ताउम्र हमको इक यही अफसोस रहेगा
कि हम न मुस्कुरा सके आपकी तरह।
सुरों और गीतों का अंबार था लगा,
पर हम न गुनगुना सके आपकी तरह।
(मुझे अपने कुछ पुराने शेर याद आ गए, जो कॉलेज के अंतिम दिनों में लिखे गए थे। उसे मैंने अब यों पूरा किया है -
आज भी बातें पुरानी जर्रा-जर्रा याद हैं,
हम कुछ नहीं भुला सके आपकी तरह।
करते-करते कोशिश थक गए हैं हम
दिल को न समझा सके आपकी तरह।