Monday, 23 June 2008

भारतीय समझदारी पर शक

परमाणु करार खटाई में जाता दिख रहा है, तो इससे हम भारतीयों को कन्फ्यू’ड मानने वालों की संख्या में निश्चित रूप से बढ़ोतरी होगी। हम यह आज तक तय नहीं कर पाए कि अमेरिका से हमें फायदा है या नुकसान। अमेरिका को लेकर एक मानसिकता बन ही नहीं पाई। क्या ऐसे ही दोस्ती की जाती है? क्या ऐसे ही दुनिया में चैन से रहने का स्वप्न देखा जाता है? शीत युद्ध के दौर में भारत की गुटनिरपेक्षता कितनी भारी पड़ी है, यह हमारे देश की गरीबी बयान करती है। इतने बड़े देश को अपने ही स्तर पर संभाल ले जाने का गुमान अभी तक नहीं टूटा है। हम आजाद हो गए, लेकिन आत्मनिर्भर नहीं हैं। वामपंथियों के बच्चे अमेरिका में पढ़ सकते हैं, देश का एक पूरा लंबा-चौड़ा वर्ग अमेरिका जाने को लालायित है। हजारों परिवार अमेरिका और भारत में बंटे हुए हैं, लेकिन जब बाद किसी समझौते की आती है, तो हमें अमेरिका पर शक होता है। अंकल सैम हमें घृणित व्यक्ति लगते हैं, लेकिन उनके डॉलर के बिना हमारा काम नहीं चलता। शेयर बाजार को फूलने के लिए अंकल सैम का पैसा चाहिए, रक्षा के लिए अंकल के हथियार चाहिए, कृषि के अत्याधुनिक तकनीक चाहिए, सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए अंकल का साथ चाहिए, पाकिस्तान पर लगाम लगवाने के लिए भी अंकल की जरूरत है, लेकिन हम ऐसे ही अनेक काम निकालने के बावजूद अंकल को पसंद नहीं करते हैं। क्या यह दोगलापन नहीं है? हमें अंकल पर विश्वास नहीं है, लेकिन हम अंकल के यहां बसना चाहते हैं? अंकल के यहां से जब हमारे यहां नौकरियां आती हैं, तो हम बड़े खुश होते हैं। पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार भी अमेरिकियों को लुभाने के प्रयास करती रही है, लेकिन वामपंथी कन्फ्यू’ड हैं। दक्षिणपंथी भी नासमझी का भरपूर प्रदर्शन करना चाहते हैं। अमेरिका भारतीयों के करीब आने को लालायित है, दशकों बाद उसने बदलते भारत को समझना शुरू किया है, लेकिन हम उसके साथ क्या कर रहे हैं? कई लोग बोल रहे हैं, करार न हुआ, तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वास्तव में ऐसे लोग भारत के विकास के विरोधी हैं? ये लोग अमेरिका को दुत्कारना चाहते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि दुनिया में आखिर हमारे साथ खड़ा कौन होगा? दुनिया में आखिर हम विश्वास किस पर करेंगे? दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश हमसे मित्रता करना चाहता है, लेकिन हम उससे दुश्मनी मोल लेना चाहते हैं? नीतियां ऐसी ही रहीं, तो अगले सौ सालों में महाशक्ति हो जाने की बात सिरे से भूल जाइए।

Friday, 20 June 2008

चुभ गया कोटा का कांटा

कोटा से कल ही लौटा, लेकिन खड़े गणेश जी मंदिर की अव्यवस्था को भूल नहीं पा रहा हूं। अव्वल तो बुधवार, 18 जून को पूरे चालीस मिनट लाइन में खड़े होने के बाद दर्शन सुलभ हुए और जब गणेश जी को एक छोटे से कमरे में फूलों से लदे-ढके देखा, तो मन दुखी हो गया। कमरे में दरवाजे के अंदर दरवाजा था, गांवों में एक कमरे वाले जो छोटे मंदिर हुआ करते हैं, उससे भी छोटा है खड़े गणेश जी का मंदिर, लेकिन उसके आसपास तामझाम इतना ज्यादा है कि लगता है, किसी विशाल मंदिर में दर्शन के लिए जा रहे हों। करीब दो-सौ मीटर दूर मंदिर का मुख्य गेट है, उसके अंदर सौ मीटर तक फुहारों की दिखावटी व्यवस्था है, संगमरमर बिछाया गया है, मंदिर के बाहर विशाल प्रांगण है, लेकिन गणेश जी के खड़े होने के लिए इतनी कम जगह है कि गणेश जी शायद ही वहां खड़ा होना पसंद करेंगे।
खड़े गणेश जी को देखकर अपने जयपुर में मोती डुंगरी वाले गणेश जी की याद आ गई। जमीन आसमान का फर्क। यहां बैठे हुए गणेश जी वाकई काफी जगह लेकर बैठाए गए हैं, देखकर मन प्रसन्न हो जाता है, लेकिन कोटा में खड़े गणेश जी की दुर्दशा आहत करती है। अंदर जाकर मालूम हुआ कि केवल दो पंडितों के खड़े होने की जगह है, इसलिए लोगों को काफी देर तक लाइन में लगना पड़ता है। गणेश जी को हाथ जोड़कर मन से मैंने प्रणाम किया और बिना तिलक, बिना प्रसाद बाहर निकल आया। मंदिर की बाईं ओर दीप-अगरबत्ती की जगह थी, तो दाईं ओर शिव मंदिर, यहां भी मन बहुत दुखी हुआ। शिवलिंग पर कथित शिव भक्तों ने मिसे हुए लड्डुओं का ढेर लगा रखा था, जल-दूध के प्रेमी शंकर जी को लोग जबरन लड्डू खिला रहे थे। यह शुद्ध बेवकूफी है। शिवलिंग पर लड्डू पोतने वालों की जितनी निंदा की जाए, कम है। वैसे अपने जयपुर में भी भगवानों की फोटुओं पर लड्डू-पेड़ा चिपकाकर लोग बड़े खुश होते हैं कि भोग सीधे भगवान को खिला दिया। पढ़े- लिखे -अपढ़ लोग खिलाने और चिपकाने का फर्क नहीं जानते?
हम खुद अपने साथ ऐसा व्यवहार पसंद नहीं करेंगे, जैसा व्यवहार हम भगवानों के साथ कर रहे हैं। क्या भगवान को सांस लेने की जरूरत नहीं है? क्या उनके मुंह-नाक में लड्डू-पेड़ा ठूंस देना चाहिए? कोई अगर हमारे मुंह-नाक-शरीर में लड्डू लीप दे, तो क्या हम उसे लगे हाथ पांच गालियां नहीं सुनाते हैं? क्या ईश्वर को हम पर रोष नहीं आता होगा? बहरहाल, कोटा में खड़े गणेश जी के मंदिर के बाहर जितने पैसे खर्च किए गए हैं, उतने पैसे से मंदिर के गर्भगृह को आसानी से बड़ा बनाया जा सकता था, खड़े गणेश जी को ठीक से खड़े होने की जगह दी जा सकती थी? लेकिन मंदिरों और भगवानों को बाजारू उत्पाद बनाकर-सजाकर बेचने का शौक रखने वालों को कौन समझाए? लोभी-भोगी पंडितों का वर्ग भी तो इसमें शामिल है?
एक और बात बता दूं, खड़े गणेश जी मंदिर और उसके आसपास मुझे कोई भी स्वयंसेवक, व्यवस्थापक या पुलिस वाला नजर नहीं आया। कोटा का यह कांटा न जाने कब तक मेरे दिल में चुभेगा और याद आएंगे, कमरे में कैद गणेश जी और लड्डुओं में गुम शिव जी।

Wednesday, 11 June 2008

वर्दी में शर्म नहीं आती !


कभी-कभी पुलिस का ऐसा निर्मम चेहरा सामने आता है कि शर्म से सिर झुक जाता है। हरियाणा में एक महिला पुलिस वालों के सामने जब न्याय की गुहार लगाते-लगाते हार गई, तब उसने आत्महत्या जैसा मजबूर कदम उठाया। उसके साथ दो पुलिसकमियों ने बलात्कार किया था और महिला की बार-बार गुहार के बावजूद पुलिस दोषियों को बचा रही थी। आला अधिकारी भी कान में तेल डाले बैठे थे, अंतत: महिला द्वारा आत्महत्या के बाद ही पुलिस जागी। दोषी व फरार पुलिसकमियों को बर्खास्त किया गया। आज इस देश का हर जागरूक इंसान इस घटना और पुलिस के व्यवहार से स्तब्ध है। दोषी पुलिसकर्मी फरार हैं और परदे के पीछे रहकर बचने की जुगाड़ बिठा रहे हैं। हरियाणा के पुलिस महानिदेशक भी इस वाकये को पुलिस बल पर धब्बा बता रहे हैं, लेकिन क्या इस मामले में उनका कोई दोष नहीं है? उनके पास भी तो न्याय के लिए दो छोटे-छोटे बच्चों की पीडि़त मां ने आवेदन किया था। महानिदेशक अमानवीय बने रहे। आराम से नौकरी बजा रहे दोनों दोषी पुलिस वाले महिला और उसके पति को आरोप वापस लेने के लिए धमकाने में जुटे हुए थे। हरियाणा की कांग्रेस सरकार को इस शर्मनाक वाकये के लिए माफी मांगनी चाहिए। सोनिया गांधी को इस घटना का संज्ञान लेना चाहिए। दोषियों की गिरफ्तारी होनी चाहिए, उन्हें सजा मिलनी चाहिए। केवल यही नहीं, जो आला अधिकारी कान में तेल डालकर बैठे थे, उनके खिलाफ भी कारवाई होनी चाहिए। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने कभी पुलिस बल को संगठित गिरोह कहा था। उस टिप्पणी को कोई और नहीं, बल्कि स्वयं पुलिस वाले साबित करते रहते हैं। जब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पुलिस को सबसे भ्रष्ट महकमा होने का अपमान हासिल है, तो फिर जयपुर, पटना जैसे शहरों में पुलिस के बारे में क्या कहा जाए? देश की पहली नागरिक महिला हैं, सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया भी एक महिला ही हैं, लेकिन क्या इस देश में कोई सभ्य महिला अकेले शिकायत दर्ज कराने के लिए थाने जाने के बारे में सोच सकती है? अफसोस, हरियाणा के इस हादसे ने साबित कर दिया, खूब पढ़-लिखकर आईपीएस बने अधिकारियों में भी मानवीयता का स्तर शर्मनाक हो चला है।

Monday, 9 June 2008

डॉक्टर जी डराते हैं

पटना से लेकर जयपुर तक जूनियर डॉक्टरों ने सेवा को तबाह कर रखा है, बार बार हड़ताल कर रहे हैं इस सन्दर्भ में कुछ बातें हैं, जिन पर विशेष गौर करना चाहिए। पहली बात, स्वास्थ्य जीवन-मरण से जुड़ा मसला है, इसलिए इसे हड़ताल से परे रखने के लिए कानून बनाया जाना चाहिए। डॉक्टरी कोई मोबाइल सेवा, दूध सेवा, सड़क सेवा या रेल सेवा नहीं है कि बाधित होने के बावजूद जनता का काम चल जाए। स्वास्थ्य सेवा तो जीवन सेवा है, इसे बाधित करने को भला किस आधार पर सही ठहराया जाएगा? दूसरी बात, यह सरकारी डॉक्टरों की खुशकिस्मती है कि उनके पास मजबूत संगठन हैं और मरीजों का कोई संगठन नहीं है। आज हमें अच्छी, ईमानदार और संतोषजनक सेवा मुहैया करवाने वाला कोई कानून नहीं है। तीसरी बात, सरकारी मेडिकल कॉलेजों में जनता के पैसे पर डॉक्टरों को सस्ती शिक्षा नसीब होती है, लेकिन डॉक्टर बनने के बाद उसी जनता को दुत्कारना कहां तक उचित है? चौथी बात, डॉक्टर हड़ताल, मारपीट, अभद्रता करके वास्तव में अपना ही अहित कर रहे हैं, उनके ऐसे व्यवहार से सरकारी अस्पतालों की प्रासंगिकता खत्म हो रही है। ज्यादा से ज्यादा मरीज उन निजी अस्पतालों में इलाज करवा रहे हैं, जहां डॉक्टरों के सारे अधिकार अस्पताल प्रबंधन के हाथों में होते हैं। क्या ये डॉक्टर किसी निजी अस्पताल या निजी मेडिकल कॉलेज में हड़ताल का दु:साहस कर सकेंगे? पांचवी बात, रेजिडेंट डॉक्टरों की लड़ाई गोखले होस्टल के लड़कों के साथ थी, लेकिन उन्होंने अपना गुस्सा निदोüष मरीजों पर उतार दिया गया। पूरी डॉक्टर बिरादरी को इस दुष्प्रवृत्ति पर विचार करना चाहिए।

Sunday, 1 June 2008

कुछ सत्य

दस साल पहले-------आज से दस साल पहले 1998 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल मात्र 10 डॉलर थी। तब भारत में पेट्रोल की कीमत मात्र 23.94 रुपये और डीजल की कीमत 9.87 रुपये प्रति लीटर थी।

जब यूपीए सरकार बनी------मई 2004 में जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी, तब कच्चे तेल की कीमत 34 डॉलर प्रति बैरल, पेट्रोल की कीमत ३५.71 रुपये प्रति लीटर व डीजल की कीमत प्रति लीटर २२.70 रुपये थी। तब रसोई गैस प्रति सिलेंडर की कीमत २८१।60 रुपये थी।

30 मई 2008 का हाल------स्थितियों में कुछ सुधार के बाद कच्चे तेल का भाव 126 डॉलर प्रति बैरल (शुक्रवार को) पर रहा। पेट्रोल की कीमत ४८।62 रुपये, डीजल ३४.17 रुपये प्रति लीटर और रसोई गैस की कीमत 300 रुपये प्रति सिलेंडर रही।

कुछ और सत्य

तेल कंपनियों को घाटा हो रहा है लेकिन सरकार फायदे में है, वह पेट्रोल से खूब कमाई कर रही है, पेट्रोल पर बोझआयात और उत्पाद शुल्क शिक्षा अधिभार सहित : १४.78 प्रतिशत, विक्रय कर 28 प्रतिशत, पथ कर अधिभार 50 पैसे प्रति लीटर, डीलर का हिस्सा 1 रुपये पांच पैसे प्रति लीटर (जयपुर मे )डीजल पर बोझउत्पाद, आयात शुल्क अधिभार सहित ४.74 प्रतिशत, विक्रय कर 20 प्रतिशत, पथ कर अधिभार 50 पैसे प्रति लीटर, डीलर का हिस्सा 63 पैसे प्रति लीटर (जयपुर में )

बाबा के ख्वाब का खून देखेंगे


भारत में सामाजिक असमानता की भयानक उबड़-खाबड़ पहाडि़यों पर शोषित लोगों को सहारा देने के लिए आरक्षण का स्वप्न देखा गया था। ऐसा मासूम स्वप्न भारत के ईमानदार लोकतांत्रिक राजनेता ही देख सकते थे, वरना विश्व में ऐसी व्यवस्थाएं कम ही हुई हैं, जिन्होंने अपने यहां दबे-कुचले लोगों के लिए ऐसी विशेष व्यवस्था की है। आरक्षण हमारे देश के लिए एक अद्भुत खूबसूरत संबल था, लेकिन अब इस संबल का जिस तरह से मजाक उड़ाया जा रहा है, उसकी जितनी निंदा की जाए कम होगी। लोग आरक्षण के नाम से चिढ़ने लगे हैं। मध्य प्रदेश के एक मंत्री जी ने तो यहां तक कह दिया कि जो आरक्षण मांग रहे हैं, वे भिखारी हैं। अब कीजिए बात, एक नेता देता है, तो दूसरा लेने वालों को भिखारी कहता है, क्योंकि वास्तव में जिस जनता को आरक्षण नहीं मिल रहा है, वो जनता ऐसी टिप्पणियों को सुनकर खुश होती है। आरक्षण को कभी इलाज माना गया था, लेकिन अब वह रोग बन चुका है। यह रोग जन-मन से लेकर सड़कों-पटरियों पर फैल गया है। आप एक जगह इस रोग का इलाज करते हैं, तो वह सरककर किसी दूसरी जगह पर उभर आता है।
जिसे भारतीय समाज के लिए अमृत माना गया था, वह विष में कैसे तब्दील हो गया, हम अंबेडकर से बैंसला तक कैसे पहुंच गए? अंबेडकर होते, तो भारत में आरक्षण की व्यवस्था को दस या बीस सालों में समाप्त करवा देते, लेकिन आज के नेताओं के लिए यह अच्छा है कि अंबेडकर नहीं हैं। मायावती खुलकर कई वर्षों तक आरक्षण की राजनीति कर सकती हैं, बैंसला मरते दम तक पटरियों पर विराजमान रह सकते हैं, मुलायम सिंह यादव समाजवाद की आड़ में जातियों की गोटी सजा सकते हैं, लालू जी यादवों-दलितों को भड़का सकते हैं। आरक्षण किसी के लिए रोग है, तो किसी के लिए भोग। जातियां भी अपने आरक्षण के दर्जे में विकास चाहती हैं। लोग खुद को दबा-कुचला कहलाने को बेताब हैं। गुर्जर कोई अकेले नहीं हैं, जिन्हें अनुसूचित जनजाति में शामिल होना है। देश भर में करीब 1000 जातियों ने अनुसूचित जनजाति में शामिल होने के लिए आवेदन लगा रखा है। बिहार या यूपी में किसी जाति के प्रति इतना डर नहीं है, जितना राजस्थान में कुछ कथित पिछड़ी-दबी कुचली जातियों का है। इसके अलावा बिहार या यूपी में जातियों से कलम ने कभी हार नहीं मानी है, लेकिन राजस्थान में इतना भय है कि कोई साफगोई का परिचय देने को तैयार नहीं है। पूरा प्रदेश भयादोहन का शिकार होने को मजबूर है।

हम डरे हुए हैं। आरक्षण का स्वप्न अब दु:स्वप्न में बदल रहा है। कुछ लोग कहते हैं, यह आरक्षण के अंत की शुरुआत है। कार्ल मार्क्स ने जो स्वप्न देखा था, उसे रूस और चीन में फांसी पर लटका दिया गया। भारत में डॉ। अंबेडकर ने जो स्वप्न देखा, वह कठघरे में खड़ा है उसके खिलाफ मुकदमे की शुरुआत हो चुकी है।

Thursday, 15 May 2008

शक्ति हमें देना दाता

जयपुर मे कर्फू लगाकर ठीक किया गया, लेकिन यह तरीका ज्यादा कारगर नहीं है। स्थितियों को सामान्य बनाने के प्रयत्न होने चाहिए। सतर्कता ठीक है, लेकिन जनजीवन बाधित नहीं होना चाहिए। प्रशंसा करें या आलोचना? बुधवार को लगभग आधा दर्जन से ज्यादा वीआईपी नेताओं ने मौका मुआयना किया है। जब वल्र्ड ट्रेड सेंटर विध्वंस की घटना हुई थी, तब जॉर्ज बुश ने कोई मौका मुआयना नहीं किया था, लेकिन तब भी बचे हुए तमाम आतंकी पकड़े गए थे और उसके बाद से आज तक आतंकियों में इतनी हिम्मत नहीं कि अमेरिका में पटाखे भी फोड़ सकें। खैर, हमारे यहां नेताओं को मौका मुआयना करना कुछ ज्यादा ही अ\'छा लगता है, लेकिन आम तौर पर मौका मुआयना राजनीतिक मकसद से संपन्न किया जाता है। इतने नेताओं को मौका मुआयना करवाने वाले आला अधिकारी शायद ही यह बता पाएंगे कि नेताओं के भ्रमण से उन्हें क्या फायदे हुए हैं? जांच-पड़ताल में नेताओं के भ्रमण से क्या प्रगति आई है? नेताओं ने जांच अधिकारियों को कौन-सा गुर सिखाया है? हमारे नेता अपना काम मौके पर गए बिना भी बेहतर ढंग से कर सकते हैं।
दूसरी अफसोस की बात यह कि इन विस्फोटों में राजनीति के भी मौके तलाशे गए हैं। जनता ऐसी राजनीति को अब समझने लगी है, उसे पता है, सरकार भाजपा की हो या कांग्रेस की, आतंकवाद के सामने सभी लाचार हो जाते हैं। गरीबों को लाठियों से खदेड़ने वाली पुलिस के हाथ-पांव आतंकी हमलों के समय फूल जाते हैं। वक्त की मांग है, आतंकवाद के खिलाफ विशेष नीति, विशेष बल और विशेष कानून लाया जाए।

आज लाल है गुलाबी


अविश्वसनीय, अकल्पनीय,... आज ऐसे ही कुछ शब्दों की जरूरत है, लेकिन ऐसे शब्द कम पड़ रहे हैं। हमारे जयपुर में जो हुआ है, उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। मंगलवार, 13 मई 2008 पुराने शहर के स्वçर्णम इतिहास के सबसे काले दिन के रूप में दर्ज हो जाएगा। मंगलवार की शुरुआत ही आंधी-बारिश के साथ हुई थी और शाम ढलते-ढलते जो नजारे बड़ी चौपड़, त्रिपोलिया, सांगानेरी गेट, सुभाष चौक, चांदपोल में दिखे, उसे देख किसी की भी आंखें नम हो जातीं। वे इलाके खून से लथपथ हो गए, जिन इलाकों की रौनक पूरी दुनिया में मशहूर थी। यह कहते हुए हमारा मन भारी हो जाता है कि जयपुर अब पहले जैसा सुरक्षित नहीं रहा। जिस आजादी के साथ यहां पर्यटक घूमा करते थे, लोग चौपड़ों पर घंटों गप्प लड़ाते थे, बाजारों में टहला करते थे, उस पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा। जयपुर घायल है, दुखी है, लेकिन यह समय हाथ पर हाथ रखकर बैठने या खून देखकर घबराने का नहीं है। यह समय हार मानकर घरों में çछप जाने का नहीं है, यह समय जोर-जोर से रोने या शोक मनाने का नहीं है, यह समय अफवाहें फैलाने का नहीं है, यह समय झूठ पर विश्वास करने का नहीं है। यह समय तो अपने शहर पर हुए हमले का मुंहतोड़ जवाब देने का है। यह समय सचाइयों को परखने का है। यह समय सावधान हो जाने का है। यह समय एक दूसरे को जानने और समझने का है। यह समय एकजुट होने का है। ये विस्फोट बड़ी चुनौती हैं और जयपुर इस चुनौती का सामना करने में पूर्ण सक्षम है। जिन आतंकियों ने जयपुर के चमकदार माथे पर पत्थर मारा है, वे किसी भी हाल में बचकर नहीं जाने चाहिए। सूचना है कि खुफिया एजेंसियों ने जयपुर में हमले के बारे में पहले ही आगाह कर दिया था, लेकिन पुलिस का खुफिया महकमा और पुलिस पूरी तरह से नाकाम रही। जयपुर पुलिस के लिए यह हमला शर्मनाक है। पुलिस के हालिया इतिहास को याद करना गलत नहीं होगा। एक थानेदार, एक एसआई, एक एएसआई को अवैध वसूली करते रंगे हाथ पकड़ा गया था। क्या यही है सुरक्षित जयपुर की पुलिस? अगर जयपुर की पुलिस वाकई काबिल है, तो यह आगामी चार-पांच दिन में साबित हो जाना चाहिए। यह विस्फोट आतंकी संगठनों के स्लीपिंग सेल का काम हो सकता है। पाकिस्तानी मूल वाले आतंकी संगठन लश्कर-ए-ताइबा और बांग्लादेशी मूल वाले हूजी पर शक जताया जा रहा है, लेकिन केवल शक जताने से कुछ नहीं होगा। पिछले साल 11 अक्टूबर को अजमेर में ख्वाजा की दरगाह पर विस्फोट हुए थे, उनमें भी आतंकियों का पता नहीं चला था, लेकिन जयपुर में ऐसा नहीं होना चाहिए। राज्य सरकार से लेकर केन्द्र सरकार तक सक्रिय हो गई है, पूरे देश में अलर्ट घोषित हो गया है। देश के एक सबसे शांत शहर पर हमला हुआ है, आतंकियों के काले इरादे बिल्कुल जाहिर हैं। वे भारत में अमन-चैन के मशहूर इलाकों को भी नफरत और हिंसा की आग में झोंकना चाहते हैं, उन्हें नाकाम करना जरूरी है। पुलिस को सावधानी और संयम का भी व्यवहार करना होगा, ताकि लोगों में घबराहट न फैले। मंगलवार को विस्फोट के बाद शहर में अघोषित कफ्यूü जैसा हाल है, शहर में माहौल को जल्द से जल्द सामान्य बनाना होगा। आज शोक सभाओं की नहीं, बल्कि सतर्कता सभाओं की जरूरत है, इसी में हमारी जीत है और हम जीतेंगे।

पत्रकार होने का धर्म

यह मेरे इस शहर जयपुर के लिए पहला बड़ा हादसा था, यों तो मैंने बहुत शहर dekhe हैं मगर जयपुर दिखने में वाकई अजब-गजब है। लोगों के बारे में मेरी राय अभी प्रशंसनीय नहीं बन पाई है, लेकिन शहर के बारे में समग्रता में मेरी राय दुरुस्त है। मैं डेली न्यूज के संपादकीय पेज का प्रभारी हूं, मैं पेज लगाकर घर के लिए रवाना हो चुका था, लेकिन रास्ते से ही लौट आया, क्योंकि जयपुर में विस्फोट की खबर लग चुकी थी, एक फोन घर किया, सलामती की खबर ली और दफ्तर में मोर्चे पर लग गया। पहले संपादकीय लिखा और फिर मन न माना, तो एक लेख। मुझे उम्मीद थी, शहर के दोनों नामी अखबार संपादकीय पेजों को विस्फोट जनित विचारों से रंग देंगे। ये दोनों अखबार शहर की सेवा का घमंड पाला करते हैं, लेकिन अफसोस, 14 मई को दोनों ही अखबारों के संपादकीय पेज पर विस्फोट की चिंता की एक लकीर तक नहीं थी। पता नहीं, ऐसे मौकों पर कई पत्रकार भाइयों को नींद कैसे आ जाती है? आश्चर्य होता है। जो समय पर सो जाए, उसके बाद में जागने का क्या मतलब है? उसमें और एक आम आदमी में क्या फर्क है? 11 अक्टूबर को जब अजमेर में ख्वाजा के दरबार में विस्फोट हुआ था, तब भी मुझे नींद नहीं आई थी, देर रात तक दफ्तर में रहा था। तब भी तत्काल टिप्पणी करने वालों में डेली न्यूज ही था। हां, एक और बात, 11 अक्टूबर को वरिष्ठ सम्मानित पत्रकार राजीव तिवारी के साथ मेरा मिलना तय था, लेकिन मैं अजमेर कांड के कारण वह मुलाकात अधूरी रह गई थी, आज मेरा सौभाग्य है, वह मेरे संपादक हैं। 13 मई को जब मैंने लिखा, आज लाल है गुलाबी, तब राजीव जी ने मेरी ओर ऐसी अभिभूत नजरों से देखा, जिसे मैं भूल नहीं सकता। पत्रकारिता आगे भी जारी रहेगी, लेकिन इस शहर का यह हादसा और उसके अनुभव हमेशा याद रहेंगे।

Sunday, 13 April 2008

खेलों से खिलवाड़


बार-बार कहा जाता है, खेलों में राजनीति का घालमेल न हो, लेकिन राजनेता अपनी आदत से बाज नहीं आते। खेलों पर ऐसे कुंडली मारे बैठे हैं कि खिलाडि़यों का दम घुट जाए। क्या हॉकी, क्या क्रिकेट, खो-खो और कबड्डी तक राजनेताओं के शिकंजे में है, और फिर भी सरकारें डंका पीटती हैं, खेलों के साथ राजनीति नहीं होने देंगे। ऐसा नहीं है कि राजनीति ने केवल भारत में ही खेलों का मजा किरकिरा किया है। ओलंपिक जैसे व्यापक खेल महाकुंभ में भी राजनीति होती आई है। 1936 में बलिüन में ओलंपिक खेलों के दौरान जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने जो नौटंकियां की थीं, उन्हें लोग आज भी नहीं भूले हैं। हिटलर अगर स्टेडियम में न जाते, तो भी खेल होते और बेहतर होते, लेकिन हिटलर ने स्टेडियम पहुंचकर खेलों को हराने के प्रयास किए। विश्वस्तरीय दांवपेच हुए थे, जिनका जिक्र न केवल राजनय, बल्कि खेलों की किताब में भी मिल जाता है। एक जमाने में सर्वहारा वर्चस्व वाले सोवियत संघ के खिलाड़ी जब दूसरे देशों में ओलंपिक खेलों में भाग लेने जाते थे, उनके लिए सबसे अलग बाड़े तैयार किए जाते थे, ताकि वे दूसरे देशों के बुर्जुआ खिलाडि़यों से मेलजोल न बढ़ा सकें। पूंजीवादी अमेरिका भी कम नहीं है, उसने हमेशा ओलंपिक में वर्चस्व दिखाया है, उसके रणनीतिकार ओलंपिक के मौके को कभी नहीं गंवाते। 1972 में म्युनिख ओलंपिक में खूनखराबा हुआ था, 17 मौतें हुई थीं। अरब के आतंकवादियों ने इजरायल के खिलाडि़यों को मौत के घाट उतार दिया था। उसके बाद से ओलंपिक खेलों में खिलाडि़यों के आसपास सुरक्षा का घेरा बढ़ गया। आज ओलंपिक खेलों को आतंकवादियों से खतरा है और एथेन्स की तरह बीजिंग में भी सुरक्षा के मद में खूब पैसा खर्च किया जा रहा है। संभव है, सैनिकों की छावनियों की तरह खिलाडि़यों की भी छावनियां सजेंगी।शीत युद्ध के दौर में अमेरिका ने मास्को में आयोजित 1980 के ओलंपिक खेलों का बहिष्कार किया, लेकिन उसके अगले ओलंपिक में ही सोवियत संघ ने बदला ले लिया। लॉस एंजेलिस में जब खेल आयोजित हुए, तो सोवियत सरकार ने भागीदारी से इनकार कर दिया। ओलंपिक खेल इंसानी भाईचारे का प्रदर्शन नहीं करते, वे केवल राष्ट्रभक्ति और परस्पर दुश्मनी का प्रदर्शन करते हैं। खिलाड़ी महत्वपूर्ण नहीं होते, देश महत्वपूर्ण होते हैं। विजेताओं के देश का राष्ट्रीय गान बजाया जाता है, विजेताओं के देश के नेता अपने खिलाडि़यों की जीत को हर संभव तरीके से भुनाते हैं। विजेता खिलाड़ी का अपने देश में ऐसे स्वागत होता है, मानो वह दुश्मनों को धूल चटाकर आया हो। ताकतवर खिलाडि़यों को राजनीतिक आधार पर देश के लिए मैडल जीतने के लिए प्रेरित किया जाता है। खिलाड़ी जब हार कर लौटते हैं, तो उन्हें यह संकेत दिया जाता है कि वे देश की नाक कटाकर लौटे हैं। इतिहास में दर्ज है, 1896 में जब खेलों की मेजबानी एथेंस को मिली थी, तब ग्रीस सरकार ने तुकीü के खिलाफ युद्ध घोषित कर दिया था। सवाल उठाया जाता है कि आखिरी युद्ध कौशल से जुड़े खेल ओलंपिक में क्यों हैं, तीर-घनुष, बंदूक, तलवार, भाला, गोला, चक्का इत्यादि युद्ध के साजो-सामान का ओलंपिक में क्या काम? क्या इससे देशों के बीच सद्भाव बढ़ाने में मदद मिलती है?

मशाल पर बेमिसाल मारामारी

आज से 52 साल पहले मेलबोर्न में जब ओलंपिक खेलों का आयोजन होना था, तब भी मशाल दौड़ का विरोध हुआ था। बैरी लारकिन के नेतृत्व में नौ ऑस्ट्रेलियाई छात्रों ने मशाल दौड़ का विरोध किया था। सिडनी में एक सामानांतर मशाल दौड़ आयोजित हुई थी। उस छोटे से विरोध प्रदर्शन का मकसद ओलंपिक टॉर्च को ज्यादा महत्व देने से बचने का संदेश देना था। कहा गया कि नाजियों ने अपने प्रचार के लिए मशाल दौड़ को पॉपुलर बनाया था। तब मशाल दौड़ के उस विरोध को नजरअंदाज कर दिया गया। अब मशाल दौड़ जब भी ओलंपिया से ओलंपिक के लिए निकलती है, तो आयोजक देश ऐसी हवा बनाता है, मानो उसके अश्वमेध का घोड़ा चल पड़ा हो। चीन की सत्ता को विश्व में सहजता से स्वीकार करने वाले कम हैं, अत: चीनी सत्ता ने मशाल दौड़ को कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण बना दिया है। इतनी लंबी (137000 किमी।) मशाल दौड़ कभी आयोजित नहीं हुई थी। 21,880 लोगों का मशाल लेकर दौड़ना भी एक रिकॉर्ड है। 1936 में केवल 8 दिन तक दौड़ हुई थी, लेकिन इस बार 130 दिन की दौड़ हो रही है। जब मशाल वियतनाम से चीन पहुंचेगी, तब चीनी सरकार इसे तिब्बत सहित पूरे देश में घुमाएगी। मशाल करीब 116 चीनी शहरों और कस्बों से होकर गुजरेगी। ओलंपिक मशाल के माध्यम से चीनीयों को शायद यह बताया जाएगा कि चीन की ताकत को पूरी दुनिया ने मंजूर कर लिया है, क्योंकि लाल चीन महान है। जाहिर है, मशाल दौड़ आज किसी भी नजरिये से मानवीय सद्भावना या देशों के बीच भाईचारे का प्रतीक नहीं है। इस दौड़ में भाग लेने वालों को आयोजक देश का समर्थक माना जाता है। फिलहाल मशाल दौड़ के विरोधियों को तिब्बत समर्थक माना जा रहा है। लंदन और पेरिस में मशाल को बुझाने के प्रयास हुए हैं। पेरिस में विरोधियों को कामयाबी मिली है, मशाल दौड़ को सफल बनाने के लिए चीन के कमांडो मशाल के साथ-साथ दौड़ रहे हैं। मशाल 17 अप्रेल को नई दिल्ली आएगी और आशंका है, तिब्बती समुदाय जोरदार विरोध करेगा। तिब्बतियों को भारतीय फुटबॉलर बाइचुंग भुटिया और पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी का समर्थन मिला है, इन दोनों ने मशाल दौड़ में भाग लेने के आमंत्रण को ठुकराया है। तिब्बतियों के हौसले बुलंद हैं और चीनीयों की नींद उड़ी हुई है। सबसे पहले तो ताइवान ने अपने यहां मशाल दौड़ करवाने से इंकार कर दिया था, क्योंकि उसे पता था, अगर उसके यहां मशाल दौड़ हुई, तो ताइवान पर चीनी अधिकार के दावे को मजबूती मिलेगी। खैर, तिब्बती लाख हल्ला मचाएं, मशाल दौड़ होकर रहेगी, खेलों में राजनीति होकर रहेगी। कोई शक नहीं, खेलों के दौरान चीनी सत्ता प्रतिष्ठान विश्व बंधुत्व का नहीं, बल्कि अपने लोगों की देशभक्ति का खुलकर प्रदर्शन करेगा और यह बताने की कोशिश करेगा कि चीन सर्वोत्तम है। चौंकिए मत, क्योंकि ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है।

Wednesday, 2 April 2008

वाह! फियोना के दीवानों वाह!

वाह फियोना के दीवानों वाह
अफसोस, प्रीतीश नंदी जैसे लोग जिन्होंने साठ के दशक में एक कवि के रूप में शुरुआत की थी और आज मीरा बाई नॉट आउट और प्यार के साइड इफेक्ट्स जैसी बेसिर-पैर की फिल्में बना रहे हैं, उन्हें फियोना जैसी मांओं की बड़ी चिंता है, उनकी नजर में बच्चों का शराब सेवन बुरा नहीं है, बचपन में सेक्स करना बुरा नहीं है, बच्चों का देर रात तक बाहर रहना बुरा नहीं है। मैंने डेली न्यूज में 19 मार्च को एक लेख लिखा था, अम्मा, तू क्यों देर से जागी? इसके जवाब में प्रीतीश नंदी का लेख दूसरे ही दिन दैनिक भाष्कर में छपा, पीडि़त पर उंगली उठाना बंद हो। खूब सारा पैसा मिलने और राज्यसभा की सदस्यता मिलने के बाद नंदी जी भटक गए हैं, आश्चर्य होता है, शिवसेना जैसी पार्टी ने नवधनाढय प्रीतीश नंदी को राज्यसभा में भेजने लायक समझा। बिहार के भागलपुर जैसे छोटे शहर में जन्मे प्रीतीश नंदी आजकल मुंबई और दिल्ली की जंगल और रेव पार्टियों के पक्षधर हो गए हैं! दुख होता है, वे बच्चों और वयस्कों को अलग-अलग देखने की दृष्टि भी खो चुके हैं। नंदी जैसों का वश चले, तो गलियों में बच्चे खुलेआम शराब पीएंगे, सेक्स करेंगे और उन जैसे लोग कहेंगे, क्या फर्क पड़ता है, जो बिंदास जी रहा है, उसे बिंदास जीने दो। माफ कीजिए, नंदी जैसे कई लोग हैं, जो उस असुरक्षित दुनिया के पक्षधर हैं, जो बच्चों को समय से पहले जवान बना रही है। नंदी जैसों को बालिग और नाबालिग का फर्क तो समझना चाहिए। मट्टू शिवानी या शशि के मामले स्कारलेट से बिल्कुल अलग हैं, मट्टू , शिवानी, शशि पूर्ण बालिग हैं, उन्हें उनके किए के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, लेकिन स्कारलेट तो बच्ची थी, उसके किए की जिम्मेदारी तो उसकी मां पर आती है। आठवी कक्षा की छात्रा स्कारलेट की बात चलेगी, तो पालन पोषण की चर्चा जरूर होगी, पेरेंतिंग में कमियां खोजी जाएंगी, स्वाभाविक है। गुड़गांव के स्कूल में हत्या होती है, हत्या करने वाले बच्चे के पिताश्री फरार हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है, बच्चे के किए के लिए वे भी जिम्मेदार ठहराए जाएंगे। फियोना की बेड पेरेंतिंग पर हमारे देश में कम और इंग्लैंड में ज्यादा लिखा गया। यह हमारे सॉफ्ट मीडिया का कमाल है कि फियोना के खिलाफ सरकार को मामला बनाने से रोका गया। फिर भी मीडिया को इतना भी सॉफ्ट नहीं हो जाना चाहिए कि वह 15 वषीय स्कारलेट के वयस्क कृत्यों के बचाव में उतर आए।
अपने बच्चों के बारे में सोचिए, क्या आप चाहेंगे कि आपका हाईस्कूल जाने वाला बच्चा या बच्ची स्कारलेट की तरह बिंदास हो जाए, क्योंकि प्रीतीश नंदी जैसे लोग गोद से उतरे बच्चे को भी बिंदास रूप में देखना चाहते हैं। उस उपभोग प्रधान जीवन शैली, पिटे हुए खोखले जीवन मूल्यों को भारत में न्यायोचित ठहराया जा रहा है, जिस शैली से पश्चिम के लोग भी तंग आने लगे हैं। फियोना भारत में आश्रय तलाश रही है और हम फियोना के देश पहुंचने का लालायित हैं। शशि, शिवानी बिंदास जीएं कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन स्कारलेट को बिंदास जीने की इजाजत न कानून देता है, न धर्म, न समाज, जो परिवार उसे बिंदास जीने की इजाजत दे रहा था, उस परिवार को निश्चित रूप से दोषी ठहराना चाहिए।
बच्चों की सुरक्षा के लिए घेरे इसलिए बनाए जाते हैं, लक्ष्मण रेखाएं इसलिए खींची जाती हैं, क्योंकि उन्हें सुरक्षित रखना होता है। माफ कीजिए, जो लोग अपने बच्चे को सुरक्षा नहीं दे सकते, वे बच्चे पैदा करके हैवानियत का परिचय देते हैं। एक सवाल यह भी है कि गोवा कातिलों का अड्डा क्यों बना, इसका जवाब प्रीतीश नंदी और उनके सांसद मित्रों को देना चाहिए। प्रीतीश नंदी हमारी सत्ता व्यवस्था का ही एक हिस्सा हैं, यह वही सत्ता है, जो अपने लिए गोवा जैसे अंधेरे कोने बनाती है। प्रीतीश नंदी जैसे लोग दोनों तरफ मलाई खाना चाहते हैं, जनता के बीच जाकर कलम उठा लेते हैं और फाइव स्टार में पहुंचकर या अपनी फिल्मों के जरिये न्यू गोवन कल्चर को विस्तार देते हैं।