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Monday, 7 March 2011

मुंह बाए खड़ा पक्षी



(कोटा चिडिय़ाघर में यह पक्षी विशेष मुद्रा में दिखा, तो न खुद को फोटो खींचने से रोक सका और न कविता लिखने से।)

एक पक्षी
पिजड़े की भीड़ में अकेला
नि:शब्द स्तब्ध
देर से सिर उठाए।
सीमा के अतिरेक तक मुंह बाए।
खड़ा, मानो विराम पर ठहरी दुनिया।
मानो हल होने वाला हो
पापी पेट का सवाल।
इंतजार बढ़ाता कोई दाना
या गले में अटका कोई गाना।
कोई भूला हुआ राग
या ठिठकी हुई रागिनी।
गले में फंसा सुर
या कोई गुप्त गुर।
कोई विचित्र नृत्य
या उसकी कोई विलंबित मुद्रा।
दुख में डूबा या सुख में बिसरा।
या आजादी की संभावनाओं का निकलता दम।
या टूटे सपने का सन्नाटा।
सूर्य या पृथ्वी को निगल जाने का गुमान,
या किसी फतींगे को धोखा देने की तैयारी।
आलस्य का चरम
या भूल गए हों कि मुंह खुला है
या खुले मुंह में आ गई हो नींद।

भकोल है
या बहुत भोला है
शायद नहीं जानता
छूटते प्राणों और
सिमटते जीवनों की दुनिया में
खतरनाक है यों मुंह खोले खड़े रहना।
भयावह होती दुनिया में
खुले मुंह का खतरा
जैसे आ मौत मुझे मार का आह्वान।

हे अनाम पक्षी
अभी बंद रखो मुंह,
खाक में मिलने से पहले तक
जैसे बंद रहती है लाख की मुट्ठी।
क्योंकि अंतत: उसे खुला ही रह जाना है।

Sunday, 27 September 2009

नवमी पर मां के लिए

लड़कियां और नदियां

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उनके मन में डर की सीढ़ियां हैं
जो हर बार
कुछ ऊंची हो जाती हैं
उन्हीं पर चढ़ती-उतरती रहती हैं
लड़कियां

उनके रास्तों में बांधों की ऊंचाइयां हैं
जो हर बार
कुछ बढ़ जाती हैं,
उन्हीं ऊंचाइयों से
ढहती-सिमटती रहती हैं
नदियां

लड़कियां हंसना चाहती हैं
वे हंसने नहीं देते,
वे चाहती हैं बदलाव
वे होने नहीं देते,
मन से जी जीने नहीं देते
हर बार रचते हैं नया व्यूह।

नदियां बहना चाहती हैं निर्बाध
वे रोकते हैं, जोड़ते-बढ़ाते हैं पहाड़
वे नदी की राह में बार-बार
बिछाते हैं जल योजनाओं की बिसात

छोटी-छोटी खुशियों
कटी-छंटी आजादियों
से संजोकर जीवन
लड़की होना
जैसे
छोटी-पतली धाराओं
बहते-सूखते झरनों
से सहेजकर प्रवाह
नदी होना
मुश्किल है

मात्र स्नेह से लड़की होना
मात्र पानी से नदी होना
बहुत मुश्किल है
मुकम्मल होना।

उम्र के हर पड़ाव पर
रखी हैं भयदायी बेडियाँ
कुछ-कुछ दूर पर बंधे हैं बांध
कहते हैं लड़कियों का हंसना
और नदियों का बहना मना है,
कहते हैं इनकी किस्मत में है गुलामी
कहते हैं काबू में रहेंगी,
तभी काम आएंगी
कहते हैं छूट दो तो
हाथ से निकल जाएंगी,
कहते हैं उन्हीं से पाप होता है,
भुल जाते हैं
उन्हीं से पाप धुलता है।

बार-बार टोको
तो अंदर कहीं मुरझा जाता है
लड़की होना
बार-बार बांधो
तो अंदर कहीं ठिठक जाता है
नदी होना

बांधो तो बांझ हो जाती हैं
नदियां और लड़कियां
फिर वहीं गरियाते हैं उन्हें
जिनमें मर चुकी लड़की,
जिनमें सूख चुकी है नदी
वाकई जिनमें पानी नहीं
उनमें लड़की नहीं

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एक-सी हैं सहेलियां
लड़कियां और नदियां

इधर लड़कियों पर बंधते हैं बांध
होती है समाज की सिंचाई
कटती हैं फसलें
लूटते हैं धन बल धारी
होती हैं लड़ाइयां,
खुदती हैं पतन की खाइयां

उधर नदियों की शादी होती है जबरन
मरती हैं नदियों की इच्छाएं
एक कल्लू कई नदियों को
एक साथ बांध लेता है बेहया।

हर दिन हर बांध के पीछे
ढलता है सूरज
और मिटती है कोई लड़की
या कोई नदी
सरस्वती।

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Sunday, 20 September 2009

हमारे मिलने से

( मित्रों के लिए )

वे दूर-दूर तक नहीं थे,
पल भर पहले,
अचानक आते, घुमड़ते,चमकते,
गरजते और बरसते हैं बादल
दम धरती है धरती
चैन लेता है मौसम
हमारे मिलने से
गौर करो, बहुत कुछ होता है।

देह पर तन आती छाया
बहार की मोहक माया
झूमते पेड़, बलखाती डालियां,
आनंद से कांपती पत्तियां
अपनी महक से चहकते फूल
हाथ आते झुक जाते रसीले फल
हमारे मिलने से
याद करो , बहुत कुछ खिलता है।

दूसरों से मिले धोखे,
दम तोड़ते कुछ भरोसे,
कभी मन दिखाते
कभी मन मसोसते
सुख पर शक
और दुख पर चुप्पी,
हो जाते हैं कई बोझ हलके
हमारे मिलने से
दर्ज करो, बहुत कुछ घटता है।

आते हो, पर्दा हटाते,
गली साफ नजर आती है,
जीने के लिए जरूरी
बेशर्मी उभर आती है,
न मिलते, न चेतते,
तो मारे जाते हम,
हवा भी बेखौफ हो जाती है
हमारे मिलने से
वाकई , बहुत कुछ होता है।

Tuesday, 21 October 2008

रोटियां और पराठे

वाह!
फूल रही हैं रोटियां
इस बार मान गई हैं,
खुशी में हो रही हैं गोल-गोल।

ओह!
पर हो गई एक गड़बड़
रोटियों से यारी पर
खफा हैं परांठे,
टेढ़े-तिरछे।
बनाए नहीं मानते,
बार-बार बिगड़ जाते,
चकले पर उलट जाते,
बेलन से झगड़ जाते,
पकने से द्रोह करते,
जैसे सीधे बाप के बिगड़ैल बेटे।

पर खुश हैं रोटियां
जैसे अच्छी मां,
प्यारी पत्नी और दुलारी बेटियां।

इन दिनों घट गई रसोई से दूरियां
रोटियों के प्रेम में तल रहा हूं पूरियां।

--दो--

भोलीभाली रोटियां
चालाक परांठे,
रोटियां तालमेल
परांठे घालमेल,
रोटियां सहारा
परांठे साजिश,
रोटियां जरूरत
परांठे ऐय्याशी,
रोटियां हकीकत
परांठे तमाशा।

--तीन--

कहते हैं, पहले नहीं थे परांठे
बस रोटियां थीं
जब तेल आया,
हुआ भ्रष्टाचार
सादगी पर प्रहार,
तो बने परांठे,
जैसे भ्रष्ट, कमजोर नेता,
थोड़े राजा, ज्यादा अभिनेता।
पालक, मूली हो या आलू
हो गया गठजोड़ चालू।
अच्छा लगा, लच्छा लगा,
चल गए परांठे,
जैसे चल गए नेता।

नेता और परांठे
दोनों देखते तेल की धार।
तेल में सिमटा सारा सार।
पर जब नाराज होंगे
पेटों के ज्वालामुखी,
भाग जाएंगे नेता और परांठे,
बस, अकेले काम आएंगी रोटियां।