Friday, 12 June 2009

ये किसकी बदबू है?

कोई शक नहीं, पिछड़े हुओं को हर कोई लतियाता है। मिसाल के लिए बिहार आने-जाने वाली ट्रेनों को देख लीजिए। या तो पूरी ट्रेन फटीचर होगी या फिर एक-दो ऐसी बॉगी जोड़ दी जाएगी कि उसमें सवार लोग पछताते-रोते-गरियाते मजबूरन सफर तय करेंगे। सहरसा-अमृतसर जनसेवा एक्सप्रेस को तो देखने की भी जरूरत नहीं है, केवल सूंघ लीजिए, तो उल्टी के आसार बन आते हैं। सीवान स्टेशन पर दूसरी बार जनसेवा एक्सप्रेस से सामना हुआ, तो देख- सूंघकर मन घबराने लगा। ऐसा लगा मानो, घोड़े की लीद से भरी ट्रेन प्लेटफार्म पर आ लगी हो। ट्रेन में बनियान या नंगे बदन ठसाठस भरे लगभग एक रंग के बिहारी मजदूरों की आंखें ट्रेन के अंदर पसरे अंधेरे में चमक रही थीं। एक अजीब तरह की निष्ठुरता- निर्लिप्तता का भाव उनकी आंखों में तारी था। शायद वे अगर निष्ठुर न हों, तो भूखों मारे जाएं। बॉगियों में शौचालय तो थे, लेकिन वहां भी उनकी खिड़कियों से मजदूर सांस ले रहे थे। ट्रेन में जो जहां था, बस वहीं रुका हुआ था। एक पर एक। मजदूरों ने ऊपर सीटों के बीचों बीच गमछियां-धोतियां बांधकर भी बर्थ बना रखे थे। बाहुबली सहाबुद्दीन की वजह से कुख्यात सीवान में सात घंटे लेट से आ रही दिल्ली जाने वाली लिच्छवी एक्सप्रेस का इंतजार करते हुए जनसेवा एक्सप्रेस को देखते मुझे मानवता पर भी संदेह हुआ।
वो कौन-सी परिस्थितियां हैं, जो मानव को पशु समान जीने को मजबूर कर रही हैं? सहरसा, सुपौल, मधेपुरा और बिहार के अन्य बेहद पिछड़े इलाकों में किन कमीनों ने विकास के पहियों को जाम कर रखा है? अव्वल तो इस ट्रेन का नाम ही अपने आप में मजाक है, यह कैसी जनसेवा हो रही है? गरीबों को गाय-गोरू के समान सफर करने पर मजबूर किया जा रहा है?
मेरी आंखों के सामने सीवान स्टेशन पर एक गरीब मजदूर का परिवार चढ़ने में नाकाम हो रहा था। तब दो कुली उन्हें चढ़ाने के लिए आगे आए। आपातकालीन खिड़की में मोटा लट्ठ घुसेड़कर एक कुली ने कुछ जगह तैयारी की, दूसरे कुली ने मजदूरों के दोनों बच्चों को पहले चढ़ाया, फिर मजदूर को चढ़ाया गया, अंदर जिंदगियां ठसाठस हो रही थीं, ट्रेन चलने की सीटी बजा चुकी थी, लगा कि मजदूर की बीवी छूट जाएगी। लट्ठ वाले कुली ने एक बार फिर खिड़की के अंदर लट्ठ घुसेड़कर जौहर दिखाया, तब किसी तरह से दूसरे कुली ने मजदूर की पत्नी को उठाकर खिड़की से अंदर टांग दिया, तभी ट्रेन चल पड़ी। कुछ गरीब प्लेटफार्म पर दौड़ते रह गए कि दरवाजे पर ठसे मजदूरों को दया आ जाए, तो कुछ कमजोर मजदूरों की आंखों की कगार पर आंसू आ गए कि ट्रेन फिर छूट गई।
अब मैं और दावे के साथ कह सकता हूं। हां, मैंने देखी है गरीबी। अब मुझे एक सवाल बहुत परेशान कर रहा है कि वह बदबू किसकी थी? जनसेवा एक्सप्रेस की या बिहार की या देश की या देश के निकम्मे अंधे तंत्र की?
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बिहार यात्रा की कुछ और बातें आगे

Sunday, 17 May 2009

नतीजों की गूँज


पंद्रहवें लोकसभा चुनाव के नतीजों ने इतना चौंका दिया है कि कई नेताओं को धरातल पर आने में वक्त लग जाएगा। न तो कांग्रेस ने ऐसी जीत की कल्पना की थी और न भाजपा ने ऐसी हार का अंदाजा लगाया था। देश में खुशनुमा माहौल का अंदाजा लगाया जा सकता है, लोग इस बात से ज्यादा खुश हैं कि केन्द्र में पहले से ज्यादा मजबूत सरकार बनेगी और क्षेत्रीय दलों के नेताओं के नखरे कम होंगे। पूरे पांच साल शासन में रहने के बाद प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह की वापसी ने उन्हें विशेष प्रधानमंत्री की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। नतीजों से साबित हो गया, अगर आपके पास दिखाने लायक नाम और काम हों, तो क्वएंटीइनकमबेंसीं का फैक्टर नाकाम हो जाता है। जनता ने महसूस किया कि कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए से बेहतर कोई विकल्प नहीं है, तो उसने यूपीए को ही चुना। बेशक, लोगों ने इस बार चतुराई और अच्छी सोच का परिचय दिया है। सोनिया गांधी लगातार यह बोल रही थीं कि कांग्रेस व यूपीए से बेहतर कोई विकल्प नहीं है और लोगों ने भी उनकी बात को माना। भाजपा नाकाम हुई, क्योंकि उसके पास न तो कांग्रेस की टक्कर के नाम थे और न काम था। लालकृष्ण आडवाणी और नरेन्द्र मोदी की एक सीमा है, जिसका अंदाजा भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ राजग के भी अनेक नेताओं को हो गया है। मौका गंवाने वाले कथित लौहपुरुष और दामन पर दंगों के दाग वाले भाजपा के नेतृत्वकर्ताओं को अब नए सिरे से सोचना होगा। अच्छा गुजराती नेता होने और अच्छा राष्ट्रीय नेता होने में फर्क है। गड़बड़ तो वहां शुरू हुई, जब हमले राष्ट्रीय स्तर के क्वपीएम इन वेटिंगं पर होते थे और जवाब एक मुख्यमंत्री की ओर से आता था। गड़बड़ वहां हुई, जब आडवाणी ने मनमोहन की चुनावी आरोपों पर दुख के इजहार के साथ अघोषित समर्पण कर दिया। -कांग्रेस अति-आत्मविश्वास में नहीं थी, तभी तो मनमोहन के लिए नया मकान तक खोजा जा रहा था। कांग्रेस नेता विपक्ष में बैठने को तैयार नजर आ रहे थे। कांग्रेस को अपनी विफलताओं का अंदाजा था, इसलिए कांग्रेस ने बार-बार आतंकवाद की बात की और लोगों को बताया कि राजग शासन के समय ज्यादा बुरी स्थिति थी। कांधार प्रकरण का बार-बार जिक्र और जवाब देने में भाजपा की विफलता ने कमाल दिखाया। एक हद तक यूपीए सरकार का कामकाज भी काम आया है। हालांकि कहना न होगा, पूरी सरकार नहीं जीती है। वाघेला, मणिशंकर अय्यर, रामविलास पासवान जैसे दिग्गज मंत्री लुट गए, लालू जैसा यूपीए सरकार का सबसे वाचाल मंत्री भी एक जगह से लुट गया। चिदंबरम जैसा काबिल मंत्री बामुश्किल जीता है। यह भी ध्यान रहे कि प्रधानमंत्री सहित छह से ज्यादा कैबिनेट मंत्री चुनाव मैदान में नहीं उतरे थे। तो अगर सरकार का कामकाज बहुत प्रभावी होता, तो सारे मंत्री न केवल चुनाव लड़ते, बल्कि जीत कर लौटते। लालू दिल्ली पहुंचकर फिर सबसे हंसी-मजाक कर सकेंगे, लेकिन वह हंसी पहले जैसी नहीं होगी, उसमें एक मलाल होगा। यूपीए की क्वबड़ी जीतं में क्वथोड़ी-सी हारं शामिल है। यह देश के लिए अच्छा। अब काम और विकास पर पहले से ज्यादा गौर किया जाएगा। बहरहाल, कांग्रेस पूरी तारीफ की हकदार है, उसने वषो बाद उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में अकेले चलने का साहस दिखाया। यह साहस राहुल गांधी के विश्वास का नतीजा है, जिसके अनेक भावी नतीजे कांग्रेस को और सशक्त करेंगे।

Friday, 8 May 2009

वो हमें धोखा देंगे

नेता अपनी-अपनी मूंछें दुरुस्त कर रहे हैं और उनके पैरों में विचारधारा औंधेमुंह गिरी पड़ी है। छोटे दल विचारधारा को गदगद भाव के साथ बुरी तरह कुचल रहे हैं और बड़े दल भी मौका खोज रहे हैं, सत्ता करीब नजर आए, तो विचारधारा को दुलत्ती जमाकर कुर्सी पर विराजमान हो जाएं। जितनी बड़ी पार्टी है, उतना बड़ा जाल, मछलियों का न तो प्रकार देखा जा रहा है और न आकार। जाल में जो भी आ जाए, स्वागत है। लोकतांत्रिक योग्यता की चर्चा मत कीजिए। कायदा तो यह बोलता है कि पहले सीटों के आंकड़े तो आ जाएं, लेकिन नेताओं में धैर्य कहां? बड़ी पार्टियाँ अभी से छोटी पार्टियों को बुक कर लेना चाहती हैं, ताकि बहुमत के इंतजाम में आसानी हो। सोनिया गांधी जब राजनीति में सक्रिय हुई थीं, तब पचमढ़ी में कांग्रेस ने किसी से गठबंधन न करने का फैसला किया था, लेकिन आज उस फैसले को खुद सोनिया याद नहीं करना चाहेंगी। अब कांग्रेस ने गठबंधन धर्म को अपना परम धर्म मान लिया है। देश की सबसे बड़ी पार्टी की नई पीढ़ी से आप विचारधारा की उम्मीद नहीं कर सकते। राहुल गांधी को सरकार बनाने के लिए त्रृणमूल कांग्रेस के साथ-साथ वामपंथियों का भी साथ चाहिए। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वामपंथी कांग्रेस के बारे में क्या-क्या कह रहे हैं। इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि ममता बनर्जी के साथ कांग्रेस का गठबंधन है और यह गठबंधन पश्चिम बंगाल में लाल झंडे-डंडे को उखाड़ने के लिए बना है। यह कैसी नई राजनीति है? राहुल का बयान तब आया, जब पश्चिम बंगाल में मतदान बाकी था। अब ममता बनर्जी कसमसा रही हैं। कांग्रेस की ढुलमुल नीति की वजह से ही वाम खेमा मजबूत हुआ है। उधर, तमिलनाडु में कांग्रेस को करुणानिधि के साथ-साथ जयललिता का भी समर्थन चाहिए। क्या यह संभव है?

कांग्रेस बिहार में लालू के साथ-साथ नीतीश कुमार पर डोरे डाल रही है। बिहार की राजनीति में फिलहाल नीतीश और लालू दो विपरीत ध्रुव हैं। और तो और, कांग्रेस को अपने धुर विरोधी चंद्रबाबू नायडू का भी समर्थन चाहिए। यह आला दर्जे की मौकापरस्ती गठबंधन युग की अगली पीढ़ी के दिमाग की उपज है, जिसने सत्ता को सबकुछ समझ लिया है। पहले के चुनावों के समय नेता सीधे जनता से मेल बढ़ाते थे, सीधे जनता से अपील करते थे, लेकिन चुनाव 2009 में जितनी बेचैनी सभाओं में नहीं है, उससे ज्यादा बेचैनी नेताओं के मंच पर देखी जा रही है। परदे के पीछे ही नहीं, परदे के सामने भी राजनीतिक जोड़तोड़ का स्वरूप इतना विशाल है कि चुनाव भी बौना नजर आ रहा है। आम आदमी सवालों से भरा हुआ है और नेता परस्पर सेटिंग में जुटे हैं। चुनाव में एक ही राज्य में एक दूसरे का बाजा बजाने के इरादे से गाली-गलौज तक कर चुके नेता अगर केन्द्र में सत्ता के लिए सेटिंग कर लें, तो क्या लोकतंत्र मजबूत होगा? लालू, पासवान यूपीए की एकता को ठेंगा दिखाकर कांग्रेस को औकात बताने के बाद भी कह रहे हैं कि कांग्रेस हमारे साथ है, हम यूपीए में हैं और सरकार हमारी बनेगी। कांग्रेस भी कभी लालू को हां बोल रही है, तो कभी ना। यह जनता के साथ धोखा नहीं, तो और क्या है? आप पार्टी नंबर 1 के खिलाफ पार्टी नंबर तीन को वोट देते हैं, लेकिन वह पार्टी केन्द्र में पहुंचकर पार्टी नंबर 1 से ही सेटिंग कर लेती है, यह आपके साथ चार सौ बीसी नहीं, तो और क्या है? अपने देश में मामूली ठगी पर धारा 420 लागू हो सकती है, लेकिन करोड़ों लोगों को धोखा देकर पाला बदलने वालों के खिलाफ धारा 420 क्यों नहीं लगाई जाती? ऐसा नहीं है कि ऐसी राजनीतिक चार सौ बीसी पहली बार हो रही है, लेकिन संभवत 2009 का लोकसभा चुनाव ऐसा पहला चुनाव है, जब बीच चुनाव में पार्टियों ने एक दूसरे पर जमकर डोरे डाले हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि सब जानते हैं, दो-तीन परितियों के बलबूते सरकार नहीं बनने वाली, सरकार बनाने के लिए आठ दस पार्टियों की जरूरत पड़ेगी। कांग्रेस के रणनीतिकार चतुर हैं, वे पहले बुकिंग करके भाजपा की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। वैसे भाजपा भी अपने पूर्व सहयोगियों के संपर्क में है। उसके रणनीतिकारों ने भी फार्मूले तैयार कर रखे हैं, जिन पर अमल 16 मई से शुरू होगा। भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन भी कोई विचारधारा आधारित नहीं है। अभी पिछले दिनों राजग के संयोजक शरद यादव अपनी पार्टी के प्रत्याशी के प्रचार के लिए जयपुर आए थे और भाजपा को जनविरोधी नीतियों वाली पार्टी बताया था। तो यह है शरद यादव की ईमानदारी? वे जयपुर के लोगों को बरगला रहे थे या सीधे कहें, तो ठग रहे थे। उधर, बाला साहेब की शिव सेना आडवाणी को कितना सम्मान देती है, यह हम देख चुके हैं, गठबंधन के मुखिया आडवाणी को मिलने तक का समय नहीं दिया गया था। समकालीन राजनीतिक परिदृश्य में अलग-अलग राजनीतिक सेनाएं एक ही मैदान में इस तरह गडमड होकर खड़ी हो गई हैं कि कौन रथी किस ओर है और किस ओर जाएगा, कहना मुश्किल है। तय है, केन्द्र में जो गठबंधन की सरकार बनेगी, उसमें विचारधारा को औंधेमुंह गिरे रहने दिया जाएगा। मतदाताओं के साथ धोखा होगा, उनके जनप्रतिनिधि अपने दुश्मनों के साथ ही दोस्ती गांठ लेंगे। सत्ता का शामियाना तनता देख सभी ललचाएंगे, खिंचे चले आएंगे। चुनाव की मंझधार में ही जब बेमेल गठबंधन की बातें हो सकती हैं, तो फिर नेताओं के घाट पर उतरते ही मतदाताओं के साथ घात को कौन टाल सकता है? चिंता जब केवल आंकड़े जुटाकर सरकार बनाने की है, तो फिर जनता से जुड़े मुद्दों की अवहेलना क्यों न हो? भारतीय राजनीति के लिए यह खतरनाक संकेत है। नेताओं के मन में यह भावना प्रबल होने लगी है कि बहुमत लायक पूरे वोट तो मिलते नहीं हैं, गठबंधन करना पड़ता है, तो क्यों न पूरा जोर वोट की बजाय गठबंधन गठन पर दिया जाए, ज्यादा से ज्यादा पार्टियों को पक्ष में पटाने पर दिया जाए। नेताओं की बिरादरी बहुमत न जुटने से दुखी है, वह अपने दुख के उपचार में लगी है, उसका जनता के दुख से सरोकार कम होता जा रहा है। दुख इसका नहीं है कि लोगों की आकांक्षाएं पूरी नहीं हो रही हैं, दुख इसका है कि बहुमत नहीं मिल रहा। आज लालू जैसे नेता तो यही कहेंगे कि गरीबी, आतंकवाद की बात बाद में करेंगे, पहले सरकार तो बना लें। एक बार जब सरकार बन जाएगी, तो बस सारा ध्यान उसे बचाने की ओर लग जाएगा। दिग्वजय सिंह जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब एक कार्यक्रम में बच्चों ने उनसे पूछा था, आप खाली समय में क्या करते हैं, तो उन्होंने बताया था, खाली समय में अपनी कुर्सी बचाने के बारे में सोचता हूं।

अब आप सोच लीजिए, एक अकेली पार्टी का मुख्यमंत्री जब यह कह सकता है, तो फिर कई पार्टियों की मदद से चुना गया प्रधानमंत्री कुर्सी बचाने के बारे में क्या कहेगा? दूसरी ओर, आम लोगों में यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि सब नेता एक जैसे हैं, किसी के आने या जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। आतंकवाद, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी, शोषण खत्म नहीं होने वाला। सब नेता एक ही तरह से बात कर रहे हैं, तो काम भी एक ही तरह से करते हैं। नेताओं की जात एक है, उनमें से ज्यादातर किसी विचारधारा से चिपक कर नहीं रहने वाले। अनीस अंसारी का एक शेर नेताओं को संबोधित है

बात तुम्हारी सुनते-सुनते ऊब गए हैं हम बाबा।

अपनी जात से बाहर झांको, बाहर भी हैं गम बाबा।

Wednesday, 29 April 2009

एक दलाल पर फिर मेहरबानी


ओतावियो के को गैर-जमानती वारंट से मुक्ति न केवल शर्मनाक, बल्कि हमारे देश की कानून-व्यवस्था पर एक तमाचा है। बोफोर्स सौदे में 64 करोड़ की दलाली लेने संबंधी आरोप कभी राजीव गांधी पर ढंग से नहीं चिपका, जनता उन्हें आज भी एक साफ नेता के रूप में याद करती है, लेकिन इस सौदे में क्वात्रोच्ची की भूमिका पर हर जागरूक भारतीय को शक रहा है। अब सीबीआई ने इंटरपोल को पत्र लिखकर निवेदन किया है कि क्वात्रोच्ची को मोस्ट वांटेड की सूची से हटा दिया जाए। इस सूची से हटते ही क्वात्रोच्ची आजाद हो जाएगा। क्वात्रोच्ची पर अभी भी मुकदमा चल रहा है, मुख भारत आने से बच रहा है क्वात्रोच्ची को मुक्ति देना क्यों जरूरी हो गया था? कांग्रेस को अब अनेक सवालों का जवाब देना होगा।



दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के निशाने पर आए नरेन्द्र मोदी ने भी यूपीए सरकार को निशाने पर ले लिया है, मोदी पूछ रहे हैं, `मोदी को जेल और विदेशी को बेल? कांग्रेस क्या जवाब देगी? कांग्रेस शायद यही कहेगी कि क्वात्रोच्ची को भारत नही लाया जा सकता, इसलिए उसे छोड़ देना चाहिए, कांग्रेस यह भी कह रही है कि सीबीआई आजाद संस्था है, लेकिन सब जानते हैं कि सीबीआई की छवि कितनी खराब हो चुकी है। अभी विगत दिनों ही कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को सीबीआई के नाम से धमका रहे थे। अब भाजपा ने सीबीआई को नया नाम दिया है, उसे अब `कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशनं कहा जा रहा है। बीच चुनाव में कांग्रेस ने एक निंदनीय कदम उठाया है, इसका बचाव नहीं किया जा सकता।



क्वात्रोच्ची के प्रति यूपीए सरकार की नरमी पहले से ही जाहिर थी। कभी न चुनाव लड़ने वाले गांधी परिवार के समर्पित सेवक व केन्द्रीय विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज अनेक मौकों पर क्वात्रोच्ची को रियायत पहुंचाते दिखे हैं। भारद्वाज के मंत्रालय ने ही क्वात्रोच्ची के दो विवादित खातों पर से रोक हटवाने का फैसला किया था। ये वो दो खाते थे, जिनमें बोफोर्स दलाली की रकम जमा बताई गई थी। भारद्वाज ने सीबीआई को भी नहीं बताया था। खातों पर से रोक हटते ही क्वात्रोच्ची ने दोनों खातों से धन निकाल लिया। एक और उदाहरण, क्वात्रोच्ची फरवरी 2007 में अर्जेंटीना में इंटरपोल की गिरफ्त में आ गया था, लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने पूरे 16 दिन तक इस खबर को देशवासियों और यहां तक कि कोर्ट से भी छिपाए रखा था। यही वह समय था, जब भारत में क्वात्रोच्ची का पुत्र अपने पिता के बचाव के लिए नई दिल्ली में मौजूद था। सुबूतों के अभाव में क्वात्रोच्ची को फिर मुक्ति मिल गई। अब अपने कार्यकाल के आखिरी महीने में यूपीए सरकार ने क्वात्रोच्ची को सबसे बड़ी राहत का तोहफा दिया है। हमारे देश को ठगने के आरोपी दलाल क्वात्रोच्ची से कांग्रेस की दोस्ती एक मिसाल बन गई है। किसी अन्य देश में किसी इतने बड़े आरोपी के प्रति ऐसी रियायत असंभव है। सीबीआई अब एक मजाक बनकर रह गई है। उसके सम्मान की वापसी मुश्किल है। उसमें काम करने का लोकतांत्रिक तरीका खत्म हो चुका है, उसे बिल्कुल राजशाही तौर-तरीकों से चलाया जा रहा है। कांग्रेस के विज्ञापनों में आजकल लालबहादुर शास्त्री भी नजर आते हैं, लेकिन शास्त्री जी ने जिस मकसद से सीबीआई को खड़ा किया था, उस मकसद को सत्ता लील चुकी है। केन्द्रीय सत्ता में बैठे और नैतिकता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नेताओं से ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी।



बीच चुनाव में कांग्रेस ने यह कदम सोच समझ कर उठाया है, कदम अगर चुनाव से पहले उठाया गया होता तो कांग्रेस को ज्यादा नुकसान होता, खैर ऐसा लग रहा है, कांग्रेस को सत्ता से जाने का अहसास होने लगा है,

Wednesday, 22 April 2009

क्या- क्या बेचेगी पुलिस ?

हमारी पुलिस में भ्रष्टाचार इस कदर बढ़ गया है कि पुलिस सुरक्षा का अहसास कराने की बजाय भय का अहसास कराने लगी है। जयपुर में एक सिपाही ने ड्यूटी लगाने के बदले रुपये लेने के गोरखधंधे का भंडाफोड़ कर दिया है। पुलिस में ड्यूटी का बिकना जितना शर्मनाक, उतना ही दुखद है। ड्यूटी का बिकना किसी बड़े अपराध से कम नहीं है। मालदार ड्यूटियों पर लगने के लिए पुलिस वाले ड्यूटी लगाने के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों को रुपये देते हैं। जिम्मेदार अधिकारियों ने ड्यूटी के प्रकार और उससे होने वाली कमाई के लिहाज से उसकी कीमत तय कर रखी है। चूंकि मंत्रियों और बड़े अफसरों के यहां गार्ड की ड्यूटी करने के अपने मजे हैं, इसलिए इस ड्यूटी के लिए 4 से 15 हजार रुपये एकमुश्त अदा करने पड़ते हैं। योग्यता का यहां भी कोई अर्थ नहीं है। यह घूसखोरी है, दलाली है या चौथ वसूली, तीनों ही स्थितियों में ड्यूटी का बिकना पुलिस के नाम पर धब्बा है। पुलिस के आला अधिकारियों को शर्म आनी चाहिए। क्या उन्हें यह पता नहीं होगा? आला अधिकारियों ने इसे रोकने के लिए क्या किया? पुलिस वाले खुद पुलिस वालों से चौथ वसूली कर रहे हैं, क्या यह किसी को दिख नहीं रहा है? पुलिस वाले खुलेआम दारू पीकर अपनी वरदी का मखौल उड़ा रहे हैं, क्या यह नहीं दिख रहा है? चेतक मतलब पीसीआर वैन पर ड्यूटी लगवाने के लिए पैसे लिए-दिए जा रहे हैं, क्या यह भी नहीं दिख रहा? अब रात हो या दिन चेतक को देखकर लोगों को डरना चाहिए या सुरक्षित महसूस करना चाहिए? चेतक पर सवार कई पुलिस वाले क्या-क्या करते हैं, क्या इसकी पड़ताल की जाती है? क्या पुलिस महकमा अपनी सफाई और सुधार का इच्छुक नहीं है? क्या राज्य सरकार को इस पर ध्यान नहीं देना चाहिए?

कोई पुलिस वाला यह बोल सकता है, `हम तो अपनों को ही बिना लिए नहीं छोड़ते हैं, तो दूसरों को क्यों छोड़ दें? मलाईदार पोस्टिंग के लिए पुलिस में रुपये की लेन-देन कोई नई बात नहीं है। मलाईदार थानें बिकते रहे हैं। कई शिकायतें हैं, पुलिस की नौकरी भी बिकती रही है। नौकरी खरीदने वाला कोई पुलिसवाला अगर ड्यूटी खरीद रहा है, तो फिर इसमें आश्चर्य वाली कोई बात नहीं है। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे महकमे में यह तो होना ही है। पुलिस में बामुश्किल सौ में से 20 काम ईमानदारी से होते होंगे, वरना रिपोर्ट लिखाने से लेकर कार्रवाई करने तक के पैसे लिए जाते हैं। जयपुर में ही शिकायतें दर्ज होती रही हैं। कोई कार्रवाई करवाने के लिए पैसे देता है, तो कोई कार्रवाई रुकवाने के लिए पैसे देता है। पुलिस की पोल केवल अदालतें खोलती रहती हैं और कोई नहीं? राजनेताओं के लिए तो शायद पुलिस का भ्रष्ट होना ही फायदेमंद है। नेताओं, आला अफसरों और अमीरों के काम समय पर हो जाएं, बाकी सबको पुलिस एक ही डंडे से हांकने में सक्षम है। बेशर्मी तो यह कि पुलिस खुद को ही हांकने लगी है। खुद को हांकते हुए न जाने किस रसातल में जाएगी? कहा जाता है, बेहतर समाज और देश के लिए हमें एक दूसरे के काम आना चाहिए। आज किसी की, तो कल आपकी बारी होगी, लेकिन कई पुलिस वाले तो कल का इंतजार करना नहीं चाहते, आज जितना हाथ में आ जा रहा हो, उसे समेटने में लगे हैं। अपने सम्मान के प्रति लापरवाह होकर बेचने-खरीदने में लगे हैं। यह सिलसिला अगर चलता रहा, तो पुलिस खुद अपना अहित करेगी। अब समय आ गया है, न केवल जयपुर बल्कि देश की पूरी पुलिस व्यवस्था के कामकाज में आमूलचूल परिवर्तन किया जाए। उसे जवाबदेह और ईमानदार बनाया जाए, वरना देश में कानून-व्यवस्था का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

Sunday, 29 March 2009

यादों को किसने रोका है


ताउम्र हमको इक यही अफसोस रहेगा


कि हम न मुस्कुरा सके आपकी तरह।


सुरों और गीतों का अंबार था लगा,


पर हम न गुनगुना सके आपकी तरह।


(मुझे अपने कुछ पुराने शेर याद आ गए, जो कॉलेज के अंतिम दिनों में लिखे गए थे। उसे मैंने अब यों पूरा किया है -


आज भी बातें पुरानी जर्रा-जर्रा याद हैं,


हम कुछ नहीं भुला सके आपकी तरह।


करते-करते कोशिश थक गए हैं हम


दिल को न समझा सके आपकी तरह।

Sunday, 22 March 2009

आईपीएल क्यों नहीं?

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने आईपीएल टूर्नामेंट विदेश में कराने का जो फैसला लिया है, वह अभी अंतिम भले न हो, लेकिन आयोजन विदेश में होता है, तो भारत के लिए दुखद होगा। जब तमाम देशों के क्रिकेट खिलाड़ी भारत में खेलते हैं, तो जाहिर है, देश का सम्मान बढ़ता है। क्रिकेट जगत में भारत के महाशक्ति होने का अहसास होता है, लेकिन जब आईपीएल टूर्नामेंट किसी पराए देश में आयोजित होगा, तब हमारे क्रिकेटीय अभिमान पर नकारात्मक असर पड़ेगा। यह हमारी सरकारों की नाकामी है। सरकार चुनाव की वजह से आईपीएल को सुरक्षा देने की स्थिति में नहीं है। पहले केन्द्र सरकार ने रोड़ा लगाया, फिर राज्य सरकारों ने एक-एक कर मजबूरियों का बखान कर दिया। केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने क्रिकेट प्रेमियों को निराश किया है। चिदंबरम के इशारे पर तीन बार आईपीएल टूर्नामेंट के कार्यक्रम को बदला गया, लेकिन इसके बावजूद बात नहीं बनी। अंततः चिदंबरम ने कह दिया, `चिंता केवल मतदान तिथियों पर होने वाले आईपीएल मैचों की नहीं है, चिंता समग्र सुरक्षा की है।ं अब दुनिया भर के क्रिकेट प्रेमी भारत में सुरक्षा को लेकर चिंतित हो जाएंगे। सरकार को सुरक्षा के मद्देनजर हाथ खड़े करते देखना दुखद है। इस स्थिति के लिए शुद्ध रूप से सरकार दोषी है।

दरअसल, भारत में नेताओं की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। पुलिस बहुत हद तक केवल नेताओं की सुरक्षा के लिए ही तैनात की जाती है। ऐसे-ऐसे नेता हैं, जिनके पीछे सौ-सौ पुलिस वाले डोलते हैं। कटु सत्य है, चुनावी मौसम में सरकारें केवल नेताओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, जनता की सुरक्षा की परवाह अगर हमारी सरकारों को होती, तो सुरक्षा बलों और पुलिस बल में निर्धारित पद खाली न पड़े होते। हमारे सुरक्षा इंतजाम इतने पुख्ता होते कि चुनाव के साथ-साथ आईपीएल टूर्नामेंट भी होता।

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, एक लाख लोगों की सुरक्षा के लिए 222 पुलिस वाले होने चाहिए, लेकिन भारत में महज 143 पुलिस वाले हैं। आंकड़े बताते हैं, सशस्त्र पुलिस बलों 13.८ प्रतिशत और नागरिक पुलिस बल में 9.8 प्रतिशत पद खाली हैं। निर्धारित पद भी जरूरत से कम हैं। नेता चाहें, तो अपने सुरक्षा में सौ-सौ पुलिसकर्मी रखें, लेकिन कृपया जनता को भगवान भरोसे न छोड़ें। बात सुरक्षा-रक्षा की हो रही है, तो बताते चलें कि थल सेना में 23.8 प्रतिशत, नौसेना में 16.7 प्रतिशत और वायु सेना में 12 प्रतिशत अफसरों के पद खाली हैं।

चिंता क्रिकेट की नहीं है, क्योंकि क्रिकेट की लोकप्रियता पर लगाम लगाना सरकार के वश में नहीं है। चिंता तो सुरक्षा की है, जिसकी वजह से क्रिकेट का एक रंगारंग आयोजन खटाई में पड़ने वाला है। पुलिसकर्मी कम हैं और उनके पास उपलब्ध संसाधनों का तो और भी बुरा हाल है। आतंकी हमलों से विचलित सरकार रिस्क लेना नहीं चाहती, तो न ले, लेकिन सुरक्षा के मोर्चे पर उसकी पोल फिर एक बार खुल गई है।

Saturday, 21 March 2009

माइक पाण्डेय और विश्व जल दिवस


माइक पाण्डेय मतलब पर्यावरणविद्, ग्रीन ऑस्कर विजेता, कैमरामैन, फिल्मकार, अर्थ मैटर्स जैसे सफल कार्यक्रम के निर्माता, निर्देशक, एंकर। उन्होंने पर्यावरणविद के रूप में सबसे ज्यादा काम किए हैं। कैमरा या स्पेशल इफेक्ट का काम तो उनके निर्देशन में उनकी टीम ही करती है। कैमरामैन के रूप में उन्होंने `रजिया सुल्तानं फिल्म में सबको चौंकाया था। धर्मेन्द्र , हेमा और न जाने कितनी फिल्मी हस्तियों के करीबी माइक पाण्डेय मूलतः तो गोरखपुर के पास के हैं, लेकिन कीनिया में जन्म हुआ, इंग्लैंड और अमेरिका में पढ़ाई की। उन्हें काम के लिए भारत ज्यादा व्यापक लगा, वे यहीं बस गए। खूब काम किए। पर्यावरणविद के रूप में वनों और लोक जीवन को करीब से देखने वाले विशेषज्ञ के रूप में। इसमें कोई शक नहीं है कि हिन्दी में पर्यावरणविद् को वैसे भी बहुत ख्याति नहीं मिल पाती है, क्योंकि हम अभी भी पर्यावरण या वन के महत्व को ढंग से नहीं समझ सके हैं।

माइक पाण्डेय से मेरी एक सीधी मुलाकात है। अमर उजाला में रहते हुए। चिराग दिल्ली में उनके निवास पर लंबी बातचीत मुझे काफी कुछ याद है। उन्होंने पृथ्वी के प्रति मुझे सोचने पर विवश कर दिया था। उन्होंने ही मुझे बताया था, स्विट्जरलैंड में ऐसी झीलें हैं, जिनके पानी को सीधे पीया जा सकता है और अमेरिका दुनिया का सबसे प्रदूषित देश है। उन्होंने ही मुझे समझाया था कि बाघ बिना पृथ्वी पर कोई नहीं रह पाएगा। शनिवार, 21 मार्च को फिर उनसे फोन पर लंबी बात हुई, वे मुझे पहले से भी ज्यादा चिंतित नजर आए। पृथ्वी और पर्यावरण के प्रति प्रेम और दर्द से भरे हुए। बातचीत में उनकी निराशा साफ महसूस हो रही थी। एक रोष भी था।

उन्होंने कहा, `कालिदास की कथा सब जानते हैं, वे जिस डाल पर बैठे थे, उसी को काट रहे थे। हम आज के कालिदास हैं। हम जीवन की जिस डाल पर बैठे हैं, उसी को काट रहे हैं। पृथ्वी हमारे लिए है, पानी हमारे लिए है, लेकिन हम दोनों को नष्ट कर रहे हैं। अपनी खाद्य सुरक्षा और जीवन चक्र को मुसीबत में डाल रहे हैं। जहां तक भारत की बात है, तो पहले भारत ऐसा नहीं था। महाभारत काल में भी जगह-जगह कुंड, सरोवर का जिक्र आता है। देश में अनेक गांव हैं, जहां पोखर-सरोवर आज भी हैं, लेकिन हम उन्हें खत्म करते जा रहे हैं। हमारी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ही एक समय 500 कुंड थे, लेकिन उनको पाट दिया गया। उन पर कॉलोनियां बना दी गई। अब दिल्ली पानी के लिए तरस रही है। वहां जरूरत भर का पानी नहीं मिल पा रहा है, तो बाकी देश की कल्पना कर लीजिए। न जाने कितने कुंड और सरोवर पाट दिए गए हैं। क्या हम आज के कालिदास नहीं हैं?

उन्होंने जानकारी दी। - नदियों को बचाने के लिए केवल हिम पर्वतों का बचाना ही जरूरी नहीं है, जंगलों को भी बचाना जरूरी है। दक्षिण भारत में करीब 300 नदियां जंगलों से ही निकलती हैं। माइक आजकल कुछ आध्यात्मिक और पारंपरिक ज्ञान प्रेमी भी हो गए हैं। उन्होंने बताया, `गौतम बुद्ध ने कहा था, `पृथ्वी से उतना ही लीजिए, जितना जरूरी है। गुरुनानक देव ने कहा, `एक परिवार की तरह रहिए। लेकिन हम क्या कर रहे हैं? हमें अपने महान पूर्वजों की सलाह की कोई परवाह नहीं है। हम न केवल अपने पूर्वजों का अनादर कर रहे हैं, बल्कि पृथ्वी पर जीवन का अनादर कर रहे हैं। पानी के लिए पैसा नहीं है, लेकिन इराक में 4 अरब डॉलर प्रतिदिन युद्धोन्माद पर खर्च किया जा रहा है। हम कहते हैं, युद्ध नहीं होना चाहिए, लेकिन एटम बम बनाते हैं। दिक्कत यहीं है। जो जरूरी है, वह नहीं किया जा रहा है और जो जरूरी नहीं है, उस पर धन लुटाया जा रहा है।

Friday, 13 March 2009

जम्हूरियत की किरकिरी

आतंकवादियों या कट्टरपंथियों से मुकाबले के लिए जिस तरह की छवि के नेता होने चाहिए, वैसे नेता पाकिस्तान में नहीं हैं। जब कोई दागदार नेता मुल्क का नेतृत्व करता है, तो जाहिर है, उससे देश को अंतत: घाटा होता है और गलत काम करने वाले लोगों का मनोबल बढ़ता है। आज पाकिस्तान में आतंकवादी खुद को मजबूत पा रहे हैं, तो वास्तव में यह जरदारी, गिलानी और कियानी जैसों की कमजोरी है। जरदारी ने नवाज शरीफ और उनके भाई शाहबाज शरीफ के साथ जो किया है, वह जम्हूरियत नहीं है। जम्हूरियत केवल सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी नहीं है। यह विपक्ष की भी जिम्मेदारी है। जम्हूरियत हड़पने की चीज नहीं है, बांटने की चीज है, लेकिन जरदारी तो बेनजीर भुट्टो की मौत के बाद से ही हड़पने में जुटे हैं। अब भी वक्त है, पाकिस्तान में जम्हूरियत पसंद नेताओं को एकजुट होना होगा। वरना एक दूसरे को अयोग्य ठहराने की जद्दोजहद में मुल्क उन फौजियों के हाथों में चला जाएगा, जिन्होंने अब तक पाकिस्तान की फजीहत करवाने के अलावा और कुछ नहीं किया है।

Sunday, 22 February 2009

वाह सोना वाह

सोने का भाव
(प्रति 10 ग्राम
31/3/1925 : 18 रु 12 आने
31/3/1940 : 36 रु 8 आने
31/3/1951 : 98 रु
31/3/1960 : 111 रु 14 आने
31/3/1975 : 540 रु।
31/3/1980 : 1330 रु।
31/3/1990 : 3209 रु
31/3/1995 : 4675 रु।
21/2/ 2009 : 15780 रु
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भारत का स्वर्ण प्रेम
भारत सोने का सबसे बड़ा ग्राहक है। वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार वर्ष 2001 में भारत में 843.2 टन सोने की मांग थी, जो विश्व की कुल मांग का 26.2 फीसदी थी। यहां प्रतिवर्ष 600 से 700 टन तक सोने की मांग रहती है, जबकि भारत स्वयं मात्र करीब 2 टन सोने का उत्पादन करता रहा है। यह कुछ अजीब ही है कि दुनिया में भारत को गरीब देश के नजरिए से देखा जाता है, लेकिन यहां 11 हजार टन से भी अधिक सोना मौजूद है। भारत की 70 प्रतिशत आबादी गांवों में बसती है और 65 से 70 फीसदी ग्रामीण ही सोने की खरीदारी करते हैं।

Sunday, 15 February 2009

कुछ अर्थनीति की बात

महंगाई क्यों?

- मांग का बढ़ना, लेकिन उसके अनुसार आपूर्ति न हो पाना।

- मानसून और मौसम के प्रतिकूल रहने से उत्पादन का प्रभावित होना

- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के भाव का बढ़ाना

- व्यवसाय में मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति का निरंकुश हो जाना

- आर्थिक नीतियों का अभावग्रस्त लोगों के अनुकूल न होना

मंदी क्यों?

- अमेरिका में सब-प्राइम फेक्टर व बैंकों की गलत नीतियां

- औकात से ज्यादा कर्ज लेने और न लौटाने की प्रवृत्ति

- दुनिया के बड़े इलाके में खाद्यान्न संकट का बढ़ना

- बड़ी आबादी के आय में कमी से मांग का घटना

- जिनके पास पैसा है, वे खर्च करने से बच रहे हैं

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लोकसभा चुनाव में आर्थिक मुद्दे

- मुद्रास्फीति काबू में है, तो महंगाई को विपक्षी दल बड़ा मुद्दा नहीं बना पाएंगे।

- पेट्रोलियम उत्पादों और रसोई गैस की कीमत में कमी से कांग्रेस को फायदा।

- वैट की विसंगतियों से व्यापारी वर्ग नाराज है, जिसे विपक्षी दल भुनाएंगे।

- रोजगार गारंटी योजना गांवों में कांग्रेस को वोट दिलाने का काम करेगी।

- ज्यादातर विपक्षी दल सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार की बात करेंगे।

- सत्यम घोटाला और कुछ अन्य आर्थिक घोटालों पर भी चर्चा होगी।

- यूपीए के दल छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू करने का श्रेय लेंगे।

- आयकर स्लैब घटाने और किसानों की कर्ज माफी की चर्चा होगी।

Tuesday, 3 February 2009

लालू पर लट्टू लोग?

मुझे यह बात कहने में कोई हिचक नहीं कि जो लोग बिहार को नहीं जानते, वही लालू प्रसाद यादव के बड़े प्रशंसक हो सकते हैं। लालू ने बिहार पर 15 साल तक राज किया, लेकिन उनके नेतृत्व में बिहार कितना आगे गया, इसका उत्तर लालू बेहतर जानते होंगे। लालू के अनेक प्रशंसक हैं, जो बिहारियों को गालियां देते हैं। केरल और तमिलनाडु और यहां तक कि मुंबई में रहने वाले भी लालू की मुस्कान, हेयर स्टाइल, संवाद शैली के दीवाने हैं। लालू जब मुंह खोलते हैं, तो प्रियदर्शन की कॉमेडी फिल्मों से भी ज्यादा मनोरंजन करते हैं।


रेलवे में लालू के काम को खूब सराहा जाता है, लेकिन रेलवे की बदइंतजामी पर किसी का ध्यान नहीं जाता। ट्रेनों में करीब आधे टिकटों को लालू तत्काल श्रेणी में बेच रहे हैं। 300 रुपये का टिकट 450 रुपये में बेचकर रेलवे को लाभ नहीं होगा, तो क्या होगा? ज्यादातर ट्रेनों में अगर आप आरक्षण करवाने में दस-बारह दिन की देरी कर दें, तो आपको तत्काल में टिकट लेने का इंतजार करना होगा। लालू का वश चले, तो वे रेलवे के मुनाफे के लिए 90 फीसदी टिकट को तत्काल श्रेणी में डलवा दें। ट्रेनें खूब लेट चलती हैं, रोज हजारों लोगों की ट्रेन छूट जाती है, लेकिन रेलवे कितनों के पैसे वापस करता है, शायद लालू ने इस पर कभी गौर नहीं फरमाया। जैसे तत्काल में जरूरत से ज्यादा पैसे वसूलना लूट है, वैसे ही छूटी हुई ट्रेनों के पैसे न लौटाना भी लूट है। लालू ने रेलवे का जितना दोहन किया है, उतना किसी ने नहीं किया, ऐसे में, मुनाफा भी खूब हुआ है। कहां गया लालू का चूकड़ अभियान, मतलब मिट्टी के पात्र में चाय परोसने का फरमान?


शुरू में प्रबंधन संस्थान भी लालू पर लट्टू थे, लेकिन लालू की पोल खुलते देर नहीं लगी, अब उन्हें कोई नहीं बुलाता। लालू का प्रबंधन बिहार भुगत चुका है। तरक्की की दौड़ में लालू का बिहार आज कहां है, यह भी तो देखना चाहिए। लालू पर फिदा लोगों को कृपया बिहार के किसी ऐसे गांव में जाकर रहना चाहिए, जहां न सड़क है, न बिजली, न साफ पेयजल, जहां खुले में फारिग होना पड़ता है। जहां रात के भयानक अंधेरे में कुछ-कुछ देर बाद `जाग... हो´ -जागते रहो - की डरावनी गूंज उठती है। जहां चोरों, डकैतों को पकड़ा नहीं जाता। रात के अंधेरे में डकैत लूटते हैं और उसके बाद जांच और पेट्रोल-पानी के नाम पर पुलिस दिनदहाड़े लूटती है। पहाड़ खोदने का नाटक किया जाता है और एक चूहिया भी बरामद नहीं होती। पुलिस अपने इलाके के गुंडों पर हाथ धरने से बचती है कि न जाने किस गुंडे को लालू, पासवान या नीतीश जैसे नेता चुनाव में टिकट देकर खड़ा कर देंगे।


तो कृपया, लालू को प्रेम प्रस्ताव करने से पहले एक बार बिहार का मजा अवश्य लें, तभी लालू जी की कामयाब मुस्कान का मतलब समझ में आएगा।