कोटा से कल ही लौटा, लेकिन खड़े गणेश जी मंदिर की अव्यवस्था को भूल नहीं पा रहा हूं। अव्वल तो बुधवार, 18 जून को पूरे चालीस मिनट लाइन में खड़े होने के बाद दर्शन सुलभ हुए और जब गणेश जी को एक छोटे से कमरे में फूलों से लदे-ढके देखा, तो मन दुखी हो गया। कमरे में दरवाजे के अंदर दरवाजा था, गांवों में एक कमरे वाले जो छोटे मंदिर हुआ करते हैं, उससे भी छोटा है खड़े गणेश जी का मंदिर, लेकिन उसके आसपास तामझाम इतना ज्यादा है कि लगता है, किसी विशाल मंदिर में दर्शन के लिए जा रहे हों। करीब दो-सौ मीटर दूर मंदिर का मुख्य गेट है, उसके अंदर सौ मीटर तक फुहारों की दिखावटी व्यवस्था है, संगमरमर बिछाया गया है, मंदिर के बाहर विशाल प्रांगण है, लेकिन गणेश जी के खड़े होने के लिए इतनी कम जगह है कि गणेश जी शायद ही वहां खड़ा होना पसंद करेंगे।
खड़े गणेश जी को देखकर अपने जयपुर में मोती डुंगरी वाले गणेश जी की याद आ गई। जमीन आसमान का फर्क। यहां बैठे हुए गणेश जी वाकई काफी जगह लेकर बैठाए गए हैं, देखकर मन प्रसन्न हो जाता है, लेकिन कोटा में खड़े गणेश जी की दुर्दशा आहत करती है। अंदर जाकर मालूम हुआ कि केवल दो पंडितों के खड़े होने की जगह है, इसलिए लोगों को काफी देर तक लाइन में लगना पड़ता है। गणेश जी को हाथ जोड़कर मन से मैंने प्रणाम किया और बिना तिलक, बिना प्रसाद बाहर निकल आया। मंदिर की बाईं ओर दीप-अगरबत्ती की जगह थी, तो दाईं ओर शिव मंदिर, यहां भी मन बहुत दुखी हुआ। शिवलिंग पर कथित शिव भक्तों ने मिसे हुए लड्डुओं का ढेर लगा रखा था, जल-दूध के प्रेमी शंकर जी को लोग जबरन लड्डू खिला रहे थे। यह शुद्ध बेवकूफी है। शिवलिंग पर लड्डू पोतने वालों की जितनी निंदा की जाए, कम है। वैसे अपने जयपुर में भी भगवानों की फोटुओं पर लड्डू-पेड़ा चिपकाकर लोग बड़े खुश होते हैं कि भोग सीधे भगवान को खिला दिया। पढ़े- लिखे -अपढ़ लोग खिलाने और चिपकाने का फर्क नहीं जानते?
हम खुद अपने साथ ऐसा व्यवहार पसंद नहीं करेंगे, जैसा व्यवहार हम भगवानों के साथ कर रहे हैं। क्या भगवान को सांस लेने की जरूरत नहीं है? क्या उनके मुंह-नाक में लड्डू-पेड़ा ठूंस देना चाहिए? कोई अगर हमारे मुंह-नाक-शरीर में लड्डू लीप दे, तो क्या हम उसे लगे हाथ पांच गालियां नहीं सुनाते हैं? क्या ईश्वर को हम पर रोष नहीं आता होगा? बहरहाल, कोटा में खड़े गणेश जी के मंदिर के बाहर जितने पैसे खर्च किए गए हैं, उतने पैसे से मंदिर के गर्भगृह को आसानी से बड़ा बनाया जा सकता था, खड़े गणेश जी को ठीक से खड़े होने की जगह दी जा सकती थी? लेकिन मंदिरों और भगवानों को बाजारू उत्पाद बनाकर-सजाकर बेचने का शौक रखने वालों को कौन समझाए? लोभी-भोगी पंडितों का वर्ग भी तो इसमें शामिल है?
एक और बात बता दूं, खड़े गणेश जी मंदिर और उसके आसपास मुझे कोई भी स्वयंसेवक, व्यवस्थापक या पुलिस वाला नजर नहीं आया। कोटा का यह कांटा न जाने कब तक मेरे दिल में चुभेगा और याद आएंगे, कमरे में कैद गणेश जी और लड्डुओं में गुम शिव जी।
श्रीमठ में महाअनुष्ठान और संत समागम
2 weeks ago