Sunday, 24 July 2011

बाइपास सर्जरी के चार महीने बाद पिता


अब पिता

पिता के लिए


पिता
के
बहुत मुश्किल है
पिता को पिता लौटाना
लेकिन मुमकिन है
पिता को पुत्र लौटाना
वही सही
लौटा रहा हूं
कुछ लौटाने की कामना में
मुझे ही मिल जा रहा है
बहुत कुछ
शायद नामुमकिन है
पिता को कुछ भी लौटाना


गाढ़े दर्द भरी आंखों से
इशारा करते हैं पिता
जरा उठाओ तो
और पिता को उठाते
मैं खुद उठता हूं,
अपनी असामाजिकता के रद्दीखाने से
अकूत धूल झाडक़र
लंबी बेशर्म नींद तोड़
वो मुझे उठना सिखाते हैं
जागना, सहेजना
अनायास
बिना बोले पिता का मौन गुरुकुल
पीढिय़ों का उजास समेटकर
मेरी झोली में डालता है।
हाथ थामकर चलते हैं पिता
कुछ डगमग मैं होता हूं
मौन पूर्वज प्यार से चीख पड़ते हैं
पिता बिन कहे उलाहते हैं
अब तो चलना सीख लो।
बूढ़ा हो गया
चलाते-चलाते।



पिता की देह में कांपती हैं कमजोरियां,
मां को चुनौती देती हुई
पांच कौर पर मुंह फेर लेते हैं पिता
सातवें कौर की उम्मीद लिए बैठी रहती मैं मां।
मनुहारती है मां
बस एक और कौर दूर है मजबूती
छठा कौर किसी तरह निगलकर
मुंह सिल लेते हैं पिता
सातवां रह जाता है
मां की उंगलियों में
और आठवां थाली में।

Sunday, 3 July 2011

खेजड़ी का पेड़





जहां रूठ गया पानी
जहां उखड़ गए पेड़ों के पांव,
जहां चंद बूंदों की भीख को
रोते सूख गए पौधे।
वहां जम गया
रम गया
अकेला खेजड़ी।




खेजड़ी में देखता है मरुथल
कि कैसे होते हैं पेड़।
कितनी मीठी होती है छांव,
ठन्डे पत्ते और नर्म स्पर्श
और उनसे फूटती हवा।
क्या होता है,
जलते-तपते में वीरान में जीना।

कसम रेत की,
पांव जमाकर खेजड़ी
डालता है मरुथल के पांवों में बेडिय़ां।
और देता है गवाही
रेत के सीने में भी होती है थोड़ी मिट्टी
जैसे रूखे शरीर में दिल
थोड़ा-सा बचा हुआ।
शायद उसी के लिए,
उसी थोड़े की पूर्णता के लिए
जिन्दा है खेजड़ी।

बनी-बंधी आस
थोड़ी-थोड़ी नरमी,
जरा-जरा प्यार
छोटे-छोटे पत्ते,
छोटी-छोटी छांव से धनी खेजड़ी।
दूसरी जगह बड़ा होने से
बहुत बड़ी बात है
मरुथल में थोड़ा होना।

कुछ दूर साथ चलता है बबूल,
छोटे भाई की तरह।
कुछ आगे हारकर
ठिठक जाता है,
और देखता है
बड़े भाई को जाते
बहुत आगे
रेत के टीले दर टीले।



कभी बड़ी दया उमड़ती खेजड़ी पर,
क्या मृगमरीचिका का षड्यंत्र उसे फंसा लाया?
सीधा-सादा खेजड़ी
आगे बढ़ता चला गया।
बहुत शातिर दूसरे पेड़
पीछे रह गए
बहुत पानी में
और भोला खेजड़ी
रह गया हानि में।

गिनती की बूंदों के आते
लहलहा जाता।
बड़ा रसिया खेजड़ी।
हर आषाढ़ रचाता शादी।
तब देखो तो उसे जरा
उसके खुरदुरे तनों-अंगों पर
हर ऊपरी सिरों-छोरों पर,
पत्तों की घनी-हरी ओढऩी।
जैसे अधेड़ बींद पर
नशे-सी छाई
नई नवेली बींदणी।




(मरुभूमि में जहाँ कोई पेड़ नहीं उगता वहां उगता है खेजड़ी, यह कविता पिछले साल जयपुर से सीकर जाते समय लिखी थी , मौसम यही था, बहुत रुला कर देर से आया था मानसून, और जब कुछ ही बूंदें बरसी थीं, लहलहा उठे थे खेजड़ी के पेड़ )

Wednesday, 30 March 2011

अपनी बात


पत्रकारिता आधार, प्रकार और व्यवहार पत्रकारिता एक अत्यधिक व्यावहारिक क्षेत्र है। यहां मची आपाधापी में शायद ही किसी के पास फुरसत है कि वह समस्याओं के विस्तार में जाए और विधिवत समाधान बताने का कष्ट करे। मैंने पत्रकारिता में अनेक नए व पुराने लोगों को भी अपने सवालों के साथ परेशान-भटकते देखा है। एक बड़ी जमात है, जो गलतियां तो निकालती है, आलोचना भी करती है, लेकिन यह नहीं बताती कि आखिर काम कैसे किया जाए, काम कैसे सुधारा जाए। हर काम अच्छा नहीं होता, लेकिन जो अच्छा नहीं है, उसे अच्छा कैसे बनाया जा सकता है, ऐसे ही अनेक सवाल हैं, जिनके जवाब खोजने की कोशिश में ही धीरे-धीरे यह किताब लिखी गई है। प्रस्तुत पुस्तक में अकादमिक पहलुओं को लगभग छोड़ दिया गया है और केवल व्यावहारिक दृष्टि से उत्तर देने या समाधान बताने की कोशिश की गई है। यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि मैंने इस पुस्तक में अनेक विषयों पर स्वतंत्रतापूर्वक विचार करने की कोशिश की है, समस्याओं के समाधान बढऩे की कोशिश की है। हमेशा इस लक्ष्य का ध्यान रखा है कि पुस्तक लाभदायक बने। इस किताब को लिखते हुए कई बार मैंने विचार किया कि क्या मैं ठीक लिख रहा हूं, क्या ऐसी किताब की वाकई जरूरत है। न जाने कितने नए व प्रशिक्षु पत्रकारों ने अनजाने में ही मुझे यह पुस्तक लिखने की प्रेरणा दी है, मैं सबसे पहले उन्हीं का शुक्रगुजार हूं। प्रस्तुत पुस्तक में प्रथम खंड आधार में मैंने पत्रकारिता के आधारभूत पक्षों को समझने-समझाने की कोशिश की है। प्रकार खंड में मैंने विभिन्न तरह की पत्रकारिता की चर्चा की है। अंतिम खंड व्यवहार में मैंने कुछ ऐसे पक्षों को उठाया है, जिनसे आम तौर पर बचने की परंपरा रही है। पुस्तक में न केवल पत्रकार बिरादरी की बेहतरी की कामना की गई है, बल्कि पाठकों-श्रोताओं-दर्शकों की भी मदद करने की कोशिश हुई है। आदरणीय रामशरण जोशी जी को जरूर याद करूंगा, उन्हें मैंने लगभग साल भर पहले पुस्तक के कुछ अध्याय दिखाए थे और पूछा था कि क्या ऐसी कोई पुस्तक अभी है, क्या मुझे लिखना चाहिए। उन्होंने उत्साह भी बढ़ाया, सुझाव भी दिए। मित्र डॉ. राजेश कुमार व्यास ने मुझे किताब को जल्दी लिखने के लिए हमेशा प्रेरित किया। शास्त्री कोसलेन्द्रदास से हुई चर्चाएं प्रेरणादायी रहीं। राजीव जैन जैसे कुशल युवा पत्रकार और मनीष शर्मा जैसे नवागंतुक को मैंने कुछ अध्याय पढऩे के लिए दिए, ताकि यह पता चले कि मैं जो लिख रहा हूं, वह फायदेमंद है या नहीं। आदरणीय रामबहादुर राय द्वारा प्राप्त सहयोग अतुलनीय रहा। मैं तो न्यू मीडिया जैसे विषय को छोड़कर आगे बढ़ रहा था, लेकिन उन्होंने मुझे प्रेरित किया और इस विषय पर भी शोध व लेखन की सलाह दी। पुस्तक के रूप में मेरी यह कोशिश अगर पत्रकारों की नई व पुरानी पीढ़ी और पत्रकारिता में रुचि रखने वाले आम पाठकों को थोड़ी भी लाभान्वित कर सके, तो मैं अपनी मेहनत को सार्थक मानूंगा।

Wednesday, 9 March 2011

मेरी किताब


(मेरी इस किताब का जल्द ही लोकार्पण होने वाला है.)
मीडिया पुस्तकों में सिद्धांत और पत्रकारिता का इतिहास तो पर्याप्त मिल जाता है, लेकिन व्यावहारिक समझ की बातें अधूरी रह जाती हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो हथियार चलाना तो सिखा दिया जाता है, लेकिन युद्ध भूमि में कब किस परिस्थिति में कैसे संघर्ष करना है, यह सब नहीं बताया जाता। अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदना तो आता था, लेकिन उसे नहीं पता था कि चक्रव्यूह के अंदर विराजमान लगभग तमाम महारथी युद्ध के सारे सिद्धांतों-नियमों की धज्जियां उड़ाकर व्यावहारिक हो जाएंगे और उसका वध हो जाएगा। मीडिया जगत में महाभारत निरंतर जारी है, आज अर्जुन होने-बनने की जरूरत है, ताकि चक्रव्यूह को न केवल भेदना, बल्कि उसे जीतना भी संभव हो सके।
आधुनिक दौर में जब पूंजी का नियंत्रण बहुत बढ़ चुका है, जब गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा पत्रकारों की प्रतीक्षा कर रही है, तब यह एक स्वाभाविक सत्य है कि एक सीमा के बाद सिद्धांत नाकाम हो जाते हैं और केवल व्यावहारिक होने का विकल्प ही बचा रहता है। प्रस्तुत पुस्तक में चाहे आधार की बात हो या प्रकार की या व्यवहार की, हर जगह यह चेष्टा हुई है कि पत्रकारिता में आने को इच्छुक छात्रों, नए-पुराने पत्रकारों, मीडिया प्रबंधकों और यहां तक की पाठकों-दर्शकों-श्रोताओं को भी समाधानों का व्यावहारिक संबल प्रदान किया जाए।

Monday, 7 March 2011

मुंह बाए खड़ा पक्षी



(कोटा चिडिय़ाघर में यह पक्षी विशेष मुद्रा में दिखा, तो न खुद को फोटो खींचने से रोक सका और न कविता लिखने से।)

एक पक्षी
पिजड़े की भीड़ में अकेला
नि:शब्द स्तब्ध
देर से सिर उठाए।
सीमा के अतिरेक तक मुंह बाए।
खड़ा, मानो विराम पर ठहरी दुनिया।
मानो हल होने वाला हो
पापी पेट का सवाल।
इंतजार बढ़ाता कोई दाना
या गले में अटका कोई गाना।
कोई भूला हुआ राग
या ठिठकी हुई रागिनी।
गले में फंसा सुर
या कोई गुप्त गुर।
कोई विचित्र नृत्य
या उसकी कोई विलंबित मुद्रा।
दुख में डूबा या सुख में बिसरा।
या आजादी की संभावनाओं का निकलता दम।
या टूटे सपने का सन्नाटा।
सूर्य या पृथ्वी को निगल जाने का गुमान,
या किसी फतींगे को धोखा देने की तैयारी।
आलस्य का चरम
या भूल गए हों कि मुंह खुला है
या खुले मुंह में आ गई हो नींद।

भकोल है
या बहुत भोला है
शायद नहीं जानता
छूटते प्राणों और
सिमटते जीवनों की दुनिया में
खतरनाक है यों मुंह खोले खड़े रहना।
भयावह होती दुनिया में
खुले मुंह का खतरा
जैसे आ मौत मुझे मार का आह्वान।

हे अनाम पक्षी
अभी बंद रखो मुंह,
खाक में मिलने से पहले तक
जैसे बंद रहती है लाख की मुट्ठी।
क्योंकि अंतत: उसे खुला ही रह जाना है।

Thursday, 3 March 2011

दिनों बाद दो फिल्में

सिनेमा हॉल में मैंने इतनी कम फिल्में देखी हैं कि बचपन से आज तक मैं गिना सकता हूं कि कौन-कौन-सी फिल्म देखी हैं और किसके साथ देखी हैं। पहली फिल्म शायद गंगा की सौगंध थी, जो पूरे परिवार के साथ देखी थी। फिर नूरी, मासूम, दर्द का रिश्ता, ताजमहल, हम हैं राही प्यार के, हम आपके हैं कौन, बाम्बे, रंगीला, बड़े मियां-छोटे मियां, जख्म, वाटर, सरकार, आजा नचले, सरकार राज इत्यादि। इनमें से हर फिल्म को देखने के साथ छोटी व यादगार कहानी भी जुड़ी है। संक्षेप में कहूं, तो मासूम मैंने राउरकेला, उड़ीसा के रज्जाक सिनेमा हॉल में देखी थी, जिसके लिए टिकट सिनेमा हॉल के बाहर चार घंटे सपरिवार इंतजार के बाद पिताजी ने कहीं से जुटाए थे। हम हैं राही प्यार के, मैंने राउरकेला में ही अफ्सरा सिनेमा हॉल में कालेज के दिनों में अपने अर्थशास्त्र विभाग के संगियों-सहेलियों के साथ देखी थी। याद आ रहा है, अफ्सरा सिनेमा के मालिक गफूर मियां थे, उनका एक शराब का कारखाना हुआ करता था, जहां बनाई शराब अनारकली नाम से बिकती थी। प्रदीप कुमार-बीना राय की मुख्य भूमिका वाली ताजमहल मैंने दरभंगा में देखी, जब फिल्म देखकर निकला था, तो तेज बुखार पीछे छूट चुका था। पहली बार गाजियाबाद में मैंने मल्टीप्लेक्स में सरकार फिल्म देखी, तो सरकार राज राजस्थान के कोटा के सिनेमा हॉल नटराज में देखी। बाकी कहानियां फिर कभी। तो छोटी-सी सूची है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैंने फिल्में कम देखी हैं। छोटे पर्दे पर ही सही, फिल्में ठीक-ठाक संख्या में देख रखी हैं। फिल्मों के प्रति रुचि तब जगी थी, जब राजकपूर को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिला था और सिलसिलेवार ढंग से दूरदर्शन पर राजकपूर की फिल्में दिखाई गई थीं। आज फिल्मों की ठीक-ठाक विवेचना कर सकता हूं। लगभग सभी महत्व के अभिनेताओं, अभिनेत्रियों पर बोल व लिख सकता हूं। थोड़ी मेहनत से इतना ज्ञान तो अर्जित कर ही लिया है। हालांकि फिल्मों पर लिखने के अवसर मुझे ज्यादा नहीं मिले हैं, लेकिन फिल्मों के बारे में मैंने दूसरों का ज्ञान अवश्य बढ़ाया है। फिल्म पत्रकारिता पर कुछ काम भी किए हैं और सौभाग्य से दो-तीन बार फिल्म पत्रकारिता पढ़ा भी चुका हूं।
बहरहाल, बहुत दिनों बाद जयपुर के पिंक स्क्वायर में मधुर भंडारकर की फिल्म 'दिल तो बच्चा है जी देखने गया। यह मेरे पौने तीन साल के बेटे द्वारा सिनेमा हॉल में देखी गई पहली फिल्म है, जो उसने जागते हुए और पॉपकॉर्न खाते हुए देखी। यह फिल्म खराब तो नहीं ही कही जाएगी, लेकिन भंडारकर ब्रांड की फिल्म यह नहीं है। आजकल एक ट्रेंड है कि किसी फिल्म में एक साथ अनेक कहानियां चलती हैं। दिल तो बच्चा है जी में भी तीन या चार-पांच प्रेम कहानियां चलती हैं, लेकिन तीनों ही प्रेम कहानियां एकतरफा प्रेम या प्रेम की गलतफहमी की कहानियां हैं। गीत नीलेश मिश्र ने लिखे हैं, जो हिन्दुस्तान टाइम्स में पत्रकार हैं, एक गीत को छोड़ दीजिए, तो फिल्म में गीत-संगीत मामूली ही है, भंडारकर जैसे निर्देशक इस बात को नजरअंदाज कर गए कि प्रेम कहानी या कहानियों पर आधारित फिल्मों में गीत-संगीत आला दर्जे का होना चाहिए। भारतीय समाज में प्रेम और संगीत का चोली-दामन का साथ है। भारतीय फिल्मों में आज भी बिना गीत-संगीत के प्रेम असंभव, अप्रभावी व अनाकर्षक है।
मैंने दूसरी फिल्म ७ खून माफ देखी। ख्यात निर्देशक विशाल भारद्वाज की यह फिल्म रस्किन बांड की कहानी पर आधारित है और भारद्वाज ने एक अमरीकी स्क्रीन प्ले राइटर की मदद से फिल्म भी ठीक-ठाक बनाई है। निर्देशन अच्छा है, लेकिन अंधेरा कुछ ज्यादा है। कई बार फिल्म अपनी मूल धारा से भटक जाती है। अब लगभग सब जानते हैं, फिल्म की नायिका सुजन्ना बारी-बारी से परिस्थितिवश अपने छह पतियों का खून करती है, उसका सातवां पति ईश्वर है। फिल्म अभिनय के लिहाज से शानदार है। प्रियंका चोपड़ा के लिए यह फिल्म यादगार होगी। नील नितिन मुकेश, अन्नू कपूर खास तौर पर प्रभावी हैं, जबकि इरफान खान और नसरुद्दीन शाह ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाते हैं। इन चरित्रों में जरूरत से ज्यादा कोण या झोल हैं, जिसकी वजह से यह फिल्म आम दर्शकों के सिर के ऊपर से निकल सकती है। हुआ भी यही, कोटा के नटराज सिनेमा में, ९ बजे के बाद के शो में बामुश्किल २५ लोग थे।फिल्म पर जो चर्चा हुई, उसमें यह बात सामान्य तौर पर उभरी है कि यह बिगाडऩे वाली फिल्म है। साथी या जीवन साथी बारबार बदलने को उकसाने वाली फिल्म है, लेकिन मेरी नजर में इस फिल्म में जो अंत है, उससे गहरा अध्यात्मिक बोध पैदा होता है। यह फिल्म स्थापित करती है कि भोग या काम से ज्यादा महत्वपूर्ण है संयम और मोक्ष। जहां तक मेरा मानना है, यह फिल्म यह भी संदेश देती है कि अगर आप बिगड़े हुए हों, विचलित हों, तो या तो आप मार दिए जाओगे या फिर आप किसी को मार डालोगे। सुजन्ना किसी आम महिला की तरह मारी नहीं जाती, बल्कि मारती है। यह शायद उत्तरआधुनिक नारीवाद है, या बदला या एक तरह का जयघोष है, एक तरह की खोज है, जिसे यह फिल्म मुकाम तक पहुंचाती है। वाकई, यह याद रह जाने वाली फिल्म है।

Tuesday, 14 December 2010

एक नाच हुआ करता था

मैं लौंडे की बात करने वाला हूँ , माफ कीजिएगा, मैं कोई अश्लील टिप्पणी नहीं करूंगा। जो लोग बिहार की नाट्य शैली नाच को जानते हैं, उनके लिए लौंडा वह है, जो स्त्री पोशाक पहनकर नाचता है, स्त्रियों की तरह स्वांग रचता है। बचपन में साल १९७८-७९ में कुल जमा दो बार नाच देखने की यादें हैं। एक बार सबसे बड़े भाई साहब की शादी में और एक ममेरी बहन की शादी में। तब मैं कुल जमा पांच साल का रहा होऊंगा। तब के हिट भोजपुरी गीत 'गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा जियरा उड़ी-उड़ी जाए' पर हुआ नाच आज भी याद है। नाच के अलावा बैंड के साथ भी हमारे ही इलाके से एक लौंडा गया था, जिसका नाम हीरा था। पिछले कुछ वर्षों तक हीरा गांव जाने पर दिख जाया करता था, लचकती चाल और सिर पर समेटकर बंधी चोटी के साथ। कौतूहल जगाता हुआ, लेकिन अब हीरा दिखता नहीं, शायद बूढ़ा हो गया होगा। नाचना छूट गया होगा। चोटी कट चुकी होगी, लेकिन चाल में लचक थोड़ी बची हुई होगी।
नाचने वाले की कमर में लचक स्वाभाविक ही बस जाती है। भोजपुरी के शेक्सपियर कहलाने वाले भिखारी ठाकुर भी कभी राधा या किसी महिला पात्र को निभाने की कोशिश में लचकने लगे थे। उनकी लचक इलाके में मशहूर होने लगी थी, फिर उन्होंने उस लचक से छुटकारा पाने के लिए लगातार पुरुष पात्रों को निभाना शुरू किया। प्रयास के बाद ही उनकी चाल से लचक तिरोहित हुई थी। लेकिन हर नाचने वाला भिखारी ठाकुर नहीं होता। एक बार लचक पीछे पड़ जाती है, तो पड़ी रहती है। मेरी नजर में पहले वह हीरा के पीछे थी और अब मनोज नाम के एक लौंडे के पीछे है, जो पिछले करीब १४ साल से हमारे घर के सामने से गुजरता दिख जाता है। जब गांव जाओ, तो मनोज का दिखना तय रहता है। चाल में वही लचक और सिर पर बंधी चोटी। १९९७ में मेरे भाई साहब की शादी में मनोज किशोर हुआ करता था। सुल्तान की बैंड पार्टी का नवछेरिया नचनिया। बारात के साथ यह बैंड पार्टी उत्तर प्रदेश के देवरिया के एक गांव गई थी। खूब बारिश हो रही थी। मनोज चटख मैकअप में था। वह जमकर नाचता, क्योंकि बिहार से जब कोई लौंडा पूर्वी उत्तर प्रदेश जाता है, तो वहां के लोग बड़े चाव से नाच का मजा लेते हैं। जुलाई का महीना था, बारात पहुंचने में खूब रात हो गई थी, बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी, लेकिन उस गांव के पच्चीस-तीस लोग डटे थे कि लौंडा नाच देखकर ही मानेंगे। बैंड पार्टी ने तय किया था कि बारात केवल बाजे के साथ दरवाजे लगा दी जाएगी। गीली और दलदली हो चुकी जमीन और रास्ते पर नाचने का तो सवाल ही नहीं उठता था। घरातियों के गांव वालों ने जब देखा कि केवल बैंड बज रहा है और लौंडा कोने में खड़ा बस टुकुर-टुकुर ताक रहा है, तो हंगामा हो गया। लौंडा नचाने की मांग होने लगी, लाठियां बजने लगीं कि डर से लौंडा नाचने लगेगा। लौंडे की जान मुसीबत में थी, बैंड पार्टी के मुखिया सुल्तान ने उसे सुझाया कि 'मास्टर साहब के पास चले जाओ।' मास्टर साहब मतलब मेरे परिवार के मुखिया बड़े पिताजी। मनोज तत्काल दौड़कर मेरे बड़े पिता के पीछे छिपकर भीड़ की पकड़ से दूर हो गया।
१३ साल हो गए, लेकिन मनोज को आज भी वह वाकया याद है। सुल्तान नहीं रहा, अब मनोज किसी और की बैंड पार्टी में नाचता है। इस बार छठ में जब मैं गांव गया, तो तय कर रखा था कि मनोज से बात करूंगा। तो उसे घर के सामने ही रोक लिया।
'इधर आइए।'
वह एक बार तो चौंका और फिर अपनी पूरी लचक के साथ मेरे करीब आ रुका।
'ये बताइए कि इलाके में किसका नाच हिट चल रहा है?
सवाल सुनते ही शायद वह समझ गया कि मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है। उसके चेहरे पर मुस्कराहट फैल गई। उसने जवाब दिया, 'नाच, अब कहां?'
'मतलब'
'अब नाच नहीं होता है?'
'कहां गए नाच?'
'खतम हो गए।'
मुझे विश्वास नहीं हो रहा था, मैंने जोर देकर पूछा, 'क्या नाच बिल्कुल बंद है?
'हां।'
'तो तुम क्या करते हो?'
'बैंड बाजा में हैं।'
'भिखारी ठाकुर के परिवार का कोई नाच में नहीं है?'
मनोज ने जवाब दिया, 'नहीं, अब नहीं है।'
मैंने पूछा, 'क्यों खतम हो गया नाच।'
'अब वीडियो है, सिनेमा है, ऑर्केस्ट्रा है। लोग अब नाच पसंद नहीं करते। वैसे भी मेहनत वाला काम है।'
मुझे बड़ी निराशा हुई। यह सच है, जिस नाच को भिखारी ठाकुर ने उत्तरी भारत की शान बना दिया था, वह लोक विधा समाज में दम तोड़ चुकी है। नाच की बात तो दूर है। मेरे ही घर में अब बारात के साथ भी लौंडे नहीं जाते, नए लडको ने लौंडों को पीछे छोड़ दिया है । मनोज जैसे लौंडे अब थोड़े ही बचे हैं। मनोज लगभग ३३-३४ के करीब पहुंच रहा है, लेकिन शायद तब तक नाचेगा, जब तक लोग उसे नचवाएंगे। फिर तो उसकी भी चोटी कट जाएगी और चाल में बस थोड़ी लचक शेष रह जाएगी, यह गवाही देती हुई कि कभी एक नाच हुआ करता था।

Monday, 29 November 2010

नीतीश बनाम लालू

गाल बजाने वाले नेताओं में अगर देखा जाए, तो लालू सबसे आगे नजर आएंगे, जबकि नीतीश में यह अवगुण नहीं है। लालू अपने खुले दांतों के बारे में खामोश रहते हैं, लेकिन अक्सर हमला बोलते हैं कि नीतीश के पेट में दांत हैं। नीतीश कभी भी लिट्टी चोखा, मछली-मांगुर में समय नहीं गंवाते, जबकि लालू के लिए ये खाद्य पदार्थ भाषण के प्रिय अंश हैं। लालू गजब की परिवारवादी नेता हैं, जबकि नीतीश भी पुत्रवान हैं, लेकिन उनके पुत्र की राजनीति में रुचि नहीं है। परिवार की तरफ नीतीश का कोई रुझान नहीं है। नीतीश ने निश्चित रूप से काम किया है, जबकि लालू १५ साल तक केवल गाल बजाते रहे। गांव की एक महिला बता रही थी कि उसने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने के लिए वोट दिया है। क्योंकि नीतीश कुमार ने योजना के तहत बिहार में लड़कियों को स्कूल जाने के लिए साइकिल बांटी। पहले घर के कामकाज और स्कूल के दूर होने की वजह से लड़कियों का समय पर स्कूल जाना एक मुश्किल काम था, लेकिन अब लड़कियों के पास स्कूल जाने के लिए साइकिल है। मैंने खुद देखा, स्कूल के समय स्कूल जा रही लड़कियों का रेला निकलता है। ऐसा लगता है, मानो नीतीश कुमार की रैली गुजर रही हो। लड़कियां बहुत खुश हैं और उससे ज्यादा खुशी उनके परिवार वाले हैं। पहले लोग पढ़ाई करने के बाद कमाई करके साइकिल खरीदते थे, लेकिन अब तो पढ़ाई के समय ही साइकिल मिल रही है। साइकिल वितरण से गांव-गांव में परिवर्तन आया है, इसे नकारा नहीं जा सकता। राजग का वह विज्ञापन वाकई सच्चाई बयान करता है, जब एक बिहारी महिला यह सोच रही है कि अगर नीतीश पहले बिहार के मुख्यमंत्री होते, तो वह भी साइकिल से स्कूल जाकर पढ़-लिख लेती। लेकिन नीतीश के पहले तो राबड़ी, लालू और जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने बिहार की एक पूरी पीढ़ी को बिगाड़ कर उद्दंड बना दिया। साइकिल इफेक्ट से लालू भी परेशान थे, तो उन्होंने लड़कों को सपने दिखाने की कोशिश की। चुनावी रैली में बोल दिया, लड़कों को स्कूल जाने के लिए मोटरसाइकिल देंगे। इसका जवाब नीतीश ने अपनी रैली में दिया, लालू स्कूली लड़कों को अपराधी बनाना चाहते हैं। १८ साल से कम उम्र के किशोरों, बच्चों को आखिर ड्राइविंग लाइसेंस कैसे मिलेगा? तो लालू चुप हो गए, मोटरसाइकिल वितरण के वादे पर गाल बजाना बंद कर दिया। अब उनके लिए वैसे भी गाल बजाने के मौके कम हो गए हैं। अब तो नेता प्रतिपक्ष पद पर भी उनका वाजिब हक नहीं रहा। उनकी बोलती बंद है, उन्हें स्वभाव बदलना पड़ सकता है, क्योंकि बिहारियों ने संकेत दे दिया है कि वे बदल रहे हैं। वाकई बिहार बदल रहा है। स्वागत है।

अब काम का समय

जब चुनाव के समय १० दिन बिहार में था तब लग तो रहा था कि नितीश कुमार को लोग फिर मुख्यमंत्री पद पर देखना चाहते हैं , लेकिन इतनी बड़ी जीत का सपने में भी अनुमान नहीं था. क्योंकि मेरे जिले मतलब सारण में विकास नहीं के बराबर हुआ है इसकी सबसे बड़ी गवाही एकमा और मांझी के बीच की सड़क देती है इस सड़क पर चलना मुश्किल है . एकमा में तो इतना कम काम हुआ है कि इलाके के विधायक रहे गौतम सिंह को चुनाव लड़ने के लिए मांझी आना पड़ा , गौतम सिंह बिहार सरकार में मंत्री रहने के बावजूद एकमा की सूरत नहीं बदल पाए अब वे मांझी से भरी अंतर से जीते हैं तो इसके लिये लोग नीतीश कुमार को ही श्रेय दे रहे हैं .
मांझी में पूर्व मंत्री रविन्द्र नाथ मिश्र खटिया चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में थे . उन्होंने भी अपने समय में कोई काम नहीं किया था . वे तीसरे स्थान पर रहे. वहां लोगों ने चुनाव नतीजों के बाद एक जुमला चला दिया : लालटेन के पेंदी फूट गइल, बंगला जर गइल , हाथ टूट गइल और खटिया खड़ा हो गइल.
नीतीश की विशालता के आगे लालू बहुत बौने साबित हुए हैं. अब गौतम सिंह जैसे विधायकों और मंत्रियो को भी अपने काम से अपनी विशालता साबित करनी चाहिए . इतनी ताकत जनता बार बार नहीं देती है, ताकत का उचित इस्तेमाल होना चाहिए वरना पांच साल बीतेते ज्यादा समय नहीं लगेगा. नीतीश की टीम के निकम्मे सदस्यों को यह ध्यान रखना चाहिए कि काम न करने की वजह से ही लालू की ऐसी दुर्गति हुई हैं,

Friday, 29 October 2010

अभी बहुत बाकी है



लालू और नीतीश कुमार मे यह फर्क है कि लालू ने बिहार मे पिछड़ी जातियों का मान बढाया था और उन्होंने बिहार के मान की कोई फिक्र नहीं की . लेकिन नीतीश कुमार ने पूरे बिहार का मान बढाया है. बिहार के बाहर बिहारियों की शर्म कुछ कम हुई है. लोग पहले बिहार की चर्चा चलती थी तो लालू, चारा और राबड़ी की बात करते थे. लेकिन अब जो परिवर्तन आया है उसे चतुर लालू भी महसूस करते होंगे. बिहार मे देर रात के समय भी कहीं जाना संभव हुआ है. पिछली बार जब बिहार गया था, तब एकमा स्टेशन पर रात दस बजे के बाद ट्रेन पहुंची थी, स्टेशन पर ट्रेन आने पर जरनेटर थोड़ी देर के लिए जला था और ट्रेन जाने के बाद जनरेटर बंद कर दिया गया. अमावास जैसी रात थी हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था, लगा कि क्या ऐसे ही रात बितानी पड़ेगी. लेकिन इतनी रात को भी जीप करके गाव पहुँच गए थे. मन मे एक बात खटक रही थी कि नीतीश कुमार अभी उर्जा के लिए कुछ नहीं कर पायें हैं. वैसे भी उर्जा के काम में काफी समय लगता है.
आज बिहार बिजली को तरस रहा है, बिजली अगर आ जाये तो आधा विकास तो वैसे ही हो जाएगा. बिजली से बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होता है. बिहार में जो भी नई सरकार बने सबसे ज्यादा ध्यान बिजली या उर्जा उत्पादन पर लगाना होगा. बिजली का आकर्षण कम से कम 20 प्रतिशत बिहारियों को अपने जन्म राज्य में खीच लाएगा.
वैसे तो नीतीश के जीतने की गुंजाइश बहुत ज्यादा है. अगर उनका गठबंधन नहीं जीता, तो लालू या कांग्रेस में भी अकेले दम पर सत्ता में आने की ताकत नहीं होगी. तो वे गठबंधन करेंगे. सत्ता में आयेंगे, उनके सत्ता में आने से उन तत्वों का मनोबल बढेगा जिनका नुक्सान नीतीश कुमार ने किया है. अपराधियों की एक बड़ी आबादी जेल में बैठ कर लालू के सत्ता में आने का इन्तेजार कर रही है. अपराधी जब बाहर आयेंगे तो राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव का जोर नहीं चलेगा.
मैं अगर अपने अनुमान पर कुछ संभानाओं की बात करूं तो
पहली : राजग जीतेगा और नीतीश फिर कमान संभालेंगे .
दूसरी : नीतीश की पार्टी अकेले दम पर भी जीत सकती है. बीजेपी की ताकत घट जायेगी.
तीसरी : लालू, कांग्रेस और पासवान सांप्रदायिक ताकतों के विरोध के नाम पर मिलकर सरकार बनायेंगे.
चौथी : लालू और पासवान का गठबंधन सत्ता में आएगा. हालांकि इसकी सम्भावना कम है.
पाचवी : बीजेपी अगर बुरी तरह पिट जाए तो कांग्रेस नीतीश को समर्थन दे सकती है, लेकिन ऐसा तभी होगा जब कांग्रेस 40 से ज्यादा शीट जीते और बीजेपी 20 से कम. और जब जनता दल यू बहुमत से 35 -40 सीट कम रह जाए.

लेकिन फिलहाल बिहार के लिए सर्वोत्तम विकल्प यही होगा कि नीतीश फिर मुख्यमंत्री बनें और लालू फिर हार कर आलोचना में जुटे रहे.
नीतीश को लालू पहले सुशासन बाबू कहते थे, लेकिन अब नहीं बोलते हैं , नीतीश को फिर एक बार सुशासन पर ध्यान देता चाहिए ताकि लालू ही नहीं पूरा भारत उन्हें सुशासन बाबू बोल सके. बिहार को सुशासन की बड़ी जरूरत है. नीतीश सही बोल रहें हैं कि बहुत हुआ, लेकिन अभी बहुत बाकी है.

Sunday, 17 October 2010

जय सियाराम

दशहरा के दिन अक्सर ऐसे लोग मिल जाते हैं, जो जय लंकेश जय रावन कहकर अभिवादन करते हैं. बड़ा दुःख होता है, जब ऐसे लोग मिलते हैं. उन्हें पता नहीं कि वे कितना गंभीर अपराध करते हैं, ऐसे लोगों से थोडा विचार-विमर्श करने पर ज्ञात होता हैं कि ये लोग ऐसा बहुत सोच समझकर नहीं कहते, धारा के खिलाफ चलना कुछ लोगों का स्वाभाव बन गया है, भीड़ से अलग दिखने की चेष्टा भी इसके पीछे होती है. अपने को दूसरों से अलग, मौलिक और चतुर दिखने की चेष्टा भी होती है, लेकिन दरअसल ऐसे लोग नहीं जानते की रावन की जगह कहाँ है.
रामानंदियों में तो हर ब्यक्ति को राम या सीताराम माना जाता है, लोग एक दूसरे को सीताराम कहकर संबोधित करते हैं. एक दूसरे को रावन कहकर या रावन-मंदोदरी या रावन-मेघनाद कहकर कोई संबोधित नहीं करता और ऐसा संभव भी नहीं है. एक दूसरे को रावन-रावन कहकर सम्मान प्रदर्शित किया जाये तो वास्तव में असम्मान ही होगा, परस्पर संघर्ष और युद्ध तक की नौबत आ जाएगी. रक्तपात हो जायेगा.
मेरा मानना है कि जय लंकेश वही बोल सकता है, जिसे अपनी 'सीता' की कोई चिंता नहीं है। यह तुछ अभिवादन वही कर सकता है जिसकी 'सीता' का बलात हरण नहीं हुआ हो या जिसकी 'सीता' के हरे जाने की कोई आशंका न हो। 'सीता' किसी की बेटी भी हो सकती है। किसी की बहन तो किसी की पत्नी भी। राम द्वापर युग में हुए थे, लेकिन आज भी कलयुग में यदि ज्यादातर सीतायें सलामत हैं तो केवल राम या राम सन्देश के कारण. सीता को जीवन भर निरंतर प्राप्त होती रही पीड़ा का हमें अनुभव करना चाहिए, यह अनुभव और यह अनुभूति ही हमें रावन या रावन का समर्थक होने से बचा सकती है. जय लंकेश कहने से पहले अपनी-अपनी सीताओ से पूछ लेना चाहिए कि क्या वे किसी रावन द्वारा बलात हरण के लिए तैयार हैं.