Friday, 26 August 2011
लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जन्मस्थली
यह लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जन्मस्थली, सिताब दियर, उत्तर प्रदेश का है. 29 - 10 - 2009 की दोपहर का वीडियो है. इस वीडियो में दायी और जो मंदिरनुमा निर्माण है वह संग्रहालय है, जहाँ जेपी की यादों को संजोया गया है, यह गाँव बहुत विशाल है, उसके जिस टोले में जेपी का जन्म हुआ, उसका पुराना नाम बबुरवानी और नया नाम जयप्रकाश नगर है.
Tuesday, 23 August 2011
देश के लिए कुछ शब्द
जन लोकपाल थोड़े परिवर्तन के साथ एक तार्किक कानून बन सकता है. लेकिन सरकार के सामने समस्या यह है कि यह कानून हमारी ब्यवस्था में तर्क की नयी शुरुवात कर देगा. एक मोर्चे पर जैसे ही कोई सुधार होगा वैसे ही दूसरे मोर्चों पर भी सुधार की मांग बढ़ जायेगी. कोटा सिस्टम से देश का एक बड़ा वर्ग परेशां है, कोटा सिस्टम लगातार अतार्किक होता चला गया है. इसमें जब सुधार की मांग होगी तो कोटा का लाभ उन्हें ही मिलेगा जो वास्तविक हकदार हैं. यहाँ नाम लेने की कोई जरूरत नहीं है, कई जातियां है जो कोटा के दम पर इतनी संगठित व शक्तिशाली हो चुकी हैं कि उन्हें बड़ी आसानी से नव-सवर्ण माना जा सकता है.
दलित एक्ट की बात करें तो यह भी एक कुतर्क पर आधारित है. सवर्ण अगर किसी अ-सवर्ण को गाली देता है तो शिकायत होने पर उसकी जमानत भी नहीं होती लेकिन अगर कोई अ-सवर्ण किसी सवर्ण को गाली दे दे तो कोई कानून नहीं है, जो बचाव के लिए इस्तेमाल किया जाए. झूठी शिकायतें और इस कानून के दुरपयोग की बात अगर छोड़ दे तो भी इस कानून को तार्किक नहीं बताया जा सकता. गाली कोई भी दे, दंड समान होना चाहिए. आप कुछ नव-दलित चिंतकों की भाषा पर गौर कीजियेगा. वे ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रहें हैं, जिसको वे स्वयं अपने लिए भी स्वीकार नहीं करेंगे. अगर कोई सवर्ण वैसी भाषा का इस्तेमाल कर दे, दलित एक्ट लागू हो जायेगा. कोई शक नहीं कोटा सिस्टम अगर तार्किक होगा तो इससे उन अ-सवर्ण जातियों को ही लाभ होगा जो वास्तविक रूप से संविधान के पैमानों पर ST या Sc या OBC हैं.
दो दिन पहले दलित चिन्तक चंद्रभान प्रसाद का एक sms आया कि God का शुक्र है मैं अन्ना नहीं हूँ. मैं उनसे पूछा, क्या मतलब है आपका? लेकिन उनका जवाब नहीं आया. कतई जरूरी नहीं है कि चंद्रभान प्रसाद जैसे दिग्गज अ-सवर्ण चिन्तक मेरे जैसे कथित सवर्ण पत्रकार को जवाब दें. यह उनकी ताकत का दौर है. अच्छी बात है. मैंने हमेशा उनका साथ दिया है, अमर उजाला में रहते हुए भी और अपने वर्तमान समाचार पत्र में रहते हुए भी मैंने उनको आमंत्रित कर उनके पीछे पड़ कर उनके लेख प्रकाशित करवाए हैं. मैं चाहता था कि वे नियमित स्तम्भ लिखें मैंने उनसे ब्यक्तिगत रूप से मिल कर निवेदन किया, आप लिखिए. बहुत मनाने के बाद उन्होंने कहा, प्रति लेख पांच हजार रूपये लूँगा. बात यही ख़त्म हो गयी. अगर जाति को सामने रख कर बात करें, तो किसी सवर्ण को भी इतना भुगतान नहीं होता है. मैंने उन्होंने मनाने की जितनी कोशिश की, उतनी कोशिश मैंने किसी को मनाने के लिए नहीं की है. मैं यहाँ यह बता दूं कि मैं उन्हें तीन हजार रूपये प्रति लेख देना चाहता था. वो तैयार नहीं हुए. उन्होंने निःस्वार्थ निवेदन का भी मान नहीं रखा. अब विचारों का लोगों तक पहुंचना महत्वपूर्ण नहीं है. अब बिज़नस और पोलिटिक्स ज्यादा महत्वपूर्ण है.
दलितों पर ईमानदारी से लिखने वालों की कमी है. राजस्थान एक ऐसा राज्य है. जहाँ कोटा सिस्टम में अतार्किकता बढती जा रही है. इस पर चरण सिंह पथिक जी ने स्वयं आगे बढ़ कर एक लेख लिखा था जो प्रकाशित भी हुआ था, लेकिन बाद में ऐसा लगा कि वे भी पीछे हट गए. बेशक तर्क से परहेज पूरे समाज का नुक्सान करेगा और फायदा केवल राजनीति को होगा.
दलित राजनीति और हिंदी पट्टी में दलित चिंतन की तर्क से दूरी लगातार बढती चली जा रही है. अन्ना की बात करें तो महाराष्ट्र के दलित उनके साथ हैं लेकिन हिंदी पट्टी के दलित उनके साथ नहीं है. गुर्जर आन्दोलन के समय कई कई दिनों तक रेल ट्रैक जाम रहता है, लोग खाते पीते वहां जमे रहते हैं, तब किसी को बुरा नहीं लगता लेकिन अन्ना के अनशन को देश घातक और भयानक बताया जाता है.
अभी बंगलुरु में अन्ना के समर्थन में एक रैली निकली बच्चे नेताओं के रूप में रैली में शामिल हुए. उनमे कोई भी अम्बेडकर बन कर नहीं आया, यह बात चंद्रभान प्रसाद जी को चुभ गयी वे ndtv prime टाइम के समय रवीश कुमार से लगातार निवेदन कर रहे थे कि रैली का footage दिखाया जाए, footage दिखाया भी गया लेकिन क्या यह सच नहीं है कि स्वयं दलित राजनीति ने अम्बेडकर की बातों को भुला दिया है. अम्बेडकर ने कोटा सिस्टम के बारे में बहुत कुछ कहा था, लेकिन उन बातों को याद करना दलित चिन्तकों को शायद राजनीतिक रूप से गलत लगता है. अम्बेडकर कभी इस भाषा में बात नहीं करते थे जिस भाषा में आज के रसूखदार दलित नेता करते हैं. लेकिन इनको यही लगता है कि अन्ना गुंडागर्दी कर रहे हैं. यह दुःख और निंदा की बात है.
आज जरूरत सिस्टम को बदलने की है. लेकिन कुछ चिन्तक यह मानते हैं कि सिस्टम बदलेगा तो कोटा सिस्टम भी बदलेगा. इसलिए सिस्टम को बदलने का विरोध हो रहा है. जो सरकार अतार्किक रूप से कोटा सिस्टम को जारी रखना चाहती है, उस सरकार के बचाव को कुछ लोगों ने अपना मकसद मान लिया है. जरूरी है सिस्टम में सुधार, अगर सिस्टम नहीं सुधरेगा, अगर वह तर्क पर आधारित नहीं होगा, तो यकीन मानिए. कोटा कांटे की तरह चुभता रहेगा. और यह काटा कितना किसको चुभ रहा है, यह वो दलित भी जानते हैं जिन्होंने कोटा का लाभ लिया है. शर्मसार वे नहीं है जो बार बार पीढ़ी दर पीढ़ी कोटा का लाभ लेते हुए सवर्णों से भी शक्तिशाली हो चुके हैं. दुखी कुंठित तो वो हैं, जो पहली बार कोटा का लाभ उठाते हुए तर्क खोज रहे हैं. दुखी तो वो हैं जिन्हें आज भी कोटा का लाभ नहीं मिला लेकिन काँटों से जिनका जिगर लहूलुहान हैं. और घूस ने हमारे समाज को कहाँ तक घुस कर मारा है, यह कहानी फिर कभी...
Thursday, 18 August 2011
पिता की मछलियाँ
मेरे बाजुओं में सिर्फ पानी है
लेकिन पिता ने पाली हैं
बाजुओं में मछलियां।
जिन पर हम भाइयों ने गुमान किया।
उन मछलियों के साए में हम पले।
पिता कभी जिम नहीं गए
खेतों-अखाड़ों में जूझकर
पाली मछलियां तगड़ी-मोटी।
लेकिन अब पिता नहीं,
दरअसल मछलियां बूढ़ी हो रही हैं।
पहले की तरह खुराक नहीं मांगतीं।
कलेवर-तेवर नहीं दिखातीं।
हम चाहते हैं खूब खाएं,
फडक़े, कसें और फैली रहीं मछलियां
लेकिन इन दिनों नहीं मानती मछलियां।
वे उतनी ही जिद्दी हैं
जितना कि वक्त।
Sunday, 24 July 2011
पिता के लिए
पिता
के
बहुत मुश्किल है
पिता को पिता लौटाना
लेकिन मुमकिन है
पिता को पुत्र लौटाना
वही सही
लौटा रहा हूं
कुछ लौटाने की कामना में
मुझे ही मिल जा रहा है
बहुत कुछ
शायद नामुमकिन है
पिता को कुछ भी लौटाना
२
गाढ़े दर्द भरी आंखों से
इशारा करते हैं पिता
जरा उठाओ तो
और पिता को उठाते
मैं खुद उठता हूं,
अपनी असामाजिकता के रद्दीखाने से
अकूत धूल झाडक़र
लंबी बेशर्म नींद तोड़
वो मुझे उठना सिखाते हैं
जागना, सहेजना
अनायास
बिना बोले पिता का मौन गुरुकुल
पीढिय़ों का उजास समेटकर
मेरी झोली में डालता है।
हाथ थामकर चलते हैं पिता
कुछ डगमग मैं होता हूं
मौन पूर्वज प्यार से चीख पड़ते हैं
पिता बिन कहे उलाहते हैं
अब तो चलना सीख लो।
बूढ़ा हो गया
चलाते-चलाते।
३
पिता की देह में कांपती हैं कमजोरियां,
मां को चुनौती देती हुई
पांच कौर पर मुंह फेर लेते हैं पिता
सातवें कौर की उम्मीद लिए बैठी रहती मैं मां।
मनुहारती है मां
बस एक और कौर दूर है मजबूती
छठा कौर किसी तरह निगलकर
मुंह सिल लेते हैं पिता
सातवां रह जाता है
मां की उंगलियों में
और आठवां थाली में।
Sunday, 3 July 2011
खेजड़ी का पेड़

जहां रूठ गया पानी
जहां उखड़ गए पेड़ों के पांव,
जहां चंद बूंदों की भीख को
रोते सूख गए पौधे।
वहां जम गया
रम गया
अकेला खेजड़ी।
खेजड़ी में देखता है मरुथल
कि कैसे होते हैं पेड़।
कितनी मीठी होती है छांव,
ठन्डे पत्ते और नर्म स्पर्श
और उनसे फूटती हवा।
क्या होता है,
जलते-तपते में वीरान में जीना।
कसम रेत की,
पांव जमाकर खेजड़ी
डालता है मरुथल के पांवों में बेडिय़ां।
और देता है गवाही
रेत के सीने में भी होती है थोड़ी मिट्टी
जैसे रूखे शरीर में दिल
थोड़ा-सा बचा हुआ।
शायद उसी के लिए,
उसी थोड़े की पूर्णता के लिए
जिन्दा है खेजड़ी।
बनी-बंधी आस
थोड़ी-थोड़ी नरमी,
जरा-जरा प्यार
छोटे-छोटे पत्ते,
छोटी-छोटी छांव से धनी खेजड़ी।
दूसरी जगह बड़ा होने से
बहुत बड़ी बात है
मरुथल में थोड़ा होना।
कुछ दूर साथ चलता है बबूल,
छोटे भाई की तरह।
कुछ आगे हारकर
ठिठक जाता है,
और देखता है
बड़े भाई को जाते
बहुत आगे
रेत के टीले दर टीले।
कभी बड़ी दया उमड़ती खेजड़ी पर,
क्या मृगमरीचिका का षड्यंत्र उसे फंसा लाया?
सीधा-सादा खेजड़ी
आगे बढ़ता चला गया।
बहुत शातिर दूसरे पेड़
पीछे रह गए
बहुत पानी में
और भोला खेजड़ी
रह गया हानि में।
गिनती की बूंदों के आते
लहलहा जाता।
बड़ा रसिया खेजड़ी।
हर आषाढ़ रचाता शादी।
तब देखो तो उसे जरा
उसके खुरदुरे तनों-अंगों पर
हर ऊपरी सिरों-छोरों पर,
पत्तों की घनी-हरी ओढऩी।
जैसे अधेड़ बींद पर
नशे-सी छाई
नई नवेली बींदणी।
(मरुभूमि में जहाँ कोई पेड़ नहीं उगता वहां उगता है खेजड़ी, यह कविता पिछले साल जयपुर से सीकर जाते समय लिखी थी , मौसम यही था, बहुत रुला कर देर से आया था मानसून, और जब कुछ ही बूंदें बरसी थीं, लहलहा उठे थे खेजड़ी के पेड़ )
Wednesday, 30 March 2011
अपनी बात
Wednesday, 9 March 2011
मेरी किताब

मीडिया पुस्तकों में सिद्धांत और पत्रकारिता का इतिहास तो पर्याप्त मिल जाता है, लेकिन व्यावहारिक समझ की बातें अधूरी रह जाती हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो हथियार चलाना तो सिखा दिया जाता है, लेकिन युद्ध भूमि में कब किस परिस्थिति में कैसे संघर्ष करना है, यह सब नहीं बताया जाता। अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदना तो आता था, लेकिन उसे नहीं पता था कि चक्रव्यूह के अंदर विराजमान लगभग तमाम महारथी युद्ध के सारे सिद्धांतों-नियमों की धज्जियां उड़ाकर व्यावहारिक हो जाएंगे और उसका वध हो जाएगा। मीडिया जगत में महाभारत निरंतर जारी है, आज अर्जुन होने-बनने की जरूरत है, ताकि चक्रव्यूह को न केवल भेदना, बल्कि उसे जीतना भी संभव हो सके।
आधुनिक दौर में जब पूंजी का नियंत्रण बहुत बढ़ चुका है, जब गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा पत्रकारों की प्रतीक्षा कर रही है, तब यह एक स्वाभाविक सत्य है कि एक सीमा के बाद सिद्धांत नाकाम हो जाते हैं और केवल व्यावहारिक होने का विकल्प ही बचा रहता है। प्रस्तुत पुस्तक में चाहे आधार की बात हो या प्रकार की या व्यवहार की, हर जगह यह चेष्टा हुई है कि पत्रकारिता में आने को इच्छुक छात्रों, नए-पुराने पत्रकारों, मीडिया प्रबंधकों और यहां तक की पाठकों-दर्शकों-श्रोताओं को भी समाधानों का व्यावहारिक संबल प्रदान किया जाए।
Monday, 7 March 2011
मुंह बाए खड़ा पक्षी

(कोटा चिडिय़ाघर में यह पक्षी विशेष मुद्रा में दिखा, तो न खुद को फोटो खींचने से रोक सका और न कविता लिखने से।)
एक पक्षी
पिजड़े की भीड़ में अकेला
नि:शब्द स्तब्ध
देर से सिर उठाए।
सीमा के अतिरेक तक मुंह बाए।
खड़ा, मानो विराम पर ठहरी दुनिया।
मानो हल होने वाला हो
पापी पेट का सवाल।
इंतजार बढ़ाता कोई दाना
या गले में अटका कोई गाना।
कोई भूला हुआ राग
या ठिठकी हुई रागिनी।
गले में फंसा सुर
या कोई गुप्त गुर।
कोई विचित्र नृत्य
या उसकी कोई विलंबित मुद्रा।
दुख में डूबा या सुख में बिसरा।
या आजादी की संभावनाओं का निकलता दम।
या टूटे सपने का सन्नाटा।
सूर्य या पृथ्वी को निगल जाने का गुमान,
या किसी फतींगे को धोखा देने की तैयारी।
आलस्य का चरम
या भूल गए हों कि मुंह खुला है
या खुले मुंह में आ गई हो नींद।
भकोल है
या बहुत भोला है
शायद नहीं जानता
छूटते प्राणों और
सिमटते जीवनों की दुनिया में
खतरनाक है यों मुंह खोले खड़े रहना।
भयावह होती दुनिया में
खुले मुंह का खतरा
जैसे आ मौत मुझे मार का आह्वान।
हे अनाम पक्षी
अभी बंद रखो मुंह,
खाक में मिलने से पहले तक
जैसे बंद रहती है लाख की मुट्ठी।
क्योंकि अंतत: उसे खुला ही रह जाना है।
Thursday, 3 March 2011
दिनों बाद दो फिल्में
बहरहाल, बहुत दिनों बाद जयपुर के पिंक स्क्वायर में मधुर भंडारकर की फिल्म 'दिल तो बच्चा है जी देखने गया। यह मेरे पौने तीन साल के बेटे द्वारा सिनेमा हॉल में देखी गई पहली फिल्म है, जो उसने जागते हुए और पॉपकॉर्न खाते हुए देखी। यह फिल्म खराब तो नहीं ही कही जाएगी, लेकिन भंडारकर ब्रांड की फिल्म यह नहीं है। आजकल एक ट्रेंड है कि किसी फिल्म में एक साथ अनेक कहानियां चलती हैं। दिल तो बच्चा है जी में भी तीन या चार-पांच प्रेम कहानियां चलती हैं, लेकिन तीनों ही प्रेम कहानियां एकतरफा प्रेम या प्रेम की गलतफहमी की कहानियां हैं। गीत नीलेश मिश्र ने लिखे हैं, जो हिन्दुस्तान टाइम्स में पत्रकार हैं, एक गीत को छोड़ दीजिए, तो फिल्म में गीत-संगीत मामूली ही है, भंडारकर जैसे निर्देशक इस बात को नजरअंदाज कर गए कि प्रेम कहानी या कहानियों पर आधारित फिल्मों में गीत-संगीत आला दर्जे का होना चाहिए। भारतीय समाज में प्रेम और संगीत का चोली-दामन का साथ है। भारतीय फिल्मों में आज भी बिना गीत-संगीत के प्रेम असंभव, अप्रभावी व अनाकर्षक है।
मैंने दूसरी फिल्म ७ खून माफ देखी। ख्यात निर्देशक विशाल भारद्वाज की यह फिल्म रस्किन बांड की कहानी पर आधारित है और भारद्वाज ने एक अमरीकी स्क्रीन प्ले राइटर की मदद से फिल्म भी ठीक-ठाक बनाई है। निर्देशन अच्छा है, लेकिन अंधेरा कुछ ज्यादा है। कई बार फिल्म अपनी मूल धारा से भटक जाती है। अब लगभग सब जानते हैं, फिल्म की नायिका सुजन्ना बारी-बारी से परिस्थितिवश अपने छह पतियों का खून करती है, उसका सातवां पति ईश्वर है। फिल्म अभिनय के लिहाज से शानदार है। प्रियंका चोपड़ा के लिए यह फिल्म यादगार होगी। नील नितिन मुकेश, अन्नू कपूर खास तौर पर प्रभावी हैं, जबकि इरफान खान और नसरुद्दीन शाह ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाते हैं। इन चरित्रों में जरूरत से ज्यादा कोण या झोल हैं, जिसकी वजह से यह फिल्म आम दर्शकों के सिर के ऊपर से निकल सकती है। हुआ भी यही, कोटा के नटराज सिनेमा में, ९ बजे के बाद के शो में बामुश्किल २५ लोग थे।फिल्म पर जो चर्चा हुई, उसमें यह बात सामान्य तौर पर उभरी है कि यह बिगाडऩे वाली फिल्म है। साथी या जीवन साथी बारबार बदलने को उकसाने वाली फिल्म है, लेकिन मेरी नजर में इस फिल्म में जो अंत है, उससे गहरा अध्यात्मिक बोध पैदा होता है। यह फिल्म स्थापित करती है कि भोग या काम से ज्यादा महत्वपूर्ण है संयम और मोक्ष। जहां तक मेरा मानना है, यह फिल्म यह भी संदेश देती है कि अगर आप बिगड़े हुए हों, विचलित हों, तो या तो आप मार दिए जाओगे या फिर आप किसी को मार डालोगे। सुजन्ना किसी आम महिला की तरह मारी नहीं जाती, बल्कि मारती है। यह शायद उत्तरआधुनिक नारीवाद है, या बदला या एक तरह का जयघोष है, एक तरह की खोज है, जिसे यह फिल्म मुकाम तक पहुंचाती है। वाकई, यह याद रह जाने वाली फिल्म है।