Monday, 1 August 2016

नसीर से नाराज नहीं, हैरान हूं मैं


अमिताभ बच्चन के बारे में एक बार नसीरुद्दीन शाह ने कह दिया था कि ‘उन्होंने तो कोई ग्रेट फिल्म नहीं बनाई, शोले को मैं ग्रेट फिल्म नहीं मानता।’ 
अब नसीर ने कहा है कि राजेश खन्ना के साथ फिल्मों में मीडियोक्रेटी की शुरुआत हुई यानी राजेश खन्ना फिल्मों में अभिनय या कला को दोयम दर्जे पर ले आए। क्या यह सही है ? 

नसीर ने ऐसा क्यों कहा ?

शायद यह अभिनय सीखे होने की श्रेष्ठता का बोध है, जो नसीर को लोकप्रिय अभिनेताओं के प्रति उकसाता रहा है। नसीरुद्दीन शाह नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से अभिनय पढ़-सीखकर निकले हैं। एनएसडी १९७३ बैच में उनके ही साथ ओम पुरी, भानु भारती और बंसी कौल जैसे नाट्य निर्देशक भी पढक़र निकले थे। एनएसडी में पढऩे का सौभाग्य न तो राजेश खन्ना को मिला था और न अमिताभ बच्चन को मिला। फिर भी दोनों अपने-अपने समय में सुपर स्टार रहे। राजेश खन्ना ने लगातार १६ सुपर हिट फिल्में दीं। ७३ की उम्र में भी अमिताभ का जादू ढला नहीं है। सुपर स्टार होने की सफलता किसी के लिए भी ईष्र्या का कारण हो सकती है। 
बहरहाल नसीर ने एक बहस छेड़ दी है कि क्या राजेश खन्ना मीडियोकर थे। क्या राजेश खन्ना की कला उपस्थिति को ऐसे नकारा या कमतर किया जा सकता है ? 
राजेश खन्ना की कला की ओर उंगली उठाने वाले नसीर यह भूल गए कि राजेश खन्ना को सफलता कोई थाली में परोसकर नहीं दी गई थी। वे टेलेंट हंट प्रतियोगिता में जीतकर फिल्मों में आए थे, उनका चयन तब के बड़े-बड़े निर्माता-निर्देशकों ने किया था। विनोद मेहरा उस प्रतियोगिता में दूसरे स्थान पर रहे थे और बताया जाता है कि अमिताभ बच्चन तो शुरू में ही बाहर हो गए थे। उस दौर में टेलेंट हंट जीतना कोई आसान काम नहीं था। 
उन्हें अच्छी फिल्में मिलीं और उन्होंने अच्छा काम किया, दर्शकों का मनोरंजन किया, उन्हें रुलाया-हंसाया-गुदगुदाया। राजेश खन्ना ने हर वह काम किया, जिसकी उम्मीद एक अभिनेता से की जाती है। वे आज दुनिया में नहीं हैं, लेकिन अपने पीछे एक विरासत छोड़ गए हैं। जिस अभिनेता ने रुपहले परदे पर अपने अभिनय से प्रेम-रोमांस को एक नई ऊंचाई दी, जिस अभिनेता ने हर तरह की भूमिका को स्वीकार किया, जिस अभिनेता ने यादगार चरित्रों के ढेर लगा दिए, जिस अभिनेता ने लाखों लोगों को अपना दीवाना बना दिया, जिस अभिनेता ने फिल्मी दुनिया से जुड़े सैकड़ों लोगों को मालामाल कर दिया, जिस अभिनेता ने फिल्म उद्योग के आकार को विस्तार दिया, जिस अभिनेता ने अनेक अन्य अभिनेताओं, युवाओं को प्रेरित-उद्वेलित किया, क्या वह दोयम दर्जे का मान लिया जाए ?
नसीर किससे लडऩा चाहते हैं? नसीर क्या केवल अपनी ओर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं? क्या यह टिप्पणी जरूरी थी? इकहरे कलात्मक नजरों से देखते हुए लोकप्रिय राजेश खन्ना को क्या दोयम दर्जे का प्रवर्तक मान लिया जाए? क्या राजेश खन्ना से पहले हिन्दी सिनेमा में सबकुछ आला दर्जे का था? दोयम दर्जे का कुछ न था?  
मोटे तौर पर यह कहने में कोई हिचक नहीं कि जहां शंकर-जयकिशन और खेमचंद्र प्रकाश खड़े हुए, वहां हिन्दी सिनेमा में गीत-संगीत की वास्तविक शुरुआत हुई और जहां दिलीप कुमार खड़े हुए, वहां अभिनय का आगाज हुआ और जहां राजेश खन्ना खड़े हुए वहां हिन्दी सिनेमा में बॉक्स ऑफिस से उपजे सुपर स्टारडम की शुरुआत हुई। सुपर स्टारडम कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे आप चॉकलेटी चेहरे, चंद अच्छे गीत-दृश्य, उम्दा कहानी के जरिये पा जाएं। इसके लिए पूरा पैकेज होता है, जो आपकी छवि को रुपहले परदे पर उभारकर मिथक या आदर्श बना देता है। बेशक, राजेश खन्ना हिन्दी सिनेमा के एक आदर्श हैं। 

अब अभिनय की बात
हम मनुष्यों के आधे चेहरे बंजर होते हैं, तो आधे उर्वर। उर्वर चेहरों में भी कुछ बहुत उर्वर होते हैं। जैसे मिट्टी भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है, कहीं चावल ज्यादा, तो कहीं बाजरा, तो कहीं केवल केक्टस। राजेश खन्ना के चेहरे की उर्वरा की तुलना अगर नसीर अपने चेहरे की उर्वरा से करना चाहते हैं, तो यह संभव तो है, लेकिन अनुचित है। दोनों के चेहरों की अपनी सीमाएं हैं ? स्वाभाविक है, राजेश कभी नसीर नहीं हो सकते, तो नसीर कभी राजेश नहीं हो पाएंगे।  
जैसे अभिनय मोटे तौर पर दो प्रकार का होता है - ठीक उसी तरह से अभिनेता भी दो प्रकार के होते हैं, लोकधर्मी और शास्त्रधर्मी। राजेश खन्ना लोकधर्मिता के निकट हैं, तो नसीर शास्त्रधर्मिता के निकट। 
नसीर इस बात को अच्छी तरह जानते होंगे कि जब वे एनएसडी में पढ़ते थे, तब उन्हें भरत मुनि का नाट्य शास्त्र नहीं पढ़ाया गया। तब भारत में भी अभिनय के गॉड फादर स्टानिस्लावस्की ही थे। नसीर जिस तरह का अभिनय करते हैं, वह स्टानिस्लावस्की की शैली के करीब है। किरदार में डूब जाओ। जिसे स्टानिस्लावस्की मैथड एक्टिंग कहते हैं, उसे भारतीय नाट्य शास्त्र में भरत मुनि ने पद्धतिबद्ध अभिनय कहा था। दिलीप कुमार, मोतीलाल, बलराज साहनी मैथड एक्टिंग के ही बड़े खिलाड़ी रहे। दिलीप कुमार की खास बात यह रही कि उन्होंने अभिनय की पढ़ाई नहीं की थी, लेकिन अशोक कुमार से गुरु ज्ञान जरूर लिया और फिर अपनी एक शैली विकसित की, जो ९० फीसद से ज्यादा मैथड एक्टिंग है। मैथड एक्टिंग मतलब - ऐसा अभिनय, जिसमें लगे नहीं कि अभिनय किया जा रहा है। अभिनय का खुलासा न हो और सबकुछ स्वाभाविक लगे, मानो सामने घटित हो रहा हो। 
मूलत: नसीर भी इसी श्रेणी के अभिनेता हैं। हालांकि उन्होंने भी कई दफा दोयम दर्जे का काम किया है, यह बात वे स्वयं भी जानते होंगे। नसीर को रोमांस नहीं जमता, लेकिन राजेश खन्ना को खूब जमता है। राजेश खन्ना की अनेक फिल्में हैं, जिनमें उनका अभिनय ऊंचाइयों पर नजर आता है। दो रास्ते, आनंद, आराधना, आविष्कार, अमर प्रेम, रोटी, सच्चा झूठा, हाथी मेरे साथी इत्यादि फिल्में खास यादगार हैं। 

राजेश खन्ना का अभिनय 
आंगिक, वाचिक, सात्विक और आहार्य, ये जो चार प्रकार के अभिनय भारतीय नाट्य शास्त्र ने बताए हैं, उसके आधार पर राजेश खन्ना को देखना रोचक होगा। उनका आंगिक अभिनय उनकी रोमांटिक छवि के अनुकूल था, खास प्रकार से हाथ हिलाना, सिर मोडऩा, मुडऩा, चलना, रुकना इत्यादि। चरित्र की जरूरत के हिसाब से उन्होंने अंग संचालन किया। वाचिक अभिनय की उनकी अपनी शैली है, वे किसी की नकल नहीं करते, उनके अपने शब्द होते थे, उनकी फिल्मों के डायलाग भी खूब बिकते थे। सात्विक अभिनय तो राजेश खन्ना के अंदर से स्वाभाविक रूप से आता है, जिसका जादू परदे पर सबसे ज्यादा चलता है। चेहरा बोल रहा है कि यह भला आदमी है, यह भला करेगा, भलाई के पक्ष में लड़ेगा। इस मामले में तुलना नसीर से करें, तो नसीर खलनायिकी में भी स्वाभाविक जमते हैं, जबकि राजेश खन्ना को कोई खलनायक मानने को तैयार नहीं होगा। जैसे हर चेहरे की अपनी उर्वरा होती है, ठीक उसी तरह से हर चेहरे की अपनी व्यंजना भी होती है। बिना बोले चेहरा कुछ न कुछ बोलता जरूर है। कोई चेहरा प्रथम दृष्ट्या स्वाभाविक रूप से अच्छाई का अहसास कराता है, तो कोई चेहरा बुराई का। 
अभिनेता के रूप में नसीर की लोकप्रियता निस्संदेह बहुत ज्यादा है, लगभग हर अच्छा या सामान्य दर्शक उन्हें जानता है, लेकिन उनके अंदर लोकप्रिय सिनेमा के प्रति खीज क्यों हैï? लोकप्रिय सिनेमा ने उन्हें भी तो सबकुछ दिया है। ‘पार’ जैसी शानदार फिल्म नसीर को कलात्मक खुशी तो दे सकती है, लेकिन उनका घर नहीं चला सकती और कम से कम सिनेमा हॉल तक नहीं पहुंचा सकती।  कलात्मक फिल्में भी खूब बन रही हैं, उनमें दोयम दर्जे की कला-कलाकार भी खूब हैं, जिनका सिनेमा हॉल तक पहुंचना असंभव है।  कौन अभिनेता नहीं चाहता कि वह अधिकतम दर्शकों तक पहुंचे? ऐसा कतई नहीं है कि कला-कला चिल्लाने वाले सभी उम्दा अभिनेता हैं। 

एनएसडी से कब निकलेगा सुपर स्टार ?

नसीर को सिखाने वाला संस्थान एनएसडी अभिनय या कला की समझ तो पैदा कर सकता है, लेकिन सफलता नहीं पैदा कर सकता। सरकारी धन से चल रहे एनएसडी से निकलने वाले सुपर स्टार का अभी इंतजार है। यह एनएसडी को चिढ़ाने वाली बात हो सकती है, लेकिन वहां पढऩे वालों को इससे गंभीरतापूर्वक गुजरना चाहिए। अगर आप एक महान लोकप्रियता को ललकार रहे हैं, तो फिर झेलिए ये सवाल कि आप क्यों महान लोकप्रिय नहीं हो गए। लोकप्रियता और कला में चोली-दामन का साथ क्यों न हो? लोकप्रियता के प्रति यदि बैर भाव एनएसडी में पैदा हो, तो यह ठीक नहीं है। सरकार तो कला क्षेत्र के साथ गड़बड़ कर ही रही है, वहां बैठे लोग कला क्षेत्र को भटकाने का ही काम करते हैं। जनता के पैसे से सरकार चलती है, लेकिन जनता के बीच लोकप्रिय रहे दिलीप कुमार, देव आनंद, राज कपूर, राजेश खन्ना को सरकार ने कभी अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार नहीं दिए। इस लीक को अमिताभ बच्चन ही तोड़ पाए, क्योंकि वे राजनीतिक व रणनीतिक रूप से ज्यादा नियोजित होकर चले। 
नसीर को खुश होना चाहिए कि उन्हें दो से ज्यादा बार अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, राजेश खन्ना को एक भी नहीं मिला, लेकिन इसका मतलब कतई यह नहीं कि राजेश खन्ना दोयम दर्जे के थे। 
आज यह जरूरी हो गया कि परस्पर चिढऩा-कुढऩा छोड़ा जाए और कला पूरी ईमानदारी से लोकप्रियता को समझे और लोकप्रियता भी कला को पूरा सम्मान दे। सरकार तो भेद करती है, कम से कम नसीरुद्दीन शाह जैसे उम्दा कलाकार तो भेद न करें।

Saturday, 14 May 2016

लालू जी, आप सबकी निगाह में हैं

देश के पूंजीपति और नेता बिहार को मजदूरों का बाड़ा बनाकर ही रखना चाहते हैं। फिर हत्याओं का दौर शुरू होता लग रहा है। लालू यादव की राजनीतिक शक्ति का समय और राजनीतिक कमजोरी के समय की तुलना की जा सकती है। करनी ही चाहिए। कहां हैं, वो लोग, जो चाहते थे कि देश में नरेन्द्र मोदी की जीत का बदला बिहारवासी ले लें। एक पत्रकार मारा गया है, सब चुप हैं। चुनाव के समय बिहार के हितैषियों की बाढ़ आ गई थी, अब यही लोग देर-सबेर जंगलराज की चर्चा शुरू करेंगे।

हम देश के सबसे पिछड़े राज्य को राजनीति का शिकार बनाना चाहते हैं, जो कि वह होता रहा है और अभी भी हो रहा है। बिहार से सबको सस्ते श्रमिक चाहिए। वहां गलियों में खून बहेगा, तभी तो श्रमिकों का बिहार से ओवर-फ्लो होगा। जंगलराज की वापसी के संकेत तो उसी दिन मिल गए थे, जिस दिन आजीवन कारावास की सजा काट रहे सीवान के पूर्व सांसद को लालू ने पार्टी में बड़ा पदाधिकारी बनाया। जेल में रहकर कोई पार्टी की कितनी और कैसी सेवा कर सकता है, यह लालू से बेहतर कौन जान सकता है।

गया था अभी दस दिन पहले
सीवान - आजीवन सजा काट रहे पूर्व सांसद की फोटो पोस्टर पर लगने-टंगने लगी है। लालू जी आ गए हैं, उनके साथ फुल पैकेज भी आ गया है। उसकी झलक हर जगह दिखने लगी है, परिवारवाद से लेकर गुंडागर्दी तक। नीतीश की जो चमक २००५ से २००७ तक थी, वह झड़ चुकी है। लालू के साथ मिलकर उन्होंने अपनी सत्ता को तो बचा लिया है, लेकिन बिहार को कितना बचा पाएंगे, यह सवाल पैदा हो गया है।

कहते हैं, बिहारी बड़े भावुक होते हैं, आवेश में आ जाते हैं, लेकिन क्या फायदा? बिहार आज कहां खड़ा है? मैंने इस बार कई लोग से चर्चा की और पाया कि माहौल उद्यमशीलता का नहीं, लूट का है। समाज के एक बड़े हिस्से को उद्यमी नहीं, बल्कि लूट के लिए प्रेरित किया जा रहा है। अगर आप हाथ आई मुफ्त सरकारी-गैर-सरकारी चीज को लूट नहीं रहे हैं, तो आप मूर्ख हैं। हर योजना-नीति-कानून-सुविधा का अपने हित में फायदा लेने का जुगाड़ करना यानी अपने को बिहार के अनुकूल बनाना। १५-१६ साल से सुशासन अगर चल रहा है, तो क्या सरकारी लोग वेतन समय पर पाने लगे हैं? सभी आश्वस्त हैं कि सरकार से पैसा आएगा, लेकिन हम सरकार को क्या देंगे, यह कोई नहीं सोच रहा। जब राज्य को देने के बारे में राज्य के बड़े-बड़े नेताओं ने ही नहीं सोचा, तो फिर ये चर्चा बेकार है। आजादी मिलने के १२-१४ साल तक बिहार देश के अगले राज्यों में था, लेकिन क्या हुआ? कांग्रेस हाईकमान की चापलूसी में कीर्तिमान रचने वाले मिश्राओं और झाओं ने जो दिशाहीन-गरीब बिहार बनाया, उसमें लालू ने क्या जोड़ा? नीतीश कितना जोड़ पाए? अगर वाकई जोड़ पाते, तो राजनीति-सत्ता में टिके रहने के लिए विकास की खाली झोली वाले लालू की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि अगर आप बिहार में ये सवाल पूछिएगा, तो आपको भाजपा का एजेंट बता दिया जाएगा।

राजनीति अंदर तक घुसकर तबाह कर रही है। आपके दिमाग में राजनीति नहीं है, आप बिहार के हित की सोच-बोल रहे हैं, लेकिन लोग फिर भी आप से आपकी राजनीति और पार्टी पूछेंगे। बिहार के गांव-गांव में पंचायत चुनाव में जिस तरह से पैसे और बल का प्रभाव दिखा है, उससे कतई आशा नहीं जगती। शराबबंदी हुई है, बड़ी अच्छी बात है, लेकिन जहां नीचे तक व्यवस्था भ्रष्ट हो, वहां शराब के अवैध कारोबार को कैसे रोका जा सकता है? नीतीश से सबसे बड़ी उम्मीद यही थी कि वे व्यवस्था को ईमानदारी के लिए प्रेरित करेंगे, लेकिन वे नहीं कर पाए हैं। अब तो उनके लिए राह और कठिन है, लालू सत्ताधारी गठबंधन के पितामह हैं और उनके दोनों बेटे अपने मुंहबोले चाचा (नीतीश कुमार) के पीछे लग गए हैं। ये टीम अच्छा काम करे, तो बिहार का कायाकल्प कर सकती है, लेकिन इस टीम में किसको किस काम का अनुभव है, इसे कैसे भुला दिया जाए?

बिहार की मिट्टी तो रो रही है। नीतीश कुमार थोड़ा-बहुत सुन लेते हैं। लालू जी को भी सुनना चाहिए। इस बार कोई गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए। वे न भूलें कि उनकी बदनामी में बिहार की बदनामी भी शामिल है। वो था अंधकार का युग, सोशल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उतना मजबूत नहीं था, आज स्थितियां बदल चुकी हैं। होगा वो दौर, जब माननीयों की छत्रछाया में गुंडे जागते थे। इस बार डरकर नहीं सोएंगे बिहारी, क्योंकि बिहार को जंगल के शेर नहीं, अच्छे नेता चाहिए।

Wednesday, 16 March 2016

कॉमरेड बनाम भैया जी

 ज्ञानेश उपाध्याय
देश के एक लोकतांत्रिक सेकुलर निर्माता पंडित नेहरू ने जेएनयू को जन्म दिया था, वरना ऐसे संस्थान को वामपंथ अपने स्वप्न में भी जन्म नहीं दे सकता। यह भी तय है कि देश में अगर लेनिन, स्टालिन या माओ की सरकार आ जाए, तो जेएनयू पहली फुरसत में मार दिया जाएगा। बंदूक और तोप पर भरोसा करने वाली विचारधारा में वैकल्पिक विचारों के लिए कितनी जगह है, दुनिया लगातार देख रही है।
महान मार्क्स ने एक सपना देखा था कि साम्यवाद यानी एक सुंदरतम मानवीय कविता। लेकिन इस कविता का जन्म स्वाभाविक रूप से वैध तरीकों से नहीं हुआ। तत्कालीन समाजों के साथ बलात्कार स्वरूप ही उस अधूरी अवैध-सी कविता का जन्म हुआ। जो सत्ता बंदूक से निकली थी, वह ज्यादा पसर नहीं पाई। दुनिया के मजदूरों के एक होने से पहले ही पोल खुल गई। यह कविता संसार में महानता हासिल करने से वंचित रह गई। भिन्न विचारों के साथ चीन आज क्या करता है? अपने विचारवान छात्रों के साथ, लोकतंत्र प्रेमियों के साथ चीन ने क्या किया है? यह हम क्यों भूल जाएं? वामपंथी जेएनयू में हर मुद्दे पर जिस तरह से गरजते रहे हैं, क्या यह चीन में संभव है, क्या सोवियत संघ में ये संभव था?
वामपंथियों में स्वतंत्र मुखर विचारवान होने का अहंकार जेएनयू तक ही सीमित क्यों है? इन्होंने केरल या पश्चिम बंगाल में ऐसे संस्थान क्यों नहीं बना लिए? जेएनयू अगर आज वामपंथियों के लिए आदर्श संस्थान है, तो वामपंथी प्रभाव वाले सभी राज्यों में अनेक जेएनयू क्यों नहीं खुले?
दरअसल, ऐसे किसी विचार-संपन्न संस्थान के बारे में लाल सलाम वाली विचारधारा सोच भी नहीं सकती। सोचने की आजादी का मतलब कतई यह नहीं कि कोई सोचते-सोचते अपनी सीमाएं भूल जाए और पाकिस्तान या चीन चला जाए। देश के धन पर पलने वाले जिस संस्थान की सोच देश, संविधान, न्यायालय के विरुद्ध चली जाए, वैसे किसी संस्थान को क्या चीन जीने देगा? क्या पाकिस्तान ने मंटो जैसों को चैन से जीने दिया था?
हम रूखी-सूखी खाने वाले देश के लोग हैं, हमें खून में चुपड़ी हुई रोटी कैसे पचेगी, यह सोचना मुश्किल है। एक तरफ पाकिस्तान है, जिसने जमींदारों को अभी तक जीवित रखा है, तो दूसरी तरफ चीन, जिसने लाखों जमींदारों को फांसी पर लटकाकर दुनिया को लाल सलाम ठोंक रखा है। दोनों गहरे दोस्त हैं, एक घोर सांप्रदायिक, तो दूसरा घोर माओवादी?
पता नहीं इस नापाक-बेमेल आदर्श दोस्ती पर कभी जेएनयू में चर्चा होती होगी या नहीं ?
पाकिस्तान के संदर्भ में किसी ने नहीं सुना ...
जमींदारों की बर्बादी तक
जंग रहेगी जंग रहेगी।
चीन के संदर्भ में किसी ने नहीं सुना
लोकतंत्र के आने तक
जंग रहेगी, जंग रहेगी।
लेकिन हम सुन रहे हैं
भारत की बर्बादी तक
जंग रहेगी, जंग रहेगी।

मुंह पर कपड़ा बांधकर अलगाववादी नारे लगाने वाले और अंडरग्राउंड हो जाने वाले यह भूल गए कि भारत की बर्बादी में जेएनयू की बर्बादी भी शामिल है। भारत बर्बाद कर दिया जाएगा, तो यहां क्या बचेगा - पाकिस्तान या चीन ? लेकिन तब जेएनयू तो अपने होने को भूल ही जाए।
भारत होना एक महान विचार का हिस्सा है, भारत के आकाश को एक खिडक़ी खोलकर नहीं समझा जा सकता। खिडक़ी वामपंथ की हो या कथित हिन्दू राष्ट्रवादियों की, पूरा आकाश नहीं दिखा पा रही है। समेकित भारतीय विचार में विरोधाभास हैं, उसे किसी एक संहिता के पैमाने पर सरलीकृत नहीं किया जा सकता, वह जटिल है और जटिल ही रहेगी। यहां सीताराम और कन्हैया जैसे पौराणिक नाम वाले भी वामपंथ के झंडाबरदार हो सकते हैं और यह बोल सकते हैं कि हमारे नाम में क्या रखा है। बड़ी संख्या में ऐसे वामपंथी हैं, जिनकी औलादें उन्हीं पूंजीवादी देशों में सेवारत हैं, जिन्हें ये अपशब्द कहते रहते हैं। जाहिर है, वामपंथियों के सिद्धांत और व्यवहार में उतना ही फर्क है, जितना कथित हिन्दू राष्ट्रवादियों के सिद्धांत और व्यवहार में। भारतीय होने का आदर्श न लेफ्ट में पैदा हो सका है और न राइट में। भारतीय होने का आदर्श अभी भी सेंटर में है, उसी सेंटर में जेएनयू स्थित है।
कोई शक नहीं, जेएनयू को न तो वामपंथियों ने जन्म दिया है और न कथित हिन्दू राष्ट्रवादियों ने...लेकिन तब भी दोनों इसके लिए आपस में जूतम-पैजार में लगे हैं।
प्यारे भैया जी, यह तो मानिए कि इंडिया दैट इज भारत को कथित हिन्दू राष्ट्रवादियों ने नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सेकुलर लोगों ने खून-पसीने से सींचा है, खड़ा किया है। सांप्रदायिक लोग तो देश लेकर चले गए, उनका देश ही सांप्रदायिकता आधारित है, वे हमारे लिए कतई आदर्श नहीं हो सकते। यहां अफजल जैसे लोग कभी यह समझ नहीं पाएंगे कि उनके नाम के साथ गुरु क्यों जुड़ा है? इस पर उन जैसौं ने कभी सोचा ही नहीं है। सांप्रदायिक आधार पर मेलजोल या भारत की मिलीजुली संस्कृति का मखौल पैदा करना और अभिव्यक्ति के अधिकार का पूरा लाभ लेते हुए अपने संविधान निर्धारित कत्र्तव्यों को भूल जाना, भारत की यही वो नब्ज है, जो कमजोर चल रही है। मुझे नहीं पता नारा लगाकर अधिकार मांगने वालों को नागरिक के रूप में अपने कत्र्तव्य कितने याद हैं?
लेकिन सावधान! आज के समय में कोई व्यक्ति भारत माता के समर्थन में नारे लगाए, तो जरूरी नहीं कि उसे भारतीय नागरिक या देश भक्त मान लिया जाए। यह नारा भी मजाक का कारण बन गया है। सोशल मीडिया पर चुटकुला चला कि विजय माल्या को विदेश जाते समय एयरपोर्ट पर रोका गया, तो विजय माल्या ने भारत माता की जय का नारा लगाया, और अधिकारियों ने उसे देशभक्त मानकर जाने दिया।
यकीन मानिए, हम किसी पौराणिक काल में नहीं हैं, जहां हम संसद में बोल दें कि सिर काटकर किसी के चरण में चढ़ा देंगे। यहां महाभारत नहीं चल रहा, भारत चल रहा है। ऐसा कैसे चलेगा कि आप कन्हैया को जेल में रखना चाहेंगे, लेकिन उसके खिलाफ ठोस सुबूत पेश नहीं करेंगे।
राष्ट्रवाद के नाम पर फेंकने का चलन ऐसा चला है कि अंधाधुंध फेंका जा रहा है। नारा हो या देशभक्ति का सर्टिफिकेट हो या कोई वस्तु, ध्यान रखें... फेंके जाने वाली कई चीजें कूड़ेदान में ही पहुंचती हैं। ऐसा न हो कि लोग देशभक्ति और देशद्रोह जैसे शब्द से ही ऊब जाएं, इन पर ध्यान देना छोड़ दें।
कथित हिन्दू राष्ट्रवादियों के हाथ में सत्ता है, तो उन्हें ठोक-बजाकर, सोच-समझकर चलना चाहिए। झगड़े उलझने नहीं, सुलझने चाहिए। यह एक भयानक बात है - हमारा कथित हिन्दू राष्ट्रवाद दक्षिणपंथ नहीं, बल्कि मुस्लिम सांप्रदायिकता का प्रतिविंब या प्रतिध्वनि मात्र रह गया है। दक्षिणपंथ की असली आवाज... खोजिए तो भैया जी, वह कहां है?

Saturday, 12 March 2016

जहां खैर मनाते हैं बकरे

क्या रावण की ससुराल यहां है?

मंडोर, जोधपुर के बारे में यह कहा जाता है कि यह रावण की ससुराल है? गत महीने इसकी पड़ताल करवाई... आप भी रिपोर्ट का आनंद लें। रावण का जोधपुर में ससुराल होने का आज तक कोई प्रमाण नहीं हैं। शास्त्र इतिहास में कोई उल्लेख नहीं, केवल किंवदंतियों के आधार पर जोड़ा गया संबंध।

लेकिन यहां होती है रावण की पूजा...


Monday, 12 October 2015

हम कैसे स्मार्ट?

ज्ञानेश उपाध्याय
वो सभ्यताएं दगाबाज होती हैं, जो अपनी विरासत बचा नहीं पातीं। इमारतों और ऐतिहासिक मुकामों से भरपूर जोधपुर तो पूरा का पूरा हमारी विरासत है। हम सभी को यह सोचना चाहिए कि हमने अपनी विरासत को कैसे-कितना बचाया है। विरासत और इस शहर को बचाने में हमारा क्या योगदान है? सबकी आंखों के सामने अतिक्रमण होता है। दुर्भाग्य देखिए, अतिक्रमण होना कोई मुद्दा नहीं है, लेकिन अतिक्रमण हटाना आज शहर का सबसे बड़ा मुद्दा है। अतिक्रमण हटते ही, कहीं न कहीं से राजनीति गरीबी में आटा गीला करने पहुंच जाती है। धन्य है हमारा शहर, जहां अतिक्रमण हटाने गए लोग पत्थर मारकर खदेड़ दिए जाते हैं। आखिर यह शहर किसका है, अतिक्रमण करने वालों का या अतिक्रमण हटाने वालों का या उनका जिन्होंने अतिक्रमण होने दिया? इसी शहर में ऐसे हजारों लोग हैं, जो हर महीने ईमानदारी से किराया अदा कर अपने सिर पर छत का इंतजाम करते हैं, सालों तक अपनी आंखों में अपने घर का सपना संजोए रहते हैं। ऐसे ईमानदार परिवारों, लोगों को याद करने वाली राजनीति कहां है? आज राजनीति तो उन लोगों के लिए आंसू बहाती है, जिन्होंने अतिक्रमण किया, खाली जगह देखकर बस गए, जिन्होंने कानून की पालना नहीं की, जिन्हें यह पता था कि एक बार कहीं बस-बैठ गए, तो फिर हटाने वालों को मिल-जुलकर देख लेंगे। क्या आज की राजनीति ईमानदार लोगों के साथ नहीं है? शहर के राजनेताओं को भी यह सोचना चाहिए कि वे अतिक्रमण हटाने के प्रति कितने समर्पित हैं। काश! आज पुनर्वास के प्रति जो समर्पण दिख रहा है, वही समर्पण अतिक्रमण के विरुद्ध भी दिखता, तो आज यह शहर देश के सुन्दरतम शहरों में शुमार होता।   
सोचिए उन पूर्वजों के बारे में जिन्होंने १९१० में घंटाघर बनवाया था। केवल घड़ी में ३ लाख रुपए लगे थे, यानी आज के हिसाब से ४२ करोड़ रुपए। पूर्वजों के उस दौर में तोला भर सोना १८ रुपए का भी नहीं था, लेकिन विरासत की कीमत थी, सौंदर्यबोध था कि शहर को शानदार और यादगार बनाना है। उस समय से आज तक महंगाई तो १४०० गुणा बढ़ गई है, लेकिन शहर के प्रति हम शहरवासियों की अपणायत कितना गुणा बढ़ी है, फैसला हमें करना चाहिए। विरासत खड़ी करने वालों ने कभी नहीं चाहा होगा कि उनकी योजना के सरदार मार्केट के अलावा भी वहां खचाखच भरा बाजार लग जाए।
हमें स्मार्ट सिटी का दर्जा नहीं मिला, तो क्यों? आज सोलह आने का सवाल तो यह है कि जिस शहर की राजनीति ईमानदार और स्मार्ट नहीं है, क्या उस शहर को स्मार्ट होने का दर्जा मिल सकता है?  शहर की पहाडिय़ों को लूटा जा रहा है, अवैध कब्जों की होड़ मची है, जिसकी लाठी उसकी भैंस की कहावत को चरितार्थ किया जा रहा है, क्या यही है स्मार्टनेस की ओर ले जाने वाला रास्ता ?
स्मार्ट होने का दर्जा नहीं मिला, १०० से २०० करोड़ रुपए हाथ से फिसल गए, तो शहर में एक भी रैली नहीं निकली, लेकिन गरीबी और गरीबों की आड़ में (अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई के खिलाफ) लंबी रैली निकली है। ऐसी रैली से राजनीति के लिए थोड़ा कुछ निकल सकता है, लेकिन समाधान कतई नहीं निकलेगा। जिस शहर में अवैध बसावट का पुनर्वास होता है, उस शहर में अवैध बस्तियां बसने का सिलसिला कौन रोक पाएगा? उन सरकारी लोगों को सबसे ज्यादा धिक्कार है, जो मोटा पैसा लेकर भी दशकों तक वैध कॉलोनियां नहीं बसा पाते हैं, लेकिन अवैध बस्तियों तक बिजली, पानी, फोन, सडक़ लिए रातों-रात पहुंच जाते हैं। ऐसी बेईमान स्मार्टनेस शहर के दामन पर सबसे बड़ा अतिक्रमण है, इसका इलाज सबसे पहले करना होगा।
(अगस्त पत्रिका में प्रकाशित टिप्पणी)

Tuesday, 7 July 2015

ए रंगबती रे रंगबती

ए रंगबती रे रंगबती
रंगबती-रंगबती कनक लोता हसी पदे कह लो कोथा
हाय गो लाजे-लाजे गो लाजे-लाजे
लाज लागे नोई जाउछे माथा गो
नाईकर नाईकर ओथा...

यह गाना जब बजता है या याद आता है, तो नोस्टेलजिक बना देता है। मन करता है, भागकर उड़ीसा की गलियों में चले जाएं। इस गीत पर विवाद छिड़ गया है, एमटीवी के एक कार्यक्रम में संगीतकार राम संपत ने इसका एक नया आधुनिक  संस्करण पेश किया है। इस गाने को उनकी ख्यात गायिका पत्नी सोना महापात्रा ने गाया है। सोना कटक की हैं, कुछ भारी लेकिन दमदार आवाज वाली सोना ने रंगबती गाने में नई जान डाल दी है। वैसे सोना इस गाने को पहले भी गाती रही हैं, लेकिन इस बार उन्होंने इस गाने को बहुत मन से गाया है।
रविवार को यह गाना मेरे हाथ लगा, मुझसे बड़े भाई ने वाट्सएप से भेजा, सुनकर आंखों में आंसू आ गए। लगा कि हम बेवकूफ रंगबती से जितने दूर आ गए, कितना पीछे छूट गया अपना राउरकेला, उड़ीसा।
वैसे इस गाने में रितुराज मोहंती भी हैं, जो उड़ीसा में ही पुरी के पास के हैं। रितुराज ने रिमिक्स का आगे का हिस्सा गाया है, जिसमें रंगबती के बोल नहीं हैं, कुछ और है.
काश! इस गाने को राम संपत युगल गीत ही रखते। मतलब पुरुष आवाज में रितुराज और महिला आवाज में सोना. वास्तव में रंगबती एक युगल गीत है, उसका पूरा अर्थ तभी उभरता है।
पुरुष पहले गाता है...
ए रंगबती रे रंगबती
रंगबती-रंगबती कनक लोता हसी पदे कह लो कोथा।
उसके बाद स्त्री गाती है...
हाय गो लाजे-लाजे गो लाजे-लाजे
लाज लागे नोई जाउछे माथा गो
नाईकर नाईकर ओथा...
कोई बात नहीं, सोना ने अकेले ही गाया है, लेकिन इससे सुनने वाले का मजा तो इसलिए भी बना रहेगा, क्योंकि यह गीत कालजयी का दर्जा रखता है, लेकिन समझने वाले को दिक्कत होगी।
खैर, बताते चलें कि रंगबती का अर्थ है रंगों वाली या कलरफुल लड़की अर्थात रंगवती।
इस गीत का मुखड़ा कुछ हिन्दी में बनाएं, तो संगीत को पकडऩा कठिन है, लेकिन अर्थ और भाव यों बनेगा - 
नायक गाता है...
ए रंगवती रे रंगवती...
रंगवती-रंगवती कनक लता हंसो कुछ कहो न बात।
नायिका गाती है... 
हाय ओ लाज-लाज ओ लाज-लाज
लाज लगे झुकता है माथा ओ
ना करो ना करो ऐसा।)

यह कोसली या संबलपुरी भाषा है। यह भाषा संबलपुर और उसके आसपास के सभी जिलों में आज भी बोली जाती है। भाषा बड़ी ही मीठी है, तो इसका असर बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और बंगाल तक दिखता है। यहां की भाषा शब्दों से अलग अनेक प्रकार की मीठी ध्वनियां हैं.. ए, ऐ, ओ, गो, हाय इत्यादि...
बहरहाल इस गीत को लेकर कॉपीराइट का एक मुकदमा किया गया है, जिसमें इस गीत के वास्तविक लेखक मित्रभानु गोंटिया और संगीतकार प्रभुदत्ता प्रधान ने राम संपत, सोना महापात्रा, एमटीवी व अन्य को घेर लिया है। मूल लेखक, मूल संगीतकार को पूरी तरह से श्रेय नहीं दिया गया है और ना ही इस गीत का रिमिक्स बनाने की मंजूरी ली गई है।
रही बात इसके मूल गायक जीतेन्द्र हरिपाल की, तो उन्हें लोग कम ही याद करते हैं। देश के बड़े पत्रकार पी. साईनाथ ने हरिपाल को आज से करीब 15  साल पहले संबलपुर के स्लम एरिया में खोज निकाला था। हरिपाल जीवित हैं। उनका गाया गीत आज उड़ीसा का सबसे समृद्ध गीत है, लेकिन हरिपाल आज भी गरीब हैं। डोम जाति के हरिपाल शिक्षा और संगीत की दीक्षा से आज भी परे हैं और जानने वाले बताते हैं कि शराब उनकी राह में बड़ी बाधा रही है।
हरिपाल की आवाज जब उड़ीसा और उसके आसपास के लोगों के कानों में गूंजती है या जब उनकी आवाज याद आती है, तो उत्कल प्रेमी हर व्यक्ति मचल उठता है। यह एक तरह से उड़ीसा का उत्सव गीत है। कोई भी पार्टी, पूजा पंडाल हो, यात्रा हो, विवाह हो, बैंड हो, रंगबती का बजना अनिवार्य है। हरिपाल की आवाज में जो लय, मस्ती और मिठास है, वह अंदर तक मन को सजल कर देती है। हरिपाल को याद करें, तो इसी गाने की स्त्री आवाज कृष्णा पटेल को भी अवश्य याद करना चाहिए। ये सब आमतौर पर गुमनामी में जीने वाले लोक कलाकार हैं, जिनको पूरा फोकस कभी नसीब नहीं होता। 
बेशक, रिमिक्स में राम संपत ने गाने को निखार दिया है, यह गाना पिछले सप्ताह यू ट्यूब पर जैसे ही लोड हुआ, उसे लाखों लोग ने हिट किया। कई लोग होंगे, जो इस गाने के लिए राम संपत और सोना महापात्रा को ही श्रेय देंगे, लेकिन क्या हरिपाल, कृष्णा, मित्रभानु, प्रभुदत्ता को भुला दिया जाए? नहीं, इस गीत के असली जन्मदाताओं को भूलना नहीं चाहिए। यह गीत अपने होने में नई पीढ़ी को इतना पुराना लगता है, मानो यह सदियों से उड़ीसा में रहा हो, जबकि इस गीत को बमुश्किल ३५-४० साल हुए हैं। सबसे खूबसूरत बात यह कि इसे बनाने वाले अभी जीवित हैं, लेकिन सबसे दुखद बात यह कि दुनिया उन्हें भूल-सी गई है। आज उन्हें फिर याद किया जा रहा है. रिमिक्स अगर कहीं मारता है, तो कहीं जिंदा भी तो करता है। राम संपत के काम को नकारा नहीं जा सकता। रिमिक्स ने रंगबती और उसके असली सृजनकर्ताओं को चर्चा में फिर जीवित कर दिया है, फैसला तो कोर्ट में होगा, लेकिन कोर्ट से बाहर रंगबती का आनंद क्यों खराब किया जाए। अपने दिल के पास चलते रहना चाहिए
ए रंगबती रे रंगबती...
ओ रंगबती रे रंगबती...

Friday, 20 February 2015

खींचन गांव/फलोदी, शुक्रवार ३० जनवरी की सुबह

कोई सरहद ना इन्हें रोके...



दूर देश से चले आते हैं पक्षी...दूर देश को चले जाते हैं...क्योंकि  इन्होंने दुनिया को नहीं बांटा...। साइबेरिया और अन्य उसके आसपास के इलाको में जब बर्फ जमने लगती है, जब वहां कुरजां पक्षी दाने को मोहताज होने लगते हैं, तब उन्हें भारत की याद सताती है और सबसे ज्यादा याद आता है फलौदी का खींचन गांव। वे पांच हजार किलोमीटर से भी ज्यादा दूरी से उड़े चले आते हैं। हवाओं को पहचानते और भारत की सुगंध को याद करते हजारों की संख्या में...आकार बनाकर, समूह बनाकर, अपना एक आदर्श नेता बनाकर पूरे अनुशासन में उड़ते...वाकई इन्हें देखकर मन कह उठता है...कोई सरहद ना इन्हें रोके..


खींचन गांव/फलोदी। लगता है, यह कुरजां का अपना गांव है। एक साथ दस-बारह हजार की संख्या में एक ही प्रजाति के पक्षी को देखना रोमांच पैदा कर देता है। अंग्रेजी के वी अक्षर के आकार में समूह के समूह दूर धोरों से उड़कर आते कुरजांओं के कलरव से इन दिनों खींचन गांव आबाद है। खेतों, तालाबों, धोरों, मैदानों से लेकर आकाश तक कुरजांओं का हुजूम दिखाई पड़ता है।

रंग और मफलर
सजग, तेज, लंबी टांग, सुगढ़ पंखों वाले कुरजां हजारों किलोमीटर की दूरी तय करते हैं। उन्हें आकाश ने अपना रंग दिया है और प्रकृति ने उनके गले में हल्का काला मफलर-सा डाल रखा है। काफी ऊंचाई पर उड़ते हुए ठंड से ये मफलर ही उन्हें बचाते होंगे। मोर के आकार-आकृति का यह लाल आंखों वाला तीन से पांच किलोग्राम का पक्षी सदियों-पीढिय़ों से भारत और साइबेरिया के बीच की दूरियां नापता आया है। बताते हैं, इनकी उम्र २५ साल तक होती है, यानी वे २५ बार भारत आकर लौट जाते हैं।

छह महीने का डेरा 
वे यहां छह महीने ही रहते हैं और फिर पांच हजार किलोमीटर दूर चले जाते हैं। लोगों को आश्चर्य होता है, दुनिया भर के पक्षी प्रेमी और विशेषज्ञ खींचन आते हैं। बताते हैं कि साइबेरिया में इन्हें देखना मुश्किल है, लेकिन भारत में ये सहज दिखते हैं। इनके जीवन, यात्रा और संघर्ष पर शोध जारी है।

जरा फासले से मिला
रो
वे बहुत सतर्क रहते हैं। मोटरसाइकिल की आवाज सुनकर भी इनकी गर्दनें सीधी हो जाती हैं, इनकी आवाज में चेतावनी का तीखापन बढ़ जाता है। शुक्रवार ३० जनवरी की सुबह एक छोटा-सा पिल्ला कुरजांओं के मैदान में टहल रहा था, कुरजांओं ने उससे भी लगभग दस मीटर की दूरी बरकरार रखी। जब ये अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त हो जाते हैं, तब उनके कलरव में कमी आ जाती है और दाना चुगने या सुस्ताने लगते हैं। एक समूह दाना चुगकर उड़ता है, तो दूसरा समूह आ जाता है।

जो नहीं लौट पाते
कुरजांओं के समूह में कुछ कुरजां गाढ़े रंग के अलग नजर आते हैं। ये वे कुरजां हैं, जो किन्हीं कारणवश पिछले साल भारत में ही रह गए थे, उड़कर न जा पाए थे। भारत की आबोहवा ने उनका रंग बदल दिया। पक्षी जानकार बताते हैं, अब इस साल जब गर्मियों की आहट पर कुरजां यह देश छोडऩे लगेंगे, तब पिछले साल छूटे हुए कुरजां भी उनके साथ ही उड़ चलेंगे। वे मार्च तक चले जाएंगे, फिर सितंबर में लौट आने के लिए।

Tuesday, 15 July 2014

कुछ सीखो समाज

हम इंसान चाहें, तो सब संभव है। इरादा नेक हो, तो हम यहीं स्वर्ग सजा सकते हैं और अगर बुरा हो, तो नर्क पसारने में जरा भी वक्त नहीं लगता। अजमेर के कायड़ गांव के लोगों ने जो किया है, वह वास्तव में अपने इलाके को स्वर्ग बनाने की दिशा में उठाया गया शानदार कदम है। गांव वालों ने हत्या के चार आरोपियों और उनके परिजनों के सामाजिक बहिष्कार का फैसला कर एक स्वागतयोग्य और अनुकरणीय फैसला किया है। वरना आम तौर पर होता यह है कि ज्यादातर लोग अपनी गली के बदमाश के साथ खड़े नजर आते हैं और साथ ही, यह भी चाहते हैं कि कोई बाहर वाला आए और बदमाश को हथकड़ी लगाकर घसीटते हुए ले जाए। ऐसे बाहर वालों के इंतजार में गलियां बदमाशों से अट जाती हैं। गांव-मुहल्ले, कस्बे, शहर में हर जगह आपराधिक ·किस्म के लोग दिन दूनी-रात चौगुनी तरक्की  करते चले जाते हैं और हम लगातार शिकायत करते रहते हैं कि यह समय-समाज-दुनिया भले लोगों के रहने लायक नहीं रही। इस शिकायत से निकलकर हमें समाधान की ओर आना होगा और समाधान कायड़ गांव के लोगों ने बता दिया है। अपने देश-समाज में अपराधियों-असामाजिक तत्वों, महिलाओं से दुव्र्यवहार करने वालों, बलात्कारियों, अन्यायियों का बहिष्कार होना ही चाहिए। यदि हम इनका बहिष्कार नहीं करेंगे, तो समाज का परिष्कार नहीं होगा। कानून और जेल अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं। किसी लोकतांत्रिक देश में सकारात्मक सामाजिकता अगर विकसित हो जाए, तो कानून और जेल की ज्यादा जरूरत ही नहीं पड़ेगी। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि आज लोग बात-बात पर कानून हाथ में ले लेते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि उनका परिवार-समाज उनके साथ है, उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। लोगों और अपराधियों की यह भ्रांति टूटनी ही चाहिए। ऐसे तत्वों और उनसे जुड़े लोगों का बहिष्कार तभी खत्म होना चाहिए, जब समाज आश्वस्त हो जाए कि ये लोग फिर गलती नहीं दोहराएंगे। जिन अनगिनत पंचायतों-गांवों को प्रेमी जोड़ों और उनके परिजनों को निशाने पर लेते देखा गया है, उन्हें भी अपना लक्ष्य सुधारना चाहिए और अपराध-हीन समाज का सपना साकार करने की दिशा में बढऩा चाहिए।
गौर करने की बात है - पूर्वोत्तर भारत के कुछ राज्यों में कम अपराध होते हैं, थाना-पुलिस की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि वहां लोग सजग हैं। समाज से पहले परिजन ही दोषियों का बहिष्कार कर देते हैं। हर व्यक्ति इस बात को समझता है कि यदि उसने अपराध किया, तो उखाड़ फेंका जाएगा, अपने मां-बाप, समाज से बिछड़ जाएगा। जाहिर है - समाज जहां वास्तव में जागृत हैं, वहां अपराध के अंधेरे कम हैं। कायड़ गांव के लोगों ने सजग सामाजिकता का जो दीप जलाया है, उस ज्योत से ज्योत जलाते चले जाने की जरूरत है, तभी असामाजिकता के नाले-परनाले सूखेंगे और सच्ची-सहृदय सामाजिकता की पवित्र गंगा बह चलेगी।
(अजमेर राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित टिप्पणी)

Friday, 17 January 2014

'नूर' चला गया

महान अभिनेत्री सुचित्रा सेन श्रद्धांजलि
पारो या पार्वती की भूमिका को अभिनेत्री सुचित्रा सेन अर्थात रमा दासगुप्ता (जन्म १९३१) ने जीवंत कर दिया था, गर्वीली प्रेमिका क्या होती है, कैसी होती है, कितनी प्यारी और कितनी फिक्रमंद होती है, देवदास से शादी न होने दुख क्या है और एक बड़े उम्र जमींदार से शादी की मजबूरी क्या है, इसे सुचित्रा सेन ने अपने भावपूर्ण अभिनय से पर्दे पर उभार दिया। हिन्दी सिनेमा में देवदास को पर्दे पर तीन बार चरितार्थ किया गया। तीसरी वाली देवदास में शानदार अभिनेता शाहरुख खान ने प्रभावित तो जरूर किया, लेकिन असली देवदास फिर भी दिलीप कुमार ही कहे जाएंगे और असली पारो सुचित्रा सेन ही कहलाएंगी।
शादी के बाद फिल्मों में आने वाली सफल अभिनेत्रियों की जब गिनती होगी, तो सुचित्रा सेन का नाम सबसे ऊपर लिया जाएगा। बांग्ला सिनेमा की अब तक की सबसे बड़ी अभिनेत्री सुचित्रा ने केवल ७ हिन्दी फिल्मों में अभिनय किया। वैसे उन्होंने २५ साल के अपने करियर में करीब ६० फिल्मों में ही काम किया। राज कपूर और सत्यजीत राय जैसे बड़े निर्देशक भी उन्हें काम देना चाहते थे। बंगाल के एक बड़े व्यवसायी की पत्नी यह अभिनेत्री वाकई गर्व से भरपूर थी, उन्होंने चुन-चुनकर फिल्में कीं। संवाद अदायगी में उनका कोई मुकाबला नहीं था, बला की खूबसूरत थीं। मुखर चेहरा, बोलती आंखें, भरा-पूरा शुद्ध बंग्ला सौन्दर्य, पूरी एक संस्कृति को अपने में समेटे हुए। परंपराओं को ढोते हुए नहीं, बल्कि अपनी सम्पूर्णता में समेटे हुए। बनावटपन से दूर, स्तब्ध कर देने वाला प्रभाव। अभिनय की गजब की टाइमिंग। आज भी अगर किसी अभिनेत्री को संवाद अदायगी सीखनी हो, तो सुचित्रा मास्टर साबित हो सकती हैं। संवाद अदायगी में सांसों का खेल इन्हें भी खूब आता था। सात्विक अभिनय में वे सिद्ध थीं, अभिनय का स्रोत उनके अंदर से फूटता था और वे यह आभास नहीं होने देती थीं कि वे अभिनय कर रही हैं। वाचिक अभिनय की गंभीर नारी अनुकूल ऊंचाई उन्होंने प्राप्त की और आने वाली पीढिय़ों को प्रभावित-प्रेरित किया। 
वे भारत की पहली ऐसी महिला अभिनेत्री थीं, जिन्हें अभिनय के लिए अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। वर्ष १९६३ में मास्को फिल्म फेस्टिवल में बांग्ला फिल्म 'सात पाके बंध' में अभिनय के लिए उन्हें यह पुरस्कार मिला था।
बांग्ला सिनेमा के एक सफलतम अभिनेता उत्तम कुमार के साथ उनकी जोड़ी स्वर्णिम मानी गई। दोनों ने साथ मिलकर अनेक अच्छी फिल्मों में काम किया और दोनों ही बांग्ला सिने जगत के सुपर स्टार रहे। सुचित्रा सेन को हिन्दी सिनेमा में हमेशा 'देवदास' के लिए याद किया जाएगा और निर्देशक-गीतकार-लेखक गुलजार की प्रसिद्ध विवादास्पद फिल्म 'आंधी' में अभिनय के लिए भी उन्हें कोई भूल नहीं पाएगा। दिलीप कुमार के साथ एक अन्य फिल्म 'मुसाफिर' में भी सुचित्रा सेन ने अभिनय किया था। सुचित्रा एक ऐसी अभिनेत्री थीं, जिनके सामने सिद्ध अभिनेता ही टिक पाते थे। उनका नायक चुनते समय यह सोचना पड़ता था कि कहीं जोड़ी बिगड़ न जाए। सिद्ध अभिनेता संजीव कुमार ने 'आंधी' में उनका बखूबी साथ निभाया। कौन भूल सकता है . . . तुम आ गए हो, नूर आ गया है, नहीं तो चिरागों से लौ जा रही थी. . .
वाकई नूर की तरह थी सुचित्रा सेन। एक ऐसा चेहरा या एक ऐसी छवि, जिसके साथ-साथ 'नोस्टेल्जिया' चलता है। देखकर लगता है, इनके पीछे एक लंबा समृद्ध इतिहास है, मूल्य बोध से लैस अनेक किस्से और जीवन वृतांत हैं। एक ऐसी छवि जिसके अंदर झांककर उसका दर्द या मर्म जानने की अनायास इच्छा होती है। दर्शक देवदास के लिए नहीं, बल्कि पारो के लिए ज्यादा रोते हैं। बेवफाई पारो ने नहीं की है, देवदास ने की है। पारो तो अपना सर्वस्व पीछे छोड़ आई थी देवदास के लिए, लेकिन मूर्ख देवदास ने लौटा दिया। प्रेम का दर्द तो है ही, साथ ही लौटा दिए जाने का भी दर्द है। ठुकरा दिए जाने का दर्द उतना नहीं होता है, जितना लौटा दिए जाने का दर्द होता है। ठुकरा दिए जाने में वापसी की संभावनाएं टूट-सी जाती हैं, जबकि लौटा दिए जाने में फिर लौटने की संभावना सदैव रहती है, लौटा दिए जाने में प्रेम भी निहित होता है। यह प्रेम जीने नहीं देता और दुनिया आखिरी समय पर पारो को देवदास से मिलने नहीं देती है। पारो को देखकर ही लगता है कि कहीं कुछ छूट-सा गया है, कहीं कुछ टूट-सा गया है। सुचित्रा सेन अगर न होती, तो शायद पारो का दर्द पर्दे पर पूरी तरह से न आ पाता। 
इसमें कोई शक नहीं, सुचित्रा भारत की ऐसी बड़ी अभिनेत्रियों में शामिल रही हैं कि जिनकी क्षमता के साथ पूरा न्याय नहीं हुआ। हिन्दी फिल्मों को उन्होंने ज्यादा समय नहीं दिया, वे रिजर्व किस्म की अभिनेत्री रहीं और उन्होंने १९७८ के बाद खुद को फिल्मों से अलग भी कर लिया। बहुत मिलना-जुलना दिखावा करना उन्हें कभी रास नहीं आया। उन्हें पुरस्कार भी ज्यादा नहीं मिले। बताया जाता है कि वर्ष २००५ में उन्हें भारत सरकार ने सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फालके देने की तैयारी की थी, लेकिन सुचित्रा ने इसमें ज्यादा रुचि नहीं दिखाई और दिल्ली जाने को तैयार नहीं हुईं और सम्मान से वंचित रह गईं।
हिन्दी सिनेमा उनके बिना अधूरा है और बांग्ला सिनेमा के लिए तो उनका जाना महाशोक की तरह है।
(सिनेमा पर लिखी जा रही पुस्तक का एक अंश)

Friday, 13 December 2013

दिलीप कुमार और भारत-पाकिस्तान मैत्री

(अपने प्रिय और भारत के सबसे ख्यात पद्धतिबद्ध अभिनेता दिलीप कुमार पर लिखे गए एक लम्बे लेख का अंश, उनके 92 जन्मदिन पर. )

दिलीप कुमार पाकिस्तान में भी बहुत लोकप्रिय हैं, पाकिस्तान के दर्शक भी उन्हें अपना कलाकार मानते हैं। पाकिस्तान की धरती और वहां के लोगों के प्रति दिलीप कुमार ने हमेशा प्रेम दर्शाया है। वे कभी भूल नहीं पाए कि वे भी पाकिस्तानी जमीन - पेशावर से भारत आए थे और पूरे होशो-हवाश में आए थे। पाकिस्तान की यादें उनके दिमाग में हमेशा बसी रहीं, उनके दिल ने कभी पाकिस्तान को पराया नहीं माना। अगर हम गौर करें, तो दिलीप कुमार ही नहीं, उनके दौर के बहुत से लोग न कभी कट्टर पाकिस्तानी हो पाए और न कभी कट्टर हिन्दुस्तानी, ये लोग भारत वर्ष में ही छूट गए। वे हमेशा उस अविभाजित भारत के ही नागरिक बने रहे, जिसे सियासत ने साजिश करके मजहब के आधार पर बांट दिया। विभाजन के समय ढेर सारे मुस्लिम पाकिस्तान लौट गए, कलाकारों की दुनिया में भी बंटवारा हुआ, लेकिन दिलीप कुमार ने यह जान लिया था कि कला की बड़ी दुनिया भारत वर्ष की इस विशाल भूमि पर विकसित होगी। उनका आकलन सही साबित हुआ, उन्हें कभी भी भारतीय दर्शकों ने धर्म के आधार पर नहीं आंका। उनकी फिल्मों को उतना ही प्यार मिला, जितना राज कपूर और देव आनंद की फिल्मों को मिला। 
पाकिस्तान और भारत की दोस्ती के बारे में वे हमेशा सोचते रहे और इसमें जहां तक हो सका, उन्होंने अपना सहयोग दिया। भारत और पाकिस्तान की मैत्री के सतत प्रयास करने वाला उनके जैसा कोई दूसरा अभिनेता न तो सीमा के इस पार हुआ और न उस पार। जब दुश्मनी की बयार चलती थी, तब भी दिलीप कुमार दोस्ती की धुन में मस्त रहते थे, वे दोस्ती के प्रति कभी निराश नहीं हुए। वर्ष १९९९ में जब कारगिल संघर्ष के बाद देश में पाकिस्तान के खिलाफ माहौल था, शिव सेना इत्यादि पार्टियों ने साफ-साफ कहा कि दिलीप कुमार पाकिस्तान द्वारा दिया गया सर्वोच्च सम्मान 'निशान-ए-इम्तियाज' लौटा दें, लेकिन दिलीप कुमार ने तब भी भारत-पाकिस्तान की मैत्री की ही बात की और साफ कर दिया कि बांटने की राजनीति उन्हें बदल नहीं सकती।
वैसे यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि पाकिस्तान ने दिलीप कुमार के काम, योगदान, बयान से कुछ भी नहीं सीखा। पाकिस्तान के लोग बस इसी बात में मस्त रहे कि ये उनके धर्मभाई यूसुफ खान हैं, जो भारतीय फिल्म दुनिया पर राज कर रहे हैं। उनकी यह धारणा है कि यह महानायक पाकिस्तान की जमीन पर जन्मा है, तो पाकिस्तान का ही है। जबकि वास्तव में दिलीप कुमार पाकिस्तान की जमीन पर नहीं, अविभाजित भारत की जमीन पर जन्मे थे। किसी को भी इस बात पर आश्चर्य होगा कि दिलीप कुमार ने करीब ६१ फिल्मों में काम किया, जिसमें से केवल तीन ही फिल्मों में उन्होंने हिन्दू का किरदार नहीं निभाया। वर्ष १९६० में बनी 'मुगल-ए-आजम' में शहजादा सलीम के उनके किरदार से सभी परिचित है, लेकिन उनके द्वारा निभाया गया कोई अन्य मुस्लिम चरित्र लोगों को याद नहीं होगा। फिल्म दुनिया में आने के ११ साल बाद १९५५ में उन्होंने पहली बार किसी मुस्लिम का किरदार निभाया। इस वर्ष फिल्म 'आजाद' में अब्दुल रहीम खान की भूमिका निभाई, हालांकि इस फिल्म में वे एक हिन्दू किरदार में भी रहे। १९५८ में आई 'यहूदी' में वे शहजादा मार्कस के किरदार में रहे।
बहुतों को आश्चर्य होगा कि भारतीय यूसुफ खान ने जगदीश (फिल्म - ज्वार भाटा - वर्ष १९४४) के किरदार से फिल्मों में शुरुआत की थी और जगन्नाथ (फिल्म - किला - १९९८) के किरदार के साथ विदा हुए। दिलीप कुमार को मजहबी नजरिये से देखने वाले आश्चर्य करेंगे कि राम, रमेश, गंगाराम, श्याम, मोहन और शंकर जैसे नाम उन पर खूब जमते थे। वे कम से कम तीन बार राम बने और तीन बार शंकर।
इन तथ्यों की रोशनी में अगर हम दिलीप कुमार के सामाजिक योगदान पर चर्चा करें, तो भारत में धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में उनके सामने कोई नहीं टिकता। यदि पाकिस्तान के लोग भारतीय दिलीप कुमार के सामाजिक योगदान पर थोड़ी भी निगाह डालेंगे, तो उन्हें पता चलेगा कि भारत वास्तव में किस चीज का बना है और धर्मनिरपेक्षता किसको कहते हैं। दिलीप कुमार एक प्रतीक हैं, जिन पर भारतीयता गर्व कर सकती है। भारत में प्रगतिशील सामाजिकता के निर्माण में उनका योगदान सर्वाधिक है, वे सांप्रदायिक घृणा की दीवारों को गिरा देते हैं। उनके बारे में कोई भी यह नहीं कह सकता कि राम, श्याम, शंकर इत्यादि नाम से किरदार निभाने में उनका क्या योगदान है। हमें यह पता होना चाहिए कि निर्माताओं और निर्देशकों से बहुत विचार-विमर्श के बाद ही दिलीप कुमार किसी फिल्म में अभिनय के लिए तैयार होते थे। वे न केवल अपने किरदार में बदलाव करते थे, बल्कि वे कहानी में भी बदलाव करते थे, अपनी फिल्म की पूरी योजना में वे शामिल रहते थे। इसलिए जो नाम उन्होंने अपने किरदारों के लिए चुने, उसके लिए उन्हें पूरा श्रेय देना चाहिए। दरअसल, उन्हें पता था कि कौन-सा नाम किस किरदार के ज्यादा मुफीद रहेगा और किन नामों की पहुंच लोगों तक सबसे ज्यादा होगी। वे चाहते, तो ऐसे नाम भी चुन सकते थे, जिनमें किसी हिन्दू ईश्वर के नाम का स्पर्श नहीं होता, लेकिन फिल्मों के प्रभाव के बारे में उनकी समझ बेमिसाल थी। उनके किरदारों के नाम भले राम, रमेश, शंकर, श्याम रहे, लेकिन उन्हें भारतीय मुस्लिम समाज ने भी दिलोजान से पसंद किया। उन्हें यह बात कभी नहीं चुभी की कोई यूसुफ खान राम, रमेश, शंकर, श्याम की भूमिका क्यों निभा रहा है। यही भारतीय समाज की ताकत है। भारतीय समाज को अपना सकारात्मक संदेश देने में दिलीप कुमार एक विचारवान अभिनेता के रूप में बहुत सफल रहे।
निश्चित रूप से भारतीय समाज में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा। सामाजिक समरसता ही नहीं, राष्ट्रीय एकता और राष्ट्र प्रेम के मामले में भी उनका योगदान अतुलनीय है। आप क्रांति (१९८१) देखिए या कर्मा (१९८६) दिलीप कुमार अपने अनुपम अभिनय से देश प्रेम को ऐसी ऊंचाई पर पहुंचा देते हैं कि हर दिल उनके साथ गा उठता है :
हम जीयेंगे और मरेंगे,
ऐ वतन तेरे लिए,
दिल दिया है, जां भी देंगे,
ऐ वतन तेरे लिए।
दिलीप कुमार का जो वतन है, उसमें पाकिस्तान अनायास शामिल है। वे पाकिस्तान को अलग रखकर सोच ही नहीं सकते, पाकिस्तान को अलग रखकर सोचना उनके लिए अपने आप को बांटकर सोचने जैसा है। उनके लिए मजहब के खांचे में सोचना मुश्किल है, इस गीत को दिलीप कुमार आगे बढ़ाते हैं -
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
हम वतन हम नाम हैं,
जो करे इनको जुदा
मजहब नहीं इल्जाम है।
हम जीयेंगे और मरेंगे,
ऐ वतन तेरे लिए...
कट्टरता बहुत टुच्ची चीज होती है, उदारता - सहिष्णुता सदैव महान होती है। बहुत सारे लोग यह सपना देखते थे कि पाकिस्तान और भारत में दोस्ती हो जाएगी, कई लोगों का यह सपना समय के साथ टूटता गया। एक युद्ध, दो युद्ध, छद्म युद्ध और फिर सतत आतंकवाद ने पूरी दुनिया को पाकिस्तान के बारे में फिर से सोचने पर विवश कर दिया, लेकिन दिलीप कुमार ने कभी यह आभास नहीं होने दिया कि वे अपनी सोच बदलने पर काम कर रहे हैं। दिलीप कुमार जैसों के बारे में वे लोग कभी ईमानदारी से नहीं सोच पाएंगे, जो १९४७ के बाद पैदा हुए हैं। हालांकि १९४७ से पहले ही अपना विचार पुख्ता करने वाले ऐसे लोग ज्यादा रहे हैं, जिन्होंने भारत और पाकिस्तान के अलग-अलग खांचों पर रहकर सोचना शुरू कर दिया, लेकिन दिलीप कुमार वाली जमात भी रही, जो चाहकर भी अलग-अलग खांचों में नहीं सोच पाई। उनकी मानसिकता में वह विशाल देश ठहर-सा गया, जो वाकई सदियों से महान था। वह ऐसा महान देश था, जिसमें कभी घृणा के बीज जड़ें नहीं जमा पाए, घृणा के थपेड़ों को पछाड़ कर वह महान देश आगे बढ़ता गया। दुर्भाग्य से बाद में वह बंटा, नतीजतन कुछ लोग टूट गए, लेकिन कुछ लोग नहीं टूटे, उनमें से एक नाम दिलीप कुमार हैं। दौर कोई भी हो, प्रेम का स्थान घृणा से सदैव ऊपर रहेगा, दोस्ती का स्थान दुश्मनी से सदैव ऊपर रहेगा।
बेशक, यह अच्छा हुआ कि दिलीप कुमार पाकिस्तानी जमीन पर नहीं गए, वहां चले जाते, तो वे इतने बड़े कलाकार कभी नहीं हो पाते, यह वास्तव में पाकिस्तान के लिए भी लाभकारी रहा। पाकिस्तान के लोग जब भी पलटकर दिलीप कुमार का ईमानदार अध्ययन करेंगे, तो उन्हें पता चलेगा कि उन्होंने क्या खो दिया और उनके बड़े पड़ोस ने क्या खूब पा लिया। आज हिन्दुओं के बीच एक यूसुफ खान है, जो बताता है कि धर्मनिरपेक्ष भारत कैसा होना चाहिए।
हालांकि वे कभी नहीं चाहेंगे कि उन्हें मजहब के चश्मे से देखा जाए। वे यही मानेंगे कि कलाकार के लिए समाज सापेक्ष कला सबसे बड़ी चीज है। मजहब यहां खास मायने नहीं रखता। यहां इंसानियत और कलाकारी ही मायने रखती है। उन्होंने फिल्मों के जरिये भी कभी घृणा का व्यवसाय नहीं किया। वे हमेशा ही 'गाये जा गीत मिलन के...' वाले मूड में रहे। यह गौर करने की बात है कि यह 'मेला' फिल्म १९४८ में बनी थी, जब देश का विभाजन हो चुका था और उसका दर्द हावी था। बाद में दोनों ओर के माहौल के कारण जिस जगह वे घिरे रहे, उसका भी अफसोस हम पढ़ सकते हैं, 'ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल...' (आरजू - १९५०), तो कभी 'ऐ मेरे दिल कहीं और चल', (दाग - १९५२)। कहीं न कहीं उनके अंदर बेचैनी थी, जो मुखर हो रही थी। शायद अनायास ही हो, लेकिन उनकी तड़प में अकेलापन, विरह या भटक जाने का भाव शामिल था। पाकिस्तान वास्तव में भारत से केवल अलग ही नहीं हुआ, बल्कि अलग-थलग हो गया। बहुत सारे लोग मजहब के आधार पर पाकिस्तान चले गए थे, लेकिन दिलीप कुमार नहीं गए। वे संभवत: पाकिस्तान न जाकर भारत को चुनने वाले सबसे बड़े मुस्लिम अभिनेता थे। उनके अलावा निर्देशकों में सबसे बड़े महबूब खान, संगीत निर्देशकों में सबसे बड़े नौसाद और फिल्मी लेखकों में सबसे बड़े ख्वाजा अहमद अब्बास पाकिस्तान नहीं गए। यह सेकुलर भारत की एक बड़ी सफलता थी और मजहबी पाकिस्तान की एक बड़ी विफलता। वैसे यहां यह भी जोडऩा उचित होगा कि पाकिस्तान के निर्माता स्वयं मोहम्मद अली जिन्ना की इकलौती बेटी डिना वाडिया भी पाकिस्तान नहीं गईं। उनका मायका भी भारत था और ससुराल भी भारत रहा। 
खैर, अगर हम ध्यान दें, तो कहीं न कहीं भारत को चुनने वाले फिल्मी कलाकारों का काम पाकिस्तान को सम्बोधित लगता है। अगर भावना प्रधान होकर देखा जाए, अगर सिनेमा के जरिये भारत-पाकिस्तान के रिश्ते को देखा जाए, तो विशेष रूप से दिलीप कुमार पाकिस्तान को कुछ ज्यादा ही सम्बोधित करते लगते हैं। उनके कई गीत फिल्मी परदे से बाहर आकर एक अलग ही व्यापक अहसास पैदा कर देते हैं। जैसे १९५८ में आई उनकी एक फिल्म 'यहूदी' का एक गीत है, जिसे शैलेन्द्र ने लिखा है और शंकर-जयकिशन ने संगीत दिया है, मुकेश ने गाया है : ये मेरा दीवानापन है या मोहब्बत का सुरूर. . .
क्या उस दौर में भारत को रहने के लिए चुनना किसी दीवानेपन से कम था, इस माटी से मोहब्बत का सुरूर भी तो था। गीत इस तरह से शुरू होता है :-
दिल से तुझको बेदिली है, मुझको है दिल का गुरूर
तू ये माने के ना माने, लोग मानेंगे जरूर।
पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क हो गया, जिसे अपने दिल से ही बेदिली हो गई, दिल का कद्र न हुआ और भारत ऐसा है कि जिसे बड़े दिल वाला होने का घमंड हो गया। पाकिस्तान भले इस बात को न माने, लेकिन दुनिया यही मानती है। क्या ऐसा नहीं लगता कि 'यहूदी' फिल्म का नायक उलाहना दे रहा है, यह उलाहना नायिका के लिए है, लेकिन अगर नायिका की जगह पाकिस्तान को रखकर देखें, तो क्या होगा? नायक बोल रहा है :-
ये मेरा दीवानापन है, या मोहब्बत का सुरूर
तू न पहचाने तो है ये, तेरी नजरों का कुसूर
क्या यह बात भारतीयों के मन में नहीं आती है कि भारत की मोहब्बत को पाकिस्तान पहचान न सका, पाकिस्तान की नजरों का कुसूर था, जो उसने भारत में अपने सबसे बड़े दुश्मन को देखा। लेकिन देखिए फिर भी ज्यादातर भारतीय या दिलीप कुमार जैसे महान लोग यही उम्मीद करते हैं :-
दिल को तेरी ही तमन्ना दिल को है तुझसे ही प्यार
चाहे तू आए ना आए, हम करेंगे इंतजार।
बेशक, मिलन का चाह रखने वालों को निराशा हाथ लगती है। खत्म होते जा रहे हैं वो लोग, जो उन इलाकों में जन्मे थे, जो पाकिस्तान के नाम से जाना जाता है, एक दिन शायद खत्म हो जाएगी दिलीप कुमार की वह पीढ़ी, जो सेकुलर होने और मिलकर रहने का संदेश देती है। लगातार बंदूकें चल रही हैं, दहशतगर्द अमन-चैन को नाजुक मौका देखकर आग लगाने के लिए चप्पे-चप्पे पर फैल गए हैं, सिर काटे जा रहे हैं, दुश्मनी का वीराना-सा तैयार होता जा रहा है :-
ऐसे वीराने में एक दिन घुट के मर जाएंगे हम।
जितना जी चाहे पुकारो, फिर नहीं आएंगे हम।
ये मेरा दीवानापन है. . .। 
दिलीप कुमार का दिल जानता होगा कि हमने कितना कुछ खो दिया है। वे पाकिस्तान के बारे में जब बात करते हैं, तब कितना प्रेम झलकता है, मानो किसी अपने दिल के टुकड़े से बात कर रहे हों। पाकिस्तान ने क्या खो दिया है। लगातार हमले के बावजूद अपनी सेकुलरिटी बचाए रखने की कोशिश के साथ भारत कुछ खुश हो सकता है, लेकिन अंतत: खोया तो उसी अखंड भारत ने है, जिसमें दिलीप कुमार उर्फ यूसुफ खान जन्मे थे। यह बहुत जरूरी है कि पाकिस्तान के लोग दिलीप कुमार होने का मतलब समझें, तो वे भारत या हिन्दुस्तान का भी मतलब समझ पाएंगे।