Wednesday, 23 December 2009

फिर अधर में नतीजे

झारखण्ड मे जो चुनाव नतीजे आये है, उनसे चिंता बढ़ गयी है। किसी भी पार्टी को अकेले बहुमार नहीं मिलना एक बड़ी चिंता की बात है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा के साथ ही अगर झारखण्ड में चुनाव हुए होते तो बीजेपी को फायदा हो सकता था। लोकसभा चुनाव के समय बीजेपी बहुत मजबूत थी, लेकिन कांग्रेस ने झारखण्ड में तब वहां विधानसभा चुनाव नहीं करवाए। मधु कोड़ा का मुद्दा शांत हो गया , कांग्रेस के पाप को जब जनता भूल सी गयी तब वहां चुनाव करवाए। कांग्रेस को खास लाभ नहीं हुआ लेकिन बीजेपी हार जरूर गयी। कांग्रेस ने पूर्व भाजपाई बाबूलाल मरांडी से गठबंधन करके भी मधु कोड़ा से हुए नुक्सान की भरपाई कर ली।
न महंगाई मुद्दा रही न भ्रष्टाचार। तभी तो मधु कोड़ा की पत्नी चुनाव जीत गयी और सोरेन मुख्यमंत्री पद के लिए लालायित हैं। देश चिंता जनक दौर में है लोगों की मानसिकता समझ से परे जा रही है। ऐसा लगता हैं की भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं रहा। जिस समाज को भ्रष्टाचारियों को डंडे लेकर खदेड़ देना चाहिए वह सामाज विवादस्पद व भ्रष्ट नेताओं को बार-बार बचा ले रहा है। शायद झारखण्ड को फिर जोड़-तोड़ वाला एक भ्रष्ट मुख्मंत्री ही मिलेगा। बेशक यह दौर कांग्रेस का है, क्या वह उम्मीदों पर खरी उतरेगी ? क्या वह आम आदमी को वास्तविक रहत देने के प्रयास करेगी ? क्या अच्छी योजनाओं में भ्रष्टाचार कम होगा? क्या गरीबों का पैसा गरीबों तक पहुंचेगा ?

Friday, 18 December 2009

सिंपल की स्पेशल यादें


मेरे साथ बड़ी मुश्किल है, जितना मैं वर्तमान में जीता हूं, उतना ही अतीत में और भविष्य की चिंता का दौर शुरू करने के बारे में केवल सोचता रहता हूं। पिछले दिनों कुछ फालतू की व्यस्तताएं रहीं, कुछ थोपी गईं, तो कुछ ओढ़ी हुईं। मौका ही नहीं मिला, कई ऐसी घटनाएं निकल गईं, जिन पर लिख न सका। अखबार के लिए लिखा भी, तो ब्लॉग पर डालना न हुआ। अब जब ब्लॉग खोलता हूं, तो उदासी का अहसास होता है। तो आइए उदासी दूर करने की कोशिश करते हैं।
किशोरवय में देखी गई फिल्में, अभिनेता व अभिनेत्रियां जिंदगी भर याद आते हैं। पिछले दिनों मेरी एक प्रिय अभिनेत्री सिंपल कपाडिया का निधन हो गया। सिंपल वाकई सिंपल थीं, अपनी बहन डिंपल की ग्लैमरस इमेज से बिल्कुल अलग। डिंपल में एक उच्च्वार्गियता थी, आज भी है, लेकिन सिंपल ने हमेशा मध्यवर्गीयता का ही प्रतिनिधित्व किया। जैसे मध्य वर्ग को निर्णायक मौके कम मिलते हैं, ठीक उसी तरह सिंपल को भी कम मिले। जितना भी काम किया, अच्छा किया, सच्चा किया। खूब बतियाती शरारती आंखें, चेहरे पर दूसरों को सहज ही अपना बना लेने का भाव। सिंपल के जमाने में अभिनेत्रियों को जीरो फीगर का सपना नहीं आता था, अभिनेत्रियां खाते-पीते घरों की हुआ करती थीं। गौर कीजिए, तो पहले की अभिनेत्रियां स्वस्थ्य नजर आती हैं, यह बात नई अभिनेत्रियों के साथ नहीं है। शायद इसीलिए पहले की अभिनेत्रियां याद रह जाती हैं और अब की अभिनेत्रियों को बीतते समय नहीं लगता। सिंपल भी स्वस्थ्य थीं, सुंदर थीं।
तब मैं दस-ग्यारह का बच्चा था। शायद 1985-86 की बात है। पिता जी वेस्टन का रंगीन टीवी 1984 में ही खरीद चुके थे। बचपन में हम सिनेमा हॉल तो कम ही गए। बामुश्किल तीन फिल्में मैंने बचपन में सिनेमा हॉल में देखीं। पहली फिल्म मैंने दीपक टॉकीज, राउरकेला में नूरी देखी थी, दूसरी फिल्म मासूम और तीसरी दर्द का रिश्ता कोणार्क टॉकीज में देखी। हां, सामुदायिक भवनों के पास खुले में पर्दा टांगकर प्रोजेक्टर से दिखाई जाने वाली कुछ फिल्मों की यादें हैं, जैसे डॉन, मां, धर्मात्मा, रास्ते का पत्थर इत्यादि। बहरहाल, सिंपल का जो चेहरा सर्वाधिक ध्यान में आता है, वह अनुरोध फिल्म का है, जो मैंने घर में टीवी पर देखी थी। राजेश खन्ना गायक हैं। सफेद कोट पर नीली-लाल धारियां। खड़े होकर झूमते हुए रेडियो पर गा रहे हैं - आते जाते खूबसूरत आवरा सड़कों पर....। दूसरी ओर, सिंपल, नीली साड़ी, नीला ब्लाउज, खुले बाल, खिला-खिला, मुस्कराता, लजाता मादक चेहरा। पांच मिनट के इस गाने के फिल्मांकन में शक्ति सामंत के निर्देशन की शक्ति भी चरम पर है। रेडियो के शीशे पर सिंपल का ठिठका हुआ चेहरा उभरता है। और गीत जारी है - ...किस कदर ये हसीन खयाल मिला है, राह में एक रेशमी रुमाल मिला है, जो गिराया था किसी ने जानकर, जिसका हो ले जाए वो पहचानकर...। मुझे अच्छे से याद है, इस गीत के समय कोई हिल भी नहीं रहा था। सब मोहित थे। मैंने तब अहसास किया था कि मेरे जीवन में कुछ विशेष घट रहा है। वह गीत खत्म हो गया, लेकिन जो गीत मेरे अंदर शुरू हुआ, वह अभी भी जारी है। इसी गीत की एक पंक्ति मुझे बार-बार याद आती है - काश फिर कल रात जैसी बरसात हो, और मेरी उसकी कहीं मुलाकात हो, मुलाकात हो।
अफसोस, केवल यादें रह जाएंगी, न वैसी बरसात होगी, न मुलाकात होगी। जब भी दिल या दिल के बाहर यह गीत बजेगा, यही ध्यान आएगा कि सिंपल अब संसार में नहीं रहीं।

Thursday, 3 December 2009

प्रथम राष्ट्रपति का गांव



भारत राष्ट्र के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा था, "सच्ची स्वतंत्रता के लिए अपनी जरूरतों को कम करना चाहिए।" उन्होंने अपने जीवन में जरूरतों को इतना कम कर लिया कि उनके बारे में यह आम धारणा बन गई कि वे गरीब परिवार से आए थे। वास्तव में वे अमीरी में जन्मे थे। उनके बड़े दादा चौधुरलालजी करीब 25-30 वर्ष तक हथुआ राज में दीवान रहे थे। दीवान होने के अलावा उन्होंने उस जमाने में सात-आठ हजार रूपए की जमींदारी खरीदी थी, जिसकी कीमत समय के साथ बढ़ी। जीरादेई गांव में राजेंद्र बाबू का जैसा बड़ा मकान है, वैसा उस इलाके में दूसरा नहीं है। जब वे छपरा में पढ़ रहे थे, तब उनकी सेवा के लिए नौकर और रसोइए रहा करते थे। यह भी सच है कि उन जैसा सादगी पसंद राष्ट्रपति दूसरा कोई नहीं हुआ। कपड़े की सिलाई उधड़ी, तो सूई-धागा हाथ में लेने से परहेज नहीं किया। महात्मा गांधी ने राजेंद्र प्रसाद ही नहीं, उनके पूरे परिवार को सादगी पसंद बना दिया था। गांधीजी के प्रभाव में देश में असंख्य लोगों ने सादगीभरा जीवन अपनाया, इसलिए वे त्याग कर पाए, इसीलिए वे देश के लिए संघर्ष कर पाए और इसीलिए हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई।

उनका गांव

उत्तरी बिहार के सीवान शहर के रेलवे स्टेशन से पश्चिम की ओर जीरादेई रेलवे स्टेशन है, लेकिन वास्तव में यह स्टेशन ठेपहां गांव में है। स्टेशन से बाहर निकलते ही, जहां राजेंद्र बाबू की प्रतिमा होनी चाहिए, वह ऊंचा चबूतरा खाली है। जिस देश में मामूली नेताओं के स्मारकों के लिए भी अरबों रूपए बेशर्मी से बहाए जा रहे हों, वहां प्रथम राष्ट्रपति की प्रतिमा के लिए धन का टोटा है? स्टेशन इतना उपेक्षित कि वेटिंग हॉल नहीं। रात के समय अंधेरा पसर जाता है। स्टेशन से पच्चीस कदम दूर आकर सड़क खोजना पड़ती है। दाहिने हाथ की ओर पतली धूलभरी कच्ची सड़क पर दो सौ मीटर चलने के बाद पक्की सड़क नसीब होती है। उसी सड़क पर लगभग चार किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में जीरादेई व जमापुर दो गांव हैं। स्वयं राजेंद्र बाबू ने लिखा है कि यह जानना मुश्किल है कि जीरादेई कहां खत्म होता है और जमापुर कहां शुरू होता है। गांव में विकास वैसे ही बेतरतीब हुआ है, जैसे बाकी देश में। प्रथम राष्ट्रपति के गांव में कोई इंटर कॉलेज नहीं, अस्पताल नहीं, थाना है, तो उधार के कमरों में। बिजली का हाल ऎसा बुरा कि ना पूछिए। धन्य हैं इस इलाके के नेता, संविधान लेखक का नहीं, कम से कम संविधान का ही सम्मान करते, तो जीरादेई आदर्श गांव हो गया होता। इसका जीरादेई को पूरा हक था, लेकिन यह हक मारा गया, क्योंकि जिम्मेदार लोगों और यहां के बाहुबली नेताओं ने अपनी जरूरतों को इतना बढ़ाया कि दूसरों की जरूरत, गांव, प्रदेश, देश की जरूरत गौण हो गई।

उनका घर

राजेंद्र बाबू के विशाल हवेलीनुमा घर को तो सरकार ने ठीक करवाया है। एक सूचना पट्ट भी लगा है कि यह देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ। राजेंद्र प्रसाद का जन्मस्थल है, लेकिन अंदर जाकर निराशा हाथ लगती है। लगता है अच्छे लोग चले गए, केवल इमारत, उसकी दीवारें और ढेर सारा सन्नाटा बचा है। चार कमरों में राजेंद्र बाबू के परिवार द्वारा प्रयुक्त होने वाले सामान, अलमारियां, संदूक, कुर्सियां, पलंग, चौकियां, मेज, बेंच इत्यादि इस तरह से ठूंसे गए हैं, मानो कूड़े में जाने हों। प्रथम राष्ट्रपति के साथ उनके अपने घर में ऎसा सुलूक किया गया है कि किसी भी संवेदनशील भारतीय की आंखों में आंसू आ जाएं। घर देखने लायक है, लेकिन किसी भी कमरे के बारे में कोई सूचना नहीं लिखी है। आप खुद घूमकर दीवारों से बात कर लीजिए। एक जगह दलान में सहेजी गई चीजों में एक बड़ी चौकी और लकड़ी की दो सोफेनुमा बेंच हैं। वहीं ऊपर लिखा है : यहां महात्मा गांधी 1927 में 16 जनवरी से 18 जनवरी की सुबह तक ठहरे थे।" ऎसा स्मारक किस काम का? कम से कम राजेंद्र बाबू की कुछ किताबें, जीवनी व संविधान से संबंघित किताबें रख दी जातीं, कुछ फोटोग्राफ, कुछ पत्र इत्यादि लगाए जाते। क्या देश के प्रथम राष्ट्रपति के साथ अन्याय इसलिए हुआ, क्योंकि वे गांव में जन्मे? काश! वे भी इलाहाबाद या दिल्ली में पैदा होते।

राजस्थान से सम्बन्ध

वे राजस्थान से बड़ा स्नेह करते थे। सुखद संयोग है कि उन्होंने आत्मकथा लिखने की शुरूआत सीकर में की थी और समापन भी यहीं राजस्थान के पिलानी में किया। 1940 में उनका स्वास्थ्य खराब हुआ था और सेठ जमनालाल बजाज उन्हें अपने साथ सीकर ले आए थे। जमनालाल बजाज जीरादेई भी गए थे, जब राजेंद्र बाबू का परिवार उनके बड़े भाई महेंद्र प्रसाद के निधन की वजह से कर्ज में डूब गया था। जमनालालजी ने न केवल ऋण प्रबंधन, बल्कि राजेंद्र बाबू के परिवार की बची हुई जमींदारी का प्रबंधन स्वयं किया। जमींदारी बेचने के बावजूद कर्ज की राशि इतनी ज्यादा थी कि जमनालालजी को घनश्यामदास बिड़ला से भी सहयोग लेना पड़ा। राजेंद्र बाबू का मकान बिक जाता, लेकिन जमनालालजी ने सूझबूझ से उसे बचाया लिया। वे जमनालालजी को बड़ा भाई मानते थे, जिनकी कृपा से वे ज्यादा से ज्यादा समय राष्ट्र को दे पाए। न कोई दिखावा, न राजनीतिक जोड़तोड़। मेहनत करते रहे, फल मिलता गया। अत्यंत मेधावी छात्र रहे राजेंद्र बाबू ने अपनी आत्मकथा में यह भी बताया है कि वे सभी परीक्षाओं में टॉप कैसे करते थे। मेहनत, तैयारी और ईमानदारी ने उन्हें देश के सर्वोच्च पद पर भी पहुंचा दिया। वाकई युवा पीढ़ी भी उनसे काफी कुछ सीख सकती है।
( मेरा यह लेख राजस्थान पत्रिका मे ३ दिसंबर को प्रकाशित हो चुका है )

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अफसोस

३ दिसंबर को राजेन्द्र बाबू की १२५ वी जयंती थी लेकिन भारत सरकार ने उनके लिए एक सेन्टीमीटर विज्ञापन भी जारी नहीं किया। आप ख़ुद सोचिये, क्या यह ठीक है ?

Wednesday, 14 October 2009

बेमिसाल अमिताभ




( yah sambhavtah amitabh bachchan ke janmdin par likha gaya akela prakashit sampadkeey hai )
उम्र के 68वें साल में प्रवेश कर चुके अमिताभ ऐसी बेमिसाल हस्ती हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। भारत में शायद किसी भी जीवित हस्ती के जन्मदिन पर इतना धूमधड़ाका नहीं होता है। गैर-सरकारी स्तर पर ही सही, अमिताभ का जन्मदिन साल दर साल खास बनता जा रहा है। केवल फिल्म उद्योग ही नहीं, बल्कि पूरी मनोरंजन की दुनिया में अमिताभ का कोई सानी नहीं है। कालिया फिल्म में अमिताभ का एक संवाद, - हम जहां पे खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती हैं, - बेहद अर्थपूर्ण है। मनोरंजन की दुनिया में उनके द्वारा शुरू की गई लाइनें दिनों-दिन लंबी होती जा रही हैं। फिल्म सात हिदुस्तानीं से लेकर रियलिटी शो बिग बॉस-तृतीय तक अमिताभ द्वारा शुरू की गई लाइनों, प्रतिमानों और शैलियों का कोई अंत नहीं है। भारत में सबसे ज्यादा नकल अगर किसी हस्ती की हुई होगी, तो वो अमिताभ ही हैं। हर छोटा-बड़ा कलाकार कभी न कभी उनकी किसी शैली को आजमाने की कोशिश करता है। बेशक, उनके आलोचक भी हैं, लेकिन जिस देश में राष्ट्रपिता का दर्जा प्राप्त हस्ती की आलोचना हो सकती है, वहां अमिताभ आलोचना से कैसे बच सकते हैं। हालांकि कई मौके आते हैं, जब अमिताभ अपने विशाल कद से आलोचकों को बौना बना देते हैं।


आखिर क्या है अमिताभ बच्चन होना? हम उनसे क्या सीख सकते हैं? पहली बात, परिवार के प्रति अमिताभ का प्रेम अनुकरणीय है। उनके माता-पिता को लंबा जीवन मिला, क्योंकि अमिताभ ने अपने माता-पिता को वह स्थान और वह जरूरी आजादी दी, जो आजकल की सफल संतानें अपने अभिभावकों से छीन लेती हैं। पिता की चरणों में जगह खोजने वाले पुत्र के रूप में, अपने बेटे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते पिता के रूप में वे आदर्श हैं। हॉलीवुड के कई महान अभिनेता अपनी शादियों की वजह से भी जाने गए हैं, लेकिन अमिताभ यहां भी आदर्श हैं।
उनकी दूसरी बड़ी खूबी है, हमेशा कुछ नया करने की कोशिश। एंग्री यंगमैन की नई धारा, कमाई के पैसे के उचित निवेश का तरीका, चुनावी राजनीति में अभिनेताओं के लिए द्वार खोलने की जिम्मेदारी, राजनीति से पल्ला झाड़ने एवं फिर न लौटने का वचन, हर संभव चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं, बड़े परदे से छोटे परदे पर पदार्पण, सक्रिय ब्लॉग लेखन और अब बिग बॉस- तृतीय में मेजबान की भूमिका, अमिताभ ने हमेशा नया करने की कोशिश की है, खतरे उठाए हैं। एकाध विफलताओं को छोड़ दीजिए, तो वे आज सफलतम हस्ती हैं। त्रिशूल फिल्म में उनका एक संवाद है, सही बात सही वक्त पे की जाए, तो उसका मजा ही कुछ और है और मैं सही वक्त का इंतजार करता हूं। - यह हमारे जीवन प्रबंधन में भी बड़े काम का वाक्य है।
अमिताभ की तीसरी बड़ी खूबी है कठोर परिश्रम।
चौथी बड़ी खूबी है वक्त का सम्मान । उनके जीवन में एक-एक मिनट मायने रखता है और सेट पर समय पर पहुंचने के लिए भी जाने जाते हैं।
पांचवी खूबी, उन्होंने हमेशा भारतीयता का आदर किया है। हॉलीवुड की दादागिरी उनके सामने बेदम हो जाती है और भारतीय बॉलीवुड पूरी मजबूती से उभरता है। आज उन जैसे खांटी अरबपति भारतीय दुर्लभ हैं। भारतीय संस्कृति ही नहीं, राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति उनका सहज समर्पण दूर देश तक लोगों को हिन्दी सीखने के लिए प्रेरित करता आया है।
अमिताभ की छठी खूबी है वो मुंबई मे रहकर भी इलाहाबादी हैं। लोग बड़े शहरों मे जाकर अपने गाँव, बोली , लहजे को भुला देते हैं लेकिन इस मोर्चे पर भी अमिताभ एक मिसाल हैं.
अमिताभ अकसर दूसरों को शतायु होने का आशीर्वाद देते हैं, आइए हम दुआ करें कि वे स्वयं भी शतायु हों।

Sunday, 27 September 2009

नवमी पर मां के लिए

लड़कियां और नदियां

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उनके मन में डर की सीढ़ियां हैं
जो हर बार
कुछ ऊंची हो जाती हैं
उन्हीं पर चढ़ती-उतरती रहती हैं
लड़कियां

उनके रास्तों में बांधों की ऊंचाइयां हैं
जो हर बार
कुछ बढ़ जाती हैं,
उन्हीं ऊंचाइयों से
ढहती-सिमटती रहती हैं
नदियां

२

लड़कियां हंसना चाहती हैं
वे हंसने नहीं देते,
वे चाहती हैं बदलाव
वे होने नहीं देते,
मन से जी जीने नहीं देते
हर बार रचते हैं नया व्यूह।

नदियां बहना चाहती हैं निर्बाध
वे रोकते हैं, जोड़ते-बढ़ाते हैं पहाड़
वे नदी की राह में बार-बार
बिछाते हैं जल योजनाओं की बिसात

३

छोटी-छोटी खुशियों
कटी-छंटी आजादियों
से संजोकर जीवन
लड़की होना
जैसे
छोटी-पतली धाराओं
बहते-सूखते झरनों
से सहेजकर प्रवाह
नदी होना
मुश्किल है

मात्र स्नेह से लड़की होना
मात्र पानी से नदी होना
बहुत मुश्किल है
मुकम्मल होना।

४

उम्र के हर पड़ाव पर
रखी हैं भयदायी बेडियाँ
कुछ-कुछ दूर पर बंधे हैं बांध
कहते हैं लड़कियों का हंसना
और नदियों का बहना मना है,
कहते हैं इनकी किस्मत में है गुलामी
कहते हैं काबू में रहेंगी,
तभी काम आएंगी
कहते हैं छूट दो तो
हाथ से निकल जाएंगी,
कहते हैं उन्हीं से पाप होता है,
भुल जाते हैं
उन्हीं से पाप धुलता है।

५

बार-बार टोको
तो अंदर कहीं मुरझा जाता है
लड़की होना
बार-बार बांधो
तो अंदर कहीं ठिठक जाता है
नदी होना

बांधो तो बांझ हो जाती हैं
नदियां और लड़कियां
फिर वहीं गरियाते हैं उन्हें
जिनमें मर चुकी लड़की,
जिनमें सूख चुकी है नदी
वाकई जिनमें पानी नहीं
उनमें लड़की नहीं

6

एक-सी हैं सहेलियां
लड़कियां और नदियां

इधर लड़कियों पर बंधते हैं बांध
होती है समाज की सिंचाई
कटती हैं फसलें
लूटते हैं धन बल धारी
होती हैं लड़ाइयां,
खुदती हैं पतन की खाइयां

उधर नदियों की शादी होती है जबरन
मरती हैं नदियों की इच्छाएं
एक कल्लू कई नदियों को
एक साथ बांध लेता है बेहया।

हर दिन हर बांध के पीछे
ढलता है सूरज
और मिटती है कोई लड़की
या कोई नदी
सरस्वती।

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Sunday, 20 September 2009

हमारे मिलने से

( मित्रों के लिए )

वे दूर-दूर तक नहीं थे,
पल भर पहले,
अचानक आते, घुमड़ते,चमकते,
गरजते और बरसते हैं बादल
दम धरती है धरती
चैन लेता है मौसम
हमारे मिलने से
गौर करो, बहुत कुछ होता है।

देह पर तन आती छाया
बहार की मोहक माया
झूमते पेड़, बलखाती डालियां,
आनंद से कांपती पत्तियां
अपनी महक से चहकते फूल
हाथ आते झुक जाते रसीले फल
हमारे मिलने से
याद करो , बहुत कुछ खिलता है।

दूसरों से मिले धोखे,
दम तोड़ते कुछ भरोसे,
कभी मन दिखाते
कभी मन मसोसते
सुख पर शक
और दुख पर चुप्पी,
हो जाते हैं कई बोझ हलके
हमारे मिलने से
दर्ज करो, बहुत कुछ घटता है।

आते हो, पर्दा हटाते,
गली साफ नजर आती है,
जीने के लिए जरूरी
बेशर्मी उभर आती है,
न मिलते, न चेतते,
तो मारे जाते हम,
हवा भी बेखौफ हो जाती है
हमारे मिलने से
वाकई , बहुत कुछ होता है।

Sunday, 23 August 2009

रियलिटी शो - इतिहास, नक़ल और बाज़ार



दुनिया में रियलिटी शो से जुडे़ कुछ महत्वपूर्ण वर्ष व दास्तान

1948 - दुनिया का पहला रियलिटी शो अमेरिका में एलन फन्ट द्वारा निर्मित हुआ, जिसका नाम कैंडिड कैमरा था। यह एक तरह से प्रेंक रियलिटी शो था, जो पूर्व में कैंडिड माइक्रोफोन के नाम से रेडियो पर प्रसारित किया जाता था।

1973 - एन अमेरिकन फैमिली आधुनिक सन्दर्भों में दुनिया का पहला रियलिटी टीवी शो था। इसमें एक ऐसे परिवार को केन्द्र में रखा गया था, जो तलाक के दौर से गुजर रहा था।

1974 - ब्रिटेन में एन अमेरिकन फैमिली की नकल से द फैमिली की शुरुआत हुई।

1977-78 - द डेटिंग गेम, द न्यूलीवेड गेम इत्यादि रियलिटी शो की शुरुआत हुई।

1996 - ब्रिटिश टीवी शो चेंजिंग रूम से आत्म विकास और बदलाव वाले रियलिटी शो की शुरुआत हुई।

1997 - स्वीडिश रियलिटी शो एक्सपीडिशन रोबिनसन से रियलिटी शो में कायदे से कंपीटिशन और एलिमिनेशन की शुरुआत हुई। सर्वाइवर व सिलेब्रिटी सर्वाइवर जैसे रियलिटी शो इसे से निकले।
1998 - ब्रिटेन में हू वांट्स टु बी मिलिनेयर शुरू हुआ, तो पूरी दुनिया में तहलका मच गया। यह अब तक का सबसे पॉपुलर रियलिटी शो है। 100 से ज्यादा देशों में लोगों ने इसे देखा है, इस कार्यक्रम की फ्रेंचाइजी दुनिया भर में बिकी है।

2002 - अमेरिकन आइडल की शुरुआत हुई, जिससे गीत-संगीत आधारित रियलिटी टीवी शो की दुनिया में एक क्रांति आई।

---भारत की कहानी---

1994 - जीटीवी ने सबसे पहले अंताक्षरी के तौर पर प्रतियोगिता शुरू की थी, जिसे देश का पहला टीवी रियलिटी शो कहा जा सकता है।

1995 - सारेगामापा जैसे टैलेंट हंट शो की शुरुआत हुई।

1996 - दूरदर्शन ने भी इसी तर्ज पर मेरी आवाज सुनो प्रतियोगिता करवाई। कार्यक्रम सफल रहा।
2000 - भारत में अमिताभ बच्चन के संचालन में कौन बनेगा करोड़पति शुरू हुआ। इस रियलिटी गेम शो ने टीवी की भूमिका को बदलकर रख दिया। उसके बाद रियलिटी शो की बाढ़ सी आ गई।

2004 - इंडियन आइडल की शुरुआत से रियलिटी शो को एक सकारात्मक दिशा मिली। यह शो बहुत कामयाब रहा।

2006 - बिग बॉस शुरू हुआ, जिसमें कुछ नामचीन लोगों को एक घर में कई दिनों तक रखा गया, जो आखिर तक रहा, जिसे ज्यादा वोट मिले, वह जीता। शो चर्चित हुआ।

2009 - यह साल भारत में रियलिटी शोज की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रहा। कई शो शुरू हुए, सर्वाधिक चर्चा राखी का स्वयंवर और सच का सामना की हुई। कुछ भारतीय सेलीब्रिटी क्वइस जंगल से मुझे बचाओं जैसे रियटिली शो के लिए विदेश अथाüत मलयेशिया के जंगल में पहुंच गए।

----कुछ ही मौलिक---

भारत में कुछ ही रियलिटी शो मौलिक हैं और हम लोकप्रियता के लिहाज से बात करें, तो सबसे पहले अंताक्षरी, बूगी-वूगी, सारेगामापा, तोल-मोल के बोल, सांप-सीढ़ी का नाम लिया जा सकता है। भारत में ज्यादातर रियलिटी टीवी शो नकल हैं या किसी विदेश शो से प्रेरित हैं। नकल करके बनाए गए लोकप्रिय रियलिटी कार्यक्रमों इस प्रकार हैं
- कौन बनेगा करोड़पति - हू वांट्स टू बी ए मिलिनेयर
- इंडियन आइडल - अमेरिकन आइडल
- बिग बॉस - बिग ब्रदर
- सच का सामना - मोमेंट ऑफ ट्रूथ

- क्या आप पांचवी पास से तेज हैं - आर यू स्मार्टर देन फिफ्थ ग्रेडर

- दस का दम - पावर ऑफ टेन

- सरकार की दुनिया - सरवाइवर

- झलक दिखला जा - डांसिंग विद स्टार्स

- राखी का स्वयंवर - द बेचलरेट

- इस जंगल से मुझे बचाओ - आई एम ए सेलीब्रिटी ज् गेट में आउट ऑफ हीयर

- छुपा रुस्तम - हाइडिंग कैमरा

- पति, पत्नी और वो - बेबी बोरोअर्स

--बढ़ता बाजार---

आज टीवी का 20 प्रतिशत समय रियलिटी शोज के हवाले है। पिछले दो वर्ष में काफी तेजी से लोकप्रियता बढ़ी है। रियलिटी शो का हिस्सा बढ़ने की शुरुआत वर्ष 2000 में अमिताभ द्वारा प्रदर्शित कौन बनेगा करोड़पति से हुई थी। आज रियलिटी शो अज्छी कमाई कर रहे हैं, इसलिए उनका हिस्सा बढ़ रहा है। टीवी चैनल की टीआरपी भी इन्हीं से तय होने लगी है। धारावाहिकों से ऊबे हुए लोग रियलिटी की ओर रुख कर रहे हैं, तो तरह-तरह के रियलिटी शो शुरू होने वाले हैं। फिलहाल देश में पचास से ज्यादा रियलिटी शो चल रहे हैं। किसी धारावाहिक की एक कड़ी के निर्माण पर 5 से 6 लाख रुपये खर्च होते हैं, जबकि रियलिटी शो की एक कड़ी पर अधिकतम 15 से 20 लाख रुपये खर्च हो जाते हैं। लेकिन तब भी रियलिटी शो बनाना फायदे का धंधा है। प्राइम टाइम की अगर हम बात करें, तो धारावाहिक के समय विज्ञापन प्रसारण की कीमत अधिकतम एक लाख रुपये प्रति दस सेकंड होती है, जबकि रियलिटी शो के दौरान विज्ञापन प्रसारण से प्रति दस सेकंड दो लाख रुपये तक कमाई होती है। जाहिर है, रियलिटी में पैसा बरस रहा है।

Sunday, 16 August 2009

फिर जिन्ना पर आया प्यार

हमारे देश में कुछ नेताओं का चिंतन इतना फिजूल है कि इससे केवल उनका बौद्धिक विलास झलकता है और यह भी जाहिर होता है कि वे जमीनी हकीकत से कितने कटे हुए हैं। आज अनेक समस्याएं विकराल रूप ले चुकी हैं, लेकिन इन नेताओं का शर्मनाक अतीत में झांकने का शौक देश की आम गरीब जनता को केवल निराश करता है। दार्जिलिंग से चुनाव जीतने वाले राजस्थानी नेता जसवंत सिंह ने किताब लिखी है जिन्ना - इंडिया, पार्टीशन, इंडिपेंडेंस। किताब में पंडित नेहरू को निशाना बनाया गया है और जिन्ना की छवि को सुधारने की कोशिश हुई है। जसवंत के मुताबिक, देश के विभाजन के लिए पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना नहीं, बल्कि पंडित नेहरू की बेहद केन्द्रीयकृत राजनीतिं जिम्मेदार थी। यह बात भारतीयों के मनोबल पर कितना नकारात्मक असर डालेगी, इस पर जसवंत ने कोई चिंतन नहीं किया है। कांग्रेस को निशाना बनाने की कोशिश में जिन्ना का महिमामंडन निंदनीय है। इतिहास गवाह है, जिन्ना बहुसंख्यक जमात के साथ रहने को तैयार नहीं थे, जबकि पंडित नेहरू को मजहब से कोई परेशानी नहीं थी। जिन्ना ने मुस्लिम राष्ट्र बनाया और पंडित नेहरू ने जो बनाया, वह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बना। सांप्रदायिकता के आधार पर भारत वर्ष को विभाजित करने के बाद जिन्ना खुद भी चिंतित थे, क्योंकि पाकिस्तान में कथित धर्म प्रेम कट्टरता की हदें पार करने लगा था, तभी तो जिन्ना ने अपने देशवासियों से आह्वान किया था कि आज से हम हिन्दू या मुस्लिम नहीं, बल्कि पाकिस्तानी होंगे, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। जिन्ना भी भारत के अंदर कई पाकिस्तान देखना चाहते थे, कश्मीर हड़पने का अभियान उनके ही इशारे पर शुरू हुआ होगा। भाजपा नेताओं में पहले लालकृष्ण आडवाणी और अब जसवंत सिंह ने जिन्ना के प्रति अपने प्रेम को उजागर किया है। जसवंत ने एक वार्ता में कहा है कि जिन्ना महान थे। गांधी जी ने भी उन्हें महान भारतीय कहा था। जसवंत ने यह नहीं बताया है कि गांधी जी ने जिन्ना को महान भारतीय क्यों कहा था और जिन्ना किस तरह से भारतीयता को ठोकर मारकर भारतीयों को खून के आंसू रुलाकर पाकिस्तानी हो गए। जिन्ना के मुख से आए किन्हीं एक-दो बयानों का हवाला देते हुए उन्हें महान नहीं ठहराया जा सकता। वह ब्यक्ति राजनेता भले ही हो, लेकिन महान कैसे हो सकता है, जिसे दूसरे धर्म के लोगों के साथ रहना तक स्वीकार न हो। जिन्ना तो उसी दिन नाकाम हो गए थे, जब उनके वंशजों ने भारत में रहने का फैसला किया। आज जिन्ना के वंशज भारत में बेहद अमीर और सम्मानित हैं, लेकिन जसवंत को लगता है कि भारत में मुसलमानों के साथ दूसरे ग्रह के प्राणियों जैसा व्यवहार किया जाता है। क्या शाहरुख खान दूसरे ग्रह के प्राणी हैं, जिन्हें अमेरिका में परेशान किए जाने पर सभी जागरूक भारतीय नाराज हैं? जसवंत को केवल यही नजर आया कि मुसलमानों ने विभाजन की कीमत चुकाई है। क्या हिन्दुओं ने कीमत नहीं चुकाई है? जसवंत की इस बात का समर्थन किया जा सकता है कि अविभाजित भारत में मुसलमान ज्यादा मजबूत हो सकते थे, लेकिन क्या उन्हें यही बात हिन्दुओं के लिए नहीं कहनी चाहिए थी? इस किताब से आतंकवाद, महंगाई, मंदी और मौसम की मार झेल रहे देश को कोई लाभ नहीं होने वाला, उल्टे इससे पाकिस्तान और बांग्लादेश में भारत विरोध को ही बढ़ावा मिलेगा।

Tuesday, 7 July 2009

चाणक्य की कोरी यादें

बजट में गांवों और किसानों का खूब जोर चला है। गांवों के लिए इतना कुछ दिया गया है कि अगर तंत्र ईमानदारी हो, तो एक ही बजट राशि से गांवों का कायापलट हो सकता है। कागज पर नरेगा की सफलता से उत्साहित केन्द्र सरकार ने नरेगा के लिए आवंटित धन को 144 प्रतिशत बढ़ाकर 39,100 करोड़ रुपये कर दिया है। यह धन इतना ज्यादा है कि देश के किसी भी गांव में कोई भी मजदूर ऐसा नहीं बचेगा, जो नरेगा से न जुड़ा हो। इसके अलावा सरकार ने गांवों में सड़कों के लिए 12,000 करोड़ रुपये, आवास निर्माण वाली दो योजनाओं के लिए 10800 करोड़ रुपये, विद्युतिकरण के लिए 7000 करोड़ रुपये, स्वास्थ्य के लिए 257 करोड़ रुपये प्रस्तावित किए हैं। गरीबी को पचास फीसदी घटाने की कागजी घोषणा भी स्वागतयोग्य है।
लेकिन दुख की बात है कि प्रणव मुखर्जी महत्वाकांक्षी विकास योजनाओं को विफल करने वाले तंत्र पर कुछ नहीं बोले, उनका तंत्र वही है, जिसने ज्यादातर गांवों में नरेगा के तहत 100 दिन की बजाय लोगों को केवल 10-12 दिन का रोजगार प्रदान किया है। प्रणव अपने बजट भाषण में बार-बार कौटिल्य या चाणक्य का जिक्र कर रहे थे, लेकिन उन्होंने चाणक्य की नीतियों के बारे में कुछ खास नहीं कहा। उन्होंने यह नहीं बताया कि नरेगा या अन्य योजनाओं का धन खाने वाले भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों या अधिकारियों के लिए बारे में चाणक्य ने क्या कहा था। उन्होंने यह नहीं बताया कि चाणक्य के समय भ्रष्ट लोगों के साथ क्या सलूक होता था। उन्होंने कहा कि आयकर की नई संहिता 45 दिन में आ जाएगी, वित्त आयोग की रिपोर्ट अक्टूबर तक आ जाएगी, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि भ्रष्टाचार पर रोक के लिए संहिता कब आएगी। राहुल गांधी ने भी भ्रष्टाचार पर उंगली उठाई थी, लेकिन प्रणव मुखर्जी योजनाओं में ईमानदारी और पारदर्शिता संबंधी किसी भी घोषणा से बच निकले। गरीबों को तीन रुपये प्रति किलो चावल देने की घोषणा कर दीजिए, बजट में अरबों-खरबों आवंटित कर दीजिए, चाणक्य का बार-बार नाम ले लीजिए, लेकिन जब तक बेईमानी है, तब तक बजट बनते रहेंगे और नतीजों के इंतजार में आंखें पथराती रहेंगी।

Saturday, 4 July 2009

रेलवे में भी मजहब की पूछ?

मदरसा छात्रों को मुफ्त मासिक टिकट देने का फैसला कितना सही है? यह एक विचारणीय प्रश्न है। क्या यह रेलवे में धर्म आधारित रियायत की शुरुआत नहीं है? क्या यह कदम एक नए तरह के झमेले की शुरुआत नहीं करेगा? अगर हम गंभीरता से देखें, तो यह एक नया ताला खुलवाने जैसी बात है, अयोध्या में ताला खुलवाने का काम श्री राजीव गांधी ने किया था और उसके बाद लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट तक वह खुला ताला कितने कमाल दिखा गया, पूरा देश जानता है।

मुस्लिम विद्वान इस रियायत को किस आधार पर जायज व समानता आधारित ठहराएंगे? सभी भारत को हिन्दू प्रधान देश कहते हैं, लेकिन क्या यहां गुरुकुल में पढ़ने वाले छात्रों को कभी रेलवे से रियायत मिली है? भारत की अपनी भाषा संस्कृत की सेवा में लगे बच्चों को रियायत के बारे में कोई नहीं सोचता, लेकिन मदरसा छात्रों को खुश करने की कोशिश क्यों होती है? अगर सरकार को मदरसों का भला ही करना है, तो वह मदरसों की डिगि्रयों को देश की मुख्य धारा की डिगि्रयों के समकक्ष क्यों नहीं मान लेती? हर बार मदरसों के लिए कुछ न कुछ घोषणा बजट में होती है, लेकिन इस बार रेलवे ने भी मेहरबानी की है। क्या ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर अभी से तुष्टिकरण के महत्वपूर्ण काम में लग गई हैं?

ये नेता नहीं जानते कि मदरसे में पढ़ाई कितनी मुश्किल होती है? मदरसों में पढ़ने-पढ़ाने वालों के घरों में चूल्हे कैसे जलते हैं? उन्हें व्यापक भारतीय समाज में कितनी इज्जत नसीब होती है? उन्हें नौकरी कहां-कहां मिलती है? मदरसों में पढ़कर निकले कितने लोगों को ममता बनर्जी के विभाग ने नौकरी दी है? मदरसों से पढ़कर निकले कितने युवाओं को राहुल गांधी ने भारत के भविष्य के लिए चुना है? ऐसी उम्मीद भाजपा से कोई नहीं कर सकता, लेकिन कांग्रेस से सबको उम्मीद रहती है? लेकिन वह भी मुस्लिमों के विकास के लिए कृत्रिम उपाय करती रहती है, तो आइए, मन मसोस कर नई रियायत का इस्तकबाल करें और उम्मीद करें कि रियायत पाकर पढ़े बच्चे भी कभी लाखों रुपये कमाएंगे।

Sunday, 28 June 2009

कोई नहीं तुम जैसा


मेरा man तैयार नहीं हो रहा था कि अपनी एक प्रिय संगीत हस्ती पर लिखे शब्दों को ब्लॉग पर दूँ , जब से ब्लॉग शुरू किया सोचता ही रहा माइकल पर लिखूंगा, लेकिन लिखा तब जब माइकल नहीं रहे और वह भी सम्पादकीय के लिए, देर से ही सही सम्पादकीय के कुछ अंश यहाँ पेश हैं


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पॉप के बादशाह माइकल जैक्सन का दुनिया से जाना न केवल संगीत जगत, बल्कि पूरे मनोरंजन जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। जिसे दुनिया भर में पॉपुलर कल्चर कहा जाता है, माइकल लगभग तीस साल तक उसके आइकन बने रहे। दुनिया में पॉप, रॉक, हिप हॉप और आर एंड बी (रीदम एंड ब्लू) के दीवानों के दिलोदिमाग पर माइकल का ऐसा नशा चढ़ा था कि वे माइकल-मय हो गए थे। भारत के छोटे शहरों और कस्बों में अल्विस प्रिस्ले, बीटल्स जैसे पश्चिमी संगीत के पुरोधा के नाम नहीं पहुंच सके, लेकिन माइकल जैक्सन का नाम पहुंच गया। उनकी छाप इतनी प्रभावी रही कि उनकी नकल करने वालों को भी खूब नाम-दाम मिला। भारत में अराजक नृत्य शैली डिस्को के दिन लद गए, ब्रेक डांस और अफ्रीकी-अमेरिकी शैली आर एंड बी का एक दौर चल गया। उनकी खास मूनवॉक शैली तो लाजवाब रही। वे दौलत व ख्याति के शीर्ष पर पहुंचे। एक समय उनकी सालाना कमाई 5 अरब 62 करोड़ रुपये हो गई थी। उनका अलबम थ्रिलर दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाला अलबम है, उसकी 11 करोड़ 90 लाख से ज्यादा रिकॉर्ड, कैसेट या सीडियां बिक चुकी हैं। वाकई उन्होंने संगीत की दुनिया में जो नए सुरूर, सलीके व साहस का दौर शुरू किया, उसे अब कभी खत्म नहीं किया जा सकेगा।


दुर्भाग्य की ही बात है कि माइकल संगीत की दुनिया में जितने सफल हुए, उससे कहीं ज्यादा विफल वे अपनी जिंदगी में रहे। उनके पास सबकुछ था, लेकिन जिंदगी ने उन्हें हर कदम पर रुलाया। पिता के अत्याचार को सहते होश संभाला, अंत तक किसी न किसी अत्याचार-विवाद से गुजरते रहे। एक समय दौलत इतनी थी कि बसने के लिए 11 वर्ग किलोमीटर जमीन खरीद ली थी, लेकिन अंतिम सांसें लीं, तो किराये के मकान में। दो शादियां, कई रिश्ते, अपने तीन बच्चे, यौन शोषण के आरोप, ड्रग्स की लत, सुंदर दिखने की कोशिश में तन से कृत्रिम खिलवाड़, कई बीमारियां, माइकल ने जीवन में क्या नहीं देखा? लोग तो उनके जीवन का केवल उज्ज्वल पक्ष ही देख पाते थे, लेकिन पचास की उम्र में ही माइकल शरीर से इतने मजबूर हो गए थे कि पलभर के लिए धूप भी उनके नसीब में न थी। उन पर अकूत धन वर्षा हुई, उन्होंने दान कर्म में भी कीर्तिमान बनाया। अपने मुकदमों को सुलझाने में जरूरत से ज्यादा लुटाया, दिवालिया हुए, लेकिन तब भी हारे नहीं थे। 13 जुलाई से प्रस्तावित अपने अंतिम वल्र्ड टूर की तैयारी कर रहे थे, लेकिन ईश्वर ने अपने इस प्रतिभावान पुत्र को अंतिम बार स्टेज पर आने का मौका नहीं दिया।


तो क्या यही है, पॉप कल्चर का नतीजा? क्या यह बढ़िया संगीत और खराब संगति का मामला है? वास्तव में पॉप कल्चर में जाना आसान है, लेकिन उसमें जीना मुश्किल है। ऐसा नहीं है कि पॉप या हिप्पी कल्चर में फिसलन से बचा नहीं जा सकता, जरूरत संयम और सोच में बदलाव की है। गौर कीजिए, मशहूर गायिका-कलाकार मैडोना पॉप कल्चर को अच्छी तरह से संभाल रही हैं, लेकिन माइकल नाकाम हुए। वे चले गए, लेकिन अपने पीछे जो अथाह संगीत, शैलियां व कलात्मकता छोड़ गए हैं, बस वही रह जाएगा उनके दीवानों के साथ।


२६ जून २००९

Sunday, 14 June 2009

ताड़ी लीजिए...ताड़ी..?


छपरा से बलिया के बीच रिवीलगंज नामक एक स्टेशन पड़ता है, इसे गौतम स्थान भी कहते हैं। किसी समय यहां गौतम ऋषि का आश्रम हुआ करता था, आज यहां उनका एक मंदिर है। यही वह जगह है, जहां राम ने पाषाण बनी ऋषि पत्नी अहल्या का उद्धार किया था। हनुमान का भी जन्म यहीं हुआ बताया जाता है। बहुत ऐतिहासिक स्थान है। कभी यहां खूब अंग्रेज रहा करते थे, अब एक भी अंग्रेज नहीं बचा। यहां से पांच किलोमीटर दूर स्थित छपरा में किसी समय बड़ी संख्या में डच और फुर्तगीज भी रहे थे। यहाँ बड़े पैमाने पर टैक्स वसूली होती थी, रिविलगंज एक टाउन है और यहां नगरपालिका की स्थापना बहुत पहले हो गई थी। मैं 29 मई की उस गर्म दोपहर को ट्रेन में बैठा-बैठा रिविलगंज की खास बातों को याद कर रहा था और सोच रहा था कि यह स्थान कितना उपेक्षित रह गया। अगर यह स्थान बिहार से बाहर होता, तो रिविलगंज एक चर्चित पर्यटन स्थल में परिवर्तित हो गया होता। खैर, बिहार में कदम-कदम पर इतिहास बिखरा पड़ा है, अफसोस, समेटने वाला कोई नहीं है।


बहरहाल, रिविलगंज स्टेशन के आउटर पर जब गरीब नवाज एक्सप्रेस रुकी, तो मैं यह देखकर दंग रह गया कि छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियां ताड़ी बेच रहे थे। जैसे रेल में चाय बिकती है, चाय लीजिए चाय... की आवाज के साथ, ठीक उसी तरह वहां ताड़ी लीजिए ताड़ी की आवाज के साथ ताड़ी बिक रही थी। ताड़ के पेड़ का यह रस नशीला होता है, पानी मिले दूध के रंग का, छपरा और बिहार के अनेक इलाकों में लोग इसे नशे के लिए पीते हैं। आज भी बिहार के अच्छे घरों में ताड़ी का नाम लेना वर्जित है। पहले एक खास जाति पासी के जिम्मे यह काम था, लेकिन अब कई अन्य निम्न जातियों के लोग भी इस धंधे से जुड़ गए हैं। पांच रुपये प्रति लोटे के हिसाब से ताड़ी बिक रही थी। लोग पानी की बोतलों में ताड़ी ले रहे थे। पास ही एक चाट ठेला भी खड़ा हो गया था, तो चखने या स्नेक्स की भी समस्या हल हो गई थी। कइयों ने ट्रेन से उतरकर छककर पीया। गोलगप्पे और चाट खाए, जब वहां ट्रेन ज्यादा देर रुकी, तो लोगों में यह भी चर्चा हुई कि ट्रेन के ड्राइवरों ने भी ताड़ी-पान किया है।


सवाल है , जिन यात्रियों ने यहां ताड़ी-पान किया, उन्होंने किस नजर से रिविलगंज को देखा होगा? अब जब भी उनकी ट्रेन यहाँ से गुजरेगी, तो वे शायद ताड़ी की ही उम्मीद लगाएंगे। गौतम ऋषि, हनुमान जी और राम जी को तो उनमें से शायद ही कोई याद करेगा।


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ताड़ से विकास की राह


बिहार के कई इलाकों में बड़ी संख्या में ताड़ के पेड़ हैं, जिनसे केवल ताड़ी और पेड़ के बहुत पुराने होने पर लकड़ी का इंतजाम होता है। इसके पत्ते से झाड़ू और हाथ-पंखे भी बनाए जाते हैं। ताड़ का व्यावसायिक उपयोग बिहार में किया जा सकता है। अगर जगह-जगह पॉम ऑयल इंडस्ट्री का विकास किया जाए, तो ताड़ से ज्यादा कमाई की जा सकती है। इससे ताड़ी का नशे के लिए उपभोग भी कम हो जाएगा और लोगों को रोजगार भी मिलेगा। इस दिशा में बिहार सरकार को सोचना चाहिए।


एक और बात...


बिहार में बड़ी संख्या में तंबाकू उत्पादन होता है, लेकिन तंबाकू के प्रसंस्करण व पैकेजिंग का काम ज्यादातर मध्यप्रदेश में होता है, अगर प्रसंस्करण इकाइयां बिहार में ही लग जाएं, तो भी बिहार में रोजगार पैदा हो सकता है। फिलहाल ताड़ हो या तंबाकू, दोनों से बिहार को केवल नशा मिलता है और कुछ नहीं।