हमारे देश के खेल में पिछड़ने के कई मूलभूत कारण हैं, लेकिन कुछ आधुनिक कारण भी हैं, जिनके बारे में हम भारतीय बहुत कम जानते हैं, कुछ ऐसे विषय हैं जिन पर हमे खूब काम करना होगा, जैसे
एक्ससाइज फीजियोलॉजी
खिलाडि़यों को ऐसे व्यायाम और उपाय सुझाने संबंधी विज्ञान जिससे उनकी प्रदर्शन क्षमता में अधितकम विकास होता है। व्यायाम हर खेल के हिसाब से बदलता है। हर खेल की अपनी एक खास फीजियोलॉजी होती है। हमारे ज्यादातर खिलाडि़यों को फीजियोलॉजी का जरूरी ज्ञान नहीं है।
स्पोट्र्स न्यूटि्रशन
खेल व खिलाड़ी के आकार-प्रकार के हिसाब से भोजन तय होता है। कई खेल हैं, जिनमें प्रदर्शन सुधारने के साथ ही अपना वजन भी नियंत्रित रखना होता है। खिलाडि़यों को उचित पोषण देने का काम स्पोट्र्स न्यूटि्रशन के तहत आता है। भारत अभी इस मामले में शुरुआती स्तर पर है।
एंथ्रोपोमेट्री
एंथ्रोपोमेट्री में मानव के आकार या शारीरिक ढांचे का अध्ययन किया जाता है और अधिकतम या बेहतर प्रदर्शन के लिए आवश्यक सुधार किया जाता है। यथोचित पोषण, जीवन शैली और अन्य साधनों के दम पर शरीर के जरूरी हिस्सों को पुष्ट करने के उपाय आजमाए जाते हैं।
स्पोर्ट्स बायोकेमिस्ट्री
अभ्यास या व्यायाम के दौरान खिलाडि़यों के शरीर में निश्चित रूप से बायोकैमिकल या जैव-रसायन संबंधी बदलाव देखे जाते हैं और इन बदलावों को समझने, सुधारने या खेल अनुकूल बनाने का विज्ञान स्पोर्ट्स बायोकेमिस्ट्री कहलाता है। भारत में यह विज्ञान भी शैशव अवस्था में है।
स्पोर्ट्स मेडिसिन
खिलाडि़यों को विशेष प्रकार की दवाइयों की जरूरत होती है। सामान्य शब्दों में कहें, तो उन्हें ऐसी दवाओं की जरूरत पड़ती है, जिसमें दारू की मात्रा न हो। उन्हें दवा चाहिए, दारू नहीं, वरना वे डोपिंग के दोषी बन जाते हैं। भारत में स्पोर्ट्स मेडिसिन पॉपुलर नहीं हो सका है।
Tuesday, 26 August 2008
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3 comments:
nirali post
बहुत बढ़िया जानकारी.
gyan saager m humne bhi ek gota lga liye sir...
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