Monday, 29 November 2010
नीतीश बनाम लालू
अब काम का समय
मांझी में पूर्व मंत्री रविन्द्र नाथ मिश्र खटिया चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में थे . उन्होंने भी अपने समय में कोई काम नहीं किया था . वे तीसरे स्थान पर रहे. वहां लोगों ने चुनाव नतीजों के बाद एक जुमला चला दिया : लालटेन के पेंदी फूट गइल, बंगला जर गइल , हाथ टूट गइल और खटिया खड़ा हो गइल.
नीतीश की विशालता के आगे लालू बहुत बौने साबित हुए हैं. अब गौतम सिंह जैसे विधायकों और मंत्रियो को भी अपने काम से अपनी विशालता साबित करनी चाहिए . इतनी ताकत जनता बार बार नहीं देती है, ताकत का उचित इस्तेमाल होना चाहिए वरना पांच साल बीतेते ज्यादा समय नहीं लगेगा. नीतीश की टीम के निकम्मे सदस्यों को यह ध्यान रखना चाहिए कि काम न करने की वजह से ही लालू की ऐसी दुर्गति हुई हैं,
Friday, 29 October 2010
अभी बहुत बाकी है

आज बिहार बिजली को तरस रहा है, बिजली अगर आ जाये तो आधा विकास तो वैसे ही हो जाएगा. बिजली से बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होता है. बिहार में जो भी नई सरकार बने सबसे ज्यादा ध्यान बिजली या उर्जा उत्पादन पर लगाना होगा. बिजली का आकर्षण कम से कम 20 प्रतिशत बिहारियों को अपने जन्म राज्य में खीच लाएगा.
वैसे तो नीतीश के जीतने की गुंजाइश बहुत ज्यादा है. अगर उनका गठबंधन नहीं जीता, तो लालू या कांग्रेस में भी अकेले दम पर सत्ता में आने की ताकत नहीं होगी. तो वे गठबंधन करेंगे. सत्ता में आयेंगे, उनके सत्ता में आने से उन तत्वों का मनोबल बढेगा जिनका नुक्सान नीतीश कुमार ने किया है. अपराधियों की एक बड़ी आबादी जेल में बैठ कर लालू के सत्ता में आने का इन्तेजार कर रही है. अपराधी जब बाहर आयेंगे तो राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव का जोर नहीं चलेगा.
मैं अगर अपने अनुमान पर कुछ संभानाओं की बात करूं तो
पहली : राजग जीतेगा और नीतीश फिर कमान संभालेंगे .
दूसरी : नीतीश की पार्टी अकेले दम पर भी जीत सकती है. बीजेपी की ताकत घट जायेगी.
तीसरी : लालू, कांग्रेस और पासवान सांप्रदायिक ताकतों के विरोध के नाम पर मिलकर सरकार बनायेंगे.
चौथी : लालू और पासवान का गठबंधन सत्ता में आएगा. हालांकि इसकी सम्भावना कम है.
पाचवी : बीजेपी अगर बुरी तरह पिट जाए तो कांग्रेस नीतीश को समर्थन दे सकती है, लेकिन ऐसा तभी होगा जब कांग्रेस 40 से ज्यादा शीट जीते और बीजेपी 20 से कम. और जब जनता दल यू बहुमत से 35 -40 सीट कम रह जाए.
लेकिन फिलहाल बिहार के लिए सर्वोत्तम विकल्प यही होगा कि नीतीश फिर मुख्यमंत्री बनें और लालू फिर हार कर आलोचना में जुटे रहे.
नीतीश को लालू पहले सुशासन बाबू कहते थे, लेकिन अब नहीं बोलते हैं , नीतीश को फिर एक बार सुशासन पर ध्यान देता चाहिए ताकि लालू ही नहीं पूरा भारत उन्हें सुशासन बाबू बोल सके. बिहार को सुशासन की बड़ी जरूरत है. नीतीश सही बोल रहें हैं कि बहुत हुआ, लेकिन अभी बहुत बाकी है.
Sunday, 17 October 2010
जय सियाराम
रामानंदियों में तो हर ब्यक्ति को राम या सीताराम माना जाता है, लोग एक दूसरे को सीताराम कहकर संबोधित करते हैं. एक दूसरे को रावन कहकर या रावन-मंदोदरी या रावन-मेघनाद कहकर कोई संबोधित नहीं करता और ऐसा संभव भी नहीं है. एक दूसरे को रावन-रावन कहकर सम्मान प्रदर्शित किया जाये तो वास्तव में असम्मान ही होगा, परस्पर संघर्ष और युद्ध तक की नौबत आ जाएगी. रक्तपात हो जायेगा.
मेरा मानना है कि जय लंकेश वही बोल सकता है, जिसे अपनी 'सीता' की कोई चिंता नहीं है। यह तुछ अभिवादन वही कर सकता है जिसकी 'सीता' का बलात हरण नहीं हुआ हो या जिसकी 'सीता' के हरे जाने की कोई आशंका न हो। 'सीता' किसी की बेटी भी हो सकती है। किसी की बहन तो किसी की पत्नी भी। राम द्वापर युग में हुए थे, लेकिन आज भी कलयुग में यदि ज्यादातर सीतायें सलामत हैं तो केवल राम या राम सन्देश के कारण. सीता को जीवन भर निरंतर प्राप्त होती रही पीड़ा का हमें अनुभव करना चाहिए, यह अनुभव और यह अनुभूति ही हमें रावन या रावन का समर्थक होने से बचा सकती है. जय लंकेश कहने से पहले अपनी-अपनी सीताओ से पूछ लेना चाहिए कि क्या वे किसी रावन द्वारा बलात हरण के लिए तैयार हैं.
Tuesday, 28 September 2010
आज का समय और समय का धर्म
समय की जब चर्चा छिड़ती है, तो मुझे बचपन याद आता है। एक पुरानी पहेली याद आती है, तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर, आगे तीतर, पीछे तीतर, बोलो कितने तीतर। जरा सोचिए, इस पहेली में अगर ‘तीतर’ के स्थान पर ‘समय’ को रख दिया जाए, तो क्या होगा? तो पहेली कुछ यों बनेगी :- समय के दो आगे समय, समय के दो पीछे समय, आगे समय पीछे समय, बोलो कितने समय? मेरे जैसे पत्रकार साधारण जन यही उत्तर देंगे कि तीन समय। अर्थात अतीत-जो बीत गया। वर्तमान, जो बीत रहा है, और भविष्य जो बीतेगा, किन्तु विद्वान आगे और पीछे वाले समय के चक्कर में नहीं पड़ेंगे, वे मात्र इतना कहेंगे कि मात्र एक समय। न आगे समय न पीछे समय न बीच में समय, मात्र एक समय। ‘तीतर’ के स्थान पर ‘समय’ को रखते ही पहेली का उत्तर बदल जाएगा। उत्तर ‘तीन’ से ‘एक’ हो जाएगा।
परन्तु समय को एक माना जाए, तो कठिनाई है। लिखाई-पढ़ाई, पत्रकारिता समय को एक मानकर नहीं चल सकती, गृहस्थ जीवन समय को एक मानकर नहीं चल सकता, विश्व की बड़ी व छोटी तमाम तरह की अर्थव्यवस्थाएं समय को एक मानकर नहीं चल सकतीं। समय को एक मान लिया जाए, तो आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का तो पूरा महानगर ही ढह जाएगा। हमारे सेठ-साहूकार समय को एक नहीं मान सकते। एक मान लिया, तो बड़ी कठिनाई हो जाएगी। सारा ‘अकाउंट’ चौपट हो जाएगा। भौतिकता की कसौटी पर समय का यदि महत्व दर्ज किया जाए, तो समय बड़ा महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। लगेगा कि समय से ज्यादा तो कुछ और महत्वपूर्ण हो ही नहीं सकता। लगेगा कि समय बड़ा बलवान है। ऐसे बलवान समय को ज्ञान और विज्ञान ने पकडऩे के बड़े प्रयास किए हैं, लेकिन समय की कोई एक पकड़ या समय की कोई एक कसौटी बनाना कठिन ही नहीं, असंभव है।
आज दुनिया में चौबीस तरह की प्रमुख व मान्य घडिय़ा हैं, इसे ‘टाइम जोन’ भी कहते हैं, अर्थात चौबीस तरह के समय आंकने के पैमाने हैं। एक ही समय में किसी घड़ी में पांच बज रहा है, तो किसी में छह, तो किसी में सात। समय एक ही है, लेकिन घडिय़ां अलग-अलग बताती हैं। अब कोई सोचे कि पांच बज रहा है, यह सच है या जो छह बज रहा है, वह सही है या जो सात बज रहा है, वह सटीक है। वास्तव में सच यह है कि समय का सच संभवत: समय भी नहीं जानता। पांच बज रहा है, यह यहां का सच है और आठ बज रहा है, वह कहीं और का सच होगा। हमारे भारत में तो हर जगह घड़ी एक-सी रहती है, लेकिन अमरीका में देखिए, लॉस एंजेलिस में १० बज रहा होता है, तो शिकागो में १२ और वॉशिगटन में १३ । जब सूरत में शाम के चार बजेंगे, तब शिकागो में घड़ी सुबह के साढ़े पांच बजा रही होगी। साढ़े ग्यारह घंटे का फर्क है। गजब हो गया, अब बताइए कौन-सा समय सही है? अत: समय को यथावत स्वीकार करने में ही भलाई है, परन्तु वह एक नहीं है, यह बात पूर्ण सत्य है। समय को पकडऩे के प्रयास जारी हैं। समय ऐसा है कि घड़ी गड़बड़ा जाती है, घड़ी को कभी एकाध पल के लिए रोकना पड़ता है, तो कभी एकाध पल आगे करना पड़ता है। फिर भी समय की ताल से ताल मिलाना दुष्कर है।
मुझे यह लगता है, समय को पकडऩे की चेष्टा वास्तव में ईश्वर को पाने की चेष्टा के समान है। संभवत: इसीलिए ईश्वर को प्राप्त कर लेने वालों के बारे में कहा जाता है कि वे समय बंधन से मुक्त हो गए। भौतिक दृष्टि से आप घड़ी देखकर यह टिप्पणी कर सकते हैं कि बुरा समय चल रहा है या अच्छा समय चल रहा है, इसे गलत भी नहीं कहा जा सकता, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से आज के समय को थामना कठिन है। भविष्यवाणी करने वाले अतीत और भविष्य बता देते हैं, कई बार भविष्यवाणी सिद्ध भी हो जाती है, लेकिन सौ प्रतिशत सही भविष्यवाणी असंभव है। आज का जो समय है, उसमें यदि कोई सौ प्रतिशत सही भविष्यवाणी करने लगे, तो लोग उसे ईश्वर घोषित करने में देर नहीं लगाएंगे। ग्रंथ पढि़ए, देवताओं के राजा इंद्र भी कई बार हैरान-परेशान दिखते हैं कि असुर जाति कहर ढा रही है, अब क्या होगा? प्रश्न उठाया जा सकता है कि अगर ब्रह्मा जी सबकुछ जानते थे, यदि विष्णु जी व महेश जी सबकुछ जानते थे, तो फिर उनके राजा इंद्र को हैरान-परेशान होने की क्या आवश्यकता थी। मेरी समस्या यह बात जानकर बहुत बढ़ जाती है कि देवताओं के राजा भी समय को पकडऩे में विफल थे। देवताओं के बीच सबसे ज्यादा गलतियां शायद उन्होंने ही की होंगी और सबसे ज्यादा निंदा भी शायद उन्हीं की हुई। आज भी होती है, इंद्र के मंदिर खोजे से नहीं मिलते। उन्हें सुख-दुख में कोई भूलकर भी याद नहीं करता। हां, बारिश न हो, तो इंद्र देवता को सभी याद करते हैं, भारत सरकार भी याद करती है। इंद्र की स्थिति संकेत करती है, समय नियंत्रण में भले न रहे, आचरण अवश्य नियंत्रण में रहना चाहिए। आचरण अगर अनुकूल न रहा, तो आप मनुष्यों में राजा की तो बात छोडि़ए, यदि आप देवताओं के भी राजा होंगे, तो आपको सम्मान प्राप्त नहीं होगा, आप हैरान-परेशान रहेंगे। आप पूज्य नहीं होंगे।
जब मुझे ज्ञात हुआ कि मुझे समय पर बोलना है, तो मैंने यह जानने की कोशिश की भगवान राम ने समय के बारे में क्या कुछ कहा है। काल के स्वरूप की क्या विवेचना उन्होंने की है। योगवाशिष्ठ के सर्ग २३-२५ में राम जी कह रहे हैं, ‘जैसे बडवाग्नि उमड़े हुए समुद्र को सोखती है, उसी प्रकार यह सर्वभक्षी काल भी उत्पन्न हुए जगत को अपना ग्रास बना लेता है। भयंकर कालरूपी महेश्वर इस सम्पूर्ण दृश्य प्रपंच को निगल जाने के लिए सदा उद्यत रहते हैं, क्योंकि सारी वस्तुएं उनके लिए सामान्यरूप से ग्रास बना लेने के योग्य हैं। युग, वर्ष और कल्प के रूप में काल ही प्रकट है। इसका वास्तविक रूप कोई देख नहीं सकता। वह सब संसार को अपने वश में करके बैठा है।’ काल लीला से चकित राम जी आगे कहते हैं, ‘संसार में अब तक ऐसी कोई वस्तु नहीं हुई, जिसे काल उदरस्थ न कर ले। इस काल का विचार सदा सबको निगल जाने का ही रहता है। यह एक को निलगता हुआ भी दूसरे को चबा जाता है। अब तक असंख्य लोग इसकी उदर-दरी में प्रवेश कर चुके हैं, तो भी यह महाखाऊ काल तृप्त नहीं होता।’ राम जी यह भी कहते हैं, ‘काल न कहीं आता है, न जाता है, न अस्त होता है और न इसका उदय होता है।’ हमारे देश में दर्शन शास्त्र के एक प्रकाण्ड विद्वान हुए हैं : अन्नम भट्ट। (मंच पर विराजमान पूज्य श्री रामनरेशाचार्य जी भी इस दौर में दर्शन के सर्वश्रेष्ठ विद्वान हैं।) अन्नम भट्ट ने कहा था, कालो नित्य: अर्थात काल नित्य है, उसका क्षरण नहीं होता। (कालो नित्य: का प्रसंग मैंने सूरत में ही प्रिय-सखा शास्त्री कोसलेन्द्रदास के सुझाव पर अपने भाषण में समाहित किया। उनको धन्यवाद।)
बहरहाल, राम जी समय को बहुत अच्छी तरह से समझ रहे थे। उनके जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने सदा आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने जीवन में सिद्ध किया कि आदर्श बनने के लिए समय को समझना जरूरी है, उससे आतंकित होने से काम नहीं चलेगा। मेरा मानना है, भारत के लोग समय से सबसे कम डरते हैं, क्योंकि उनके पास आध्यात्मिक पूंजी है।
एक पश्चिमी विद्वान टिल्ली ओलसेन की टिप्पणी सुनिए - the clock talked loud. I threw it away, it scared me what it talked. घड़ी बहुत जोर से बोली, मैंने उसे फेंक दिया, उसकी बातों ने मुझे डरा दिया। दूसरे एक पश्चिमी विद्वान डिओन बाउसिकाउल्ट का कथन कुछ ज्यादा सही है, देखिए -Men talk of killing time, while time quietly किल them . लोग समय को मारने की बात करते हैं, जबकि समय चुपचाप उन्हें मार देता है। एक बात बहुत सिद्ध है कि संसार में सभी समय को लेकर बहुत चिंतित हैं। यह चिंता कैसे दूर होगी? इस चिंता को दूर करने के क्या उपाय हैं? समय का धर्म क्या है? बड़े महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। मुझे लगता है, समय को यों ही नहीं छोडऩा चाहिए, उसे समझना चाहिए। समय का मानकीकरण करना चाहिए। मेरा मानना है, समय का सर्वश्रेष्ठ मानकीकरण धर्म है और धर्म का सर्वश्रेष्ठ मानकीकरण भक्ति है और भक्ति का सर्वश्रेष्ठ मनोनुकूल सहजीकरण राम भक्ति है। समय था, समय है, समय सदा रहेगा, किन्तु वह यों ही अच्छा नहीं बीतेगा, उसके लिए धर्म आवश्यक है। हमारे महान पूज्य पूर्वजों ने धर्म के रूप में समय का सबसे अनुकूल व सभ्य पड़ोसी तैयार किया। हमारे पूर्वज तो जीवनशैली खोज रहे थे, वे कोई धर्म नहीं बना रहे थे। उन्होंने जो धर्म दिया, धर्म के ज्ञान की जो वैज्ञानिकता निर्मित की, वास्तव में उसी के फलस्वरूप हमारे यहां एक से एक महात्माओं का पदार्पण हुआ। किसी भी चरण या युग में हमारे पूर्वज भयभीत नहीं थे, क्योंकि वे समझदार थे। मात्र राम-राम जपकर भी असंख्य लोग अत्यंत निडर हो गए। प्रलय की कल्पना को लेकर हमारे पूर्वजों ने कभी क्रंदन नहीं किया। उन्हें तो यह भी चिंता नहीं थी कि हम अपना धर्म नहीं फैलाएंगे, तो मिट जाएंगे। वे इहलोक की उतनी ही बात करते थे, जितनी परलोक की। वे यह नहीं कहते थे कि इहलोक में हत्या करो कि परलोक में स्वर्गानुभूति हो। वे तो कहते थे, इहलोक सुधारो, परलोक स्वत: सुधर जाएगा। कर्म करो, भविष्य की चिंता छोड़ो। कर्म नेक होंगे, तो भविष्य नि:संदेह आनंददायक होगा। तो आज समय का धर्म यही है कि समय को हम ठीक से समझें, समय का हम ठीक से निर्वाह करें। समय से अनावश्यक बैर न करें, शांति बनाए रखें। काश, यह बात पूरा संसार समझ पाता। ग्लोबल वार्मिंग क्या है, समय को समझने की विफलता का नकारात्मक पारितोषिक है। दुख क्या है, समय के अनादर का परिणाम है। सुख क्या है, समय के आदर की परिणति है। हमें आज समय का तांडव नहीं देखना, हमें धर्म के माध्यम से समय का सुगम संगीत सुनना है। हमें समय का ध्रुवपद सुनना है। जो समय के धु्रवपद को सबसे डूबकर सुनेगा, वह संसार में सुख व शक्ति के साथ टिक पाएगा। हम भारतीयों का समय एक है, इसीलिए हम टिके हुए हैं। यहां अध्यात्म टिका हुआ है। हमारे राम जी घर-घर में टिके हुए हैं। पश्चिम हम भारतीयों के समय के साथ सरोकार व सम्बन्ध को समझ नहीं सकता। उदाहरण के लिए, हाल ही में इस सदी के सबसे बड़े भौतिकशास्त्री कहलाने वाले स्टीफन हॉकिंग ने कह दिया, ‘सृष्टि की रचना ईश्वर ने नहीं की।’ पश्चिम में विद्वानों को ईश्वर की बड़ी चिंता रहती है। पिछली सदी में नीत्से ने तो ईश्वर की मौत की घोषणा कर दी थी और फिर खुद भी डर गए थे कि ईश्वर के बिना दुनिया का क्या होगा। एक तरह से यह मानते हुए नीत्से पीछे हट गए कि ईश्वर को झुठलाने के लिए हमें ईश्वर को समझना-जानना होगा। मेरा मानना है, ईश्वर को समझने के लिए हमें समय को समझना होगा। समय से प्रेम करना होगा। समय से प्रेम करेंगे, तो न अतीत का भय रहेगा न भविष्य का। तभी हम स्वयं को कुछ बना पाएंगे, हमारा महत्व बढ़ेगा, हमारी सार्थकता बढ़ेगी। मैं फिर एक अंग्रेजी विद्वान डोमिनिको एस्त्रादा का उद्धरण दूंगा : Time is like the wind it lifts the light and leaves the heavy. . अर्थात : समय हवा की तरह है, हल्के को उठा लेता है, लेकिन भारी को छोड़ देता है। अब हमें सोचना चाहिए कि हमें अपने धर्म-कर्म से हल्का बनना है या भारी।
Saturday, 4 September 2010
वाह! स्वामी जी
Monday, 19 July 2010
मैं क्यों भेद करूं?

पूज्य श्री कह रहे थे, मैं क्यों भेद करूं, जब ईश्वर भेद नहीं करता। सूर्य सबको समान किरण देता है, ब्राह्मण को भी उतना ही जितना शूद्र को, जितना गरीब को, उतना ही अमीर को। हवा भी सबको समान मिलती है, लेकिन भेद तो हम करते हैं। और अधिकतर जो समस्याएं हैं, वो वितरण की अपारदर्शिता के कारण हैं। अगर ईमानदार वितरण हो, तो किसी के साथ भी अन्याय नहीं होगा। पूज्य श्री जाति आधारित जनगणना की चर्चा से चिंतित हैं। उन्हें लगता है, जात-पात पूछने का युग फिर आ जाएगा। जगदगुरु रामानन्दाचार्य जात-पात पर कतई जोर नहीं देते थे। जात-पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे से हरि का होई। पूज्य श्री ने बताया कि वे एक ऐसे अभियान से जुड़े हैं, जिसका कार्य जाति आधारित जनगणना का विरोध करना है। यह जानकर मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने मन ही मन यह सोचना प्रारम्भ किया कि पूज्य श्री के चिंतन को कैसे दूर तक पहुंचाया जाए। कई बातें हुईं, वे कह रहे थे, सरस्वती पुत्रों के बीच प्रेम होना चाहिए। सरस्वती पुत्रों को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए। जरा यह सोचकर देखिए कि पढ़े-लिखे लोग अगर एकजुट हो जाएं, तो राष्ट्र के विकास की गति कितनी तेज हो सकती है। वामपंथ पर बात हुई। मैंने कहा, रामराज्य में ऐसे तत्व हैं, जो उसे वामपंथ से भी आगे रखते हैं। पूज्य श्री ने इसे स्वीकार करते हुए चंडीगढ़ के एक नास्तिक वामपंथी का उदाहरण दिया। एक रामकथा के वाचन के उपरांत उस व्यक्ति ने पूज्य श्री के चरण छुए, तो बहुतों को आश्चर्य हुआ कि जो व्यक्तिमंदिरों में ईश्वर के सामने हाथ नहीं जोड़ता, वह पूज्य श्री को प्रणाम कर रहा है। द्वितीय भेंट में पूज्य श्री ने हरिद्वार कुम्भ को भी याद किया। कुम्भ के प्रति प्रेम से वे लबालब थे। कई घटनाओं को उन्होंने याद किया। यह भी बताया कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हरिद्वार गए थे। उत्तराखंड के राज्य अतिथि थे। यहां मैं यह बता दूं कि पूज्य श्री और अशोक गहलोत में बहुत प्रेम है। मैंने पूज्य श्री के मुख से अशोक गहलोत के लिए केवल प्रशंसा ही सुनी है। बहरहाल, अशोक जी हरिद्वार पहुंचे और पूज्य श्री से कहा, अपना राम मंदिर दिखलाइए। यहां यह बता दें कि हरिद्वार में पूज्य श्री के रामानन्द संप्रदाय की ओर से लगभग १५० करोड़ रुपयों की लागत से भव्य राम मंदिर बन रहा है। यह मंदिर कई तरह की विशेषताओं से युक्त होगा। इसकी पूरे देश में चर्चा है। पूज्य श्री ने टालने की कोशिश की, लेकिन अंतत: अशोक जी के साथ उन्हें हरिद्वार में निर्माणाधीन विशाल राम मंदिर के दर्शन के लिए जाना पड़ा। खांटी कांग्रेसी अशोक जी ने निर्माण देखकर बड़े प्रसन्न होकर अर्थपूर्ण टिप्पणी की, 'उनका तो बनेगा नहीं, अपना बन गया।
Saturday, 10 July 2010
जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी से द्वितीय भेंट

सच कहा गया है, प्रेम की कथा अकथ होती है। हृदय प्रेम में ऐसा स्तब्ध हो जाता है कि भाव प्रवाह ठहर जाता है। वाणी पर ताले पड़ जाते हैं, पड़े भी क्यों न, उसकी चाभी तो मस्तिष्क के पास होती है और मस्तिष्क प्रेम में ऐसा डूबा हुआ होता है, मानो प्रेम में ही समाहित हो गया हो, मानो प्रेम प्रवाह में बह गया हो। कहते हैं रस में रस हो, तो रस की अनुभूति नहीं होती, रस की अनुभूति के लिए पात्र चाहिए और अगर पात्र ही रसमय या रसिक हो जाए, तो फिर रस की पृथक अनुभूति तो असंभव हो ही जाएगी।
ऐसा ही हुआ, जब रामानन्द संप्रदाय के प्रधान पूज्य श्री जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी से द्वितीय भेंट हुई। हम ऐसे मिले, मानो कभी बिछड़े न हों। जिस भाव धरा पर हम एक दूजे से ३० दिसम्बर २००९ को विलग हुए थे, ठीक उसी भाव धरा पर हम पुन: विराजमान हुए। मुझे तो ऐसा प्रतीत हुआ कि हमारा संवाद ३० दिसम्बर से निरंतर था और अभी भी है। कौन कहता है कि सदेह निकट उपस्थिति ही संवाद के लिए आवश्यक है, संवाद तो सतत है, जैसे प्रेम सतत है, जैसे भक्ति सतत है। दो प्रेमी साथ न हों, तब भी तो उनके हृदय में प्रेम सतत रहता है। संसार में हमारे राम जी कभी हुए थे सदेह, आज सदेह नहीं हैं, तो क्या उनसे हमारा संवाद टूट गया? अनुभूति की शक्ति को सप्रेम प्रज्जवलित करके देखिए, तो राम जी आज भी हमसे संवादरत अनुभूत होते हैं। कुछ अत्यधिक अनुभूत करके देखिए, तो राम जी की सदेह अनुभूति भी असंभव नहीं है। चिंतन में उतर जाइए, तो यह भी अनुभूति संभव है कि आप रामजी की गोद में बैठे हैं। यह अनुभव अभ्यास एक प्रयोग है और प्रयोग करते करते ही कोई आविष्कार होता है। कम से कम मैंने तो स्वयं का अर्थात अपने राम का आविष्कार ऐसे ही किया है। खैर, पूज्य श्री बोल रहे थे, समस्याओं और अविकास पर रोना ठीक नहीं है। यह उनकी खूबी है वे न तो निराश हैं और न दूसरों को निराश करते हैं। उनके अनुसार, विकास हुआ है और साफ दिख रहा है, उसे नकारना नहीं चाहिए। ईंधन की ही बात करें तो यह संकट दूर हुआ है। मैं जब बच्चा था, पढ़ता था रात-रात भर। लालटेन सारी रात जलती, तेल खत्म हो जाता था। कण्ट्रोल से सीमित मात्रा में तेल आता था। उसकी उपलब्धता सहज नहीं थी। दादी जी कहती थीं, तेल जलकर खर्च नहीं होता, ये तेल पी जाता है। इतना पढ़कर को कलेक्टर बनेगा क्या?... पूज्य श्री बोल रहे थे, आज स्थितियां बदल गई हैं, ऊर्जा है, सुविधा है। गरीब भी पढ़ रहे हैं। यही तो विकास है। किन्तु पूज्य श्री के बचपन की यह संक्षिप्त कथा मुझे झकझोर गई। मैं विकास के विषय पर नहीं अटका , मेरा मन कलेक्टर वाली बात पर अटका। धन्य हैं वो पूजनीया दादी जी और राम जी की इच्छा। पूज्य श्री कलेक्टर तो नहीं बने, परन्तु जो बने हैं, वह हजार कलेक्टर भी मिलकर नहीं बन सकते । हृदय यों हुआ, मानो देह-बाड़ तोड़ बाहर आ जाएगा। रात-रात भर की वह पढाई-कमाई आज यों काम आती है कि मेरे जैसे रस- कंगले लूट रहे हैं, छक रहे हैं और जो चीज छक रहे हैं, उसका कोई अंत नहीं है, कोई विकल्प नहीं है।
भारत भूमि की उर्वरा देखनी हो, तो कोई पूज्य श्री के सामने आ जाए। आधुनिक दौर में ज्यादातर फलदार व्यक्ति अकड़कर लंबे-चौड़े हो जाते हैं, झुकने को तैयार नहीं होते, लेकिन इसी दौर में पूज्य श्री जैसा एक फल-समृद्ध भी है, जो विनम्रता में झुका जा रहा है, जो उनसे ग्रहण कर सके , ग्रहण करे। साधु क्या है, जैसी प्रकृति । अच्छे साधु और प्रकृति के बीच भेद मिट जाता है। साधु के पास जो भी होता है, प्राकृतिक होता है। कृत्रिमता उसे तनिक भर भी छू नहीं पाती है। पूज्य श्री भी सहजता के वैभव से ऐसे लबालब होते हैं आपके और उनके बीच की दूरियां पलक झपकते नप जाती हैं, खाइयां तत्काल पट जाती हैं। वे अपनी बातों से ऐसा सेतु निर्मित करते हैं, जिस पर से होते हुए उन तक पहुंचना अति सहज हो जाता है।
उनसे मिलने के बाद मुझे आश्चर्य होता है कि मैं कभी नास्तिक होकर भी सोचता था। मेरी प्रगतिशीलता के अनुभव ऐसे थे कि किसी भी साधु को स्वीकार करना कठिन प्रतीत होता था। मेरे अनुभव कोष में जिस प्रथम साधु का समावेश हुआ, उनके बारे में मैं बताना चाहूंगा। उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में सरयू नदी के किनारे उनका आश्रम था, मेरा ननिहाल का गांव बभनियाव उन बाबा जी के आश्रम के समीप था। मैं करीब पांच-छह वर्ष का था, हम लोग सब बैलगाड़ी पर सवार उन्हें देखने गए थे। हम आश्रम पहुंचकर अभी बैलगाड़ी से उतर ही रहे थे कि मचान पर बैठे साधु हमें ‘जाओ-जाओ-जाओ’ कहने लगे। मैं तो उन साधु बाबा को ठीक से देख भी नहीं पाया, वहां जल्दी-जल्दी प्रसाद लेकर हम फिर बैलगाड़ी पर सवार हो गए थे। मौसियों ने बताया था, ‘इहे देवराहा बाबा हउवन।’ मतलब यही देवराहा बाबा हैं।
कुछ बड़ा हुआ, तो पता चला, देवराहा बाबा बड़े-बड़े लोगों से भेंट किया करते थे। उनका बड़ा सम्मान था, पहुंचे हुए संत थे। पिता बताते हैं, वे दो बार उनसे मिलने गए थे और दोनों ही बार उन्होंने पिता से दो बार संवाद किया था। मतलब कि वे हर किसी को नहीं भगाते थे। खासकर वे बच्चों और महिलाओं को दूर रखा करते थे। मेरे मन पर खराब प्रभाव पड़ा कि हम बड़े नहीं थे, इसलिए देवराहा बाबा ने हमें दुत्कार दिया। वे मचान पर बैठे रहते थे और हर आने वाले साधारण व्यक्ति को दूर से ही जाओ-जाओ कहने लगते थे। ये उनका अपना तरीका था। शायद इससे उनका आश्रम भीड़ से बच पाता होगा, वर्ना उनके आश्रम के आसपास तो मेला लगाने की इच्छा रखने वालों की कमी नहीं थी। लेकिन देवराहा बाबा के बचाव वाले ये तर्क मेरे मन में बाद में तैयार हुए। साधु सहज नहीं होते हैं, यह धारणा तो मन में जड़ें जमा चुकी थी। धर्म को जानने की इच्छा तो हृदय में सदैव रही, लेकिन धर्म के समीप जाने की इच्छा बचपन में ही मार दी गई।
मैं हृदय से स्वीकार करना चाहूंगा, पूज्य श्री से भेंट के बाद मैंने आध्यात्मिक बचपन का पुन: प्रारम्भ किया । घोषणा करता हूं मैं फिर जीने लगा हूं। अब केवल शब्दों ही नहीं, सांसों का भी मेरे लिए नया अर्थ है।
Monday, 5 July 2010
बदलाव आहिस्ता-आहिस्ता
गांव में बिजली की जरूरत सभी को महसूस होने लगी है। तो बिजली का जुगाड़ भी किया गया है। इस बार मैंने देखा, प्रति प्वाइंट ८० रुपए महीना के दर से जनरेटर से पैदा बिजली का आवंंटन हो रहा है। सिंगल फेज है, बस सीएफएल जलता है। पंखा नहीं चलाया जा सकता। सामान्य बल्ब नहीं जलाया जा सकता। हां, मोबाइल चार्ज हो सकता है। जनरेटर से बिजली पैदा करके बांटने का धंधा चमकने लगा है। गांव में दो-तीन लोगों ने यह धंधा शुरू किया है। शाम को अंधेरा होते ही बिजली आपूर्ति शुरू हो जाती है और करीब तीन घंटे तक आपूर्ति होती है। मैं जब गांव में था, तब साढ़े सात बजे बिजली आती थी और साढ़े दस बजे चली जाती थी। घर में शादी का माहौल था, तो जनरेटर वाले को बोल रखा था कि भइया आधा घंटे देर से जनरेटर बंद करना। कहां जाता है, अगर इच्छा हो, तो राह निकल आती है। बिजली के लिए राह निकल आई है। शायद कोई हिम्मत करेगा और जनरेटर से ही चौबीस घंटे बिजली की आपूर्ति भी संभव हो पाएगी, लेकिन जरूरी है कि लोग बिजली की कीमत समझें और ईमानदारी से कीमत चुकाएं। एक और तब्दीली आई है, जितने साइकिलें हैं, उससे कुछ ही कम मोटरसाइकिलें होंगी। मोटरसाइकिल होने से रात-बिरात कहीं आना-जाना आसान हो जाता है। माहौल खराब है, पूरी तरह से सुधरा नहीं है, लेकिन लोग रात के समय भी जरूरी होने पर आना-जाना करने लगे हैं। अब डर पहले जैसा नहीं है। पहले तो दस-ग्यारह बजे रात में रेलवे स्टेशन की ओर जाने के बारे में सोचना मुश्किल था। लोग रेलवे स्टेशन पर अगर शाम आठ बजे के बाद बाहर से पहुंचते थे, तो वहीं रात गुजारनी पड़ती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अगर आप रात के समय भी स्टेशन पर पहुंचें, तो आपको वहां जीप, सफारी, मार्शल इत्यादि गाडिय़ां मिल जाएंगी। आप रिजर्व करके अपने घर जा सकते हैं। रास्ते में लूट कम हुई है। देर रात कहीं आप जा रहे हों, तो हल्का डर तो लगता है, लेकिन धीरे-धीरे बात करते हुए रास्ता कट ही जाता है। पुलिस की व्यवस्था बिल्कुल नहीं सुधरी है। बिहार में बड़ी संख्या में पुलिस चौकियों की जरूरत है, ताकि कम से कम बड़े गांवों के करीब पुलिस चौकी बने, जो जरूरत पडऩे पर सुरक्षा मुहैया कराने का काम करे। तो एक ओर, जहां मूलभूत ढांचे पर ध्यान देना होगा, वहीं कानून-व्यवस्था भी पुख्ता करने की जरूरत है। बिहार के ये इलाके पिछड़े हुए जरूर हैं, लेकिन यहां लोग पिछड़े हुए नहीं हैं। ज्यादातर लोग मजबूर हैं, कुछ कर नहीं सकते। सुनी-सुनाई बातों के आधार पर जीते हैं। इलाके विधायक और सांसद को ध्यान देना चाहिए। आम लोगों को अभी भी नीतीश कुमार से बड़ी उम्मीदें हैं। नीतीश के साढ़े चार साल में लोग ऊबे नहीं हैं, लोगों में विश्वास जगा है। यह बात नकारात्मक भी है और सकारात्मक भी यहां के लोग जल्दी नहीं ऊबते हैं। लालू से ऊबने में लोगों ने पंद्रह साल लगा दिए। नीतीश से ऊबने में कम से कम दस साल तो लगने ही चाहिए। पांच-छह वर्ष में तस्वीर बदलनी चाहिए, बदल भी रही है, लेकिन रफ्तार धीमी है।
Tuesday, 29 June 2010
लाइब्रेरी वाला गांव
शीतलपुर या गरमपुर
पहले मेरे गांव के लोग कम बीमार पड़ते थे, लेकिन अब ज्यादा बीमार पडऩे लगे हैं। पूछता हूँ , तो हर कोई अपनी या किसी अपने की बीमारी की दास्तान सुनाता है। चेहरों की रौनक बुझने लगी है। क्या हो गया है मेरे गांव को?
कहते हैं, जो गांव पूरब से पश्चिम तक लंबा बसा होता है, उस गांव में बहुत शांति कभी नहीं रहती। किसी की हुकूमत ज्यादा दिन तक नहीं चलती है। बड़े बड़े आते हैं और चले जाते हैं। तो गांव तो उत्तर से दक्षिण दिशा में लंबवत होकर बसना चाहिए। हमारा गांव पूरब-पश्चिम वाला है, उसे चाहकर भी शायद उत्तर-दक्षिण वाला नहीं बनाया जा सकता। मेरा मानना है, यह गांव लंबा होता जा रहा है, लेकिन घर के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि गांव शुरू से ही ऐसा ही है। कभी किसी ने कोशिश नहीं की कि इसे सुधारा जाए। जिसे जहां बसना था, बस गया, घर बना लिया। लेकिन यह बात बिल्कुल सही है कि कभी गांव में किसी की ज्यादा दिन तक नहीं चली। एक से एक लाला जी हुए गांव में, लेकिन कोई जमा नहीं। एक से एक साह हुए, सोनार हुए, लेकिन लंबे समय तक कोई जमा नहीं रहा। ब्राह्मणों का वर्चस्व तो शायद ही कभी रहा हो। अब इधर आरक्षण वाली जमात मजबूत हुई है, उन्हीं का वर्चस्व है, वही तय करते हैं कि किसे सरपंच व मुखिया बनाना है।
पिछली बार एक दागी छवि वाले व्यक्ति को लोगों ने मुखिया बनवाया, हालांकि उनका मुखिया पद छिन चुका है। मुखिया जी की नेतागिरी बिल्कुल ठीक चल रही थी, पूरा सम्मान मिलने लगा था, पैसा आने लगा था, लेकिन शायद उनकी किस्मत खराब थी। एक चाट वाले से लड़ बैठे कि उनके लोग खाएंगे चाट, लेकिन पैसा नहीं देंगे। गरीब चाट वाला अड़ा, तो अपने कुछ दांतों से हाथ धो बैठा। कानून कड़ा है, सिर के किसी भाग पर प्रहार को खास गम्भीरता से लेता है, मुखिया जी को अंदर जाना पड़ा। अब जमानत पर बाहर आ गए हैं, लेकिन उनकी मुखियाई तो गई। नया मुखिया बनाया गया है, वह भी आरक्षित वर्ग से ही है। सब लोगों ने मिलकर उसे पंचायत के बाकी बचे हुए कार्यकाल के लिए मुखिया चुन लिया गया है।
नेता आज भी हैं, लेकिन पहले जैसी गुणवत्ता नहीं रही। सेवा का भाव कम हुआ है। शीतलपुर एक अच्छा गांव है, संपन्न गांव है, उसे आज काफी आगे होना चाहिए था, लेकिन आस-पास के गांवों से भी पिछडऩे लगा है, क्योंकि नेतृत्व उतना कुशल नहीं है, जितना होना चाहिए। आपस में झगड़े सुलझाए नहीं जाते, झगड़े लगाए और कराए जाते हैं। उदाहरण के लिए, मेरे घर के सामने जो सड़क सदियों से है, वह आज भी कागज पर नहीं आई है। व्यावहारिकता में सड़क है, लेकिन वहां कोई ईंट नहीं बिछाता, वहां कोई सिमेंटेड सड़क नहीं बनाता। मुखिया आते हैं, चले जाते हैं। हमारे सामने जिनका घर है, उनसे हमारा झगड़ा है, गांव के चतुर लोग जानते हैं कि सड़क बन जाएगी, तो झगड़ा खत्म हो जाएगा। चलने के लिए सड़क तो है ही, चलते रहिए, कागज पर नहीं है, तो क्या हुआ? कागज पर थोड़े चलने जाना है। एक और बात बता दूं, आसपास के सभी गांवों में सड़कें सीमेंटेड हो गई हैं, लेकिन हमारे गांव में इसकी कोई सुगबुगाहट नहीं है। तो यह है नेतृत्व?
बहरहाल, मेरी चिंता दूसरी है, गांव के प्रति गांव के लोगों में जो प्रेम होना चाहिए, वह नदारद है। गांव पर गर्व करने के बहाने लगातार कम होते जा रहे हैं। मैंने अपनी उम्र के छत्तीस वर्षों में अपने गांव के समाज को लगातार गिरते हुए, टूटते हुए और बिगड़ते हुए देखा है। शायद जैसे जैसे मेरा गांव पिछड़ता गया है, वैसे वैसे बिहार के गांव और शायद स्वयं बिहार भी पिछड़ता गया है। जैसे जैसे योग्य लोग मेरे गांव को छोड़ते गए हैं, वैसे-वैसे योग्य लोग बिहार को छोड़ते गए हैं।
क्रमश:
Friday, 25 June 2010
कौन ठगवा नगरिया लूटल हो
कौन ठगवा नगरिया लूटल हो।
चन्दन खाट कै खटोलना तापर दुल्हिन सूतल हो ।
उठो सखी मोर मांग सवारों दूल्हा मोसे रूठल हो
चारी जाने मिली खाट उठाइन चहुँ दिस धू धू उठल हो।
आये जमराज पलंग चढ़ी बैठे नैनं आंसू टूटल हो।
कहत कबीर सुनो भाई साधो जग से नाता टूटल हो।
कौन ठगवा नगरिया लूटल हो .
कबीर की ये पंक्तियाँ देर तक और दूर तक पीछा करती हैं । झकझोर कर रख देते हैं कबीर । इतना रेडिकल कवि कोई दूसरा नहीं दीखता । आखिर कबीर इतने बड़े कवि कैसे हैं ? कभी सोचता हूँ तो यही जवाब मिलता है कि कबीर केवल लिखते नहीं थे वे अपने लिखे हुए को जीते थे इसलिए वे उस ऊंचे मुकाम पर नजर आते हैं जहाँ कोई दूसरा कवि नजर नहीं आता । इस देश मे कबीर से बड़ा कवि और गाँधी जी से बड़ा नेता नहीं हो सकता । दोनों मे एक ही साम्यता है कि दोनों कथनी और करनी के भेद को अपने जीवन मे मिटा देते हैं । दोनों की कथनी करनी में ही नहीं बल्कि रहनी में भी साम्यता है । कथनी करनी और रहनी की साम्यता ही वास्तव में किसी को महान बनाती है।
आज कबीर जयंती है दुःख होता है उन्हें याद करने वालों की संख्या क्यों कम है ?