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Sunday, 29 March 2009

यादों को किसने रोका है


ताउम्र हमको इक यही अफसोस रहेगा


कि हम न मुस्कुरा सके आपकी तरह।


सुरों और गीतों का अंबार था लगा,


पर हम न गुनगुना सके आपकी तरह।


(मुझे अपने कुछ पुराने शेर याद आ गए, जो कॉलेज के अंतिम दिनों में लिखे गए थे। उसे मैंने अब यों पूरा किया है -


आज भी बातें पुरानी जर्रा-जर्रा याद हैं,


हम कुछ नहीं भुला सके आपकी तरह।


करते-करते कोशिश थक गए हैं हम


दिल को न समझा सके आपकी तरह।