी भी विकास की वह रफ्तार नहीं है, जो युवाओं को पलायन से रोक सके। रोज हजारों युवा बिहार छोडऩे को मजबूर हैं और बिहार सरकार की नीति कहती है कि जो बिहारी बाहर चले गए हैं, उन्हें लौटने की कोई जरूरत नहीं है। बिहार को विकास करता हुआ, तभी माना जाएगा, जब वहां लोगों को समय पर तनख्वाह मिलने लगेगी, जब वहां से युवाओं को पलायन रुकेगा। 
अभी एक दिन पहले ही कुछ बिहारी युवाओं से बात हो रही थी, जो अहमदाबाद में काम करते हैं। उनके मन में एक डर है और असुरक्षा बोध भी। असुरक्षा बोध इस बात को लेकर भी है कि वे अगर बिहार लौट भी गए, तो आगे जीवन का क्या होगा? बिहार में ९-१० हजार की नौकरी भी नहीं मिलती। इतने ही रुपयों के लिए युवा अपनी जमीन से दूर कहीं जाकर मेहनत करते हैं। मार खाते हैं, अपशब्द झेलते हैं। क्यों? 
नीतीश कुमार तो सोच ही रहे होंगे, लेकिन अब प्रशांत किशोर को भी सोचना चाहिए कि बिहार में ऐसा कब तक होगा? लालू प्रसाद यादव या उनका परिवार बिहार के विकास का कोई मॉडल पेश करेगा, कहना मुश्किल है। नीतीश कुमार और प्रशांत किशोर जैसे सुलझे हुए नेताओं से बिहारियों को उम्मीद है। उन्हें पैमाने पर खरा उतरना चाहिए। राजनीति में अच्छे लोग आएं, तो कामयाब होने की कोशिश भी करें। भ्रष्टाचार रुके, निवेश आमंत्रित किया जाए। सरकार अपराध को बिल्कुल रोके, ताकि निवेश सुरक्षित रहे और बढ़े। 
पता नहीं, अब कोई नीतीश कुमार को सुशासन बाबू बोलता है या नहीं? मजाक उड़ाने के लिए नहीं, बल्कि प्रेरित करते रहने के लिए भी उन्हें सुशासन बाबू बोलते रहना चाहिए, ताकि उन्हें याद रहे कि वे क्यों मुख्यमंत्री बनाए गए हैं। प्रशांत किशोर के पास एक अच्छा दिमाग है, वे उसे अपनी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करने के लिए इस्तेमाल करें, तो जरूरी नहीं कि सफलता मिल ही जाए। 
तो प्रशांत किशोर को ऐसा क्या करना होगा, जो नीतीश कुमार भी अभी तक नहीं कर पाए हैं। दरअसल, जरूरी है कि बिहार को एक ब्रांड बनाया जाए। उसके दामन पर लगे दाग मिटाए जाएं। बिहार को सशक्त बनाया जाए, बिहार को आदर्श राज्य बनाया जाए। नीतीश को मुख्यमंत्री के रूप में १२ से ज्यादा वर्ष मिल चुके हैं, रणनीति से १२ और वर्ष भी मिल जाएंगे, लेकिन बिहार कैसा होगा? क्या ऐसा बिहार कभी बनेगा, जो बाहर के राज्य के लोगों को भी खूब रोजगार देगा?  क्या ऐसा बिहार बनेगा, जहां से रोजगार के लिए कोई दुखी युवा पलायन नहीं करेगा? जहां कोई मां बाहर गए अपने बेटे के लिए नहीं रोएगी, जहां बेटा अपनी आंखों के सामने रहेगा? कम से कम ऐसे युवाओं को तो रोका जाए, जो अपना जिला-जवार छोड़ते हुए गमछा-रूमाल गीले कर देते हैं। कम से कम ऐसे किसी युवा को तो बाहर न जाना पड़े, जिस पर पूरा परिवार निर्भर है।
आखिर बिहार में इतने विरह गीत क्यों लिखे जाते हैं और कब तक लिखे जाएंगे? अकेली औरतें, माताएं, मजबूर पिता-दादा आखिर कब तक शहर की बाट जोहते रहेंगे? घर के लडक़ों को चंपारण, दरभंगा, छपरा, सिवान, आरा, पटना, गया, सुपौल, मोतीहारी जैसे शहरों में कब नौकरी मिलने लगेगी? बिहार की टे्रेनें कब तक मजदूरों को बाहर ले जाती रहेंगी? अब समय आना चाहिए, जब ये टे्रनें बाहर से मजदूर लेकर आएं। बिहार की मिट्टी को सब जानते हैं कि वह सोना उगल सकती है। जब वह सोना उगलने लगेगी, तो बिहार ब्रांड बन जाएगा, उस दिन नीतीश-प्रशांत की पार्टी अपने आप राष्ट्रीय पार्टी बन जाएगी। 

Saturday, 14 May 2016

लालू जी, आप सबकी निगाह में हैं

देश के पूंजीपति और नेता बिहार को मजदूरों का बाड़ा बनाकर ही रखना चाहते हैं। फिर हत्याओं का दौर शुरू होता लग रहा है। लालू यादव की राजनीतिक शक्ति का समय और राजनीतिक कमजोरी के समय की तुलना की जा सकती है। करनी ही चाहिए। कहां हैं, वो लोग, जो चाहते थे कि देश में नरेन्द्र मोदी की जीत का बदला बिहारवासी ले लें। एक पत्रकार मारा गया है, सब चुप हैं। चुनाव के समय बिहार के हितैषियों की बाढ़ आ गई थी, अब यही लोग देर-सबेर जंगलराज की चर्चा शुरू करेंगे।

हम देश के सबसे पिछड़े राज्य को राजनीति का शिकार बनाना चाहते हैं, जो कि वह होता रहा है और अभी भी हो रहा है। बिहार से सबको सस्ते श्रमिक चाहिए। वहां गलियों में खून बहेगा, तभी तो श्रमिकों का बिहार से ओवर-फ्लो होगा। जंगलराज की वापसी के संकेत तो उसी दिन मिल गए थे, जिस दिन आजीवन कारावास की सजा काट रहे सीवान के पूर्व सांसद को लालू ने पार्टी में बड़ा पदाधिकारी बनाया। जेल में रहकर कोई पार्टी की कितनी और कैसी सेवा कर सकता है, यह लालू से बेहतर कौन जान सकता है।

गया था अभी दस दिन पहले
सीवान - आजीवन सजा काट रहे पूर्व सांसद की फोटो पोस्टर पर लगने-टंगने लगी है। लालू जी आ गए हैं, उनके साथ फुल पैकेज भी आ गया है। उसकी झलक हर जगह दिखने लगी है, परिवारवाद से लेकर गुंडागर्दी तक। नीतीश की जो चमक २००५ से २००७ तक थी, वह झड़ चुकी है। लालू के साथ मिलकर उन्होंने अपनी सत्ता को तो बचा लिया है, लेकिन बिहार को कितना बचा पाएंगे, यह सवाल पैदा हो गया है।

कहते हैं, बिहारी बड़े भावुक होते हैं, आवेश में आ जाते हैं, लेकिन क्या फायदा? बिहार आज कहां खड़ा है? मैंने इस बार कई लोग से चर्चा की और पाया कि माहौल उद्यमशीलता का नहीं, लूट का है। समाज के एक बड़े हिस्से को उद्यमी नहीं, बल्कि लूट के लिए प्रेरित किया जा रहा है। अगर आप हाथ आई मुफ्त सरकारी-गैर-सरकारी चीज को लूट नहीं रहे हैं, तो आप मूर्ख हैं। हर योजना-नीति-कानून-सुविधा का अपने हित में फायदा लेने का जुगाड़ करना यानी अपने को बिहार के अनुकूल बनाना। १५-१६ साल से सुशासन अगर चल रहा है, तो क्या सरकारी लोग वेतन समय पर पाने लगे हैं? सभी आश्वस्त हैं कि सरकार से पैसा आएगा, लेकिन हम सरकार को क्या देंगे, यह कोई नहीं सोच रहा। जब राज्य को देने के बारे में राज्य के बड़े-बड़े नेताओं ने ही नहीं सोचा, तो फिर ये चर्चा बेकार है। आजादी मिलने के १२-१४ साल तक बिहार देश के अगले राज्यों में था, लेकिन क्या हुआ? कांग्रेस हाईकमान की चापलूसी में कीर्तिमान रचने वाले मिश्राओं और झाओं ने जो दिशाहीन-गरीब बिहार बनाया, उसमें लालू ने क्या जोड़ा? नीतीश कितना जोड़ पाए? अगर वाकई जोड़ पाते, तो राजनीति-सत्ता में टिके रहने के लिए विकास की खाली झोली वाले लालू की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि अगर आप बिहार में ये सवाल पूछिएगा, तो आपको भाजपा का एजेंट बता दिया जाएगा।

राजनीति अंदर तक घुसकर तबाह कर रही है। आपके दिमाग में राजनीति नहीं है, आप बिहार के हित की सोच-बोल रहे हैं, लेकिन लोग फिर भी आप से आपकी राजनीति और पार्टी पूछेंगे। बिहार के गांव-गांव में पंचायत चुनाव में जिस तरह से पैसे और बल का प्रभाव दिखा है, उससे कतई आशा नहीं जगती। शराबबंदी हुई है, बड़ी अच्छी बात है, लेकिन जहां नीचे तक व्यवस्था भ्रष्ट हो, वहां शराब के अवैध कारोबार को कैसे रोका जा सकता है? नीतीश से सबसे बड़ी उम्मीद यही थी कि वे व्यवस्था को ईमानदारी के लिए प्रेरित करेंगे, लेकिन वे नहीं कर पाए हैं। अब तो उनके लिए राह और कठिन है, लालू सत्ताधारी गठबंधन के पितामह हैं और उनके दोनों बेटे अपने मुंहबोले चाचा (नीतीश कुमार) के पीछे लग गए हैं। ये टीम अच्छा काम करे, तो बिहार का कायाकल्प कर सकती है, लेकिन इस टीम में किसको किस काम का अनुभव है, इसे कैसे भुला दिया जाए?

बिहार की मिट्टी तो रो रही है। नीतीश कुमार थोड़ा-बहुत सुन लेते हैं। लालू जी को भी सुनना चाहिए। इस बार कोई गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए। वे न भूलें कि उनकी बदनामी में बिहार की बदनामी भी शामिल है। वो था अंधकार का युग, सोशल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उतना मजबूत नहीं था, आज स्थितियां बदल चुकी हैं। होगा वो दौर, जब माननीयों की छत्रछाया में गुंडे जागते थे। इस बार डरकर नहीं सोएंगे बिहारी, क्योंकि बिहार को जंगल के शेर नहीं, अच्छे नेता चाहिए।

Friday, 21 June 2013

जान लेबs का हो

बिहारी राजनीति को ज्यादा महत्व देते हैं, क्या यह बात फिर साबित नहीं हुई है? बिहार को क्या अपना फायदा नहीं देखना चाहिए था? एक पिछड़ा हुआ प्रदेश, जहां बिजली, सडक़, पानी इत्यादि कोई भी मूलभूत व्यवस्था सही नहीं है, वहां के लोग जब राजनीति करते दिखते हैं, तो दुख ही होते हैं। बिहार के पुराने नेताओं ने भी यही किया, सारा प्यार दूसरे प्रदेशों पर उड़ेलते रहे। देश को पहले देखने की यही अदा बिहारियों पर भारी पड़ी, बिहारी राजनेताओं की समझ अभी भी नहीं खुली है। पंजाब, महाराष्ट्र या दक्षिण के राज्यों से बिहार ने कुछ नहीं सीखा है, इसलिए ये राज्य प्रगति करते गए हैं और बिहार वर्षों तक पिछड़ता चला गया है। बिहार तो इस देश के लिए सस्ते और मेहनती श्रमिक पैदा करने का कारखाना है। बिहार विकास के लिए रो रहा है, लेकिन यहां के नेता सिर्फ राजनीति में जुटे हैं। बिहार की माटी बार-बार आह्वान कर रही है, रहम करो, विकास करो, राजनीति छोड़ो, लेकिन बिहार के नेता तो मानों राजनीति के ठेकेदार हैं। नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी को रोकने को अपना परम कत्र्तव्य बना लिया। दूसरे किसी राज्य में किसी नेता ने मोदी के खिलाफ वैसे तेवर नहीं दिखाए, जैसे नीतीश ने दिखाए। नरेन्द्र मोदी का देश के सभी राज्यों में स्वागत है, लेकिन बिहार की सरकार उनका स्वागत करने को तैयार नहीं, शिष्टाचार का भी आभास नहीं है, क्यों? क्योंकि राजनीति करनी है, राजनीति बड़ी चीज है, बिहार तो बस बिसात है, जिस पर राजनीति के मोहरे चले जाएंगे। कभी लालू के हाथ में बाजी होगी, कभी नीतीश कुमार के हाथ में, बिहार तो हर हाल में हारेगा-लुटेगा। बिहारी जब बिहार लौटकर जाते हैं, तो सुविधाओं का अभाव देखकर दिल रोता है। हिन्दू भी रोते होंगे और मुसलमान भी। न अंधेर नगरी कहीं जा रही है और न राजा चौपट होने से बच रहा है। कथित सेकुलरिटी की झूठी आफत गले पड़ी हुई है, लोग शायद अंधेरे में रहकर सेकुलरिटी को बचाना चाहते हैं। अगर व्यवस्था को दुरुस्त किया जाए, अगर कानून और थाने सक्षम हों और ठीक से काम करें, तो सेकुलरिटी का प्रदर्शन करने की कोई जरूरत नहीं। विकास का लाभ मुसलमानों को भी मिलेगा और हिन्दुओं को भी। भाजपा ने कभी सेकुलरिटी का दावा नहीं किया, उसका जोर विकास पर है, कुछ राज्यों में उसने अच्छा काम किया है। दूसरी ओर, कांग्रेस सबसे सेकुलर पार्टी कहलाती है, उसी के राज्य में सत्येन्द्र नारायण सिन्हा मुख्यमंत्री थे, बिहार के भागलपुर में दंगा हुआ था। सैंकड़ों लोग मरे थे। कांग्रेस से लोगों ने मुंह फेर लिया, लालू को सत्ता हासिल हुई, तब नीतीश कुमार भी लालू के साथ थे, लालू-राबड़ी जब तक रहे, भागलपुर दंगा पीडि़तों को पूरा न्याय नहीं मिला। फिर भी लालू टोपी लगाकर अल्पसंख्यक हितैषी होने का ढोंग रचते हैं, लेकिन कौन मुस्लिम हैं, जो ताली बजाते हैं। लालू सबसे सेकुलर नेता थे, उन्होंने आडवाणी के रथ को बिहार में रोक दिया था, नीतीश कुमार भी सेकुलर नेता हैं, उन्होंने मोदी के रथ के राह पर निकलने से पहले ही अपने दरवाजे बंद कर दिए हैं। क्यों? क्योंकि बिहार ने सेकुलरिटी का ठेका ले रखा है? उधर, देखिए, जो असम कुछ दिनों पहले सांप्रदायिक दंगे की आग में जल रहा था, वहां से राज्यसभा सांसद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नीतीश कुमार को धर्मनिरपेक्ष बता रहे हैं, और नीतीश कुमार फुल के कुप्पा हो गए हैं। लेकिन क्या उनके फुल के कुप्पा होने से मुसलमानों का पेट भर जाएगा? क्या कथित उदारवादी हिन्दुओं को विकास नहीं चाहिए? हम झूठी सेकुलरिटी को कब तक बचाते रहेंगे, और क्यों बचाते रहेंगे? बिहारी अपना हित क्यों नहीं देख रहे हैं, सेकुलरिटी राजनीति के पेड़ पर लगने वाला कोई फल नहीं है, सेकुलरिटी तभी फलेगी-फुलेगी, जब विकास होगा। विकास होगा, रोजगार होगा, तो अमन-चैन अपने आप आएगा, और तब जो दंगाई होंगे, उन्हें भीड़ से छांटकर अलग करना ज्यादा आसान हो जाएगा, अपने विकास के प्रति सजग लोग हिंसा की निरर्थकता को समझेंगे। लालू और नीतीश ही क्यों, आप रामविलास पासवान को देख लीजिए, जो ओसामा बिन लादेन के हमशक्ल को साथ लेकर वोट मांगने निकलते थे, क्या यही सेकुलरिटी है? धिक्कार है ऐसे बिहारी नेताओं पर जो राजनीति का संकीर्ण आकलन करते हैं, बिहार का हित नहीं देखते। जब लालू के पास सत्ता थी, तो केन्द्र में विरोधी पार्टी की सरकार थी। जब नीतीश के पास सत्ता आई, तो केन्द्र में विरोधी पार्टी की सरकार थी, अगर मान लीजिए, केन्द्र में नरेन्द्र मोदी आ गए, तो उस बिहार के साथ क्या होगा, जहां की सरकार नरेन्द्र मोदी को अपने राज्य में घुसने से रोकना चाहती है? बिहार के मुखिया मोदी के साथ गलत कर रहे हैं, शिष्टाचार तक भुला चुके हैं, क्या उनके पास आंकड़े हैं कि गुजरात से कितने बिहारियों की रोजी-रोटी चल रही है? बिहार वही गलती कर रहा है, जो पश्चिम बंगाल और उड़ीसा कर रहे हैं, विडंबना देखिए, तीनों ही राज्य पिछड़े हैं, लेकिन शायद यहां के नेता सेकुलरिटी की गारंटी देना चाहते हैं, क्योंकि यह गारंटी आसान है। मुश्किल तो विकास की गारंटी में है, जो कोई नहीं देता।

Friday, 29 October 2010

अभी बहुत बाकी है



लालू और नीतीश कुमार मे यह फर्क है कि लालू ने बिहार मे पिछड़ी जातियों का मान बढाया था और उन्होंने बिहार के मान की कोई फिक्र नहीं की . लेकिन नीतीश कुमार ने पूरे बिहार का मान बढाया है. बिहार के बाहर बिहारियों की शर्म कुछ कम हुई है. लोग पहले बिहार की चर्चा चलती थी तो लालू, चारा और राबड़ी की बात करते थे. लेकिन अब जो परिवर्तन आया है उसे चतुर लालू भी महसूस करते होंगे. बिहार मे देर रात के समय भी कहीं जाना संभव हुआ है. पिछली बार जब बिहार गया था, तब एकमा स्टेशन पर रात दस बजे के बाद ट्रेन पहुंची थी, स्टेशन पर ट्रेन आने पर जरनेटर थोड़ी देर के लिए जला था और ट्रेन जाने के बाद जनरेटर बंद कर दिया गया. अमावास जैसी रात थी हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था, लगा कि क्या ऐसे ही रात बितानी पड़ेगी. लेकिन इतनी रात को भी जीप करके गाव पहुँच गए थे. मन मे एक बात खटक रही थी कि नीतीश कुमार अभी उर्जा के लिए कुछ नहीं कर पायें हैं. वैसे भी उर्जा के काम में काफी समय लगता है.
आज बिहार बिजली को तरस रहा है, बिजली अगर आ जाये तो आधा विकास तो वैसे ही हो जाएगा. बिजली से बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होता है. बिहार में जो भी नई सरकार बने सबसे ज्यादा ध्यान बिजली या उर्जा उत्पादन पर लगाना होगा. बिजली का आकर्षण कम से कम 20 प्रतिशत बिहारियों को अपने जन्म राज्य में खीच लाएगा.
वैसे तो नीतीश के जीतने की गुंजाइश बहुत ज्यादा है. अगर उनका गठबंधन नहीं जीता, तो लालू या कांग्रेस में भी अकेले दम पर सत्ता में आने की ताकत नहीं होगी. तो वे गठबंधन करेंगे. सत्ता में आयेंगे, उनके सत्ता में आने से उन तत्वों का मनोबल बढेगा जिनका नुक्सान नीतीश कुमार ने किया है. अपराधियों की एक बड़ी आबादी जेल में बैठ कर लालू के सत्ता में आने का इन्तेजार कर रही है. अपराधी जब बाहर आयेंगे तो राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव का जोर नहीं चलेगा.
मैं अगर अपने अनुमान पर कुछ संभानाओं की बात करूं तो
पहली : राजग जीतेगा और नीतीश फिर कमान संभालेंगे .
दूसरी : नीतीश की पार्टी अकेले दम पर भी जीत सकती है. बीजेपी की ताकत घट जायेगी.
तीसरी : लालू, कांग्रेस और पासवान सांप्रदायिक ताकतों के विरोध के नाम पर मिलकर सरकार बनायेंगे.
चौथी : लालू और पासवान का गठबंधन सत्ता में आएगा. हालांकि इसकी सम्भावना कम है.
पाचवी : बीजेपी अगर बुरी तरह पिट जाए तो कांग्रेस नीतीश को समर्थन दे सकती है, लेकिन ऐसा तभी होगा जब कांग्रेस 40 से ज्यादा शीट जीते और बीजेपी 20 से कम. और जब जनता दल यू बहुमत से 35 -40 सीट कम रह जाए.

लेकिन फिलहाल बिहार के लिए सर्वोत्तम विकल्प यही होगा कि नीतीश फिर मुख्यमंत्री बनें और लालू फिर हार कर आलोचना में जुटे रहे.
नीतीश को लालू पहले सुशासन बाबू कहते थे, लेकिन अब नहीं बोलते हैं , नीतीश को फिर एक बार सुशासन पर ध्यान देता चाहिए ताकि लालू ही नहीं पूरा भारत उन्हें सुशासन बाबू बोल सके. बिहार को सुशासन की बड़ी जरूरत है. नीतीश सही बोल रहें हैं कि बहुत हुआ, लेकिन अभी बहुत बाकी है.

Friday, 11 June 2010

बिहार मे पूरबी की खोज

पूरबी गीत-संगीत मुझे अच्छा लगता है। वह मुझे बेचैन करता है। कोई पूरबी गाना चले, तो रुककर मैं सुनता हूं। महुआ चैनल की कृपा से कभी-कभी पूरबी सुनने को मिल जाता है, लेकिन मेरी इच्छा है कि पूरबी गानों की एक पूरी सीडी या डीवीडी रखूं। इस बार बिहार यात्रा के दौरान पूरबी की खोज करता रहा। हर जगह निराशा ही हाथ लगी। दुकान वाले नए गाने तो जानते हैं, लेकिन पूरबी संगीत की पहचान न के बराबर लोगों को है। मेरे परिवार में ही पूरबी पहचानने वाले कम लोग हैं, हालांकि सुना सभी ने है। थोड़ा गाकर भी बताया, फिर भी पूरबी खोजने में मुश्किल आई। गुड्डू रंगीला टाइप गानों या फिर अच्छों में मनोज तिवारी ने दुकानों को भर रखा है। पता नहीं किसी ने केवल पूरबी पर काम किया है या नहीं?
लौटने के दिन ४ जून को अंतिम मौका था, थावे वाली माता के दर्शन के लिए गया था। उनके और हरषू भगत के दर्शन के बाद सीडियों की दुकानों को खंगालना शुरू किया। यहां भी वही जवाब। बहुत खोजा, पूछा तो एक जगह गायिका कल्पना के संग्रह में एक पूरबी गाना मिला, उस गाने के नाम पर ही सीडी का नाम था : देवरा तूड़ी किल्ली। जो लोग भोजपुरी थोड़ा भी समझ रहे होंगे, वे इस गाने का अर्थ समझ गए होंगे। इसके मुखड़े का हिस्सा है, आ जा घरे छोड़ के तू दिल्ली, देवरा तूड़ी किल्ली। यह गाना मैं पहले भी सुन चुका था, लेकिन गाना चूंकि पूरबी में है, इसलिए शब्दों को भूलकर उसके धुन में रमना मेरे लिए आसान है। इस सीडी के अलावा भरत शर्मा और शारदा सिन्हा के गानों की सीडी भी खरीदकर लौटा।
दुख होता है, जो समृद्ध है, वह किनारे पर पड़ा है। भिखारी ठाकुर का पूरा काम और पूरबी, विदेशिया को बहुत ऊंचाइयों पर ले जाया जा सकता है, लेकिन वांछित प्रयास नदारद हैं। जगह-जगह 'चोलिया के हूक राजा जी लगाए दीहीं और 'हम पाड़े हईं टाइप गाने गूंजते सुनाई पड़ते हैं। ऐसे ही गानों का बड़ों और बच्चों पर भी गहरा प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे ही गाने लोगों की जुबान पर चढ़ रहे हैं। उदाहरण के लिए, पिछले दिनों एनडीटीवी के मनीष बिहार के आरा जिला के गांवों में रिपोर्ट कर रहे थे। इन इलाकों में पानी में आर्सेनिक की मात्रा इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि ऐसे बच्चे पैदा हो रहे हैं, जिनकी आंख ही नहीं होती है। रवीश कुमार की जानदार आवाज वाली वह डाक्यूमेंट्री मुझे याद है। एक बिना आंख वाला बच्चा कैमरे के सामने नाचते हुए गा रहा था, 'चोलिया के हूक राजा जी लगाए दीहीं। यह सुनकर मैं सिहर गया था, वह सिहरन अभी लिखते हुए भी उतनी ही महसूस हो रही है।
बिहार के संगीत के बारे में मैं कहना चाहूंगा कि संगीत समृद्ध है, लेकिन शब्द भटक चुके हैं। दिलों में काफी उजास है, लेकिन बाहर जो झलक रहा है, वह केवल अंधेरा है।
मैं एक और अच्छा गाना खोज रहा था, जो सुर संग्राम कार्यक्रम में शायद नंदन-चंदन नाम के दो गायक भाइयों ने गाया था, 'काहे खिसियाइल बाड़ू जान लेबू का हो, बोलो हमारा सुगनी परान लेबू का हो। यह भी नहीं मिला। नेट पर खोजा, तब भी नहीं मिला। ३१ मई को जब भतीजे की बारात पटना जा रही थी, तो भतीजों की मांग पर यह गाना मैंने सुनाया था। भतीजों ने कहा है कि वे यह गाना खोजने में मेरी मदद करेंगे।
खैर, बारात यात्रा के दौरान आर।डी बर्मन का एक बांग्ला गाना भी खूब याद आया, उसे भी मैंने गाया।
मोने पोड़े रूबी राय, कोबिताय तोमाके
एक दिन कतोकिरी देखीछे,
आज हाय रूबी राय,
देके बोलो आमाके
तोमाके कोथाय जेनो देखीछे।

रोड जोला दुपुरे, सुर तुले नुपुरे।
बस थाके तुमी जोबे नामते ।
एक टी किशोर छेले, एका केनो डारिये
से कोथा कि कोनोदिनू भाबते।
मोने पोड़े रूबी राय...
इसी गीत के संगीत को बाद में आरडी ने हिन्दी फिल्म अनामिका में इस्तेमाल किया। तब उसके बोल हो गए थे : मेरी भीगी भीगी से पलकों पे रह गए...। बांग्ला गाना आरडी की अपनी आवाज में है। बांग्ला संस्करण में यह गाना किशोर कुमार से भी मीठी आवाज में आरडी ने गाया है। बांग्ला गाना गाते हुए आरडी की सुविख्यात खुरदुरी आवाज रसोगुला माफिक मीठी हो जाती है, शायद यह बांग्ला का जादू है, जो भोजपुरी की पड़ोसी भाषा है। बहरहाल, भोजपुरी पीछे छूट चुकी है, लेकिन बांग्ला तो बहुत आगे है।

Sunday, 6 June 2010

बिहार से फिर लौटकर

मेरे बचपन का बिहार अर्थात गर्मी की छुट्टियों वाला बिहार, पके आम, घोड़ागाड़ी, बैलगाड़ी, खेत-खलिहान, बंसवारी, बगीचों, अनथक धमा-चौकड़ी वाला बिहार, गांव के साप्ताहिक बाजार वाला बिहार, गांव के सुन्दर मंदिर वाला बिहार। अब पीछे छूटता जा रहा है। मैं उसे पकड़ नहीं पा रहा हूं और उसकी मुझे पकडऩे में कोई रुचि नहीं है। वह शायद चाहता है कि मेरे जैसी थोड़ी समझ वाले लोग बाहर रहें, ताकि उसका कारोबार निर्विघ्न चलता रहे। बदलते बिहार में चिन्ताएं दूसरी दिशा में मुडऩे लगी हैं। बढ़ती उम्र के साथ आंखें कुछ और देखने-खोजने लगी हैं। मेरे लिए अब एक सांस्कृतिक, सामाजिक, मानसिक आघात की तरह होने लगी हैं बिहार यात्राएं। अब मजा कम आता है और तकलीफ ज्यादा होती है। अंधेरा पहले लगता था कि केवल बाहर है, लेकिन सबसे ज्यादा अंधेरा तो लोगों के दिलों में बस गया है। विकास की गाड़ी ठहर गई है, कहीं कोई नरेगा नहीं है, है तो बस लूट है। नीतीश कुमार जहां जाते हैं, वहां सड़कों को कामचलाऊं बना दिया जाता है, जैसे हमारे गांव शीतलपुर बाजार से गुजरने वाली मुख्य सड़क (एकमा-मांझी) को बना दिया गया। सड़क पर बने गड्ढों को मिट्टी और गिट्टी से भर दिया गया है। जब बारिश शुरू होगी, तो नीतीश कुमार बिहार के इस पिछड़े इलाके में झांकने भी नहीं आ पाएंगे। यहां के स्थानीय नेता हमेशा की तरह दूसरों के चेहरे पर अपनी बड़ी गाडिय़ों के बड़े पहियों से कीचड़ उछालते हुए लापरवाह गुजर जाएंगे। विकास का रायता बुरी तरह फैल जाएगा। सड़कों पर बड़े आराम से गड्ढे खोद जाएगी बारिश। अपने गांव में बिजली का मुझे बचपन से इंतजार है। वह आती है, सरकारी बाबुओं की तरह हाजिरी बनाती है और चली जाती है। परंपराओं का पतन हो रहा है। अच्छी बातें बीत रही हैं। खराब बातें जम रही हैं। जर्रा-जर्रा बेईमान होने का बेताब नजर आता है। ज्यादातर लोगों की आंखों में ईष्र्या में सनी बदमाशी नजर आती है। लाज के मोटे-मोटे परदों को लोग बेलेहाज फाड़ रहे हैं। क्रोध से जी मचल जाता है, नायकत्व जागने लगता है कि कुछ किया जाए। आखिर क्यों?
जो अच्छा है,
सिमटकर थोड़ा बचा है।
जो बुरा है,
चादर फाड़कर पसरा है।

रिस रही अच्छाई,
सिलन से बेहाल दीवारों पर
बचे हैं बस नारे
जिन्हें कोई लिख जाता है
बार-बार बचाकर नजरें।
लिखने-लिखवाने वालों से
मैं समझना चाहता हूं
नारों का सच।

यहां का सच
बाहर नारों से ढंक जाता है
अंदर सिलन से उधड़ जाता है
लेकिन पहलू दो ही नहीं
अनेक हैं।
दीवार में सीमेंट कम
ज्यादा मिट्टी है,
ईंटें कम
बेडौल पत्थर अधिक हैं।
शायद दीवार बनाई नहीं
केवल दिखाई गई है।

या शायद केवल आभास है
कि खड़ी है दीवार।

तभी तो
जो अच्छा है,
सिमटकर थोड़ा बचा है।
जो बुरा है,
चादर फाड़कर पसरा है।